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लसूत्र. अष्टावक्र ने कहा, hey पुत्र. तू बहुत काल से देह अभिमान के पास में बंधा हुआ है. उस पास को मैं बोध हूं. इस ज्ञान की तलवार से काटकर तू सुखी हो.
अष्टवक्र की दृष्टि में और वही शुद्धतम दृष्टि है. अत्यंत दृष्टि है. बंधन केवल मान्यता का है. बंधन वास्तविक नहीं है कि रामकृष्ण के जीवन में ऐसा उल्लेख है कि जीवन भर तो उन्ह... | 280.466 | |
जनक ने कहा, ज्ञान, गे और ज्ञाता ये तीनों यथार्थ नहीं, जिसने यह तीनों भागते हैं, मैं वहीं निरंजन. ज्ञानम, game तथा ज्ञाता, त्रेतायम, नाचती, वास्तवम. कि जो भी दिखाई पड़ रहा है है जिससे दिखाई पड़ रहा है है और इन दोनों के beach संबंध है ज्ञान का या दर्शन पर जनक कहते हैं आज मैं जागा और मैंने देखा यह सब स्वप्न है है जो जागा ... | 6,328.299 |
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