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audio audioduration (s) 0.77 30 | text stringlengths 5 306 | duration float64 0.77 30 | source stringclasses 4
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|---|---|---|---|
अथवा निरर्थकात् पाठाद् वेदवादी स उच्यते वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकी | 7.43 | recitation_corpus | |
अन्नात्मनि शरीरे सौ व्यज्यते सुविवेकिभिः अन्नस्य सारभूतो यं शरीरस्य च केशवः | 15.47 | recitation_corpus | |
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते | 7.93 | recitation_corpus | |
घेति हावधृतिश्चैव सोमः सौम्यत्वतो हरिः उना मया च युक्तत्वादूमैर्युक्तत्वतो पि वा अमः स इति वा | 9.68 | recitation_corpus | |
स्थिरं चाज्ञानपापादि तद्भक्ताय पराहथ गुरूनपि नरान् नित्यं गुणैर्वर्तयथाञ्जसा पर्वतानां पृथिव्याश्च दिशो नित्यं वियाथन वनिनश्च तरून् सम्यग् भजनीयान् सुरान् हरिः | 14.28 | recitation_corpus | |
राजमार्गं गते कृष्णे द्वारकायाः कुलस् त्रियः हर्म्याण्यारुरुहुर्विप्रास्तदीक्षणमहोत्सवाः | 8.87 | scholar | |
महाव्याकरणे सूत्रमिति स्वरविनिर्णये ऋतं सत्यं परं ब्रह्मेत्याद्युद्देश्यद्वितीयका | 9.19 | scholar | |
यावदेतान् निरीक्षे हं योद्धुकामानवस्थितान् कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे | 9.1 | recitation_corpus | |
नैव देवपदं प्राप्ता ब्रह्मदर्शनवर्जिताः तिरोहितं तथा प्येते शृण्वन्ति क्रीडया थवा | 9.03 | recitation_corpus | |
मनीषिणः इति विशेषणात् पूर्वपक्षो पि ग्राह्य एव फलत्यागेन त्यागो विवक्षितो यज्ञादेस्तत्पक्षे यस्तु कर्मफलत्यागी इति च वक्ष्यति अत एक एवायं पक्षः | 15.65 | recitation_corpus | |
स जीवनामा भगवान् प्राणधारणहेतुतः उपचारेण जीवाख्या संसारिणि निगद्यते | 8.5 | recitation_corpus | |
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति | 8.57 | recitation_corpus | |
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथा परे स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः | 9.65 | recitation_corpus | |
उपलक्षणा च गौणी च तिस्रः शब्दस्य वृत्तयः प्रवृत्तिहेतोर्बाहुल्यं ज्ञेयं परममुख्यता | 8.85 | tts_aug | |
तथा प्युग्रं युद्धं कर्मेत्यत आह श्रेयानिति | 5.4 | recitation_corpus | |
विवादाध्यासिता सृष्टिश्चेतनेच्छानुसारिणी सृष्टित्वात् पटसृष्टिर्वेत्यनुमा पक्षसाधिका | 9.87 | tts_aug | |
अप्रकम्प्यवपुषं सुरासुरैः सिंहसंहननमेनमुन्नतम् प्राप्तमात्मनगरान्तिकं नृपः प्रेक्ष्य सौधशिखरे स्थितोब्रवीत् | 11.37 | tts_aug | |
अस्मत्पदैरान्तरत्वात् क्रियार्थैश्च तदन्वयैः परोक्षत्वात् तत्पदैश्च मुख्यवाच्यः स एव तु | 8.6 | recitation_corpus | |
दृष्टहानिरदृष्टस्य कल्पनेत्येव दूषणम् यदा तदधिको दोषो विद्यते को नु वादिनाम् | 6.19 | scholar | |
दोषारच्छिद्रशब्दानां पर्यायत्वं यतस्ततः गुणा नारा इति ज्ञेयास्तद्वान् नारायणः स्मृतः | 6.91 | scholar | |
एते पि मे भृत्यभूताः परिवार्य व्यवस्थिताः इति ज्ञापयितुं विष्णुः सह तैरप्युपागतः | 13.37 | recitation_corpus | |
यमाहुराद्यं पुरुषं सहस्राङ्घ्र्यूरुबाहुकम् यत्र विश्व इमे लोकाः सविकाशं समासते | 11.66 | scholar | |
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् | 9.99 | scholar | |
तत्र कामः कालनेमिः सर्वं धूममलोल्बवत् शुभमध्याधमजनं क्रमादावृत्य तिष्ठति | 7.15 | recitation_corpus | |
यस्मात् स्वतन्त्रकर्तृत्वं विष्णोरेव नचान्यगम् तदधीनं स्वतन्त्रत्वं स्वावरापेक्षयैव तु | 6.53 | recitation_corpus | |
इति ब्रह्माण्डे | 2.78 | recitation_corpus | |
लोकानामुपकृतये कुतः शिलेयं निन्ये नो इति जनता जगाद तत्र नेतारो यतिवर मानवा न हीमां भीमश्चेदिह यतते नयेन्न वेति | 12.65 | tts_aug | |
ते साधुकृतसर्वार्था ज्ञात्वा त्यन्तिकमात्मनः मनसा धारयामासुर्वैकुण्ठचरणाम्बुजम् | 8.19 | scholar | |
राज्यकामो मनून्देवान् निर्ऋतिं त्वभिचरन्यजेत् ग्रामकामो यजेत्सोममकामः पुरुषं पुमान् | 9.91 | scholar | |
अनाश्चर्यवदप्यसुरादयः पश्यन्तीति कश्चित् इति विशेषणम् | 5.55 | recitation_corpus | |
पश्य प्रयान्तीश्च भवान्ययोषितः स्वलंकृताः कान्तसखा वरूथशः यासां व्रजद्भिः शितिकण्ठ मण्डितं नभो विमानैः कलहंसपाण्डुभिः | 19.19 | scholar | |
तोकेन जीवहरणं यदुलूपिकायाः त्रैमासिकस्य च पदा शकटो पवृत्तः यद्रङ्गता न्तरगतेन दिवि स्पृशोर्वा उन्मूलनन्त्वितरथा र्जुनयोर्न भाव्यम् | 16.94 | scholar | |
शेषमित्राववाचीनौ वीन्द्रकामावुदक्तनौ सभार्याः कोणपैः सार्धं चत्वारो दिशिदिश्यपि | 14.73 | recitation_corpus | |
अनिवृत्तेस्तदर्थं हि जिज्ञासा त्र विधीयते यथा दृष्ट्या प्रसन्नः सन् राजा बन्धापनोदकृत् | 6.47 | scholar | |
तं त्वामाशास्महे वयम् | 3.08 | recitation_corpus | |
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् | 10.1 | recitation_corpus | |
समावर्तो निवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा | 9.45 | scholar | |
कथं वा पाण्डवेयस्य राजर्षेर्मुनिना सह संवादः समभूत्तात यत्रैषा सात्वती श्रुतिः | 6.15 | scholar | |
अहमेवैतत् पञ्चधा त्मानं विभज्यैतद् बाणमवष्टभ्य विधारयामीति ते श्रद्दधाना बभूवुः | 16.95 | recitation_corpus | |
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियो सि मे | 9.45 | recitation_corpus | |
इति वाराहे | 2.68 | recitation_corpus | |
तस्मादन्यत्रगैः शब्दैरुक्तन्यायैः समन्ततः एको नारायणो देवो भण्यते नात्र संशयः | 6.99 | scholar | |
हठलुठ दल घिष्टोत्कण्ठदष्टोष्ठ विद्युत् सटशठ कठिनोरः पीठभित्सुष्ठुनिष्ठाम् पठतिनुतव कण्ठाधिष्ठ घोरान्त्रमाला दह दह नरसिंहासह्यवीर्याहितंमे | 17.24 | tts_aug | |
किन्तर्हि आश्चर्यो भगवानेवेत्याह आश्चर्यवदिति आश्चर्यमेव सन्तम् एनमाश्चर्यवत् पश्यति न पुनरनाश्चर्यम् | 11.38 | recitation_corpus | |
जगद्रक्षासाधनान्यप्यनन्तान्यनन्तधा सन्ति पुनस्तवेश अगाधरूपा महती शुभा च मतिर्मम त्वद्विषये सदा स्तु ऋतज्ञानप्रतिरूपत्वहेतोर्निर्ऋत्याख्यां दुर्मतिं दूर एव बाधस्व दुर्ज्ञानिजनं निरस्य स्वर्गात् पराकृत्य च शश्वदेव कृतं च पापं प्रमुमुग्धि मत्तः | 24.88 | recitation_corpus | |
त्याज्या सर्वत्र ममता ज्ञात्वा सर्वं हरेर्वशे इति च | 4.08 | recitation_corpus | |
यच्छ्रद्धया श्रुतवत्या च भक्त्या संमृज्यमाने हृदये वधार्य ज्ञानेन वैराग्यबलेन धीरा व्रजन्ति यत् ते ङ्घ्रिसरोजपीठम् | 13.14 | scholar | |
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना | 7.68 | recitation_corpus | |
अथा न उ॒भये षा॒ममृ॑त॒ मर्त्या नाम् मि॒थः स न्तु॒ प्रश॑स्तयः | 8.47 | recitation_corpus | |
तद् ब्रह्म परमं शुद्धं सतां वर्त्म सनातनम् विगर्ह्य यात पाखण्डं दैवं वो भूतराट् सदा | 11.42 | scholar | |
सादृश्ये चैक्यवाक् सम्यक् सावकाशा यथेष्टतः अवकाशोज्झिता भेदश्रुतिर्नातिबला कथम् | 6.27 | scholar | |
तव प्रियतमादतिप्रियतम सदैवान्तरं पयस्युपहितं घृतं स्वयमिव श्रियो वल्लभम् विबुध्य लघुबुद्धयः स्वपरपक्षलक्ष्यायितं पठन्ति हि लुठन्ति ते शठहृदः शुचा शुण्ठिताः | 15.87 | tts_aug | |
सत्त्वं साधुगुणाद् विष्णुरात्मा सन्ततिहेतुतः इति च | 4.25 | recitation_corpus | |
गां पर्यटन् मेध्यविविक्तवृत्तिः सदा प्लुतो धःशयनावधूतः अलक्षितः स्वैरवधूतकेशो व्रतानि चेरे हरितोषणानि | 11.42 | scholar | |
द्र॒वि॒णो॒दा द्रवि॑णसो॒ ग्राव॑हस्तासो अध्व॒रे य॒ज्ञेषु॑ दे॒वमी॑ळते | 9.1 | recitation_corpus | |
अथैष सल्लोकदयासुधार्द्रया सदागमस्तेन निरासकामया रमावरावासभुवा विशारदो विशालयाचिन्तयदात्मनो धिया | 13.3 | tts_aug | |
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः | 8.87 | scholar | |
तदन्ये नैव च स्वर्गं यान्ति विष्णुबहिर्मुखाः इति नारदीये | 5 | recitation_corpus | |
अनादिमायया विष्णोरिच्छया स्वापितो यदा तया प्रबोधमायाति तदा विष्णुं प्रपश्यति | 12.6 | recitation_corpus | |
स तं महाभागवतं व्रजन्तं कौरवर्षभः विश्रम्भादभ्यधत्तेदं मुख्यं कृष्णपरिग्रहे | 12.14 | scholar | |
अवापुर्दुरवापं त असद्भिर्विषयात्मभिः विधूतकल्मषस्थानं विरजेनात्मनैव हि | 9.39 | scholar | |
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः | 9.83 | scholar | |
तेनोपयातेन कदाचनाथ वाराणसीं पापनिवारणेन अवादि वाणी बलिनः स्वशिष्यान् विलोक्य लीलावसरेवलिप्तान् | 12.05 | tts_aug | |
उदकात्मको बुधस्तस्या उषा नामात्मिका ततः ततः शनिः पृथिव्यात्मा कर्मात्मा पुष्करस्ततः | 15.28 | recitation_corpus | |
ते पि यान्ति तमो घोरं तथा संहारकर्तृताम् नाङ्गीकुर्वन्ति ते प्येवं तस्मात् सर्वगुणात्मकम् | 13.03 | recitation_corpus | |
तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि ह अतः प्रबोधो स्मात् मुग्धे र्धसम्पत्तिः परिशेषात् सुषुप्तिबोधमोहांश्च स्ववशस्तद्वशं सदा | 14.45 | tts_aug | |
ई॒शावा॒स्य॑मि॒द सर्वं॒ यत्किञ्च॒ जग॑त्यां॒ जग॑त् तेन॑ त्य॒क्तेन॑ भुञ्जीथा॒ मा गृ॑धः॒ कस्य॑ स्वि॒द्धन॑म् | 18.3 | recitation_corpus | |
स्वरूपानाशः कैमुत्येनैव सिद्धः | 3.97 | recitation_corpus | |
अनाद्यनन्तकालेषु प्रवाहैकप्रकारतः नियमेनैव ससृजे भगवान् पुरुषोत्तमः | 12.28 | recitation_corpus | |
यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् | 6.05 | scholar | |
नाश्चर्यमेतद् यदसत्सु सर्वदा महद्विनिन्दा कुणपात्मवादिषु सेर्ष्या महापूरुषपादपांसुभिर्निरस्ततेजस्सु तदेव शोभनम् | 19.93 | scholar | |
इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसंमितम् उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषिः | 5.67 | scholar | |
एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम् | 6.67 | scholar | |
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् | 8.6 | recitation_corpus | |
ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्टमल् लेभकंसयवनाः कुजपौण्ड्रकाद्याः अन्ये पि शाल्वकपिबल्वलदन्तवक्रसप्तोक्षशम्बरविडूरथरुग्मिमुख्याः | 18.09 | scholar | |
यतो तो ब्रह्मशब्दस्य तत्रैव नियतत्वतः ये न्नं ब्रह्म इत्यादिरूपादभ्यासात् तैत्तिरीयके | 6.95 | scholar | |
यत्र ह क्व च पुत्रस्य तत् पितुर्यत्र वा पितुस्तद् वा पुत्रस्येत्येतदुक्तं भवति इत्यादिश्रुतेश्च | 8.85 | recitation_corpus | |
प्रतीकं नैव विष्णुर्यन्मिथ्योपासा ह्यनर्थदा यो न्यथा सन्तमात्मेशमन्यथा प्रतिपद्यते | 8.83 | tts_aug | |
अथापि तदभिप्रेतं जानन्नहमरिंदम पृष्ठतो न्वगमं भर्तुः पादविश्लेषणाक्षमः | 14.02 | scholar | |
योगे योगे त॒वस्त॑रं॒ वाजे वाजे हवामहे सखा य॒ इन्द्र॑मू॒तये | 10.03 | recitation_corpus | |
ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः ययुः प्रभासं संहृष्टा रथैर्दैवविमोहिताः | 11.06 | scholar | |
न समो ब्रह्मणः कश्चिन्मुक्तावपि कथञ्चन ततः सहस्रगुणिता श्रीस्ततः परमो हरिः | 7.53 | recitation_corpus | |
मनुष्यः सन्नहं त्वां तु ज्योतिर्मुक्तजनाय च निदधे हृदि स त्वं च दीप्यसे मयि सर्वदा ब्रह्मजो ग्निर्ऋताद् वेदवाचो भिव्यज्यते हरिः उक्षितः स्वगुणैः सर्वैयुक्तः | 14.9 | recitation_corpus | |
इमे चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः प्रार्थ्या महत्त्वमिच्छद्भिः न च यान्ति स्म कर्हिचित् | 8.19 | scholar | |
एतस्मादात्मशब्दो यं परमात्माभिधा भवेत् प्रतीकविषयत्वेन विष्णुदृष्टिर्न तद् भवेत् | 8.2 | tts_aug | |
पुरुषावयवैर्लोकाः सपालाः पूर्वकल्पिताः लोकैरमुष्यावयवाः सपालैरिति शुश्रुमः | 7.43 | scholar | |
अशनिं यां विद्युतं यां मिहं च नाम्ना हेतिं वेद्युपमां सुतीक्ष्णाम् अशनिभेदं ह्रादुनिनामधेयं त्वामुद्दिश्यैवाकिरत् सो हिरुग्रः त्वां प्रत्येतन्नैव सिद्धिं चकार पश्चात्काले त्वजयस्त्वं तमेव | 16.63 | recitation_corpus | |
यत्र धर्मसुतो राजा गदापाणिर्वृकोदरः कृष्णो स् त्री गाण्डिवं चापं सुहृत्कृष्णस्ततो विपत् | 9.07 | scholar | |
स वर्षपूगानुदधौ महाबलश्चरन् महोर्मीः श्वसनेरिता मुहुः गुर्व्या भिजघ्ने गदया विभावरीम् आसेदिवांस्तात पुरं प्रचेतसः | 15.14 | scholar | |
तदेव स्पष्टयत्युत्तरैः श्लोकैस्त्रिभिः एतान्येव ज्ञानोपायानि तच्चोक्तम् तद्वै जिज्ञासुभिः साध्यं ज्ञानिनां यत् तु लक्षणम् इति शोभनाध्यासो रागः रसो रागस्तथा रक्तिः शोभनाध्यास उच्यते इत्यभिधानम् | 24.76 | recitation_corpus | |
अपिशब्दो गुणसमुच्चयार्थः कर्ता मे नास्तीत्यपि विद्धि इति | 5.98 | recitation_corpus | |
भक्तिज्ञानाभ्यां भूयिष्ठां नमउक्तिं विधेम | 7.52 | recitation_corpus | |
सञ्चरन्नञ्चनीयः कदाचिद्विभुर्विष्णुपद्यास्तटं वैष्णवाग्रेसरः प्रापदाप्तैर्निजैरेष शिष्यैर्वृतस्त्यक्तविश्वप्लवं शात्रवातङ्कतः | 13.4 | tts_aug | |
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः | 7.55 | scholar | |
विमतः प्रपञ्चवान् कालः कालत्वात् प्रतिपन्नवत् इति चान्या नुमैकत्वं जीवस्य विनिवारयेत् | 8.13 | tts_aug | |
इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः | 9.79 | scholar | |
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्णपिङ्गलम् विष्ण्वाख्यमुक्तमन्यत्र ह्यूर्ध्वरेतं च तत् प्रति | 6.43 | scholar | |
नासीन्नच भविष्यो वा परतः स्वत एव च इत्यादिश्रुतेश्च | 6.43 | recitation_corpus | |
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा निराशीर्निर्ममो भूत्वा युद्ध्यस्व विगतज्वरः | 6.42 | recitation_corpus | |
मर्त्यामर्त्यामर्त्यविद्विट्पुरोगं विश्वं दृश्यं विप्रचण्डालपूर्वम् भेदापेतं भेदि मानैः समानैः साधीयः कः साधयेत्तामलब्ध्वा | 15.82 | tts_aug |
Su-śrotā — Sanskrit ASR Dataset
Curated and consented Sanskrit speech with utterance-level transcriptions, used to train the Su-śrotā Sanskrit ASR model (finetuned IndicConformer-CTC). Focused on śāstric and recitational Sanskrit (chant and prose).
- Author: Prof. Prathosh A P, Indian Institute of Science, Bengaluru.
- Audio: 16 kHz mono WAV. Transcriptions: Devanāgarī.
Splits
| split | clips | hours | description |
|---|---|---|---|
train |
6,438 | 17.4 | full training set (all sources below) |
in_the_wild_test |
327 | ~2 | leakage-free held-out of consented in-the-wild user recordings (phones, rooms, varied speakers) — the real-world benchmark |
Fields
| field | type | description |
|---|---|---|
audio |
Audio(16 kHz) | the waveform |
text |
string | Devanāgarī transcription |
duration |
float | seconds |
source |
string | one of scholar, recitation_corpus, tts_aug, flywheel |
Composition (train)
| source | utterances | hours | description |
|---|---|---|---|
scholar |
2,139 | 6.06 | 21 reciters reading Bhāgavata Purāṇa, Upaniṣad, and stotra texts; forced-aligned to reference |
recitation_corpus |
2,504 | 7.59 | pre-segmented Upaniṣad, Gītā / Ṛgveda, and additional recitation |
tts_aug |
637 | 2.00 | studio/synthetic voices for speaker robustness |
flywheel |
1,158 | 1.73 | consented in-the-wild user recordings, clean tier, ~11 input scripts |
Data pipeline & quality
In-the-wild audio is collected with consent through the Su-śrotā / Vāgbodhinī practice tools (users read a known reference text) and automatically quality-graded at the akṣara level against that reference. Only clean-tier clips are included here. The auto-grader was audited for reliability: of the clips it quarantines as partial matches, only ~4% were later found to be model error — i.e. it correctly separates real reader deviations from mere model disagreements.
Usage
from datasets import load_dataset
ds = load_dataset("prathoshap/sushrota-sanskrit-asr-data")
print(ds["train"][0]["text"], ds["train"][0]["audio"]["sampling_rate"])
Consent, provenance & license
Scholar recordings were contributed for the purpose of building this model and dataset. In-the-wild clips are included only with explicit user consent; records carry no raw IP or personal identifiers (an anonymous per-session id only, not published). Individual reciter names are not published.
Released under CC-BY-4.0. Please cite:
Prathosh A P, Su-śrotā: Scholar-grade Sanskrit ASR and metre-aware chant practice, Indian Institute of Science, Bengaluru, 2026.
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