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20231101.hi_502486_0
मीठड़ी मारवाड़
मीठड़ी मारवाड़ - यह ग्राम मारवाड़ क्षेत्र तदानुसार नागौर जिले के उत्तरी पूर्वी दिक्कोण (ईशान) में आबाद कस्बाई ग्राम है। यह तहसील एवं पंचायत समिति लाडनूं के परिधीय क्षेत्र का पूर्वी सीमांत स्थित ग्राम पंचायत मुख्यालय है। स्वतंत्रता के पूर्व रियासती काल में यह ग्राम तत्कालीन तीन राजपूत रियासतों मारवाड़, जयपुर तथा बीकानेर...
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मीठड़ी मारवाड़
जागतिक दृष्टिकोण से हमें सही समय का ज्ञान नहीं है कि इस ग्राम की स्थापना कब तथा किसनें की थी तथापि राजपूतकालीन ऱियासतों के उत्तरवर्त्ती काल में यहाँ मानव बस्तियों का स्थापित होना प्रारम्भ हो गया था। कतिपय ऐतिहासिक साक्ष्यों एवं जन श्रुतियों के अनुसार ७०० AD. या इससे पूर्व यह स्थान उस मार्ग पर स्थित था जो तत्कालीन दो रि...
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मीठड़ी मारवाड़
यह ग्राम वर्तमान में नागौर जिले के ठीक ईशान कोण में स्थित है, इसी प्रकार की अवस्थिति रियासती काल में भी रही थी। पूर्वोत्तर का सीमांत प्रतिनिधि ग्राम होनें के कारण जोधपुर महाराजा एक सीमांत चौकी स्वरूप इसका महत्त्व समझते थे अस्तु उन्होनें ग्राम को सदैव अपनें सीधे प्रशासन में रखते हुए खालसा़ ग्राम ही घोषित किए रखा। ग्राम ...
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मीठड़ी मारवाड़
यह स्थान एक सीमांत तथा सुरक्षित स्थान होनें के साथ साथ एक खालसा श्रेणी का स्थल होनें का कारण तत्कालीन जन समुदायों को स्थायी आवास स्थापित करनें हेतु प्रेरित करनें वाला स्थान बन गया था। ऐसा अनुमान है कि कड़वासरा गौत्रिय जाटों ने सम्भवतया ग्राम राम कि नींव रखी। और एेसा भी मत है कि उन्होंने अपनी जाति के विपरित अर्थी नाम रख...
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मीठड़ी मारवाड़
कड़वासरा एवं स्वामियों के पश्चात जाखड़ गौत्रीय कुछ जाट कृषक परिवारों नें यहाँ रहना प्रारम्भ किया था। ग्राम्य सामान्य सामाजिक जीवन की प्रमुख जाति जिसनें इस ग्राम को अपनें निवास के लिए चयनित किया वह निश्चित रूप से वणिक थे जिन्हें साधारणतया बनिया कहा जाता है थी। वस्तुत यह सभी हरियाणा क्षेत्र से प्रव्रजन कर क्रमश यहाँ तक प...
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मीठड़ी मारवाड़
ग्राम का नाम मीठड़ी रह जानें के पीछे कतिपय प्रवाद भी प्रचलित है कि कड़वासरा गौत्रिय जाटों ने इसे बसाकर इसका नाम अपनी जाति के विरोधाभासी नाम के रूप में रखा। क्योंकि कड़वा का मतलब है खारा या क्षारिय जिसके उल्ट उन्होंने मिठड़ी नाम रखा जिसका मतलब है मीठा।एक और वाद प्रचलित है जैसे कि शेखावाटी क्षेत्र की बोली जो अपनें उच्चार...
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मीठड़ी मारवाड़
नागौर जिले का यह भू भाग राजस्थान की परम्परागत जलवायु वाला क्षेत्र है। अरावली पहाड़ियाँ राज्य के दक्षिण-पश्चिम में १७२१ मीटर ऊँचे गुरु शिखर से पूर्वोत्तर में खेतड़ी तक एक रेखा बनाती हुई गुज़रती हैं। राज्य का लगभग ३/५ भाग इस रेखा के पश्चिमोत्तर में व शेष २/५ भाग दक्षिण-पूर्व में स्थित है। राजस्थान के ये दो प्राकृतिक विभा...
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मीठड़ी मारवाड़
मीठड़ी मारवाड़ ग्राम अपनी विशिष्ठ भौगोलिक स्थिति के कारण नागौर जिले के इस २० - २५ ग्रामों से बनें एक पृथक ग्रामीण वृत्त का केन्द्रीय ग्राम है। यह राज्य महा मार्ग संख्या ६० पर डीडवाना से लगभग २४ किमी ईशान दिशा में वहीं सालासर धाम से ठीक २१ किमी वायव्य दिक्कोण में स्थित है। यह राज्य महा मार्ग सालासर बालाजी धाम को तीर्थरा...
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मीठड़ी मारवाड़
मीठड़ी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र नागौर के अन्तर्गत आनें वाला ग्राम है। १३ वीं लोकसभा के चुनावों से पूर्व लाडनूं तहसील का सम्पूर्ण क्षेत्र चुरू लोकसभा क्षेत्र में सम्मिलित होता था, परन्तु चुनाव पूर्व हुए नए परिसीमन में यह क्षेत्र अपनें गृह जिले नागौर में सम्मिलित कर दिया गया था। वर्तमान में श्री हनुमान बेनिवाल यहाँ के नि...
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मीठड़ी मारवाड़
ग्राम मीठड़ी मारवाड़ परंपरागत भारतीय गंगा जमुनी संस्कृति को अपनें आप में समाहित कर एक प्रतिमान बन जानें वाला ग्राम है। ग्राम की जनसंख्या के वर्तमान आँकड़े चाहे कोई भी नवीन तथ्य प्रदर्शित करें परन्तु यह सत्य बात है कि इस ग्राम का क्षेत्र में विशिष्ठ महत्त्व होनें का मुख्य कारण ग्राम में वणिक परिवारों की आबादी का सर्वाधि...
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मीठड़ी मारवाड़
ग्राम में इस्लाम धर्म के अनुयायी कायमखानी परिवारों की अचछी जनसंख्या निवास करती है। कायमखानियों के अतिरिक्त मुस्लिम छींपा तथा मुस्लिम मनियार अथवा लखारों के भी परिवार यहाँ निवास करते है। ग्राम के सदर बाजार से पश्चिम में बहुत सुन्दर वास्तु कला का उदाहरण देती विशालकाय मस्जिद दिखाई देती है, इसके पीछे ही मुस्लिम बस्ती है जिस...
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मीठड़ी मारवाड़
ग्राम प्रारम्भ से ही वणिक जनों की जन्म भूमि एवं कर्म भूमि रहा था अस्तु सार्वजनिक सुविधाओं की उपलब्धता की दृष्टि से सदैव सौभाग्यशाली रहा है। एक नगर स्तर की सभी सुविधाओं से ग्राम लाभान्वित रहा है।
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मीठड़ी मारवाड़
शिक्षा के प्रति ग्राम जनों की जागरूकता का प्रतीक है यहाँ का राजकीय सीनियर सैकण्डरी विध्यालय, जो स्वतंत्रता के पूर्व उस समय प्राथमिक पाठशाला के रूप में स्थापित हुआ था जब वर्तमान समीपस्थ शहरों यथा डीडवाना, जसवंत गढ़, लाडनूं, सुजानगढ़ में कोई भी तथा किसी भी स्तर का राजकीय शिक्षणालय नहीं था। माननीय जोधपुर महाराजा के आदेशों...
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मीठड़ी मारवाड़
ग्राम में सन् १९५१ में स्थापित राष्ट्रीय औषधालय है जिसे १९६१-६२ में राजकीय प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र के रूप में मान्यता मिल गई थी। वर्तमान वित्त वर्ष में २०१२-२०१३ में राज्य सरकार नें इसे सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के रूप में क्रमोन्नत कर दिया है।
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मीठड़ी मारवाड़
एक मरूस्थलीय अथवा अर्द्ध मरूस्थलीय ग्रामीण परिवेश में जल की सुगम एवं पर्याप्त प्राप्ति सर्वाधिक महत्तवपूर्ण आवश्यकता है। ग्राम की भूमि उस भूपटी का एक भाग है जो फतेहपुर से डीडवाना तक संकरे स्वरूप में फैली हुई है। डीडवाना क्षेत्र लवणीय उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। ग्राम की समस्त भूमि में अत्याधिक लवणता तथा फ्लोराईड की उपस...
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मीठड़ी मारवाड़
राजस्थान राज्य की जनता एवम सरकार के मध्य सम्बन्धों को समीपता परदान करनें तथा राजकीय कामों में पारदर्शिता लानें के उदे्दश्य के साथ राज्य के मुख्यमंत्री श्रीमान् अशोक गहलोत नें जोधपुर में राजीव गांधी भारत निर्माण सेवा केन्द्र की आधारशिला रख कर भारत निर्माण योजना को साकार किया। मुख्यमंत्री नें ५ अगस्त २०१२ रविवार को प्रात...
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मीठड़ी मारवाड़
मीठड़ी की पूर्व दिशा में सदर बाजार से लगभग १५ किमी की दूरी सार्वजनिक गौचर भूमि का ५०० बीघा क्षेत्र है। इस गौचर क्षेत्र की स्थापना हैदराबाद दक्षिण प्रवासी मानावत जिन्हें श्री बद्री नारायण जी की संतति होनें के कारण बद्रुका उपाख्य नाम से जाना जा था के वंशज युग पुरूष राजा साहिब बंकट लाल बद्रुका के नेतृत्तव में सम्पन्न हुई ...
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मीठड़ी मारवाड़
ग्राम बैंकिग सुविधा की दृष्टि से ज्यादा लाभान्वित नहीं है। यध्यपि ग्राम में १० से अधिक केन्द्र एवं राज्य सरकार के उपक्रम है साथ ही आस पास के लगभग १५ - १६ गाँव भी प्राथमिक सुविधाओं के लिए इसी ग्राम पर निर्भर है। साथ ही कम से कम २५० पेंशनर्स जिनमें अधिकाँश रिटायर्ड सैनिक हैं यहाँ रहते हैं परनतु अभी तक कोई राष्ट्रीयकृत बै...
20231101.hi_502486_18
मीठड़ी मारवाड़
भारतीय आदि सभ्यता सिन्धु नदी घाटी सभ्यता में नगर स्थापना पूर्व नियोजित होती थी जिसकी आधार पीठिका सड़कों को सामानान्तर रूप से काटता जाल होता था।। ग्राम मीठड़ी की बसावट यध्यपि उस पुरातन नगर नियोजन की भाँति तो कतई नहीं है परनतु जैसा की उपर कई बार उल्लेख किया जा चुका है कि अग्रवाल जनों की निवास स्थली होनें का प्रतिफल सदैव ...
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मीठड़ी मारवाड़
[[श्रेणी:नागौर जिले के गा�</ref> https://web.archive.org/web/20190413121513/http://meetharischool.blogspot.com/></ref>
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मीठड़ी मारवाड़
ग्राम में सन् १९५१ में स्थापित राष्ट्रीय औषधालय है जिसे १९६१-६२ में राजकीय प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र के रूप में मान्यता मिल गई थी। वर्तमान वित्त वर्ष में २०१२-२०१३ में राज्य सरकार नें इसे सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के रूप में क्रमोन्नत कर दिया है।
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मीठड़ी मारवाड़
एक मरूस्थलीय अथवा अर्द्ध मरूस्थलीय ग्रामीण परिवेश में जल की सुगम एवं पर्याप्त प्राप्ति सर्वाधिक महत्तवपूर्ण आवश्यकता है। ग्राम की भूमि उस भूपटी का एक भाग है जो फतेहपुर से डीडवाना तक संकरे स्वरूप में फैली हुई है। डीडवाना क्षेत्र लवणीय उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। ग्राम की समस्त भूमि में अत्याधिक लवणता तथा फ्लोराईड की उपस...
20231101.hi_502486_22
मीठड़ी मारवाड़
राजस्थान राज्य की जनता एवम सरकार के मध्य सम्बन्धों को समीपता परदान करनें तथा राजकीय कामों में पारदर्शिता लानें के उदे्दश्य के साथ राज्य के मुख्यमंत्री श्रीमान् अशोक गहलोत नें जोधपुर में राजीव गांधी भारत निर्माण सेवा केन्द्र की आधारशिला रख कर भारत निर्माण योजना को साकार किया। मुख्यमंत्री नें ५ अगस्त २०१२ रविवार को प्रात...
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मीठड़ी मारवाड़
मीठड़ी की पूर्व दिशा में सदर बाजार से लगभग १५ किमी की दूरी सार्वजनिक गौचर भूमि का ५०० बीघा क्षेत्र है। इस गौचर क्षेत्र की स्थापना हैदराबाद दक्षिण प्रवासी मानावत जिन्हें श्री बद्री नारायण जी की संतति होनें के कारण बद्रुका उपाख्य नाम से जाना जा था के वंशज युग पुरूष राजा साहिब बंकट लाल बद्रुका के नेतृत्तव में सम्पन्न हुई ...
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मीठड़ी मारवाड़
ग्राम बैंकिग सुविधा की दृष्टि से ज्यादा लाभान्वित नहीं है। यध्यपि ग्राम में १० से अधिक केन्द्र एवं राज्य सरकार के उपक्रम है साथ ही आस पास के लगभग १५ - १६ गाँव भी प्राथमिक सुविधाओं के लिए इसी ग्राम पर निर्भर है। साथ ही कम से कम २५० पेंशनर्स जिनमें अधिकाँश रिटायर्ड सैनिक हैं यहाँ रहते हैं परनतु अभी तक कोई राष्ट्रीयकृत बै...
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मीठड़ी मारवाड़
भारतीय आदि सभ्यता सिन्धु नदी घाटी सभ्यता में नगर स्थापना पूर्व नियोजित होती थी जिसकी आधार पीठिका सड़कों को सामानान्तर रूप से काटता जाल होता था।। ग्राम मीठड़ी की बसावट यध्यपि उस पुरातन नगर नियोजन की भाँति तो कतई नहीं है परनतु जैसा की उपर कई बार उल्लेख किया जा चुका है कि अग्रवाल जनों की निवास स्थली होनें का प्रतिफल सदैव ...
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मीठड़ी मारवाड़
12. https://web.archive.org/web/20140304044805/http://www.stad.com/index.php?maptype=roadmap&zoomlevel=12&lat=27.574330&lon=74.686775
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बाल तपस्विनी अणसीबाई
बाल तपस्विनी अणसीबाई का जन्म 12-8-1925 को राजस्थान में पाली जिले के नाडोल गाँव में हुआ था। इनका जन्म मेघवँश में एक साधारण परिवार में हुआ था। इन्होनें 25-11-1946 को नाडोल में ही जीवित समाधि ली। इनकी समाधिस्थल पर भव्य मंदिर बना हुआ है|
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बुधिराम दुबे महिला महाविद्यालय
बुधिराम दुबे महिला महाविद्यालय एक महिला डिग्री कॉलेज है जो इटहरा गाँव में स्थित हैं। इसकी स्थापना २०११ में हुई थी। कलकल निनादिनी, पतितपावनी तृरावेष्टितमां गंगा के पावन भूभाग पर अवस्थित इस महाविद्यालय को कोनिया क्षेत्र का प्रथम महाविद्यालय होने का गौरव प्राप्त हुआ। महाविद्यालय में एक अच्छा पुस्तकालय है जिसमें पर्याप्त म...
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बुधिराम दुबे महिला महाविद्यालय
महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ द्वारा इस महाविद्यालय में निम्न सात विषयों में मान्यता प्रदान की गई हैं।
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बुधिराम दुबे महिला महाविद्यालय
https://web.archive.org/web/20160304204049/http://www.veethi.com/colleges-in-india/budhiram-dubey-mahila-mahavidyalaya-detail-14192.htm
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मोनारख जी महाराज
मेघवँश के महान संत श्री मोनारख जी राजस्थान के जालोर के निवासी थे| आबुपर्वत पर मेवाड के महाराज कुम्भा का आधिपत्य था| कुम्भा कई संत महात्माओँ से परचा माँगना था| परचा नही देने पर उनको कारागृह में डाल देता था| इस प्रकार कुम्भा ने हजारोँ संत महात्माओँ को बंदी बना दिया था| जब मोनारख जी इस बात का पता चला तो वे जालोर छोड आबुपर...
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बाबा गंगेश्वरनाथ धाम
बाबा गंगेश्वर नाथ धाम मंदिर गंगा नदी से तीनो दिशाओं से घिरे कोनिया क्षेत्र के इटहरा गाँव में स्थित है यह भगवान शिव का मंदिर है, पश्चिम वाहिनी गंगा के सम्मुख होने के कारण इस मंदिर को बाबा गंगेश्वर नाथ कहा गया है। इस मंदिर का निर्माण कार्य बिसेन राजपूतो ने तत्कालीन काशी नरेश की सहायता से लगभग २५० वर्ष पूर्व इ. सन १७५० मे...
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बाबा गंगेश्वरनाथ धाम
तब विष्णु तथा ब्रह्मा ने भगवान शिव की महत्ता को स्वीकार किया और उसी दिन से शिवलिंग की पूजा की जाने लगी। शिवलिंग का आकार दीपक की लौ की तरह लंबाकार है इसलिए इसे ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। एक मान्यता यह भी है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को ही शिव-पार्वती का विवाह हुआ था इसलिए महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है...
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बाबा गंगेश्वरनाथ धाम
https://web.archive.org/web/20160307031124/http://wikimapia.org/4085793/Shivalay-Baba-Gangeshwarnath-Dham
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आप्रवास
आप्रवास (अंग्रेज़ी: इम्मिग्रेशन)लोगों का उन क्षेत्रों में गमन होने को कहते हैं, जहां के वे मूल निवासी नहीं होते हैं। यह गमन वहां बसने की मंशा से किया जाता है।[1] आप्रवास कई कारणों से किया जा सकता है जिनमें मौसम, तापमान, प्रजनन, आर्थिक, राजनीतिक, परिवार के पुनःएकीकरण, प्राकृतिक आपदा, गरीबी या अपने परिवेश को स्वेच्छा से ...
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कोनिया क्षेत्र
कोनिया क्षेत्र (अंग्रेजी: Konia Kshetra) जिला मुख्यालय ज्ञानपुर से तकरीबन 45 किमी की दूरी पर स्थित तीन तरफ से गंगा की धाराओं से घिरा हुआ इलाका है। इस स्थान पर छेछुआ-भुर्रा गाँव के पास गंगा का धारा प्रवाह मुड़ गया है। गंगा नदी द्वारा तीनों दिशाओं से घिरे होने की वजह से यह क्षेत्र एकदम कोने में हो गया है। सम्भवत: इसीलिए ...
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हेनरी टामस कोलब्रुक
हेनरी टामस कोलब्रुक (१७६५-१८३७ ई.)। इंग्लैंड के प्रख्यात प्राच्य विद्याविशारद तथा गणितज्ञ थे। उन्हें 'यूरोप का प्रथम महान संस्कृत विद्वान' माना जाता है।
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हेनरी टामस कोलब्रुक
हेनरी टामस कोलब्रुक का जन्म १५ जून,१७६५ ई. को लन्दन में हुआ था। उनके पिता सर जार्ज कोलब्रुक ईस्ट इंडिया कंपनी के संचालक-मंडल के अध्यक्ष थे। अत: १७८२-८३ ई. में वे भारत आए और तिरहुत के सहायक कलक्टर के पद पर नियुक्त हुए। १७९५ में उनकी नियुक्ति मिरजापुर (उत्तर प्रदेश) में हुई। वहाँ उनको प्राच्य भाषाओं के अध्ययन के लिये विश...
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हेनरी टामस कोलब्रुक
कोलब्रुक बड़े मेधावी गणितज्ञ, उत्साही ज्योतिषी तथा संस्कृत भाषा के गंभीर विद्वान् थे। इन्होंने प्राच्य विद्या के विविध अंगों पर मौलिक लेख लिखे जिनके द्वारा इन विषयों का प्रथम प्रामाणिक परिचय पाश्चात्य विद्वानों को मिला। वेद, संस्कृत व्याकरण, कोश, जैनमत, हिंदू विधि, भारतीय दर्शन, भारतीय बीजगणित आदि विषयों पर इनके लेख आज...
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मिताक्षरा
मिताक्षरा याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर की टीका है जिसकी रचना 11वीं शताब्दी में हुई। यह ग्रन्थ 'जन्मना उत्तराधिकार' (inheritance by birth) के सिद्धान्त के लिए प्रसिद्ध है।
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मिताक्षरा
हिंदू उत्तराधिकार संबंधी भारतीय कानून को लागू करने के लिए मुख्य रूप से दो मान्यताओं को माना जाता है- पहला है दायभाग मत, जो बंगाल और असम में लागू है। दूसरा है मिताक्षरा, जो शेष भारत में मान्य है। मिताक्षरा के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से ही अपने पिता की संयुक्त परिवार सम्पत्ति में हिस्सेदारी हासिल हो जाती है। इसम...
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मिताक्षरा
मिताक्षरा विधि की शाखा पांच उप-शाखाओं में विभाजित है। दत्तकग्रहण तथा दाय के संबंध में परस्पर मतभेद होने के कारण इन उपशाखाओं की उत्पत्ति हुई। ये सभी उप-शाखाएं मिताक्षरा को ही सर्वोपरि प्रमाण मानते हैं, परन्तु कुछ परिस्थितियों में मतभेद होने पर किसी मूल भाष्य या ग्रंथ विशेष को प्राथमिकता देते हैं।
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सीता समाहित स्थल
सीता समाहित स्थल (Sita Samahit Sthal) या सीतामढ़ी (Sitamarhi) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के भदोही ज़िले में स्थित एक हिन्दू मन्दिर है। यह सीता माता को समर्पित है।
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सीता समाहित स्थल
यह मंदिर इलाहबाद और वाराणसी के मध्य स्थित जंगीगंज बाज़ार से ११ किलोमीटर गंगा के किनारे स्थित है। मान्यता है कि इस स्थान पर माँ सीता ने अपने आप को धरती में समाहित कर लिया था। यहाँ पर हनुमानजी की ११० फीट ऊँची मूर्ति है जिसे विश्व की सबसे बड़ी हनुमान जी की मूर्ति होने का गौरव प्राप्त है। स्वामी जितेंद्रानंद जी के असीम प्...
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ब्लू डार्ट एविएशन
ब्लू डार्ट एविएशन एक चेन्नई, भारत आधारित कार्गो वायु सेवा है। यह अन्तर्राष्ट्रीय और अन्तर्देशीय तथा क्षेत्रीय चार्टर उड़ानों सहित अनुसूचित रात्रि एक्स्प्रेस कार्गो सेवा संचालित करती है। कंपनी की स्वयं की अनुरक्षण योग्यता है एवं अन्य विमानों को भि यह विमान अनुरक्षण एवं अभियाम्त्रिकी सेवा उपलब्ध कराती है।
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ज़हरान क़बीला
ज़हरान (अरबी: , अंग्रेज़ी: Zahran) एक बदू अरबी कबीला है। यह उन गिनती के अरब क़बीलों में से है जिन्हें अरबी प्रायद्वीप का मूल निवासी माना जाता है। इस कबीले के लोग ग़ामिद​ क़बीले के भी सम्बन्धी हैं और उनके ऐतिहासिक मित्रपक्ष में रहे हैं। इनकी मूल मातृभूमि अरबी प्रायद्वीप का दक्षिणी या दक्षिणपूर्वी भाग, विशेषकर यमन और सउद...
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ज़हरान क़बीला
ज़हरान और बेलाद ग़ामिद​ क़बीले अपनी अलग विशेष अरबी उपभाषा बोलते हैं जिसे ज़हरानी कहा जाता है। कुछ स्रोतों के अनुसार यह पुराने ज़माने की शास्त्रीय अरबी की सब से निताकतम जीवित उपभाषा है। सभी जीवित अरबी बोलियों में से इसका व्याकरण कुरान की अरबी के सबसे नज़दीक पाया जाता है।
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ग़म्द क़बीला
ग़म्द​ या ग़ामिद​ (अरबी: , अंग्रेज़ी: Ghamd या Ghamid) एक बदू अरबी कबीला है। यह उन गिनती के अरब क़बीलों में से है जिन्हें अरबी प्रायद्वीप का मूल निवासी माना जाता है। इस कबीले के लोग ज़हरान क़बीले के भी सम्बन्धी हैं और उनके ऐतिहासिक मित्रपक्ष में रहे हैं। इनकी मूल मातृभूमि अरबी प्रायद्वीप का दक्षिणी या दक्षिणपूर्वी भाग,...
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दायभाग
दायभाग जीमूतवाहनकृत एक प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथ है जिसके मत का प्रचार बंगाल में है। 'दायभाग' का शाब्दिक अर्थ है, पैतृक धन का विभाग अर्थात् बाप दादे या संबंधी की संपत्ति के पुत्रों, पौत्रों या संबंधियों में बाँटे जाने की व्यवस्था। बपौती या विरासत की मालिकियत को वारिसों या हकदारों में बाँटने का कायदा कानून।
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दायभाग
दायभाग हिन्दू धर्मशास्त्र के प्रधान विषयों में से है। मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृतियों में इसके संबंध में विस्तृत व्यवस्था है। ग्रंथकारों और टीकाकारों के मतभेद से पैतृक धनविभाग के संबंध में भिन्न भिन्न स्थानों में भिन्न भिन्न व्यवस्थाएँ प्रचलित हैं। प्रधान पक्ष दो हैं - मिताक्षरा और दायभाग। मिताक्षरा याज्ञवल्क्य स्मृति प...
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दायभाग
सबसे पहली बात विचार करने की यह है कि कुटुंबसंपत्ति में किसी प्राणी का पृथक् स्वत्व विभाग करने के बाद होता है अथवा पहले से रहता है। मिताक्षरा के अनुसार विभाग होने पर ही पृथक् या एकदेशीय स्वत्व होता है, विभाग के पहले सारी कुटुंबसंपत्ति पर प्रत्येक संमिलित प्राणी का सामान्य स्वत्व रहता है। दायभाग विभाग के पहले भी अव्यक्त ...
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दायभाग
पिता पुत्र का समान अधिकार स्पष्ट कहा गया है तथापि जीमूतवाहन ने इस श्लोक से खींच तानकर यह भाव निकाला है कि पुत्रों के स्वत्व की उत्पत्ति उनके जन्मकाल से नहीं, बल्कि पिता के मृत्युकाल से होती है।
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दायभाग
उपर जो क्रम दिया गया है उसे देखने से पता लगेगा कि मिताक्षरा माता का स्वत्व पहले करती है और दायभाग पिता का। याज्ञवल्क्य का श्लोक है:
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दायभाग
इस श्लोक के 'पितरौ' शब्द को लेकर मिताक्षरा कहती है कि 'माता पिती' इस समास में माता शब्द पहले आता है और माता का संबंध भी अधिक घनिष्ठ है, इससे माता का स्वत्व पहले है। जीमूतवाहन कहता है कि 'पितरौ' शब्द ही पिता की प्रधानता का बोधक है इससे पहले पिता का स्वत्व है। मिथिला, काशी और महाराष्ट्र प्रांत में माता का स्वत्व पहले और ...
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दायभाग
(१) मिताक्षरा के अनुसार पैतृक (पूर्वजों के) धन पर पुत्रादि का सामान्य स्वत्व उनके जन्म ही के साथ उत्पन्न हो जाता है, पर दायभाग पूर्वस्वामी के स्वत्वविनाश के उपरांत उत्तराधिकारियों के स्वत्व की उत्पत्ति मानता है।
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दायभाग
(२) मिताक्षरा के अनुसार विभाग (बाँट) के पहले प्रत्येक सम्मिलित प्राणी (पिता, पुत्र, भ्राता इत्यादि) का सामान्य स्वत्व सारी संपत्ति पर होता है, चाहे वह अंश बाँट न होने के कारण अव्यक्त या अनिश्चित हो।
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दायभाग
(३) मिताक्षरा के अनुसार कोई हिस्सेदार कुटुंब संपत्ति को अपने निज के काम के लिये बै या रेहन नहीं कर सकता पर दायभाग के अनुसार वह अपने अनिश्चित अंश को बँटवारे के पहले भी बेच सकता है।
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दायभाग
(४) मिताक्षरा के अनुसार जो धन कई प्राणियों का सामान्य धन हो, उसके किसी देश या अंश में किसी एक स्वामी के पृथक् स्वत्व का स्थापन विभाग (बटवारा) है। दायभाग के अनुसार विभाग पृथक् स्वत्व का व्यंजन मात्र है।
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दायभाग
(५) मिताक्षरा के अनुसार पुत्र पिता से पैतृक संपत्ति को बाँट देने के लिये कह सकता है, पर दायभगा के अनुसार पुत्र को ऐसा अधिकार नहीं है।
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दायभाग
(६) मिताक्षरा के अनुसार स्त्री अपने मृत पति की उत्तराधिकारिणी तभी हो सकती है जब उसका पति भाई आदि कुटुंबियों से अलग हो। पर दायभाग में, चाहे पति अलग हो या शामिल, स्त्री उत्तराधिकारिणी होती है।
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दायभाग
(७) दायभाग के अनुसार कन्या यदि विधवा, वंध्या या अपुत्रवती हो तो वह उत्तराधिकारिणी नहीं हो सकती। मिताक्षरा में ऐसा प्रतिबंध नहीं है। याज्ञवल्क्य, नारद आदि के अनुसार पैतृक धन का विभाग इन अवसरों पर होना चाहिए— पिता जब चाहे तब, माता की रजोनिवृत्ति और पिता की विषयनिवृति होने पर, पिता के मृत, पतित या संन्यासी होने पर।
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अत्याधिक आत्मचेतना
अत्यधिक आत्मचेतना​ (अंग्रेज़ी: self-consciousness) स्वयं के बारे में अत्यधिक चेतना को कहते हैं। यह साधारण आत्मबोध और आत्मचेतना से भिन्न दशा है। इसमें दूसरों द्वारा साधारण स्तर से अधिक परखे जाने या देखे जाने की अप्रिय भावना हो सकती है। मनोविज्ञान में अत्यधिक आत्मचेतना को कभी-कभी संकोच, शर्म या संविभ्रम (paranoia) की स्थ...
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अत्याधिक आत्मचेतना
कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अत्यधिक आत्मचेतना​ अक्सर किशोरावस्था में शुरू होती है और इसमें पीड़ित व्यक्ति को लगता है कि अन्य लोग उसे देख रहे हैं जबकि वास्तव में उसपर लोगों का ध्यान कम होता है या बिलकुल ही नहीं होता। इन 'काल्पनिक दर्शकों' (imaginary audience) के बारे में सोचने से व्यक्ति खुलकर अपने व्यक्तित्व के अनुसार...
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अणुगति सिद्धांत
पदार्थ की विभिन्न अवस्थायों में अणुओं की गति भिन्न भिन्न प्रकार की होती है, अंतरा-अणुक दूरी भिन्न-भिन्न होती है तथा अंतरा-अणुक बल भी भिन्न-भिन्न होता है | इसीलिए पदार्थ की विभिन्न अवस्थायों में भौतिक गुण भी भिन्न-भिन्न होते हैं | उदाहरण के लिए, पदार्थ की ठोस अवस्था में उसका एक निश्चित आयतन व निश्चित आकृति होती है, द्रव...
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अणुगति सिद्धांत
(1) ठोस के अणु एक नियमित क्रम में सजे होते हैं | प्रत्येक अणु की एक निश्चित अवधि होती है | ये अणु अपनी स्थिति के इधर उधर कम्पनिक गति करते रहते हैं, लेकिन अपना स्थान नहीं छोड़ते हैं | इसीलिए ठोस का आयतन तथा आकृति निश्चित होती है |
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अणुगति सिद्धांत
(2) ठोस में अंतरा-अणुक दूरी बहुत कम होती है | सामान्यतः यह अंतरा-अणुक दूरी, द्रव के अपेक्षा कम होती है |
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अणुगति सिद्धांत
(3) ठोस में अणुओं के बीच सर्वाधिक आकर्षण बल लगता है | इसी बल के कारण ठोस में अणु अपने स्थान पर बने रहते हैं तथा एक स्थान से दूसरे स्थान तक चलने के लिए स्वतंत्र नहीं होते हैं, बल्कि अपने स्थान पर रहकर ही इधर उधर कम्पनिक गति करते हैं |
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अणुगति सिद्धांत
(4) ठोस को गर्म करने पर उसके अणुओं का दोलन आयाम बढ़ जाता है जिससे उनके बीच की औसत दूरी बढ़ जाती है अर्थात् ठोस का प्रसार हो जाता है | इसे ठोस का उष्मीय प्रसार कहते हैं |
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अणुगति सिद्धांत
(1) द्रव में अणुओं की स्थिति निश्चित नहीं होती हैं, केवल वे द्रव के भीतर ही विभिन्न चालो से विभिन्न दिशाओं में अनियमित गति करते रहते हैं |
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अणुगति सिद्धांत
(4) द्रव को गर्म करने पर उसके अणुओं के बीच की औसत दूरी बढ़ जाती है, जिससे द्रव का उष्मीय प्रसार कहते हैं |
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अणुगति सिद्धांत
(5) द्रव को बहुत अधिक गर्म करते रहने पर एक ऐसी अवस्था आती है, जबकि अणुओं की औसत उर्जा इतनी बढ़ जाती है कि वे पारस्परिक आकर्षण बल को पार करके द्रव की सतह के बाहर जाने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं | इसे द्रव का वाष्पन कहते हैं |
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अणुगति सिद्धांत
(1) किसी गैस के सभी अणु समान, सुदृढ़ तथा अति-सूक्ष्म गोलाकार कण होते हैं | इनका आयतन, गैस के आयतन की तुलना में नगण्य होता है |
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दायतत्त्व
दयातत्त्व रघुनन्दन द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ है। इसमें हिन्दुओं के उत्तराधिकार प्रक्रिया का विवेचन है। सम्भवतः रघुनन्दन दायभाग के रचयिता जीमूतवाहन के शिष्य थे।
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छोले भटूरे
छोले भटूरे भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी क्षेत्रों में लोकप्रिय एक खाद्य व्यंजन है। यह चना मसाला (मसालेदार सफेद छोले) और भटूरा/पूरी का एक संयोजन है, जो मैदा से बनी एक तली हुई रोटी है। हालांकि इसे एक विशिष्ट पंजाबी व्यंजन के रूप में जाना जाता है, लेकिन पकवान की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न दावे हैं।
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छोले भटूरे
छोले भटूरे को अक्सर नाश्ते के व्यंजन के रूप में खाया जाता है, कभी-कभी लस्सी के साथ। यह स्ट्रीट फ़ूड या संपूर्ण भोजन भी हो सकता है और इसके साथ प्याज, मसालेदार गाजर, हरी चटनी या आचार भी हो सकता है।
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छोले भटूरे
मैदा और सूजी को किसी बर्तन में छान कर निकाल लीजिये, मैदा के बीच में जगह बनाइये, 2 टेबिल स्पून तेल, नमक, बेकिंग पाउडर, दही और चीनी इसमें डालकर, इसी जगह इन सब चीजों को अच्छी तरह मिला लीजिये। गुनगुने पानी की सहायता से नरम आटा गूथ लीजिये। गुथे हुये आटे को 2 घंटे के लिये बन्द अलमारी या किसी गरम जगह पर ढक कर रख दीजिये। कढ़ाई...
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छोले भटूरे
चनों को रात भर पानी में भिगने रख दीजिये। पानी से निकाल कर चनों को धोकर, कुकर में डालिये, एक छोटा गिलास पानी, नमक और खाना सोडा मिला दीजिय। कुकर बन्द करें और गैस पर उबालने के लिये रख दीजिये। दूसरी तरफ टमाटर, हरी मिर्च, अदरक को मिक्सी से बारीक पीस लें। कढ़ाई में तेल डाल कर गरम करें। जीरा भुनने के बाद धनियाँ पाउडर डाल दीजि...
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नास्तिक एकात्मता दिन
यह अंत में विरोध का एक दिन, उत्सव और जागरूकता बढ़ाने है। केवल एकजुटता में नास्तिकों के एक दुनिया है जो हर जगह में नास्तिक भगवान में विश्वास की कमी के बारे में खुला हो और डर किसी भी हानिकारक परिणाम नहीं बना सकते हैं।
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नास्तिक एकात्मता दिन
यह एक नास्तिक छुट्टी और जागरूकता अभियान है। यह एक वैश्विक और वार्षिक करने के लिए एक साथ एक के रूप में खड़े उन लोगों के लिए जो अपने समुदायों में गैर धार्मिक संघर्ष समर्थन प्रदान दिन है। यह जो लोग अपने विश्वासों के बारे में खुला हो सकता है, जबकि एक ही समय में उन जो कि स्वतंत्रता नहीं है के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए...
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नास्तिक एकात्मता दिन
इस दिन एक दिन है, जहां दुनिया भर के नास्तिक नास्तिक (आधा लाल लाल 1/2) काले रिबन उनकी शर्ट या कुछ भी है कि खुद को एक नास्तिक "एक लाल रंग के रूप में इस तरह के रूप में पहचान करने के लिए टिकी पहनना होगा। जैसा कि हम हर साल ज्यादा से ज्यादा प्रचार पाने के लिए यह आसान है और आसान हो सकता है के लिए दूसरों को बाहर खड़ा करने के ल...
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नास्तिक एकात्मता दिन
जून में 21 लोगों को नतीजों के लिए और अधिक ध्यान देने की है कि कुछ एक नास्तिक के रूप में खुद की पहचान पीड़ित हो सकता है भुगतान किया जाएगा. यह एक दिन है कि जब नतीजों विश्व भर में नास्तिक होता है खड़े हो जाओ और मांग यह खत्म हो जाएगा होगा। इस दिन हम मीडिया को पत्र लिख देंगे, हम विरोध करेंगे, हम इसे और अधिक अच्छी तरह से जान...
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वी॰ वी॰ रवि
इनका जन्म महान संत संगीतकार स्वाति तिरुनाल के वंश में हुआ है, श्री वी॰ वी॰ रवि ने अपने बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न दिवंगत पिता वादाक्कंचेरी वीरा राघव अय्यर से कर्नाटिक संगीत को विरासत में पाया जिन्होंने बड़ी प्रवीणता से इन्हें प्रशिक्षित किया। अपने भाई कर्नाटक यंत्र वादक वि वि सुब्रहमनियम के साथ वह कई देशों का दौरा किया।
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वी॰ वी॰ रवि
10 वर्ष की कम उम्र में एक वायलिन वादक के रूप में इन्होंने अपने संगीत कैरियर की शुरूआत की.वह, चेम्बाई वैद्यनाथ भागावतर, शेम्मान्गुड़ी श्रीनिवास अय्यर, पुलियूर सुब्रहमनियम नारायण स्वामि जैसे प्रसिद्ध कलाकारों से विशेष प्रशिक्षण मिला.वाद्य वृंदा समूह के एक सदस्य के रूप में 1982 में आकाशवाणी रेडियो प्रसारण सेवा में शामिल ह...
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वी॰ वी॰ रवि
1976 और 1990चेन्नई संगीत विद्वत सभा द्वारा अच्छा वायलिन कलाकार पुरस्कार, 1973 में आकाशवाणी द्वारा अच्छा वायलिन कलाकार पुरस्कार.
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वी॰ वी॰ रवि
वी॰ वी॰ रवि रवि विवाहित हैं और उनके दो बच्चें हैं: उसकी पत्नी का नाम विशालं रवि (डबिंग आर्टिस्ट) है, उनके बेटे का नाम राघव कृष्णा (गायक) है और उनकी बेटी का नाम हरिणी रवि पार्श्वगायिका हैं।.
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स्वीडन की काउंटियाँ
स्वीडन की काउंटियाँ स्वीडन के सबसे ऊंचे स्तर के प्रशासनिक विभाग हैं। इन्हें स्वीडी भाषा में 'लैन' (स्वीडी: län) कहा जाता है। वर्तमान में स्वीडन 21 काउंटियों में बाँटा गया है। इन्हें सन् 1634 में स्थापित किया गया था। उस से पहले स्वीडन कुछ प्रान्तों में विभाजित था जिन्हें तब रद्द कर दिया गया। इन काउंटियों को आगे नगर-पालि...
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सत्यमंगलम
सत्यमंगलम (Sathyamangalam) भारत के तमिल नाडु राज्य के ईरोड ज़िले में स्थित एक नगर है। यह पूर्वी घाट के चरणों में भवानी नदी के किनारे बसा हुआ है।
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झेरणा
ये लकडी का बना होता है। इसका प्रयोग दही बिलौने हेतु किया जाता है। इसके कई पारंपरिक महत्व है। मारवाड अँचल में शादी के अवसर पर तोरण पर दुल्हें का इसे बदाया या वंदन किया जाता है तथा जब दुल्हा दुल्हन को लेकर अपने घर जाता है तो परिवार की महिलाओ द्वारा पुन: बन्दना की जाती हैँ|
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द हाँटींग हॉर: इस बारे में ना सोचें
द हाँटींग हॉर: इस बारे में ना सोचें (अंग्रेज़ी: The Haunting Hour: Don't Think About It) एक २००७ हॉरर कल्पना परिवार के रूप में एक ही नाम के बच्चों की किताब पर आधारित फिल्म है द्वारा: आर.एल. स्टाईन जो भी बनाया: गूसबम्प्स.
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द हाँटींग हॉर: इस बारे में ना सोचें
में उत्तरी अमेरिका, फिल्म यूनिवर्सल स्टूडियोज होम एंटरटेनमेंट से DVD पर ४ सितंबर, २००७ को जारी किया गया था और पहले परिवार DVD के लिए प्रत्यक्ष फिल्म डीवीडी पर वाइडस्क्रीन और पैन और स्कैन अलग स्वरूपों में जारी किया जा था। यह टेलीविजन पर प्रसारित पर कार्टून नेटवर्क संयुक्त पर अमेरिका में ७ सितंबर, २००७.
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द हाँटींग हॉर: इस बारे में ना सोचें
में भारत, पर इसे प्रसारित किया गया है कार्टून नेटवर्क को ३१ अक्टूबर, २००७ में मूल अंग्रेजी ऑडियो और हिंदी डबिंग. यह फिर से जारी किया गया था VCD/DVD पर में. २००८, जारी साथ अंग्रेजी और हिन्दी के अलग डबिंग दो अलग पर VCD.
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द हाँटींग हॉर: इस बारे में ना सोचें
फिल्म कार्नेगी पेंसिल्वेनिया, के नगर के रूप में के रूप में अच्छी तरह से अक्टूबर और नवंबर २००६ में क्रैनबेरी टाउनशिप में फिल्माया गया था।
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गुंदी
यह एक पेड़ का नाम है। इस पर लगने वाले फलों को गुँदे कहा जाता है। ये छोटे मीठे तथा गोंददार होते हैं। इसे 'डेला' भी कहते हैं।
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राईज़ ऑफ़ द गार्गोय्ल्स
राईज़ ऑफ़ द गार्गोय्ल्स (फ्रेंच: La fureur des gargouilles, अंग्रेजी: Rise of the Gargoyles) एक २००९ टीवी फिल्म बिल कोरकोरन द्वारा निर्देशित और Syfy चैनल के लिए उत्पादन किया। इस में १८ फिल्म है मनेअटर श्रृंखला.
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राईज़ ऑफ़ द गार्गोय्ल्स
पेरिस, फ्रांस में, दो श्रमिकों एक छिपे हुए कक्ष पाते हैं जबकि सेंट जीन आंद्रे चर्च के भूमिगत खुदाई. वे जगह में मूल्यवान वस्तुओं को इकट्ठा लेकिन वे एक प्राणी से हमला कर रहे हैं। इस बीच, बदनाम प्रोफेसर जैक रान्डेल, जो विशेषज्ञों द्वारा अस्वीकार कर दिया गार्गोय्ल्स के बारे में एक पुस्तक लिखी है अपने दोस्त कैरल झांकना बेखम...
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प्रति-कण
किसी भी कण से संबद्ध प्रतिकण भी होता है जिसका द्रव्यमान अभिन्न होता है लेकिन विद्युत आवेश विपरीत होता है। उदाहरण के लिये इलेक्ट्रॉन का प्रति-कण प्रति-इलेक्ट्रॉन एक धनावेशित कण जिसे पोजीट्रॉन कहते हैं, सामान्यतः इसे रेडियोधर्मी पदार्थों के क्षय से बनाया जाता है।
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प्रति-कण
प्रकृति के नियम कणों और प्रतिकणो के लिये लगभग सममितीय होते हैं। उदाहरण के लिये एक प्रतिप्रोटोन और पोजीट्रॉन से प्रति-हाइड्रोजन परमाणु का निर्माण होता है, जिसके गुणधर्म भी हाइड्रोजन परमाणु के समान ही हैं।
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प्रति-कण
प्रतिप्रोटोन और प्रति-न्यूट्रोन की खोज कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में १९५५ में एमिलियो जिनो सेग्रे और ओवेन चेम्बेर्लैन ने की। तब तक कण त्वरक प्रयोगों में कई अन्य अर्द्ध-परमाणविक कणों के प्रति-कणों की खोज हो चुकी थी। हाल ही के वर्षों में प्रति-पदार्थ के परमाणु, विशिष्ट विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्रों की उपस्थिति में ...
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प्रति-कण
डिराक समीकरण को हल करने पर हमें ऋणात्मक ऊर्जा की क्वांटम (प्रमात्रा) अवस्था प्राप्त होती है। परिणाम स्वरुप एक [इलेक्ट्रॉन अपनी ऊर्जा को विकिरित करते हुये ऋणात्मक ऊर्जा अवस्था को प्राप्त हो सकता है।
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Low-Resource RAG: Wikipedia FAISS Indexes (BGE-M3)

FAISS indexes over Wikipedia 2023 passages for four languages, embedded with BAAI/bge-m3. Source corpus: CohereLabs/wikipedia-2023-11-embed-multilingual-v3.

Each language folder has two files aligned row-by-row:

  • index.faiss — FAISS IndexFlatIP, dim=1024, L2-normalized BGE-M3 vectors
  • dataset/ — Arrow dataset with _id, title, text per passage
Language Code Passages Size
Hindi hi 541,822 2.1 GB
Marathi mr 203,479 795 MB
Nepali ne 83,598 327 MB
Maithili mai 13,806 54 MB

Usage

import faiss
from datasets import load_from_disk
from FlagEmbedding import BGEM3FlagModel

LANG = "hi"  # hi | mr | ne | mai
INDEX_DIR = "/path/to/indexes"

index = faiss.read_index(f"{INDEX_DIR}/{LANG}/index.faiss")
dataset = load_from_disk(f"{INDEX_DIR}/{LANG}/dataset")

model = BGEM3FlagModel("BAAI/bge-m3", use_fp16=True)
query_vec = model.encode(["your query"])["dense_vecs"]

scores, indices = index.search(query_vec, k=10)
results = dataset.select(indices[0])

Download

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    repo_id="Pika4028/low-resource-rag-indexes",
    repo_type="dataset",
    local_dir="/path/to/indexes",
    allow_patterns="hi/*",  # omit for all languages
)
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