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थूपवंसो 265
सखस करें सापयित्वा मिकख लत्न ठितोस्व सो।
आागिनेय्यस्स बदने हत्थं पक्खिप्प ताबदे,।। 43।
धातुकरण्डं आदाय, तिद्ठू नागा/ति भासिय।
निमुज्जित्वा पठवियं परिवेणम्हि उद्गृहि।।774।
एकस् उक्ते नागराजा अप्रतिभानः भूत्वा आत्मनः भागिनेयेन धातबः गोपिता” इति मन््यमानः एवम्
आह- यूय॑ भदन््त! चैत्ये धातुना अस्तिभाव॑ वा न... | |
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2. सुमेधपत्थनाकथा
पालि- “संसारसोतं छिन्दित्वा, विद्धंसेत्वा तयो भवे।
धम्मनावं समारुय्ह, सनन््तारेस्सं सदेवकं"॥439॥
मनुस्सत्तं लिड्गगसम्पत्ति, हेतु सत्थारदस्सनं।
पब्वज्जा गुणसम्पत्ति, अधिकारों च छन्दता।
अद्भधम्मसमोधाना, अभिनीहारो समिज्ञति॥440॥
लोकबिदू दीपड्करो, आहुतीनं पटिग्गहो।
उस्सीसके मं ठत्वान, इदं बचनमत्रवि॥4... | |
१. चित्तुप्पादकण्डं व
१२. कतमं॑ तस्मिं समये सद्दिन्द्रियं होति? या तस्मि समये सद्धा सद्दहता ओकप्पना
अभिष्पसादो सद्धा सद्धिन्द्रियं सद्घाबलं - इदं तस्मिं समये सद्धिन्द्रियं होति।
१३. कतम॑ तस्मिं समये वीरियिन्द्रियं होति? यो तस्मिं समये चेतसिको बवीरियारम्भो
निक्कमो परक््कमो उस्यामो वायामो उस्साहो उस्सोव्ठ्ही थामो धित... | |
मातिका श्रः
<८. (क) सविचारा धम्मा।
(ख) अविचारा धम्मा।
<९. (क) सप्पीतिका धम्मा।
(ख) अप्पीतिका धम्मा।
९.०. (क) पीतिसहगता धम्मा।
(ख) न पीतिसहगता धम्मा।
९१. (क) सुखसहगता धम्मा।
(ख) न सुखसहगता धम्मा।
९.२. (क) उपेक्खासहगता धम्मा। (ख) न उपेक्खासहगता धम्मा।
(संस्कृतच्छाया) ८८. (क) सविचारा: धर्मा:।
(ख) अविचारा: धर्मा:।
. (क) स... | |
उमापुस्फियवस्गो तक
“सतसहस्सितो कप्पे, बुद्धों लोके अनुत्तरो।
पदुमुत्तरो लोकबिदू, आहतीनं पटिग्गहो॥655॥
“तस्स छत्तं मया दिन्नं, विचित्तं समलड्त्कतं।
उभो हत्थेष्टि पग्गण्हि, सयम्भू अग्गपुग्गलो॥656॥
“अहो बुद्धो अहो धम्मो, अहो नो सत्थुसम्पदा।
'एकच्छत्तस्स दानेन, दुग्गतिं नुपपज्जहं॥657॥
“किलेसा झापिता मस्हं, भवा सब्बे समू... | |
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2. सुमेधपत्थनाकथा
चालि- “न हेते एत्तकायेव, बुद्धधम्मा भविस्सरे।
अज्ञेपि विचिनिस्सामि, ये धम्मा बोधिपाचना"॥206॥
विचिनन््तो तदा दक्खि, ततियं नेक्खम्मपारमिं।
पुब्बकेहि महेसीहि, आसेवितनिसेवितं॥207॥
“इमं त्व॑ं ततियं ताव, दव्ठह॑ कत्वा समादिया
नेक्खम्मपारमितं गच्छ, यदि बोधिं पत्तुमिच्छसि॥208॥
“यथा अन्दुघरे पुरिसो, ... | |
थूपवंसो ख्गा
तस्मि खणे धातुमत्थके सेतच्छत्त दिस््सति, छत्तगाहकत्रह्मा न दिस्सति, तथा
तालवण्टबीजनि-आदयो दिस्सन्ति, गाहका न दिस्सल्ति। दिव्वसुरियघोससड्गीतियो सुय्यन्ति,
गन्धब्बदेवता न दिस्सन्ति। राजा एत॑ अच्छरियं दिस्वा इन्दगुत्तत्थेरे एवं आह- देवता
दिव्वछत्तेन पूजेसूं, अहं मानुसकच्छत्तेन पूजेमि भन््ते”ति। थेरोः- युत्... | |
श्रस्मपदपाकछि
श्7
पालि-
98. गामे जा यदि जारञ्ओे, निन्ने जा यदि जा थले।
यत्थ अरहन्तो विह्रन्ति, त॑ भूमिरामणेय्यकं॥ 7/9 ॥।
99. रमणीयानि अरज्ञानि, यत्थ न रसती जनो।
जीतरागा रमिस्सन्ति, न ते कामगवेसिनो॥ 7/40 ॥।
संस्कृतच्छाया-
ग्रामे वा यदि वारण्ये निम्ने वा यदि वा स्थले ।
यत्रार्हन्तो विहरन्ति सा भूमी रमणीया ॥| 7 /9॥।
रम... | |
'लिगसले 299
य॑ प्रासं कुशलं कर्म कुर्वता इसं मया।
तेन एतेन पुण्येन सत्त्वा गच्छन्तु निर्वुतिमा।
अनन्तरायेन यथा च सिद्धिम॒ुपागतः स्तूपवः
तथैब सद्धर्मश्चिता: जनानाम।
मनोरथा शीघ्रम् उपेन्तु सिद्धिम्।|
पटिसम्भिदामार्गैस्थ येन लीनार्थदीपनी।
टीका विरचिता साधु सद्धमोदियकामिना।।
तथा प्रकरणे सत्यसंक्षेपे अर्थदीपना।
श्वीमता स... | |
व
अपदानपालि
“पथब्या पब्बते चेव, आकासे उदके बने।
य॑ य॑ हत्थं पसारेसि, अलड्कारा उपेन्ति मं॥63॥
“पथब्या पब्बते चेव, आकासे उदके बने।
य॑ य॑ हत्थ॑ पसारेमि, सब्बा कड्ञा उपेन्ति मं॥64॥
“पथब्या पब्बते चेव, आकासे उदके बने।
य॑ य॑ हत्थं पसारेमि, मधुसक्खरा उपेन्ति मं॥65॥
“पथब्या पब्बते चेव, आकासे उदके वने।
य॑ य॑ हत्थं पसारेमि, सब... | |
सत्तमों परिच्छेदो
26 पे हु मल
त॑ सुत्वा यक्खभयतो, भीत॑ त॑ आह यक्खिणिं।
मा चिन्तयि सहस्सेन, दापयिस्सामि ते बलिं॥64॥
पुनप्पुन॑ त॑ं याचित्वा, उभो आदाय पुत्तके।
भीता पि सा अगतिया, लंकापुरमुपागमि॥62॥
पुत्ते बिहि निसीदेत्वा, सयं पाविसि त॑ पुरं।
सज्जानित्वान तं यक्खि, भीता चोरी ति सड्ज्िनो॥63॥
संखुब्भिसु पुरे यक्खा, एको साहस... | |
मातिका बल
(६) ओघगोच्छक
३२. (क) ओघा धम्मा।
(ख) नो ओघा धम्मा।
३३. (क) ओघनिया धम्मा।
(ख) अनोघनिया धम्मा।
३४. (क) ओघसम्पयुत्ता धम्मा।
(ख) ओघविष्पयुत्ता धम्मा।
३५. (क) ओघा चेव धम्मा ओघनिया च।
(ख) ओघनिया चेव धम्मा नो च ओघा।
३६. (क) ओघा चेव धम्मा ओघसम्पयुत्ता च।
(ख) ओघसम्पयुत्ता चेव धम्मा नो च ओघा।
ल्संस्कृतच्छाया) ३२... | |
'पदमाला
य्र
भूतोति गोत्रभू, सोतापत्तिमग्गस्स अनन्तरपच्चयेन सिखाप्पत्तबनलवविपस्सनाचित्तेन
समन्नागतो पुग्गलो। बुत्तज्हेते भगवता “कतमो च पुग्गलों गोत्रभू? येसं धम्मानं समनन्तरा
अरियधम्मस्स अवक्कन्ति होति, तेहि धम्मेहि समन्नागतो पुग्गलो गोत्रभू”ति, इदमेवेत्थ
अत्थसाधकं बचनं। अपिच समणोति गोत्तमत्तमनुभवमानो कासाबकण्ठसमणो... | |
'पदमाला
ण़्त
चातुभाबोति पातुभवनं पातुभावो। आविभावोति आविभवनं आविभावों, उभिन्नमेतेसं
'पाकटता इच्चेबत्थो। तिरोभावोति तिरोभवनं तिरोभाबो, पटिच्छन्नभाबो। विनाभावोति
विनाभवनं विनाभावो, वियोगो। सोत्यिभावोति सोत्थिभवन सोत्थिभावों, सुवत्थिभावो
सुखस्स अत्थिता, अत्थतो पन निब्भयता निरुपद्ववता एव। अत्थिभावोलति अत्थिता विज्जमान... | |
उमापुस्फियवस्गो वहा
“चतुन्नवुतितो कप्पे, यं सज्ञमलभिं तदा।
दुग्गतिं नाभिजानामि, बुद्धसज्ञायिदं फलं॥585॥
“सत्तवीसे इतों कप्पे, एको आसिं महीपति।
अरज्ञसत्थो नामेन, चक्कवत्ती महब्बलो॥586॥
“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासन"॥587॥
इत्थं सुदं आयस्मा निमित्तसज्ञको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।
'निमित्तसज्ञकत्थ... | |
सच्दनीतिप्पकरणं
530- न्
एते दुह्मदयो धातू, तिकम्मापि भवन्ति तु।
कारितप्पच्चये लद्धे, इति आचरिया'ब्रजुं॥
तत्रिमानि उदाहरणानि - गवं पयो दुहति गोपालको। गाविं खीरं दुहति गोपालदारको।
तत्थ पयोति उपयोगबचनं, “यसो लद्धा न मज्जेय्या”ति एत्थ “यसो”ति पदमियवा
मनोगणिकस्स छि ईदिसम्पि उपयोगवचनं होति अज्ञादिसम्पि। इस्सरो गोपालं गवं ... | |
20
आदीनवं स्तेहजं पेक्खभानो, एको
अपदानपालि
““सरागवल्थूसु विरागसज्जी, रत्तम्हि लोकम्हि विरत्तचित्ता।
हित्वा पपञ्चे जितफन्दितानि [विदिय फन्दितानि (सी*) जितबन्धितानि (क*)], तथेब
बोधिं अनुपापुर्णिंसु॥89॥
““सब्बेसु भूतेसु निधाय दण्डं, अविहेठयं अड्ञतरम्पि तेसं।
मैत्तेन चित्तेन हितानुकम्पी, एको चरे खग्गविसाणकप्पो॥90॥
“... | |
बुद्धवस्गो अंक
““आकासो मिनितुं सक्का, रज्जुया अड्गगुलेन वा।
न त्वेव तव सब्बज्ञु, जाणं सक्का पमेतवे॥222॥
““महासमुद्दे उदकं, पथवी चाखिला जटं [पथविं चाखिलड्जहे (स्या>)]।
बुद्धजाणं उपादाय, उपमातो न युज्जरे॥223॥
““सदेवकस्स लोकस्स, चित्त येसं पवत्तति।
अन्तोजालीकता [अन्तोजालगता (पी*)] एते, तब जाणम्हि चक््खुम॥224॥
“बैन आाण... | |
एन्ला।-(उ-म्रा क्ीकज्षााक्न के".
डतहबांधब०.. बकवास
छणएएाएप्त4०.५१५/5.57७7.
एबधग्ण
एकर्ण, एच्वा्ापलएघाव पिश्यावआबाव डिी्वजाफ
डक्णशरातपांबट लक वध बास्ता+.. ८.8 काच्म-
एफबवढलए.. डिकक्षापप+. प.प्पंध्टा
एच्वा। 8&फएत३ (ए:ःशाए-९
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अभ्यपदपाक्ति
69
253. घरचज्जानुपस्सिस्स , निचे उज्ञानसखण्थिनो।
आसबा तस्स चद्भुन्ति, आरा सो आसबनखया॥ 48/49॥॥
254. आकासेब पद नत्थि, समणो नत्थि बाहिरे।
पपज्चाशिरता पजा, निष्पपठ्चा तथागता॥ 48/20॥॥
255. आकासेव पद नत्थि, समणो नत्थि बाहिरे।
सद्धवरा सस्सता नत्वथि, नत्थि बुद्धानमिड्जितं॥48/24 ॥॥
संस्कृतच्छाया-
परवद्याउनुदर... | |
उब4 मेत्तेयवग्गो
“खत्तियम्हि कुले जातों, अभिज्ञापारमिं गतो।
सब्बासवपरिक्खीणो, नत्थि दानि पुनब्भवो॥ 634॥
“यदि बुद्धोसि सब्बज्जू, पभड्कर तमोनुदा
नमस्सिस्सामि त॑ देव, दुक्खस्सन्त करो तुबं॥632॥
“पत्थरित्वाजिनचम्मं, निसीदनमदासहं।
निसीद नाथ सब्बज्ञु, उपद्धिस्सामहं तुबं॥633॥
“निसीदि भगवा तत्थ, अजिनम्हि सुवित्थते।
'निमन््तयित... | |
63
पालि-
229. ये चे विज्जू पसंसन्ति, अनुविच्च सुवे सुवे।
अच्छिद्वुत्ति मेधाविं, पठ्ञासीलसमाहितं॥ 47/9 ॥।
230. निक्खं जम्बोनदस्सेव, को तं॑ निन्दितुमरहति।
देवापि न॑ पसंसन्ति, ब्रह्म्मुनापि पसंसितो॥ 47/40 ॥॥
234. कायप्पकोपं रक्खेय्य, कायेन संबुतो सिया।
कायदुच्रितं हित्वा, कायेन सुचरितं चरे॥ 47/44 ॥॥
232. वचीपषकोपं रक््स... | |
पालि-
॥नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स॥
खुद्दकनिकाये
बुद्धवंसपात्ठि
4.रतनचड्-कमनकण्डं
ब्रह्मा च लोकाधिपती सहम्पती [सहम्पति (स्या* कं०)], कतड्जली अनधिवरं अयाचथा
“सन्तीध सत्ताप्परजक्खजातिका, देसेहि धम्म॑ अनुकम्पिमं पज॑"॥॥
सम्पन्नविज्नाचरणस्स तादिनो, जुतिन्धरस्सन्तिमदेहधारिनो ।
'तथागतस्सप्पटिपग्गलस्स, उप्पज्जि कार... | |
सच्दनीतिप्पकरणं
38 द्दनी |
समानसुतिकानि। एवं सन््तेषि एकज्मकरणेन लद्ध समानसुतिलेसं गहेत्वा अत्थन्तरविड्जापनत्थ
उच्ज्चारणविसेसदस्सनत्थड्च “समानसुतिकानी”ति बुत्तानि। एस नयो अख्ञत्रापि ईदिसेसु
ठानेसु। इदमेत्थ सल््लक्खेतब्बं -
अत्थ समानसुतिकानं अट्लारसाकारेसु येन केनचि आकारेन अत्थविसेसो लब्भति,
विच्छिन्दित्वा पन उच्चार... | |
धातुमाला
खाद खादाति लपसि, गतसत्तं जरग्गव”न्ति
पाछ्ठियं पन “गतसत्तं जरग्गब”न्ति पाठस्स “बिगतजीबितं जिण्णगोण”न्ति अत्थं
संवण्णेसुं। इमिना सत्तसद्वस्स जीवितवचनं विय दिस्सति, “न सुकरा उच्छेन पर्गहेन यापेतु"न्ति
एत्थ पर्गहसद्दस्स पत्तकथनं विय। सुट्कु विचारेतब्बं।
सुत्त अवमोचने। सुत्तेति, सुत्तयति।
मुत्त पसबने। मुत्तेति,... | |
धातुमाला
493
अज्जे अज्ञानिपि वदन्ति। तानि सासनानुलोमानि न होन्तीति इध न दस्सितानि।
अट्ठृकथासु पन “मारो, नमुचि, कण्हों, पमत्तबन्धू"ति चत्तारियेव नामानि आगतातनि।
इदानि अभिक्कन्तसद्स्स भूवादिगणे “कमु पदविक्खेपे”ति वोहारसीसेन चुत्तस्स
'कमुधातुस्स वसेन इध च “कमु इच्छाकन्तीसू''ति वुत्तस्स कमुधातुस्स वसेन अत्थुद्धारं कथया... | |
सच्दनीतिप्पकरणं
32 द्दनी |
“इसमे नून अरड्ञस्मि, मिगसड्ग्घानि लुद्दका।
बाकुराहि परिक्खिप्प, सोब्भ॑ पातेत्वा तावदे।
विक्कोसमाना तिब्बाहि, हन्ति नेसं वरं बर"'न्ति॥
आदीसु पन बहुबचनो। “सीलवा वत्तसम्पन्नो। एथ तुम्हे आयस्मन््तो सीलबा
नियतो ब्रह्मचारी। सन्तो हवे सब्भि पवेदयन्ति। महाराजा यसस्सी सो। चत्तारो महाराजा"ति
एवबमादी... | |
नीली ता आज
महावंसो
203
त॑ नन््दना दक्खिणेन, नयं थेरं रथेसभो।
महामेघवनुय्यानं, पाचिनद्वारकं नयि॥44॥
तत्थ राजघरे रम्मे, मडचपीठानि साधुकं।
साधक्यूति सन््थरापेत्वा, “वबसते"त्त सुखं” इति॥42॥
राजा थेरे'भिवादेत्वा, अमच्च्चपरिवारितो।
पुरं पाविसि थेरा तु, तं रत्ति तत्थ ते वसुं॥3॥
पभातेयेव पुप्फानि, गहेत्वा धरणीपति।
थेरे उप... | |
अक्कमित्वान म॑ बुद्धो 434
अग्गिचन्दसूरियान 675
अच्चुतो च खुमनो च 923
अजपाललक्खमूलस्मि 44
अजपालसरूक्खमूलस्मि 824
अजपालल्ूक्खमूले 975
अज्मायको मन््तधरो 86
अड्जलिं परगहेलवान 56.
अड्ड सारीरिका थूपा 057
अद्डइगवचनसम्पन््नो 927
अद्डदीससमाकीर्णम् 42
अड्डतवुतिसहस्सान 685
अद्भपण्णासरतन 456,487,55,
580,803
अड्डबस्ससहस्सानि 84... | |
अपदानपालि
206
“सिंसतिमे [तिपड्ञासे (सी* स्या*)] इतो कप्पे, राजा आसिं जनाधिभू।
महापुलिननामेन, चक्कवत्ती महब्बलो॥970॥
“पटिसम्भिदा चतस्सो, विमोक््खापि च अट्ठिमे।
ऋछष्ठछभिज्जा सच्छिकता, कत॑ बुद्धस्स सासनं”॥974॥
इत्थं सुदं आयस्मा पुलिनपूजको थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।
पुलिनपूजकत्थेरस्सापदान सत्तमं।
8. उत्तियत्थेरअपदानं... | |
_... थूचंसोा . ७9$ः67
भगवान् पुनः एवं महत्यां पूजायां वर्तमानायां प्रथमयामे मल्लान् धर्म अदिसत् मध्यमयामे
सुभद्व धर्म दिशित्वा त॑ मार्गफले प्रत्यस्थापयत् पश्चिमयामे भिक्ष्त् अवबच्य बलवत्प्रत्यूपसमये महापृथवरीं
कम्पयन् अनुपादिशेषायां निर्वाणधातौ परिनिरवात्। परिनिर्वुत पुनः भगवति लोकनाथे आनन्दयथेरो
मल्लराजान् त... | |
मिलिन्दपज्हो 09
“गोपालकस्स भन््ते”ति।
'किं कारणा”ति? “किज्चापि सो एवं वदेय्य, अपि च ततो येव त॑ निब्बत्तं”ति।
“एवमेव खो, महाराज, कि चापि अछ्ञं मारणन्तिकं नामरूपं, अज्ञं पटिसन्धिस्मिं नामरूपं,
अपि च ततो येव तं॑ निब्बत्तं। तस्मा न परिसमुत्तो पापकेहि कम्मेही"ति।
“कल्लोसि, भन््ते नागसेना”ति।
45. ननु नागसेनो परिसन्दहिस... | |
मिलिन्दपज्हो 703
44. को पटिसन्दहति? ।
राजा आह “भन््ते नागसेन, को पटिसन्दहती"”ति? थेरो आह “नामरूपं खो, महाराज,
पटिसन्दहती”ति। “किं इमं येव नामरूपं पटिसन्दहती”ति? “न खो, महाराज, इमं येव नामरूप॑
पटिसन्दह॒ति। इमिना पन, महाराज, नामरूपेन कम्मं करोति सोभनं वा पापकं वा, तेन कम्मेन
अज्ञं नामरूप॑ं पटिसन्दहती”ति।
“यदि, भन््त... | |
थूपबंसो 3
बने स्थित रहे। उदित होकर अस्त होते हुए चन्द्रमा और सूर्य की भाँति तथागत के पैरों के अर्न्तध्यान होने पर
जनसमूह ने महाक्रन्दन किया। (यह क्रन्दन) परिनिर्वाण काल से (भगवान् बुद्ध के) अधिक करूणापूर्ण था। इसके
बाद देवताओं के प्रभाव से यह चिता चारों ओर से एक साथ प्रज्चलित हो गई। प्रज्वलित भगवान् के शरीर की
चमडी ... | |
2:०६. 9-03.
फर१डातापरा ४१ 5/घएछातराप 3#घवडया
96९४७ ४० ४
( *ड' भरे के स्माथ राष्ट्रीय मूल्यांकन एज (+ल्बतवकाप्ट4 छ१०३856 कक 'ह' दाल)
अल्थायन परिषव् द्वारा सान््यता प्राप्त)
'पुरोवाक्
यह अत्यन्त हर्ष का विषय है कि राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान (मानित विश्वविद्यालय) संस्कृत के सर्वांगीण विकास के
साथ-साथ पाल्लि एवं प्रा... | |
अपदानपालि
450
“सत्तसद्रिम्हितो कप्पे, एको सामुद्धरो अह।
सत्तरतनसम्पन्नो, चक्कवत्ती महब्बलो॥2084॥
“पटिसस्भिदा चतस्सो...पे*... कत॑ बुद्धस्स सासन॑"॥2082॥
इत्थं सु्दं आयस्मा यूथिकपुप्फियो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।
8. दुस्सदायकत्थेरअपदानं
“तिवरायं पुरे रम्मे, राजपुत्तोसहं [राजपुत्तो अहं (सी* स्या*)] तदा।
पण्णाकारं... | |
सच्दनीतिप्पकरणं
38: न्
के बेठने। ठायति।
चठ वियत्तियं बाचायं। धम्म॑ पठति। पाठो, नक्खत्तपाठको, सो होरपाठक॑ पुच्छि।
सव्वपाठी भविस्सति। पढितु, पदितवे, पढित्वा, पछित्वान, पदितुन, पिय, पदियाना
'एवंविध॑ तुंपच्चयन्तादिविभागं सब्बत्थ यथारहं वत्तुकामापि गन्थ वित्थारभयेन न वदाम।
अवुत्तोषि ईदिसो विभागो नयानुसारेन यथासम्भवं स्ब... | |
कुण्डधान बग्गो
“पटिसम्भिदा चतस्सो...पे*... कतं बुद्धस्स सासनं"॥4024॥
इत्थं सुदं आयस्मा सागतो थेरो इमा गाथायो अभासित्थाति।
सागतत्थेरस्सापदान दुतियं।
3. महाकच्चानत्थेरअपदानं
“पदुमुत्तरनाथस्स, पदु्म नाम चेतियं।
सिलासन॑ [सीहासनं (क*)] कारयित्वा, सुवण्णेनाभिलेपयिं॥022॥
“रतनामयछत्तउच, पग्गय्ह वाव्ठबीजनिं [वाव्वबीजनी (सी* स्... | |
मिलिन्दपज्हो 37
(क) कि लक्खणो फस्सो
नागसेन, कि लक्खणो फस्सो”ति? “फुसनलक्खणो, महाराज,
4.“ओपम्मं करोही”ति।
“यथा, महाराज, द्वे मेण्डा युज्ञेय्युं, तेस यथा एको मेण्डो, एवं चक्खु दट्ठब्बं॑ यथा
दुतियो मेण्डो, एवं रूपं॑ दट्ठछब्बं, यथा तेसं सन्निपातो एवं फस्सो दट्ठब्बो"ति।
2. “भिय्यो ओपम्सं करोही”ति।
“यथा, महाराज, द्वे पाण... | |
सच्दनीतिप्पकरणं
332- न्
“अयं सो इन्दको यकक््खो, दज्जा दान परित्तकं।
अतिरोचति अम्हेहि, चन्दो तारगणे यथा”ति
दस्सनतो। एत्थ हि दज्जाति दत्वाति अत्थो। इदं पन दत्वासद्वेन समानत्थं “ददिय्य” इति पदरूप॑
पतिट्ठपेत्वा य्यकारे परे सरलोपं॑ कत्वा सज्ञोगेसु सरूपलोपड्च ततो चकारसज्जोगस्स
ज्जकारद्वयं दीघत्तडच कत्बा निप्फज्जति॥
अथाप... | |
246
27. गोतमबुद्धवंसो
पालि- निमित्ते चतुरो दिस्वा, अस्सयानेन निक््खमिं।
हिन्दी-
संस्कृतच्छाया-
छब्बस्सं पधानचारं, अचरिं दुक््करं अहं॥4024॥
बाराणसियं इसिपतने, चक्के
पवत्तितं मया।
अहं गोतमसम्बुद्धों, सरणं सब्बपाणिनं॥025॥
कोलितो उपतिस्सो च, द्वे भिक्खू अग्गसावका।
आनन्दो नासुपट्ठाको, सन्तिकावचरो
रो मम।
खेसा उप्प... |
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