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|---|---|
Marg darshan kare | इस विश्व में परमात्मा सर्वत्र है। |
Marg darshan kare | वही सूर्य को. चंद्र को, पृथ्वी को, तारों को निश्चित स्थान पर रख रहा है। |
Marg darshan kare | वही भूमि पर संतुलन रख रहा है। |
Marg darshan kare | 'पानी की मात्रा' बढ्ने नहीं दे रहा है। |
Marg darshan kare | मनुष्य अतिविचार' करके वैचारिक प्रदूषण कर रहा है जिससे गयी बढ रही है और उसी से 'ग्लोबल वॉर्मिंग' का खतरा उत्पन्न हो रहा है। |
Marg darshan kare | अधिक गर्मी बढने पर बर्फ पिघल जाएगी और सर्वत्र पानी हो जाएगा। |
Marg darshan kare | पृथ्वी की जमीन डूब जाएगी। |
Marg darshan kare | प्रकृति का संतुलन बिगड जाएगा। |
Marg darshan kare | अतिविचार से वह बिगाड़ रहा है। |
Marg darshan kare | विचार करना प्रकृति के विरोध में हैं क्योंकि प्रकृति के साथ जुड जाने पर विचार नहीं रह जाते। |
Marg darshan kare | ' समर्पण ध्यान' प्रकृति से समरस होना सिखाता है। |
Marg darshan kare | समर्पण ध्यान' करने से हमारा अस्तित्व प्रकृति से अलग नहीं रहे जाता है। |
Marg darshan kare | परमात्मा एक अविनाशी शापित है जो विश्व में सर्वत्र विद्यमान है। |
Marg darshan kare | 'परमात्मा' ही सारे ब्रह्मांड का संचालन व नियंत्रण कर रहा हैं परमात्मा को किसी 'धर्म' के दायरे में बाँधा ही नहीं जा सकता है। |
Marg darshan kare | परमात्मा कल मी था, 'आज भी है' और कल भी रहेगा। |
Marg darshan kare | परमात्मा 'सजीव' व 'निर्जीव' दोनों में समान रूप विद्यमान रहता है। |
Marg darshan kare | कई निर्जीव स्थान' भी परमात्मा को अनुभूति कराते हैं। |
Marg darshan kare | हम संजीव है, इसलिए संजीव से हम आसानी से ग्रहमा कर सकते हैं। |
Marg darshan kare | एक बार आपके भीतर का परमात्मा जागृत हो जाए, आपको बाहर के भी परमात्मा के दर्शन सर्वत्र होने लग जाते हैं। |
Marg darshan kare | परमात्मा सर्वत्र है। |
Marg darshan kare | इस ब्रांड में परमात्मा के अलावा और कुछ हैं ही नहीं। |
Marg darshan kare | परमात्मा की न कोडे शुरुआत है, न अंत है। |
Marg darshan kare | 'समर्पण ध्यान' परमात्मामय होना सिखाता है। |
Marg darshan kare | आप जैसे-जैसे ध्यान में गहरे उतरते जाते हैं, वैसे-वैसे आपका 'मैं का अहंकार परमात्मा में दिलीत होने लगा जाता है और ध्यान की उच्च अवस्था में आप ही परमात्मामय हो जाते हो, आप ही परमात्मा हो जाते हो। |
Marg darshan kare | यह 'मैं ही परमात्मा की अनुभूति में बाधा है। |
Marg darshan kare | यही मैं हमें परमात्मा से अलग रखता है। |
Marg darshan kare | मैं का अहंकार हमे परमात्मा से अलग करता है। |
Marg darshan kare | में हमें छोटा करता है, 'मैं हमें कमजोर करता है। |
Marg darshan kare | 'मैं विनाश की प्रक्रिया है, जो अलग होने पर ही संभव हैं। |
Marg darshan kare | 'मैं अधिक होने पर 'मेरा का जन्म होता हैं- यह मेरा है, यह मेरा है। |
Marg darshan kare | 'मैं और 'मेरा हो जाने के बाद मुझे की शुरुआत होती है। |
Marg darshan kare | 'मुझे' यह पसंद है, मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं है यो सब नासमझी की बातें हैं। |
Marg darshan kare | आप अपने आपको 'मैं पेरा' 'मुझे' में परमात्मा से अलग कर रहे हैं। |
Marg darshan kare | आप अगर अलग हो जाओगे तो परमात्मा को केसे पाओगे > आपको परमात्मामय होने का है। |
Marg darshan kare | आप पानी की बूँद नहीं हो। |
Marg darshan kare | आप अथाह सागर हो। |
Marg darshan kare | इस बात : सदैव ध्यान में रखो। |
Marg darshan kare | अलग अस्तित्व के कारण ही सागर बूँद" कहलाता है , अन्यथा वह सागर ही सदैव होता है। |
Marg darshan kare | खतरा बूँद को होता है, मिटने का डर बूँद को होता है, सागर को नहीं। |
Marg darshan kare | यह मैं का अहंकार हमें बूँद बनाता है, इसलिए हमें इस 'मैं को ही समाप्त करना है। |
Marg darshan kare | इस 'मैं की विनाशक प्रवृत्ति को नष्ट करना है। |
Marg darshan kare | यह हमें छोटा करती है। |
Marg darshan kare | मैं बडा सूक्ष्म भाव है। |
Marg darshan kare | स्वयं को तो यह कमी पता ही नहीं चलता है। |
Marg darshan kare | 'मैं का अहंकाररुपी राक्षस सभी में होता है। |
Marg darshan kare | एक मनुष्य का अहंकार ' एक मनुष्य उतना हो होगा, समान होगा तो एक मनुष्य अपने 'अहंकार' को दूर कर ही नहीं सकता है। |
Marg darshan kare | अच्छी शक्तियाँ और बुरी शक्तियाँ समान ही हों, तो कमी भी बुरी शक्तियों समाप्त नहीं होंगी। |
Marg darshan kare | बुरी शक्तियाँ तभी समाप्त हो सकती हैं, जब अच्छी शक्तियों को बाहर से अच्छी शक्तियों सामूहिकता प्राप्त हो। |
Marg darshan kare | याने में के अहंकार पर अकेला न मैं विजय प्राप्त कर सका, न कमी आप विजय प्राप्त कर सकेंगे। |
Marg darshan kare | यह में का अहंकाररुपी राक्षस सामूहिकता में ही समाप्त हो सकता है। |
Marg darshan kare | हमारे जीवन का उद्देश्य ही इस में के अहंकार को समाप्त करना हे। |
Marg darshan kare | परमात्मा की प्राप्ति के बाद मैं वो में बदल जाता फिर कहते है, " वो चाहे, वह वह करेगा। |
Marg darshan kare | " सारी जीवनयात्रा ही मैं से वो तक की है। |
Marg darshan kare | एक बार 'वो' का जीवन में प्रवेश हो जाए. जीवन आनंदमय हो जाता है। |
Marg darshan kare | मनुष्य सुख और दुःख से परे हो जाता है। |
Marg darshan kare | सुख मिले उसकी क्या से, दुःख मिले तो पी उसकी कृपया से। |
Marg darshan kare | जीवन में 'मैं विदा हो जाता है और एक साक्षीभाव आ जाता है। |
Marg darshan kare | जब मनुष्य के प्रयत्न असफल हा जाते हैं और मैं का अहंकार टूट जाता है, तब उसे उस परमपिता परमेश्वर की याद आती और फिर मनुष्य उस परमेश्वर के किसी ना किसी माध्यम के सामने नतमस्तक होता है। |
Marg darshan kare | याने छप्पर लगे फटने और प्रसाद लगे बाँटने' वाली स्थिति हो जाती है। |
Marg darshan kare | याने परमेश्वर को केवल संकट के समय ही याद किया जाता है। |
Marg darshan kare | संकट के कारण ही क्यों न हो, मनुष्य थोडे से समय के लिए 'मैं से यो तक पहुँच जाता है। |
Marg darshan kare | परमात्मा के सत्यस्वरूप कों जाना हो, तो उस तक पहुँचने में आसानी होती। |
Marg darshan kare | परमात्मा आस्तिक व नास्तिक दोनों के लिए समान होता है क्योंकि वह करुणा का सागर है। |
Marg darshan kare | वह किसी के लिए कम या ज्यादा नहीं हो सकता है। |
Marg darshan kare | वह प्रत्येक मनुष्यमात्र में बसता है. प्रत्येक प्राणी में बसता है। |
Marg darshan kare | हमारे भीतर का परमात्मा हमारे सबसे करीब होता है। |
Marg darshan kare | उस तक पहुँचना सबसे सरल होता है। |
Marg darshan kare | हम पास के परमात्मा को छोडकर बाहर के परमात्मा की खोज समय बर्बाद करते हैं। |
Marg darshan kare | इस विश्व में परमात्मा सर्वत्र है। |
Marg darshan kare | वही सूर्य को. चंद्र को, पृथ्वी को, तारों को निश्चित स्थान पर रख रहा है। |
Marg darshan kare | वही भूमि पर संतुलन रख रहा है। |
Marg darshan kare | 'पानी की मात्रा' बढ्ने नहीं दे रहा है। |
Marg darshan kare | मनुष्य अतिविचार' करके वैचारिक प्रदूषण कर रहा है जिससे गयी बढ रही है और उसी से 'ग्लोबल वॉर्मिंग' का खतरा उत्पन्न हो रहा है। |
Marg darshan kare | अधिक गर्मी बढने पर बर्फ पिघल जाएगी और सर्वत्र पानी हो जाएगा। |
Marg darshan kare | पृथ्वी की जमीन डूब जाएगी। |
Marg darshan kare | प्रकृति का संतुलन बिगड जाएगा। |
Marg darshan kare | अतिविचार से वह बिगाड़ रहा है। |
Marg darshan kare | विचार करना प्रकृति के विरोध में हैं क्योंकि प्रकृति के साथ जुड जाने पर विचार नहीं रह जाते। |
Marg darshan kare | ' समर्पण ध्यान' प्रकृति से समरस होना सिखाता है। |
Marg darshan kare | समर्पण ध्यान' करने से हमारा अस्तित्व प्रकृति से अलग नहीं रहे जाता है। |
Marg darshan kare | परमात्मा एक अविनाशी शापित है जो विश्व में सर्वत्र विद्यमान है। |
Marg darshan kare | 'परमात्मा' ही सारे ब्रह्मांड का संचालन व नियंत्रण कर रहा हैं परमात्मा को किसी 'धर्म' के दायरे में बाँधा ही नहीं जा सकता है। |
Marg darshan kare | परमात्मा कल मी था, 'आज भी है' और कल भी रहेगा। |
Marg darshan kare | परमात्मा 'सजीव' व 'निर्जीव' दोनों में समान रूप विद्यमान रहता है। |
Marg darshan kare | कई निर्जीव स्थान' भी परमात्मा को अनुभूति कराते हैं। |
Marg darshan kare | हम संजीव है, इसलिए संजीव से हम आसानी से ग्रहमा कर सकते हैं। |
Marg darshan kare | एक बार आपके भीतर का परमात्मा जागृत हो जाए, आपको बाहर के भी परमात्मा के दर्शन सर्वत्र होने लग जाते हैं। |
Marg darshan kare | परमात्मा सर्वत्र है। |
Marg darshan kare | इस ब्रांड में परमात्मा के अलावा और कुछ हैं ही नहीं। |
Marg darshan kare | परमात्मा की न कोडे शुरुआत है, न अंत है। |
Marg darshan kare | 'समर्पण ध्यान' परमात्मामय होना सिखाता है। |
Marg darshan kare | आप जैसे-जैसे ध्यान में गहरे उतरते जाते हैं, वैसे-वैसे आपका 'मैं का अहंकार परमात्मा में दिलीत होने लगा जाता है और ध्यान की उच्च अवस्था में आप ही परमात्मामय हो जाते हो, आप ही परमात्मा हो जाते हो। |
Marg darshan kare | यह 'मैं ही परमात्मा की अनुभूति में बाधा है। |
Marg darshan kare | यही मैं हमें परमात्मा से अलग रखता है। |
Marg darshan kare | मैं का अहंकार हमे परमात्मा से अलग करता है। |
Marg darshan kare | में हमें छोटा करता है, 'मैं हमें कमजोर करता है। |
Marg darshan kare | 'मैं विनाश की प्रक्रिया है, जो अलग होने पर ही संभव हैं। |
Marg darshan kare | 'मैं अधिक होने पर 'मेरा का जन्म होता हैं- यह मेरा है, यह मेरा है। |
Marg darshan kare | 'मैं और 'मेरा हो जाने के बाद मुझे की शुरुआत होती है। |
Marg darshan kare | 'मुझे' यह पसंद है, मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं है यो सब नासमझी की बातें हैं। |
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