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22 items • Updated
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आम्बली दा बूट्टा | kr_1 |
(म्हाचली पहाड़ी क्हाणी संग्रह) | kr_1 |
कमल हमीरपुरी | kr_1 |
मैं क्या गलां ? | kr_1 |
मैं तां स्टेजी कलाकारां कने रँहदा ड्रामे नाटकां करांदा-रिहा | kr_1 |
नौकरी अदेई थी, सरकारा दी, जेड्डी नौंई स्कीम औणी तिदी मताबक साहबां दा हुकम मिलणा - ‘भई इस बारे कुछ सोचो, करो, कोई गीत, गप्प गडौंजा, कोई ड्रामा बणाओ!' | kr_1 |
साहबां दे हुकमां सरे मात्थे रखदे नौकरी बजांदे रैह | kr_1 |
कदी नूरपुर, कदी म्हीरपुर, कदी पालमपुर, कदी डाडेसीबें तां कदी हरिपुर-गुलेर | kr_1 |
जगह-जगह दा पाणी, हवा, खाण-पीण, मिलणे-मलाणे बालेयां दा तजा नजा दिखदेआं मेरे अन्दर वि कहाणीकार कने नाटककार जागदा, बड़ोंदा-सरोंदा रिहा | kr_1 |
सन् 1974 च कांगड़ा लोकसाहित्य परिषद कने गठोया तिस भान्ने साहित्यकारां ने वि मेल- जोल बध्या | kr_1 |
रीसोरीसिया साहितक क्हाणियां नाटक लिखोणा शुरू होए | kr_1 |
मैं साहित्य दा तां विद्यार्थी रेहा पर मता नी | kr_1 |
साहित्य दे मापदण्डां दा ज्ञान तां था पर पूरा नी, न परम्परा रही | kr_1 |
शुरू-शुरू च साहित्य ने राह-बाह वि नी रिहा | kr_1 |
समै-समै पर कुछ बचार कुछ समस्यां मने च औंदियां रिह्आं, दमागे च खौढ्दल पौंदी रही जिसा जो मैं लिखदा रेहा | kr_1 |
इक दो बरी साहित्य समेलना च कहाणियां पढ़ियां, सराहना मिल्ली, जिगरा बधया कने मैं लिखदा गिया | kr_1 |
कुछ कहाणियां सप्ताहिक कने दैनिक अखवारां च वि छपियां | kr_1 |
पाठकां सराहियां | kr_1 |
ऐही मेरे लेखके दा तिहास है | kr_1 |
मेरिया क्हाणियां छपी करी पाठकां बाहल कुसी कताबां दे रूपैं पुज्जन, डॉ0 गौतम शर्मा व्यथित, निदेशक कांगड़ा लोकसाहित्य परिषद होरां दी बड़ी दिली इच्छया रही | kr_1 |
समै-समै पर टणकेरदे-प्रेरदे-फणसेरदे वि रैह | kr_1 |
एह वहाणी संग्रह 'आम्बली दा बूट्टा' तिसा प्रेरणा दा ई सबूत है जिस ताईं मैं तिन्हांदा बड़ा धनवाद करदा | kr_1 |
साईं कम्पयूटर सैंटर धर्मशाला रे कु. नीला गुरूङ दा वि मैं बड़ा धनवाती है मेरियां कहाणियां जो कम्पयूटर टाईप-सैटिंग करी ने कताबी शक्ल दिली परी, इम्पीरियल प्रिंटिंग प्रैस धर्मशाला दा वि शक्रिया जिन्हां एह कता की छाप्पी | kr_1 |
मैं अपणिया धर्म पत्निया श्रीमति विमला देवी दा वि धनवाद करदा जिहां चार सहयोग रिहा | kr_1 |
इन्हां शब्दां ने पाठकां जो नौएं साल्ले दियां, मुवारकां, मतियां | kr_1 |
शुभकामना | kr_1 |
कमल हमीरपुरी | kr_1 |
26 जनवरी, 2017 डोहग देहरियां - कांगड़ा | kr_1 |
(हि.प्र.) | kr_1 |
पिन न0-176029 | kr_1 |
मने दी गल्ल, मने ने गलाइयो | kr_1 |
क्हाणी तां जीणे दा सैः अनुभव है जेहड़ा भुलाणे पर भी नी भुलदा, दिले अंदर अदेआ डुङ्गा निहरदा जांदा, जिसदी चीहक म्हेसा लगी रैंहदी | kr_1 |
कहाणीकारे दे मने दी एहू चुभदी, निहदी, दुखदी चीक तिदी ताईं सांत नी हुंदी जाहली तिक्कर सैः तिसजो क्हाणियां च गलाई नि लैन्दा | kr_1 |
आम्बली दा बूटा क्हाणी संग्रह दियां सारियां क्हाणियां इसाई पीड़ा दियां बुझारतां जां अभिव्यक्ति न | kr_1 |
कमल हमीरपुरी घुम्मकड़ कने स्टेजी, अदबी, आम आदमि ने जुड़ियो, तिन्हां ने जीन्दे, गल-कत्थ करदा, अफसर-मतहतया ने ढभोन्दे, अपणियां धरती, पाणियें, हौआ, खाणे-पीणे ने जुड़ेयो तजरबी वि हन | kr_1 |
एह क्हाणियां लिटरेरी दमाकी सोच विचारां दियां क्हाणियां नी न, ऐह तां जीणे दे सच्चे-सुच्चे, बगैर कुसी लेस-पलेसें लखोईयां क्हाणियां हन् | kr_1 |
मतलब जेहड़ा दिखया, सैः लिखया | kr_1 |
कुथी कोई ख्याली कसरत नी | kr_1 |
उयां सोचिए तां कहाणियां च दमागी कसरत करी क्हाणी पाणे दी कोई जरूरत वी नी हुन्दी कने सैः कहाणी वि क्या जेहड़ी कुसी दिया गाणी वि न औऐ, रसली-रौंसली गल्ल वि सैही हुन्दी जेहड़ी पढ़देयां दमाकें बही जाए कने अपणी बझोयै | kr_1 |
कमल जी! सन् 72-73 च ढभोए थे असां ने, कांगड़ा लोकसाहित्य परिषद दे गठन कने | kr_1 |
तदूं ते अज्जे तिक्कर ना इन्हां स्हाढ़ा लड़ छडया, न असां छडणा दित्ता | kr_1 |
मेरे मंच, निष्पादन कलां संबंधी हर विचार जो साझा करदे पक्के-सच्चे-निस्वार्थी साथी कमल जी धुप-छाऊ बणी रैह | kr_1 |
मैं इन्हां दियां क्हाणियां जालू वि पढ़दा-सुणदा तां मने एही विचार बणदा - जे एह कहाणियां कताबी सकला च छपणा चाहिदियां | kr_1 |
इक बरी इन्हां 'पितलू दा हुक्का' कहाणी इक साहित्य सम्मेलन च पढ़ी | kr_1 |
कहाणीकारां इसा दी बड़ी सरोहता कित्ती | kr_1 |
तिसते बाद मिंजो वि जाहूलू मिलदे मैं वि फणसेरदा, प्रेरदा रेहा | kr_1 |
खीर गदित्ती कत्ताबा छापा! मेरा मनणा है जे | kr_1 |
सोलह-सतारह क्हाणियां कठरोईयां | kr_1 |
मैं फिरी चुंग दित्ती कत्ताबा छापा | kr_1 |
और लेखक कुछ लिखदा है कने अपणे लिखयो जो मसूस करदा है जे मैं सही लिपि सैः छपणा चाहिदा | kr_1 |
कैहंजे फिरी कोई परवाह नि मारदा | kr_1 |
कई बचारे सोचदे चली अगलेआं गल्ल नि सुणी | kr_1 |
खैर, कुछ होणी वि हुन्दी सैः होई ने रैंहूदी | kr_1 |
वक्ते पर बस नी चलदा | kr_1 |
कमल होरां मेरी गल्ल मन्नी कने क्हाणियां दी फैल (फायल) मिन्जो थमाई गलाया, ऐह क्हाणियां कने ऐह साई, अगला कम्म तुसां जाणा | kr_1 |
मिन्जो बड़ी खुशी है जे कमल होरां दियां कहाणियां दा संग्रह 'आम्बली दा बूट्टा' छपी ने पाठको बाहल पुज्जा दा | kr_1 |
क्हाणियां कदीआं न एह तां पढ़ने पर ही पता लगणा | kr_1 |
मैंह जे आम्बले दा सुआद तां खाणे बाद ई औंदा मिन्जो तां एह कहाणियां इयां लगियां जिआं मने दी गल्ल मने ने गलाइयो | kr_1 |
कमल होरां जो इस ताईं बड़ी-बड़ी बधाई कने इसरे पाठकां जो भी, सुखी स्वस्थ जीणे दियां शुभ कामना | kr_1 |
राजमन्दिर नेरटी कांगड़ा हि.प्र. 176208 . महाशिवरात्रि, 2017 | kr_1 |
गौतम शर्मा 'व्यथित' सेवानिवृत्त ऐसोसियेट प्रोफैसर निदेशक | kr_1 |
कांगड़ा लोक साहित्य परिषद | kr_1 |
कुथू क्या ? | kr_1 |
आम्बली दा बूटा | kr_1 |
लगना जो जाणे ते पहलैं जाहूलू नहोणे वास्ते कपड़े खोहले तां लाड़े दिया बूआ-ससूं बोल्या-अबो! नाई-प्रोहत कुथू हन् ? सद्दा तिन्हां जो | kr_1 |
नाई गांह आया कनै बोल्या 'हां जी दस्सा! बू बोली-मियो ! तुसां स्हाड़े अंगणे च जीव-हत्या कजो करना लग्यो | kr_1 |
दिक्खा भला! लाड़े दे पिंडे पर कोई छटांक भर भी मास नी ऐं, जे-इसा ठण्डु च नहौंदयां-नहौंदयां इस जो किच्छ होई गिया तां तुसां दूंही तां अन्दर होणा ही होणा असां जो भी पेसियां, भुगतणा पौणियां | kr_1 |
बचारे दे दन्द कियां बज्जा दे, हड़कू भी कियां ठल-ठलाट करा दे | kr_1 |
इक होर जणास बोली | kr_1 |
क्या गल ओ मुन्नू! तिज्जो अम्मां रोटी नी दिन्दी? इक्कनी लाड़े दा पक्ष लैई करी गलाया - चला छड्डा, ब्याहे ते बाद सेहत बणी जाणी | kr_1 |
बू-सस झट बोली-बणी नी जाणी होर सुकड़नी, नाईया रहणा दे, मत नुहा, मुंहें धुआ कनै कपड़े लुआ! बच्चा! भ्यागा नहींई लैंआं | kr_1 |
इकनी होरनी ताहना मारया, जे मुन्नू भ्यागा नहौणां हुंगा तां भी दो चार मूण्डू सज्जें-खबें खडेरी लैआं, कुती कौ नि चुक्की लैण | kr_1 |
म्हारी छुणाकी ब्याहे ते पहलें ही बिधवा न होई जाए | kr_1 |
बेमतलबिया गल्लां पर बूआ दी झिड़कू सुणी करी सब चुप होई गईयां | kr_1 |
लाड़ें मुंह धोता, कपड़े लाए कनै लगना जो जाई बैठा | kr_1 |
का मस्त रामें दा ब्याह होई गिया | kr_1 |
सब साख-सबन्धी, मित्र-सज्जणा अपणे | kr_1 |
में आम्बली दा बूटा ल्याई करी जोर | kr_1 |
अम्ब, मरूद, नीन | kr_1 |
नाटिया च लगया था, | kr_1 |
डा बढ़िया हुन् अपणे चले गए | kr_1 |
पंज्जां-सत्तां दिनां बाद मस्तरामें आनी च लगाई दित्ता | kr_1 |
मां बोली - मिया-बूट्टा लाणा था तो कोई अम्ब जां सन्तरा लगान्दा, एह क्या लगाया तैं! मिए अम्मां! खडालिग सोच्चया घरै लान्दा दिख-भाल हुन्दी रैंहगी, बोलदे इसदा चार बड़ा बलिया मां बोली-चल कोई नी, पर पाणी दिंदा रैयां 'ताही बूट्टा सरोंदा-बडोंदा-पर | kr_1 |
दो त्रै साल तां खरे बीती गै पर बाद च छुणाकिया दी ससस को ठोक्कर होणा लगी पैई, तिनै कदी सस्सू ने लड़ना, कदी खसमें ने झगड़ना, जी रूस्सी करी प्योक्यां चली जाणा | kr_1 |
मस्त रामें मनाई-तनाई जाई करी ल्यौणी दिन इयां ही बीतदे रहे | kr_1 |
छुणाकिया जो कोई बाल-बच्चा नी होया | kr_1 |
उलादा खातिर अन्य छुणाकिया जो कदी डाक्टरां बल लैई जाए, कदी चेल्यां जोगियां ते टूणा-टेस्सा कराए पर कोई गल नी बणी | kr_1 |
मस्त राम पहले ही सेहती दा कमजोर था | kr_1 |
ब्याहे त बाद होर ढिल्ला होई गिया | kr_1 |
कदी पेट खराब, कदी हाजमा ठीक नी, कदी कामा, कदी जलाब, कदी सरें पीड़, तां कदी ताप | kr_1 |
घरे दा सारा म्हौल नीरस जहा गिया | kr_1 |
सब दुआस रैंहदे | kr_1 |
सस्सू दे ताइन्हें सुणी-सुणी छुणाकी गल्ला-गल्ला पर खिज्जणा लगा इक दिन लड़दिएं-लड़दिएं सस्सं गलाया 'पता नी मेरयां कर्मां च पत्रुिए का दिखणा भी नसीब हुंगा कि इयां मरी जांहगी, बत्रा लाज कराई चुका पर कुछ नी बणया | kr_1 |
छुणाकी इक्क दम बोली-'अम्मा जे पोत्रू दिखणा ता 3 लाज कर, मेरे लाजे ने कुछ नी बणना | kr_1 |
मां कुछ नी बोली, चुप-चाप बौहड़ी जो गोहई गई | kr_1 |
कुछ दिन बिस्तरा थम्मी लैआ, बैद हकीम भी लयांदे, कोई फर्क नी पेआ | kr_1 |
पाठ मने च बन्ही करी इक दिन सैह भी चलदी बणी | kr_1 |
दाह संस्कार कर हरिद्वार जाणे ते पहलैं माऊ दे अस्तुआं दी थैली आम्बली दे बूट लटकाणा लाई तां तिन्नी दिखया कि तिस पर निके-निके आम्बले लग्य | kr_1 |
कुछ दिना बाद माऊ आ | kr_1 |
पोचुए दी आस स्किार करी मस्त रामें | kr_1 |