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|---|---|---|
68 | मां कहती है-क्यों पुराने चावल मे कीड़े ढ़ूंढ रहा है। | negative |
69 | मां के पास पिता के बारे में अच्छा बताने के लिए कुछ भी नहीं है। | negative |
70 | उसका एहसास जागता है। | positive |
71 | वह मां को कुछ कहता हुआ निकलता है। | neutral |
72 | फिल्म के अंत में लेखक-निर्देशक ने झिमली के जरिए अनावश्यक ही अपनी बात और लायक की मंशा स्पष्ट कर दी है। | neutral |
74 | वरुण धवन अपेक्षाकृत नए एक्टर हैं। | neutral |
75 | उनकी मेहनत जाहिर है। | positive |
76 | उन्होंने रघु के बदलते भावों को व्यक्त करने में अच्छी-खासी मेहनत की है। | positive |
77 | दूसरी तरफ नवाजुद्दीन सिद्दीकी की फितरत प्रभावित करती है। | positive |
78 | वरुण की मेहनत और नवाज की फितरत से 'बदलापुर' रोचक और रोमांचक हुई है। | positive |
79 | वरुण सधे अभिनेता नवाज के आगे टिके रहते हैं। | neutral |
80 | नवाज हमारे समय के सिद्ध अभिनेता हैं। | positive |
82 | यह फिल्म वरुण और नवाज के अभिनय के लिए याद रखी जाएगी। | positive |
83 | फिल्म में महिला किरदारों को सीमित स्पेस में ही पर्याप्त महत्व दिया गया है। | positive |
84 | पांचों महिला किरदारों ने अपनी भूमिकाओं को संजीदगी से निभाया है। | positive |
85 | प्रभावशाली दृश्य राधिका आप्टे और हुमा कुरैशी को मिले हैं। | positive |
87 | कुमुद मिश्रा की सहजता और स्वाभाविकता उल्लेखनीय है। | positive |
88 | श्रीराम राघवन ने बदले की रोमांचक फिल्म को नया ट्विस्ट दे दिया है। | positive |
89 | हिंदुस्तान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बारे में हम सभी जानते हैं। | neutral |
90 | सभी मजहबों में बेहतर इंसान बनने की सीख दी जाती है। | positive |
93 | निर्देशक करण अंशुमान ने एक काल्पनिक देश ‘बैंगिस्तान’ की कल्पना की है। | neutral |
94 | इस काल्पनिक देश में वही सब हो रहा है, जो हिंदुस्तान,पाकिस्तान और अफगानिस्तान में होता रहता है। | neutral |
97 | करण अंशुमान ने ‘बैंगिस्तान’ में सार्थक प्रहसन रचा है। | positive |
98 | उन्होंने नॉर्थ और साउथ बैंगिस्तान के धर्मावलंबियों को बांट कर एक ही तीर से निशाना साधा है। | positive |
99 | वे अपना प्रभाव और डर बढ़ाने के लिए साजिशें रचते रहते हैं। | negative |
100 | महज संयोग नहीं है कि दोनों हमशक्ल हैं। | neutral |
101 | मजहब कोई भी हो आतंकवादी का चेहरा एक ही होता है। | neutral |
102 | गौर करें तो करण ने ‘मां का दल’ और ‘अल काम तमाम’ संगठनों के माध्यम से अतिवादी विचारों के हिमायतियों के कार्य और व्यवहार को सटीक तरीके से पेश किया है। | neutral |
103 | प्रहसन की एक खासियत होती है कि दर्शक मूल स्रोतों को समझ रहे होते हैं। | positive |
105 | दोनों अपने नुमाइंदों को विश्व सर्वधर्म सम्मेलन में तबाही मचाने के लिए पॉलैंड भेजते हैं। | negative |
106 | हफीज बिन अली(रितेश देशमुख) और प्रवीण चतुर्वेदी(पुलकित सम्राट) एक-दूसरे के मजहब को चोला धारण करते हैं। | neutral |
107 | इस प्रक्रिया में वे एक-दूसरे के धर्म को करीब से समझते हैं। | positive |
108 | फिल्म में गीता और कुरान का जिक्र आता है। | positive |
109 | पता चलता है कि इस अभियान में दोनों मजहबों के प्रतिनिधि दूसरे पक्ष के हमदर्द बन जाते हैं। | positive |
110 | फिल्म थोड़ी कमजोर होने के साथ फंस जाती है। | negative |
111 | करण अंशुमान ने पहली कोशिश में ही आतंकवाद के प्रासंगिक मुद्दे को कॉमिकल और पॉलिटिकल तरीके से कहने की कोशिश की है। | neutral |
113 | वे नई पीढ़ी के उन फिल्मकारों में हैं जो नए विषयों के साथ प्रयोग कर रहे हें। | positive |
114 | उन्हें रितेश देशमुख, पुलकित सम्राट और कुमुद मिश्रा का भरपूर साथ मिला है। | positive |
116 | संवाद में ही सही रितेश उनसे कह भी देते हैं, तुम तो बुरे एक्टर निकले। | negative |
117 | कुमुद मिश्रा ने अवश्यक अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह किया है। | positive |
118 | दोनों मजहबों के कट्टरपंथियों के डबल रोल में वे निर्देशक की सोच रख सके हैं। | neutral |
119 | फिल्म में कसावट नहीं है। | negative |
121 | साथ ही संवादों में विचारों और कटाक्ष की भरपूर संभावनाएं थीं। | neutral |
122 | संवाद और दमदार एवं मारक हो सकते थे | negative |
123 | पाकिस्तानी फिल्मकार शोएब मंसूर की खुदा के लिए कुछ सालों पहले आई थी। | neutral |
124 | आतंकवाद और इस्लाम पर केंद्रित इस फिल्म में शोएब मंसूर ने साहसी दृष्टिकोण रखा था। | positive |
125 | इस बार उनकी फिल्म बोल पाकिस्तानी समाज में प्रचलित मान्यताओं की बखिया उधेड़ती है और संवेदनशील तरीके से औरतों का पक्ष रखती है। | positive |
126 | बोल की कहानी परतदार है, इसलिए और भी पहलू जाहिर होते हैं। | neutral |
128 | पार्टीशन के समय हकीम साहब का परिवार भारत से पाकिस्तान चला जाता है। | neutral |
129 | वहां उन्हें पाकिस्तान छोड़ आए किसी हिंदू की हवेली में पनाह मिलती है, जिसमें दीवारों और छतों पर हिंदू मोटिफ की चित्रकारी है। | neutral |
130 | हकीम साहब ने बेटे की लालसा में बीवी को बच्चा जनने की मशीन बना रखा है। | negative |
131 | उनकी चौदह संतानों में से सात बेटियां बचती हैं। | negative |
132 | रूढि़वादी हकीम साहब अपनी बेटियों को पर्दानशीं रखते हैं। | negative |
133 | उनकी अगली संतान उभयलिंगी पैदा होती है। | neutral |
134 | बदनामी के डर से वे उसे किन्नरों को नहीं देते। | negative |
135 | लाजवाब होने पर उसके अब्बा हाथ उठा देते हैं। | negative |
136 | फांसी चढ़ने से पहले वह पाकिस्तान के सदर से खास इजाजत लेकर मीडिया से मुखातिब होती है | neutral |
137 | और अपना किस्सा बयान करती है। | neutral |
138 | फ्लैशबैक में बनी यह फिल्म जैनब के दर्द को उसके सामाजिक परिवेश और पारिवारिक माहौल में पेश करती है। | neutral |
139 | बोल में जैनब की भूमिका हुमैमा मलिक ने निभायी है। | neutral |
140 | उन्होंने शानदार अभिनय किया है। | positive |
141 | जैनब की तकदीफ और हिम्मत को उन्होंने पर्दे पर बखूबी उतारा है। | positive |
142 | हकीम साहब की भूमिका में मंजर सेहबाय ने भी जान डाल दी है। | positive |
143 | मशहूर गायक आतिफ असलम बोल में एक छोटी भूमिका में हैं। | negative |
144 | फिल्म पाकिस्तानी समाज के अन्य पहलुओं को भी चलते-चलते उजागर करती है। | neutral |
146 | इस हफ्ते अनुराग कश्यप की ‘बॉम्बे वेल्वेट’ हिंदी सिनेमा के दूसरे आयाम को छूती है। | neutral |
147 | अनुराग कश्यप समाज के पॉलिटिकल बैकड्रॉप में डार्क विषयों को चुनते हैं। | neutral |
148 | ‘पांच’ से ‘बॉम्बे वेल्वेट’ तक के सफर में अनुराग ने बॉम्बे के किरदारों और घटनाओं को बार-बार अपनी फिल्मों का विषय बनाया है। | neutral |
149 | वह आज की मुंबई से अलग और खास थी। | positive |
150 | अनुराग की ‘बॉम्बे वेल्वेट’ 1949 में आरंभ होती है। | neutral |
151 | आजादी मिल चुकी है। | neutral |
152 | देश का बंटवारा हो चुका है। | neutral |
153 | मुल्तान और सियालकोट से चिम्मन और बलराज आगे-पीछे मुंबई पहुंचते हैं। | neutral |
154 | चिम्मन बताता भी है कि दिल्ली जाने वाली ट्रेन में लोग कट रहे थे, इसलिए वह बॉम्बे की ट्रेन में चढ़ गया। | neutral |
155 | बलराज अपनी मां के साथ पहुंचता है। | neutral |
156 | ऐसी मां, जिसने उसे पाला था और जो बाद में उसे छोड़ कर चली जाती है। | neutral |
157 | चिम्मन और बलराज पोर्ट सिटी बॉम्बे में कुछ हासिल करने का ख्वाब देखते हैं। | neutral |
158 | बलराज का जल्दी से ‘बिग शॉट’ बनना है। | neutral |
159 | उसकी ख्वााहिश को खंबाटा भांप लेता है। | neutral |
160 | खंबाटा को बलराज की आक्रामकता और पौरूष भाता है। | positive |
161 | वह चंद मुलाकातों में ही स्पष्ट कर देता है कि वह बलराज का इस्तेमाल करेगा। | neutral |
162 | बलराज इसके लिए तैयार है, लेकिन वह अपना हिस्सा चाहता है। | neutral |
164 | उसे तो जल्दी से जल्दीे अपना बलराज टावर देखना है। | neutral |
165 | बलराज की ख्वाहिशों में खंबाटा की साजिशों के मिलने से ड्रामा क्रिएट होता है। | neutral |
166 | इस ड्रामे में रोजी, जिम्मी मिस्त्री और मेहता शामिल होते हैं। | neutral |
167 | फ्रंट में चल रही इस कहानी के पीछे एक बड़ी कहानी चल रही होती है, जिसमें गटर में समा रहे बॉम्बे का भविष्य तय किया जा रहा है। | neutral |
168 | पॉलिटिशियन, गैंगस्टर, अखबारों के एडिटर और अन्य कई कैरेक्टर अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं। | neutral |
169 | अनुराग बार-बार देश की राजनीति और बॉम्बे में चल रहे विकास के कुचक्र की ओर इशारा करते हैं। | neutral |
170 | वे संवादों में ही घटनाओं और प्रसंगों को समेट देते हैं। | neutral |
171 | फिल्म के लेखक, निर्देशक और किरदार राजनीति से बचते हुए निकल जाते हैं। | neutral |
172 | इस परहेज की यही वजह हो सकती है कि भारत में फिल्में राजनीतिक होते ही मुश्किलों में फंस जाती हैं। | negative |
174 | हम उन घटनाओं के प्रभाव भी देखते हैं। | positive |
175 | अनुराग कश्यप की सोच और निर्देशन की खूबियों का हम ‘बॉम्बे वेल्वेन’ में कई स्तरों पर देखते हैं। | positive |
176 | इस पैमाने पर हिंदी में कम फिल्में बनी हैं। | negative |
177 | ‘बॉम्बे वेल्वेट’ में पांचवें और छठे दशक का बॉम्बेे है। | neutral |
178 | प्रोडक्शन डिजायनर सोनल सावंत और कॉस्ट्यूम डिजायनर निहारिका खान ने उस काल को वास्तु, वेशभूषा और लुक के जरिए उतारा है। | neutral |
179 | उन्होंने आज के कलाकरों को उस काल के किरदारों में ढाल दिया है। | neutral |
180 | फिल्म देखते समय यह एहसास नहीं रहता कि हम 2015 के कलाकारों को 1969 के किरदारों में देख रहे हैं। | neutral |
181 | रणबीर कपूर ने खुद कहा है कि उन्होंने किशोर कुमार, राज कपूर और रॉबर्ट डिनेरो से प्रेरणा ली है। | neutral |
182 | लुक में वे कहीं से भी प्रेरित हो सकते हैं, लेकिन मिजाज में वे इस फिल्म के ग्रे किरदार ही हैं। | neutral |
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