Source: EURLEX
Language: es
Format: md

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| 29.12.2021 | ES | Diario Oficial de la Unión Europea | C 526/1 |

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COMUNICACIÓN DE LA COMISIÓN —

Guía sobre la interpretación y la aplicación de la Directiva 2005/29/CE del Parlamento Europeo y del Consejo relativa a las prácticas comerciales desleales de las empresas en sus relaciones con los consumidores en el mercado interior

(Texto pertinente a efectos del EEE)

(2021/C 526/01)

ÍNDICE

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| INTRODUCCIÓN | 5 |

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| 1. | ÁMBITO DE APLICACIÓN DE LA DPCD | 5 |

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| 1.1. | Ámbito de aplicación material | 5 |

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| 1.1.1. | Legislación nacional relativa a las prácticas comerciales, pero que protege intereses distintos de los intereses económicos de los consumidores | 6 |

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| 1.1.2. | Prácticas comerciales relacionadas con una transacción entre empresas o que perjudican exclusivamente a los intereses económicos de los competidores | 7 |

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| 1.2. | Interacción entre la Directiva y otros actos legislativos de la UE | 8 |

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| 1.2.1. | Relación con otros actos legislativos de la UE | 8 |

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| 1.2.2. | Información establecida por otros actos legislativos de la UE como información «sustancial» | 10 |

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| 1.2.3. | Interacción con la Directiva sobre los derechos de los consumidores | 12 |

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| 1.2.4. | Interacción con la Directiva sobre cláusulas contractuales abusivas | 13 |

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| 1.2.5. | Interacción con la Directiva sobre indicación de los precios | 15 |

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| 1.2.6. | Interacción con la Directiva sobre publicidad engañosa y publicidad comparativa | 16 |

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| 1.2.7. | Interacción con la Directiva de servicios | 17 |

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| 1.2.8. | Interacción con la Directiva sobre el comercio electrónico | 17 |

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| 1.2.9. | Interacción con la Directiva de servicios de comunicación audiovisual | 17 |

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| 1.2.10. | Interacción con el Reglamento General de Protección de Datos y la Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas | 18 |

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| 1.2.11. | Interacción con los artículos 101 y 102 del TFUE (normas de la UE sobre competencia) | 19 |

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| 1.2.12. | Interacción con la Carta de los Derechos Fundamentales de la UE | 20 |

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| 1.2.13. | Interacción con los artículos 34, 35 y 36 del TFUE | 20 |

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| 1.2.14. | Interacción con el Reglamento sobre las relaciones entre plataformas y empresas | 21 |

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| 1.3. | Relación entre la DPCD y la autorregulación | 21 |

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| 1.4. | Aplicación y medios de reparación | 22 |

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| 1.4.1. | Aplicación pública y aplicación privada | 22 |

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| 1.4.2. | Sanciones | 22 |

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| 1.4.3. | Medios de reparación a disposición de los consumidores | 25 |

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| 1.4.4. | Aplicación de la DPCD a los comerciantes establecidos en terceros países | 25 |

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| 2. | PRINCIPALES CONCEPTOS DE LA DPCD | 25 |

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| 2.1. | Funcionamiento de la DPCD: organigrama de la Directiva | 25 |

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| 2.2. | Concepto de comerciante | 26 |

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| 2.3. | Concepto de práctica comercial | 28 |

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| 2.3.1. | Prácticas posventa, incluidas las actividades de cobro de deudas | 29 |

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| 2.3.2. | Comerciantes que compran productos a consumidores | 30 |

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| 2.4. | Criterio de la decisión sobre una transacción | 30 |

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| 2.5. | Consumidor medio | 33 |

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| 2.6. | Consumidores vulnerables | 35 |

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| 2.7. | Artículo 5: diligencia profesional | 36 |

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| 2.8. | Artículo 6: acciones engañosas | 38 |

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| 2.8.1. | Información general engañosa | 39 |

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| 2.8.2. | Ventajas con respecto al precio | 41 |

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| 2.8.3. | Comercialización que induce a confusión | 42 |

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| 2.8.4. | Incumplimiento de los códigos de conducta | 43 |

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| 2.8.5. | Comercialización de «calidad dual» | 44 |

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| 2.9. | Artículo 7: omisiones engañosas | 49 |

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| 2.9.1. | Información sustancial | 50 |

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| 2.9.2. | Publicidad encubierta y falta de identificación del propósito comercial | 50 |

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| 2.9.3. | Información sustancial facilitada de manera poco clara | 51 |

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| 2.9.4. | Contexto fáctico y limitaciones del medio de comunicación utilizado | 52 |

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| 2.9.5. | Información sustancial en las invitaciones a comprar: artículo 7, apartado 4 | 53 |

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| 2.9.6. | Pruebas gratuitas y trampas de suscripción | 58 |

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| 2.10. | Artículos 8 y 9: prácticas comerciales agresivas | 59 |

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| 3. | LISTA NEGRA DE PRÁCTICAS COMERCIALES (ANEXO I) | 60 |

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| 3.1. | Productos que no pueden ser legalmente vendidos: punto 9 | 61 |

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| 3.2. | Planes piramidales: punto 14 | 62 |

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| 3.3. | Productos que curan enfermedades, disfunciones o malformaciones: punto 17 | 63 |

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| 3.4. | Utilización de la afirmación «gratuito»: punto 20 | 66 |

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| 3.5. | Reventa de entradas de espectáculos adquiridas por medios automatizados: punto 23 bis | 69 |

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| 3.6. | Comercialización persistente por herramientas a distancia: punto 26 | 69 |

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| 3.7. | Exhortaciones directas a los niños: punto 28 | 70 |

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| 3.8. | Premios: punto 31 | 71 |

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| 4. | APLICACIÓN DE LA DPCD A SECTORES ESPECÍFICOS | 72 |

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| 4.1. | Sostenibilidad | 72 |

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| 4.1.1. | Declaraciones medioambientales | 72 |

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| 4.1.1.1. | Interacción con otros actos legislativos de la UE relativos a las declaraciones medioambientales | 73 |

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| 4.1.1.2. | Principios fundamentales | 75 |

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| 4.1.1.3. | Aplicación del artículo 6 de la DPCD a las declaraciones medioambientales | 76 |

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| 4.1.1.4. | Aplicación del artículo 7 de la DPCD a las declaraciones medioambientales | 79 |

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| 4.1.1.5. | Aplicación del artículo 12 de la DPCD a las declaraciones medioambientales | 81 |

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| 4.1.1.6. | Aplicación del anexo I a las declaraciones medioambientales | 82 |

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| 4.1.1.7. | Declaraciones medioambientales comparativas | 83 |

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| 4.1.2. | Obsolescencia programada | 84 |

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| 4.2. | Sector digital | 86 |

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| 4.2.1. | Plataformas en línea y sus prácticas comerciales | 87 |

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| 4.2.2. | Intermediación de contratos celebrados por consumidores con terceros | 89 |

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| 4.2.3. | Transparencia de los resultados de las búsquedas | 90 |

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| 4.2.4. | Reseñas de los usuarios | 93 |

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| 4.2.5. | Medios sociales | 96 |

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| 4.2.6. | Comercialización por medio de influentes | 97 |

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| 4.2.7. | Prácticas basadas en los datos y patrones oscuros | 99 |

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| 4.2.8. | Prácticas de fijación de precios | 102 |

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| 4.2.9. | Juego | 103 |

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| 4.2.10. | Utilización de técnicas de geolocalización | 105 |

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| 4.2.11. | Cautividad del consumidor | 106 |

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| 4.3. | Sector de los viajes y el transporte | 107 |

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| 4.3.1. | Cuestiones transversales | 107 |

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| 4.3.2. | Viajes combinados | 109 |

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| 4.3.3. | Contratos de aprovechamiento por turno | 109 |

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| 4.3.4. | Cuestiones que afectan en particular al transporte aéreo | 110 |

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| 4.3.5. | Cuestiones que afectan en particular al alquiler de automóviles | 114 |

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| 4.3.6. | Cuestiones que afectan en particular a los sitios web de reserva de viajes | 115 |

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| 4.4. | Servicios financieros y bienes inmuebles | 116 |

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| 4.4.1. | Cuestiones transversales | 116 |

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| 4.4.2. | Aspectos específicos de los bienes inmuebles | 117 |

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| 4.4.3. | Cuestiones específicas de los servicios financieros | 118 |

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| ANEXO | 121 |

INTRODUCCIÓN

La Directiva 2005/29/CE del Parlamento Europeo y del Consejo [(1)](#ntr1-C_2021526ES.01000101-E0001) relativa a las prácticas comerciales desleales de las empresas en sus relaciones con los consumidores en el mercado interior («DPCD») constituye el principal elemento de la legislación de la UE que regula las prácticas comerciales desleales en las transacciones entre empresas y consumidores, y se aplica a todas las prácticas comerciales que se producen antes, durante y después de que tenga lugar una transacción de ese tipo.

El objetivo de este documento de orientación (en lo sucesivo denominado «Guía») es facilitar la correcta aplicación de la citada Directiva. La presente Guía desarrolla y sustituye a la versión de 2016 [(2)](#ntr2-C_2021526ES.01000101-E0002). También tiene por objeto aumentar el conocimiento de la Directiva entre todas las partes interesadas, como los consumidores, las empresas y las autoridades de los Estados miembros, incluidos los órganos jurisdiccionales nacionales y los profesionales de la Justicia, en toda la Unión, y abarca las modificaciones introducidas por la Directiva (UE) 2019/2161 del Parlamento Europeo y del Consejo [(3)](#ntr3-C_2021526ES.01000101-E0003) en lo que atañe a la mejora de la aplicación y la modernización de las normas de protección de los consumidores de la Unión, que entran en vigor a partir del 28 de mayo de 2022. Por consiguiente, parte de esta Guía refleja y examina normas que aún no habrán comenzado a aplicarse en el momento de su publicación. Se indican claramente las secciones y puntos pertinentes. Cuando las citas de la Directiva o de resoluciones del Tribunal de Justicia de la Unión Europea (en lo sucesivo, «el Tribunal de Justicia») contengan texto resaltado, es la Comisión quien ha puesto tal énfasis.

Los destinatarios de la presente Guía son los Estados miembros de la UE e Islandia, Liechtenstein y Noruega como signatarios del Acuerdo sobre el Espacio Económico Europeo (EEE). En consecuencia, las referencias a la UE, a la Unión o al mercado único deben ser interpretadas como referidas al EEE o al mercado del EEE.

Esta Guía se ha concebido estrictamente como un documento de orientación; solamente el texto de la propia legislación de la Unión tiene validez jurídica. Las interpretaciones fidedignas del Derecho deben derivarse del texto de la Directiva y directamente de las resoluciones del Tribunal de Justicia. La presente Guía tiene en cuenta las resoluciones del Tribunal de Justicia publicadas hasta octubre de 2021 y no predetermina la evolución de la jurisprudencia de dicho Tribunal.

Las opiniones expresadas en este documento se entienden sin perjuicio de la postura que la Comisión Europea pueda adoptar ante el Tribunal de Justicia. La información aquí contenida es solo de carácter general y no se dirige específicamente a personas o entidades concretas. Ni la Comisión Europea ni ninguna persona que actúe en su nombre serán responsables de cualquier uso que pueda hacerse de la siguiente información.

Puesto que la presente Guía refleja el estado de la situación en el momento de la redacción, las orientaciones ofrecidas podrían modificarse más adelante.

1.   ÁMBITO DE APLICACIÓN DE LA DPCD

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| Artículo 3, apartado 1  La presente Directiva será aplicable a las prácticas comerciales desleales de las empresas en sus relaciones con los consumidores según establece el artículo 5, antes, durante y después de una transacción comercial en relación con un producto. |

La Directiva es de carácter horizontal y protege los intereses económicos de los consumidores. Sus disposiciones, basadas en principios, afrontan una extensa gama de prácticas y son lo suficientemente amplias para abarcar asimismo productos y métodos de venta en rápida evolución.

1.1.   Ámbito de aplicación material

La DPCD se basa en el principio de la plena armonización. Con el fin de eliminar los obstáculos al mercado interior y aumentar la seguridad jurídica tanto para los consumidores como para las empresas, establece un marco regulador uniforme que armoniza las diferentes normativas nacionales. Así pues, la DPCD dispone que los Estados miembros no pueden adoptar medidas más restrictivas que las definidas en la Directiva, ni siquiera para garantizar un grado más elevado de protección de los consumidores, salvo que la Directiva así lo permita [(4)](#ntr4-C_2021526ES.01000101-E0004).

El Tribunal de Justicia ha confirmado este principio en varias resoluciones. Por ejemplo, en el asunto Total Belgium, el Tribunal de Justicia resolvió que la Directiva se opone a una prohibición general nacional de las ofertas conjuntas [(5)](#ntr5-C_2021526ES.01000101-E0005). En el asunto Europamur Alimentación, el Tribunal de Justicia dictaminó que la DPCD se opone a una prohibición general nacional de ofertar o realizar ventas de bienes con pérdida [(6)](#ntr6-C_2021526ES.01000101-E0006). En ese mismo asunto, el Tribunal de Justicia aclaró también que las medidas nacionales restrictivas podían incluir la inversión de la carga de la prueba [(7)](#ntr7-C_2021526ES.01000101-E0007).

En este sentido, el artículo 3, apartado 9, impone una limitación del carácter de armonización plena de la DPCD al afirmar que «[p]or lo que respecta a los “servicios financieros” […] y a los bienes inmuebles, los Estados miembros podrán imponer requisitos más exigentes o más restrictivos que los previstos en la presente Directiva en el ámbito objeto de la aproximación que esta realiza». Por lo tanto, en estos sectores los Estados miembros pueden imponer normas que vayan más allá de las disposiciones de la DPCD, siempre que sean conformes con el resto del Derecho de la Unión. El punto 4.4 aborda específicamente la forma en que la DPCD se aplica a los servicios financieros y los bienes inmuebles.

Por otro lado, de conformidad con el artículo 3, apartado 5, modificado por la Directiva (UE) 2019/2161, la Directiva «no impide que los Estados miembros adopten disposiciones para proteger los intereses legítimos de los consumidores en lo que atañe a prácticas de comercialización o venta agresivas o engañosas en el contexto de visitas no solicitadas efectuadas por comerciantes al domicilio de los consumidores o excursiones organizadas por comerciantes con el objetivo o el efecto de promocionar o vender productos a los consumidores». No obstante, tales disposiciones serán proporcionadas y no discriminatorias, y estarán justificadas por razones de protección de los consumidores. El considerando 55 de la Directiva (UE) 2019/2161 explica que las citadas disposiciones no deben prohibir dichos canales de venta como tales y ofrece algunos ejemplos no exhaustivos de las posibles medidas nacionales.

El artículo 3, apartado 6, obliga a los Estados miembros a notificar a la Comisión las disposiciones nacionales adoptadas y cualquier modificación posterior, de modo que la Comisión pueda facilitar a los consumidores y los comerciantes un acceso sencillo a esta información en un sitio web específico [(8)](#ntr8-C_2021526ES.01000101-E0008).

El considerando 14 de la DPCD aclara que la plena armonización no excluye la posibilidad de que los Estados miembros especifiquen en su legislación nacional las principales características de determinados productos, cuya omisión sería sustancial cuando se hiciera una invitación a la compra. Asimismo, puntualiza que la DPCD se entenderá sin perjuicio de las disposiciones del Derecho de la Unión que permiten expresamente a los Estados miembros elegir entre diversas posibilidades de reglamentación para proteger a los consumidores en materia de prácticas comerciales.

Por lo que se refiere a la información al consumidor, el considerando 15 de la DPCD explica que los Estados miembros podrán, cuando así lo permitan las cláusulas mínimas del Derecho de la Unión, mantener o introducir requisitos de información más estrictos, de conformidad con el Derecho de la Unión, a fin de garantizar un mayor nivel de protección de los derechos contractuales individuales de los consumidores. Véase también el punto 1.2.3, que describe la interacción con los requisitos de información precontractual previstos en la Directiva sobre los derechos de los consumidores.

1.1.1.   Legislación nacional relativa a las prácticas comerciales, pero que protege intereses distintos de los intereses económicos de los consumidores

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| Artículo 1  La presente Directiva tiene por objeto contribuir al buen funcionamiento del mercado interior y alcanzar un elevado nivel de protección de los consumidores mediante la aproximación de las disposiciones legales, reglamentarias y administrativas de los Estados miembros sobre las prácticas comerciales desleales que perjudican a los intereses económicos de los consumidores. |

La DPCD no cubre las disposiciones nacionales dirigidas a proteger intereses que no son de naturaleza económica. Por lo tanto, la DPCD no afecta a la facultad de los Estados miembros de fijar normas que regulen las prácticas comerciales por motivos de sanidad, seguridad o protección del medio ambiente.

La DPCD tampoco cubre las normas nacionales vigentes relativas a la comercialización y la publicidad basadas en el «buen gusto o decoro». El considerando 7 dispone lo siguiente: «La presente Directiva […] no trata de los requisitos legales en relación con el buen gusto y el decoro, los cuales varían considerablemente de un Estado miembro a otro. […] Por consiguiente, los Estados miembros deben poder seguir prohibiendo en sus territorios, de conformidad con la legislación comunitaria, determinadas prácticas comerciales por motivos de buen gusto o decoro, aun cuando dichas prácticas no limiten la libertad de elección de los consumidores […]».

Así pues, en el contexto de las prácticas comerciales, la DPCD no cubre las disposiciones nacionales sobre la protección de la dignidad humana, la prevención de la discriminación sexual, racial y religiosa, ni la representación de desnudos, violencia y comportamiento antisocial.

Por ejemplo, el Tribunal de Justicia aclaró que la DPCD no se aplica a una disposición nacional que impida a un comerciante abrir su establecimiento los siete días de la semana al exigir a los comerciantes que elijan un día de cierre semanal, pues esta disposición específica no persigue objetivos relacionados con la protección de los consumidores [(9)](#ntr9-C_2021526ES.01000101-E0009).

El Tribunal de Justicia ha especificado asimismo que la DPCD no se opone a una disposición nacional que protege la salud pública y la dignidad de la profesión de odontólogo, por una parte, prohibiendo con carácter general y absoluto toda publicidad relativa a prestaciones de tratamientos bucales y dentales y, por otra parte, estableciendo determinados requisitos de discreción en lo que se refiere a los rótulos de las consultas de odontología [(10)](#ntr10-C_2021526ES.01000101-E0010).

Por el contrario, las normativas nacionales que tengan por objeto proteger los intereses económicos de los consumidores, aun cuando abarquen otros intereses, sí entran en su ámbito de aplicación.

En cuanto a las disposiciones nacionales que prohíben las ventas con prima, el Tribunal de Justicia ha aclarado que la DPCD se opone a una prohibición nacional general de las ventas con prima que no tenga solamente por objeto proteger a los consumidores, sino que persiga también otros objetivos (tales como el pluralismo de los medios de comunicación) [(11)](#ntr11-C_2021526ES.01000101-E0011).

En lo concerniente a las disposiciones nacionales que solo permiten anunciar las ventas en liquidación previa autorización de la autoridad administrativa del distrito competente, el Tribunal de Justicia señaló que el órgano jurisdiccional remitente había admitido implícitamente que una disposición de este tipo, atinente al caso de autos, tenía por objeto proteger a los consumidores, y no exclusivamente a los competidores y a los demás operadores del mercado. Por consiguiente, la DPCD era aplicable [(12)](#ntr12-C_2021526ES.01000101-E0012).

1.1.2.   Prácticas comerciales relacionadas con una transacción entre empresas o que perjudican exclusivamente a los intereses económicos de los competidores

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| Considerando 6  La presente Directiva […] [n]o comprende ni atañe a las leyes nacionales sobre prácticas comerciales desleales que perjudican sólo a los intereses económicos de los competidores o que se refieren a transacciones entre comerciantes; para tener plenamente en cuenta el principio de subsidiariedad, los Estados miembros seguirán teniendo la capacidad de regular esas prácticas, de conformidad con el Derecho comunitario, si así lo deciden […]. |

Las prácticas comerciales entre empresas («B2B») no entran en el ámbito de aplicación de la DPCD. Se rigen parcialmente por la Directiva 2006/114/CE del Parlamento Europeo y del Consejo sobre publicidad engañosa y publicidad comparativa [(13)](#ntr13-C_2021526ES.01000101-E0013). Asimismo, la Directiva (UE) 2019/633 del Parlamento Europeo y del Consejo [(14)](#ntr14-C_2021526ES.01000101-E0014) regula las prácticas comerciales desleales en las relaciones B2B que tienen lugar en la cadena de suministro agrícola y alimentario. No obstante, los Estados miembros pueden ampliar a las prácticas comerciales B2B la protección otorgada en virtud de la DPCD, con arreglo a lo dispuesto en sus legislaciones nacionales.

Una disposición nacional no está comprendida en el ámbito de aplicación de la DPCD si, como sostiene el órgano jurisdiccional remitente, solo se limita a regular las relaciones entre competidores y no tiene como objetivo la protección de los consumidores [(15)](#ntr15-C_2021526ES.01000101-E0015).

Solo se excluyen del ámbito de aplicación de la DPCD las medidas nacionales que protegen exclusivamente los intereses de los competidores. Cuando las medidas nacionales regulan una práctica con el doble objetivo de proteger a los consumidores y a los competidores, sí quedan comprendidas en el ámbito de aplicación de la DPCD.

En cuanto a la distinción entre los intereses de los consumidores y los de los competidores, el Tribunal de Justicia consideró lo siguiente:

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| «39 | […] [S]olo se excluyen de su ámbito de aplicación, como se desprende del sexto considerando de esta Directiva [la DPCD], las normativas nacionales relativas a prácticas comerciales desleales que menoscaben “sólo” los intereses económicos de los competidores o que se refieran a una transacción entre profesionales. |

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| 40 | […] [E]videntemente este no es el caso de las disposiciones nacionales […] [que] tienen por objeto expreso la protección de los consumidores, y no sólo la de los competidores y otros operadores del mercado» [(16)](#ntr16-C_2021526ES.01000101-E0016). |

Corresponde a las autoridades y órganos jurisdiccionales nacionales decidir si una disposición nacional está destinada a proteger los intereses económicos de los consumidores.

A este respecto, el Tribunal de Justicia observó:

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| «29 | Corresponde por tanto al órgano jurisdiccional remitente y no al Tribunal de Justicia determinar si las disposiciones nacionales […] persiguen efectivamente finalidades relacionadas con la protección de los consumidores, para comprobar si dichas disposiciones pueden entrar en el ámbito de aplicación de la Directiva sobre las prácticas comerciales desleales […]» [(17)](#ntr17-C_2021526ES.01000101-E0017). |

El Tribunal de Justicia ha constatado asimismo que la DPCD se opone a una disposición nacional que prohíbe la venta a pérdida únicamente en la medida en que tiene por objetivo proteger a los consumidores [(18)](#ntr18-C_2021526ES.01000101-E0018).

Por lo que se refiere a las normativas nacionales que prohíben las reducciones de precios durante los períodos previos a las rebajas, el Tribunal de Justicia ha precisado que tal prohibición no es compatible con la DPCD si lo que se pretende es proteger los intereses económicos de los consumidores [(19)](#ntr19-C_2021526ES.01000101-E0019).

1.2.   Interacción entre la Directiva y otros actos legislativos de la UE

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| Artículo 3, apartado 4  En caso de conflicto entre las disposiciones de la presente Directiva y otras normas comunitarias que regulen aspectos concretos de las prácticas comerciales desleales, estas últimas prevalecerán y serán aplicables a esos aspectos concretos. |

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| Considerando 10  Es preciso garantizar una relación coherente entre la presente Directiva y el Derecho comunitario existente, especialmente por lo que respecta a las disposiciones detalladas sobre prácticas comerciales desleales aplicables a sectores concretos. […] La presente Directiva resulta por tanto aplicable solo en la medida en que no haya disposiciones específicas del Derecho comunitario que regulen aspectos concretos de las prácticas comerciales desleales, como requisitos relativos a la información y normas sobre la manera en que ha de presentarse la información al consumidor.  Establece una protección para los consumidores allí donde no existe legislación sectorial específica a nivel comunitario  y prohíbe a los comerciantes crear una falsa impresión sobre la naturaleza de los productos. Esto es especialmente importante en el caso de productos complejos que implican un elevado nivel de riesgo para los consumidores, como ciertos productos ligados a servicios financieros. La presente Directiva complementa, pues, el acervo comunitario aplicable a las prácticas comerciales que perjudican a los intereses económicos de los consumidores. |

Debido a su carácter general, la Directiva se aplica a muchas prácticas comerciales que también están reguladas por otros actos legislativos de la UE de carácter general o sectorial.

1.2.1.   Relación con otros actos legislativos de la UE

El artículo 3, apartado 4, y el considerando 10 son elementos clave de la DPCD. Aclaran que la DPCD complementa otros actos legislativos de la UE («normas comunitarias» en el texto de la Directiva) que regulan aspectos concretos de las prácticas comerciales desleales. Por consiguiente, la DPCD funciona como una «red de seguridad» que garantiza que pueda mantenerse en todos los sectores un elevado nivel común de protección de los consumidores ante las prácticas comerciales desleales, lo que incluye completar y colmar las lagunas existentes en otros actos legislativos de la UE.

Cuando existan actos legislativos de la UE, sectoriales o de otra índole, y sus disposiciones se solapen con lo dispuesto en la DPCD, prevalecerán las disposiciones correspondientes de la lex specialis. De hecho, el artículo 3, apartado 4 de la Directiva aclara que «[e]n caso de conflicto entre las disposiciones de la presente Directiva y otras normas comunitarias que regulen aspectos concretos de las prácticas comerciales desleales, estas últimas prevalecerán y serán aplicables a esos aspectos concretos».

El artículo 3, apartado 4, leído en relación con el considerando 10, implica que una disposición del Derecho de la UE prevalecerá sobre la DPCD si se cumplen las tres condiciones siguientes:

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| — | tiene estatuto de legislación de la UE, |

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| — | regula un aspecto concreto de las prácticas comerciales, y |

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| — | existe un conflicto entre las dos disposiciones o el contenido de la otra disposición del Derecho de la UE se solapa con el contenido de la disposición pertinente de la DPCD, por ejemplo por regular la conducta en cuestión de una forma más detallada o por afectar a un sector específico [(20)](#ntr20-C_2021526ES.01000101-E0020). |

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| Por ejemplo:  El artículo 12 de la Directiva sobre créditos hipotecarios [(21)](#ntr21-C_2021526ES.01000101-E0021) prohíbe, en principio, las prácticas de ventas vinculadas por las que un contrato de crédito hipotecario se venda junto con otro producto financiero y no se presente por separado. Esta prohibición per se entra en conflicto con la DPCD porque las prácticas de ventas vinculadas serían desleales y, por ende, únicamente estarían prohibidas en virtud de la DPCD tras una evaluación caso por caso. El citado artículo 12 de la Directiva sobre créditos hipotecarios prevalece sobre las disposiciones generales de la DPCD, de modo que las prácticas de ventas vinculadas en el sentido de dicho artículo están prohibidas como tales. |

Cuando las tres condiciones expuestas anteriormente se cumplen, la DPCD no se aplica al aspecto concreto de la práctica comercial regulada, por ejemplo, por medio de una determinada norma sectorial. Pese a todo, la DPCD sigue siendo pertinente para evaluar otros posibles aspectos de la práctica comercial no cubiertos por las disposiciones sectoriales, como el comportamiento agresivo de un comerciante.

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| Por ejemplo:  Un consumidor quiere cambiar de proveedor de servicios de telecomunicaciones, para lo cual el proveedor actual le pide que cumplimente un formulario. Sin embargo, no se puede acceder al formulario en línea y el proveedor no responde a los mensajes de correo electrónico ni a las llamadas telefónicas del consumidor. El artículo 106 del Código Europeo de las Comunicaciones Electrónicas (CECE) [(22)](#ntr22-C_2021526ES.01000101-E0022) dispone que, en caso de cambio de proveedor, los abonados podrán conservar su número de teléfono, que la conservación del número se ejecutará con la mayor brevedad y que no se aplicarán cuotas directas a los usuarios finales. El CECE también establece en su artículo 106, apartado 6, que los proveedores cooperarán de buena fe y no provocarán retrasos ni cometerán abusos relacionados con los procesos. Las autoridades nacionales de reglamentación se encargan de garantizar la eficiencia y la simplicidad del proceso de cambio del usuario final. Sin embargo, las prácticas de los comerciantes relacionadas con el cambio de proveedor se pueden evaluar con arreglo al artículo 8 y al artículo 9, letra d), de la DPCD, que prohíben los obstáculos no contractuales desproporcionados al cambio por considerarlos una práctica comercial agresiva. |

De lo anterior se desprende que, en general, la aplicación de la DPCD no está por sí misma excluida por el mero hecho de que exista otra normativa de la UE que regule aspectos concretos de las prácticas comerciales desleales.

En el asunto Abcur [(23)](#ntr23-C_2021526ES.01000101-E0023), el Tribunal de Justicia señaló lo siguiente:

«[…] [E]l tribunal remitente pregunta en sustancia si, en el supuesto de que medicamentos de uso humano […] estén sujetos a la Directiva 2001/83, las prácticas de publicidad de esos medicamentos […] están también sujetas a la Directiva 2005/29. […]

Como el Tribunal de Justicia ha apreciado, la Directiva 2005/29 se caracteriza por un ámbito material de aplicación especialmente amplio que se extiende a cualquier práctica comercial que presente un vínculo directo con la promoción, la venta o el suministro de un producto a los consumidores […].

Por las anteriores consideraciones ha de responder […] que, incluso en el supuesto de que medicamentos de uso humano, como los que son objeto del asunto principal, entren en el ámbito de aplicación de la Directiva 2001/83, las prácticas de publicidad de esos medicamentos […] también pueden estar sujetas a la Directiva 2005/29, siempre que concurran las condiciones de aplicación de esa Directiva».

Así pues, por lo general la DPCD puede aplicarse junto con las normas sectoriales de la UE de manera complementaria, ya que los requisitos más específicos establecidos en otras disposiciones de la Unión suelen añadirse a los requisitos generales establecidos en la DPCD. Normalmente, la DPCD puede utilizarse para impedir que los comerciantes faciliten la información exigida por la legislación sectorial de manera engañosa o agresiva, salvo que este aspecto esté regulado específicamente por dicha legislación.

La interacción con las obligaciones de información establecidas en los instrumentos sectoriales de la UE se puso de relieve en el asunto Dyson/BSH [(24)](#ntr24-C_2021526ES.01000101-E0024). El asunto se refería al etiquetado de las aspiradoras y a si la falta de información específica sobre las circunstancias de la medición de la eficiencia energética, que no se exige en las normas sectoriales en cuestión [(25)](#ntr25-C_2021526ES.01000101-E0025), podía constituir una omisión engañosa. El Tribunal de Justicia confirmó que, en caso de conflicto entre la DPCD y la legislación sectorial pertinente, ha de prevalecer esta última, lo que en este caso supuso que la información no exigida por la etiqueta energética de la UE no podía considerarse «información sustancial» y que no se podía mostrar otra información.

La interacción con las normas sectoriales se abordó asimismo en el asunto Mezina [(26)](#ntr26-C_2021526ES.01000101-E0026). Este asunto se refería a declaraciones de propiedades saludables en relación con complementos alimenticios naturales. El Reglamento (CE) n.o 1924/2006 del Parlamento Europeo y del Consejo [(27)](#ntr27-C_2021526ES.01000101-E0027) relativo a las declaraciones nutricionales y de propiedades saludables en los alimentos se aplica a las declaraciones nutricionales y de propiedades saludables efectuadas en las comunicaciones comerciales, ya sea en el etiquetado, la presentación o la publicidad de los alimentos que se suministren como tales al consumidor final. En caso de conflicto entre las disposiciones del Reglamento (CE) n.o 1924/2006 y la DPCD, prevalecerán las primeras en relación con las declaraciones de propiedades saludables.

1.2.2.   Información establecida por otros actos legislativos de la UE como información «sustancial»

La DPCD califica de «sustanciales» los requisitos de información establecidos por otros actos legislativos de la UE en relación con las comunicaciones comerciales.

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| Artículo 7, apartado 5   |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 5. | Se considerarán sustanciales los requisitos establecidos por el Derecho comunitario en materia de información relacionados con las comunicaciones comerciales, con inclusión de la publicidad o la comercialización, de los que el anexo II contiene una lista no exhaustiva. | |

Estos requisitos de información se encuentran en una serie de actos legislativos de la UE de carácter sectorial. Por ejemplo:

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| — | medio ambiente (entre ellos el Reglamento por el que se establece un marco para el etiquetado energético [(28)](#ntr28-C_2021526ES.01000101-E0028) y los Reglamentos Delegados conexos, la Directiva sobre el diseño ecológico [(29)](#ntr29-C_2021526ES.01000101-E0029) y los Reglamentos Delegados conexos, el Reglamento relativo al etiquetado de los neumáticos [(30)](#ntr30-C_2021526ES.01000101-E0030), y la Directiva sobre el consumo de combustible [(31)](#ntr31-C_2021526ES.01000101-E0031)); |

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| — | servicios financieros (por ejemplo, la Directiva relativa a los mercados de instrumentos financieros [(32)](#ntr32-C_2021526ES.01000101-E0032), la Directiva sobre servicios de pago [(33)](#ntr33-C_2021526ES.01000101-E0033), la Directiva sobre crédito al consumo [(34)](#ntr34-C_2021526ES.01000101-E0034), la Directiva sobre créditos hipotecarios [(35)](#ntr35-C_2021526ES.01000101-E0035), la Directiva sobre las cuentas de pago [(36)](#ntr36-C_2021526ES.01000101-E0036) y el Reglamento sobre los documentos de datos fundamentales relativos a los productos empaquetados o basados en seguros [(37)](#ntr37-C_2021526ES.01000101-E0037)); |

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| — | sanidad (como la Directiva 2001/83/CE del Parlamento Europeo y del Consejo [(38)](#ntr38-C_2021526ES.01000101-E0038)); |

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| — | servicios de comunicaciones electrónicas (Código Europeo de las Comunicaciones Electrónicas [(39)](#ntr39-C_2021526ES.01000101-E0039)); |

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| — | transporte (por ejemplo, el Reglamento sobre los servicios aéreos [(40)](#ntr40-C_2021526ES.01000101-E0040) y los Reglamentos sobre los derechos de los viajeros [(41)](#ntr41-C_2021526ES.01000101-E0041)); |

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| — | ámbito alimentario (por ejemplo, el Reglamento sobre legislación alimentaria general [(42)](#ntr42-C_2021526ES.01000101-E0042) y el Reglamento sobre la información alimentaria facilitada al consumidor [(43)](#ntr43-C_2021526ES.01000101-E0043)). |

Estos requisitos de información tendrán a menudo un carácter más específico que los requisitos de información de la DPCD.

El artículo 7, apartado 5, de la DPCD aclara que tales requisitos de información «[s]e considerarán sustanciales».

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| Por ejemplo:  El artículo 23 del Reglamento sobre los servicios aéreos exige a las compañías aéreas, sus agentes y otros vendedores de billetes que, al ofrecer los billetes de avión, desglosen el precio final por componentes (por ejemplo, tarifa aérea, impuestos, tasas de aeropuerto y otros cánones o derechos, tales como los relacionados con la seguridad extrínseca o el combustible). Esto constituye información sustancial en el sentido del artículo 7, apartado 5, de la DPCD. |

Por consiguiente, el hecho de no facilitar dicha información puede considerarse una práctica comercial engañosa con arreglo a la DPCD que debe apreciarse en función del criterio general de la decisión sobre una transacción con el fin de determinar si tal omisión hace o puede hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado. El concepto de «información sustancial» en el sentido de la DPCD se examina en el punto 2.9.1.

El considerando 15 establece que los Estados miembros podrán mantener o añadir requisitos de información relacionada con el Derecho contractual si así lo autorizan las cláusulas mínimas de armonización contenidas en los instrumentos jurídicos vigentes de la UE.

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| Por ejemplo:  Los Estados miembros pueden introducir requisitos adicionales de información precontractual para las ventas en establecimientos, que están sujetos a la cláusula mínima de armonización prevista en el artículo 5, apartado 4, de la Directiva sobre los derechos de los consumidores. |

1.2.3.   Interacción con la Directiva sobre los derechos de los consumidores

La Directiva sobre los derechos de los consumidores [(44)](#ntr44-C_2021526ES.01000101-E0044) («DDC») se aplica a todos los contratos celebrados entre empresas y consumidores, salvo en los ámbitos excluidos de su ámbito de aplicación, como los servicios financieros y sanitarios. Armoniza plenamente los requisitos de información precontractual correspondientes a los contratos a distancia (incluidos los contratos en línea) y los contratos celebrados fuera del establecimiento (es decir, los contratos que no se celebran en tiendas físicas tradicionales; véase la definición completa en el artículo 2, punto 8, de la DDC). Al mismo tiempo, tal como se establece en el artículo 6, apartado 8, de la DDC, la Directiva no impide que los Estados miembros puedan imponer requisitos de información adicionales de conformidad con la Directiva 2006/123/CE del Parlamento Europeo y del Consejo relativa a los servicios [(45)](#ntr45-C_2021526ES.01000101-E0045) y la Directiva 2000/31/CE del Parlamento Europeo y del Consejo sobre el comercio electrónico [(46)](#ntr46-C_2021526ES.01000101-E0046) (para más información, véase el Documento de orientación sobre la DDC, punto 4.1.1 [(47)](#ntr47-C_2021526ES.01000101-E0047)). Por lo que se refiere a otros tipos de contratos, en particular los celebrados en tiendas físicas tradicionales (contratos en el establecimiento), la Directiva permite a los Estados miembros adoptar o mantener requisitos adicionales de información precontractual (artículo 5, apartado 4). La DDC regula asimismo determinados derechos contractuales, en particular el derecho de desistimiento.

Los requisitos de información precontractual establecidos en la DDC son más detallados que los requisitos de información previstos en el artículo 7, apartado 4, de la DPCD con respecto a las invitaciones a comprar. Una invitación a comprar en virtud de la DPCD se refiere a la información facilitada tanto en la fase de comercialización (publicidad) como antes de la firma del contrato. En este último caso, puede existir un solapamiento entre los requisitos de información previstos en el artículo 7, apartado 4, de la DPCD y los requisitos de información precontractual establecidos en la DDC. La diferencia entre la información precontractual y una invitación a comprar se explica con más detalle en el punto 2.9.5.

Habida cuenta del carácter más exhaustivo de los requisitos de información contenidos en la DDC, el cumplimiento de los requisitos establecidos en dicha Directiva para la fase precontractual también debería garantizar normalmente el cumplimiento del artículo 7, apartado 4, de la DPCD, por lo que respecta al contenido de la información. No obstante, la DPCD seguirá siendo aplicable de cara a la evaluación de cualesquiera prácticas comerciales engañosas o agresivas ejercidas por un comerciante, también en cuanto a la forma y presentación de esta información al consumidor.

Otro ejemplo de complementariedad entre ambos instrumentos se refiere a las consecuencias de las prácticas de «suministro no solicitado», que están prohibidas en virtud de los puntos 21 y 29 del anexo I de la DPCD. El artículo 27 de la DDC aclara que, en el caso de suministro no solicitado, «[s]e eximirá al consumidor de toda obligación de entregar contraprestación alguna» y, en tales casos, «la falta de respuesta del consumidor […] no se considerará consentimiento».

El concepto de «suministro no solicitado» ha sido interpretado asimismo por el Tribunal de Justicia. Precisó que, puesto que ni la DDC ni la DPCD regulan la formación de los contratos, corresponde a los órganos jurisdiccionales nacionales apreciar, de conformidad con la normativa nacional, si puede considerarse celebrado un contrato, por ejemplo, entre una empresa de distribución de agua y un consumidor, sin el consentimiento expreso de este [(48)](#ntr48-C_2021526ES.01000101-E0048).

En este contexto, el Tribunal de Justicia también aclaró que el punto 29 del anexo I no abarca la práctica comercial de una empresa de distribución de agua potable consistente en mantener la conexión a la red pública de distribución de agua cuando se instala un consumidor en una vivienda que había estado previamente ocupada si dicho consumidor no puede elegir el proveedor de tal servicio, este proveedor factura, en función del consumo de agua, tarifas que cubren los costes y son transparentes y no discriminatorios, y dicho consumidor sabe que la citada vivienda está conectada a la red pública de distribución de agua y que el abastecimiento de agua es de pago [(49)](#ntr49-C_2021526ES.01000101-E0049).

El Tribunal de Justicia ha explicado asimismo que el artículo 27 de la DDC, en relación con el artículo 5, apartados 1 y 5, de la DPCD, no se opone a una normativa nacional que establece que los propietarios de una vivienda en un edificio en régimen de propiedad horizontal conectado a una red de calefacción urbana están obligados a contribuir a los gastos del consumo de energía térmica de las partes comunes y de la instalación interior del edificio, aun cuando no hayan solicitado individualmente el suministro de calefacción y no lo utilicen en su vivienda, ya que el contrato se celebró a petición de la mayoría de los propietarios [(50)](#ntr50-C_2021526ES.01000101-E0050).

1.2.4.   Interacción con la Directiva sobre cláusulas contractuales abusivas

La Directiva sobre cláusulas contractuales abusivas [(51)](#ntr51-C_2021526ES.01000101-E0051) («DCCA») se aplica a todos los contratos celebrados entre empresas y consumidores y se refiere a las cláusulas contractuales que no han sido negociadas individualmente con antelación (por ejemplo, cláusulas de adhesión). Las cláusulas contractuales pueden considerarse abusivas sobre la base de una prohibición general [(52)](#ntr52-C_2021526ES.01000101-E0052), de una lista indicativa de cláusulas potencialmente abusivas [(53)](#ntr53-C_2021526ES.01000101-E0053) o de la obligación de redactar las cláusulas de manera transparente, es decir, en términos claros y comprensibles [(54)](#ntr54-C_2021526ES.01000101-E0054). A diferencia de la DPCD, que se entiende sin perjuicio del Derecho contractual y no prevé la nulidad de los contratos derivados de prácticas comerciales desleales, las infracciones de la DCCA tienen consecuencias contractuales: en virtud del artículo 6, apartado 1, de dicha Directiva, «no vincularán al consumidor» las cláusulas abusivas que figuren en un contrato celebrado con este [(55)](#ntr55-C_2021526ES.01000101-E0055).

Relación entre las cláusulas contractuales abusivas y prácticas comerciales desleales

La DCCA se aplica a los contratos celebrados entre empresas y consumidores en todos los sectores de actividad económica, lo que significa que puede aplicarse paralelamente a otras disposiciones del Derecho de la UE, incluidas otras normas de protección de los consumidores, como la DPCD.

El Tribunal de Justicia precisó determinados elementos de la relación entre estas dos Directivas en el asunto Pereničová y Perenič, relativo a un contrato de crédito en el que la tasa anual equivalente indicada era inferior al tipo efectivo [(56)](#ntr56-C_2021526ES.01000101-E0056).

El Tribunal de Justicia llegó a la conclusión de que esta información errónea sobre el precio total del crédito facilitada en las cláusulas contractuales es «engañosa» en el sentido de la DPCD si hace o puede hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado.

El hecho de que un comerciante haya recurrido a tal práctica comercial desleal es uno de los elementos que deben tenerse en cuenta en la apreciación del carácter abusivo de las cláusulas contractuales con arreglo a la DCCA [(57)](#ntr57-C_2021526ES.01000101-E0057). En particular, este elemento podrá utilizarse para determinar si una cláusula contractual basada en él causa en detrimento del consumidor un «desequilibrio importante» entre los derechos y obligaciones que se derivan del contrato, en virtud del artículo 3, apartado 1, y del artículo 4, apartado 1, de la DCCA. Asimismo, este elemento podría ser pertinente en la valoración de la transparencia de una cláusula contractual con arreglo al artículo 4, apartado 2, y al artículo 5 de la DCCA [(58)](#ntr58-C_2021526ES.01000101-E0058). Al mismo tiempo, la comprobación de que un comerciante ha recurrido a una práctica comercial desleal no incide directamente en la cuestión de si el contrato es válido con arreglo al artículo 6, apartado 1, de dicha Directiva, sin perjuicio de las disposiciones nacionales en virtud de las cuales el contrato celebrado sobre la base de prácticas comerciales desleales sea nulo en su conjunto [(59)](#ntr59-C_2021526ES.01000101-E0059).

El Tribunal de Justicia no se ha pronunciado directamente sobre si, a la inversa, la utilización de cláusulas contractuales abusivas en virtud de la DCCA debe considerarse una práctica comercial desleal con arreglo a la DPCD. No obstante, cabe argumentar que el uso de tales cláusulas contractuales abusivas, que no son jurídicamente vinculantes para el consumidor, en algunos casos podría resultar pertinente para la identificación de una práctica comercial desleal. En particular, puede ser la marca de una acción engañosa con arreglo al artículo 6 de la DPCD, en la medida en que dé lugar a información falsa o induzca a error al consumidor medio en cuanto a los derechos y obligaciones de las partes del contrato. Por otro lado, a la hora de evaluar la transparencia de la información sustancial y la existencia de una omisión engañosa con arreglo al artículo 7 de la DPCD, debe tenerse en cuenta el recurso a cláusulas contractuales opacas, que no están redactadas de manera clara y comprensible, tal como disponen el artículo 4, apartado 2, y el artículo 5 de la DCCA [(60)](#ntr60-C_2021526ES.01000101-E0060). Además, la utilización de cláusulas contractuales abusivas podría indicar que un comerciante no ha cumplido los requisitos de diligencia profesional con arreglo a lo dispuesto en el artículo 5 de la DPCD.

Solo las autoridades de protección de los consumidores de algunos Estados miembros disponen de facultades específicas en el ámbito de las cláusulas contractuales para prohibir el uso de las cláusulas contractuales tipo no negociadas que consideren desleales sin necesidad de llevar al comerciante a los tribunales [(61)](#ntr61-C_2021526ES.01000101-E0061).

Apreciación de oficio

Según jurisprudencia reiterada del Tribunal de Justicia, los órganos jurisdiccionales nacionales tienen la obligación de apreciar de oficio las cláusulas contractuales abusivas [(62)](#ntr62-C_2021526ES.01000101-E0062), es decir, aun cuando el carácter abusivo de dichas cláusulas no sea invocado por el consumidor: La obligación se deriva del artículo 6, apartado 1, de la DCCA, que establece que las cláusulas abusivas no vincularán al consumidor, así como del principio de efectividad, que exige que las medidas nacionales de ejecución no hagan imposible en la práctica o excesivamente difícil el ejercicio de los derechos que confiere a los consumidores el Derecho de la Unión [(63)](#ntr63-C_2021526ES.01000101-E0063). El requisito de un control de oficio se justifica por la consideración de que el sistema de protección establecido por la DCCA se basa en la idea de que el consumidor se halla en situación de inferioridad respecto al profesional, en lo referido tanto a la capacidad de negociación como al nivel de información, situación que le lleva a adherirse a las condiciones redactadas de antemano por el profesional sin poder influir en el contenido de estas [(64)](#ntr64-C_2021526ES.01000101-E0064). Por lo tanto, existe un riesgo no desdeñable de que el consumidor no invoque la norma jurídica destinada a protegerle, entre otras razones por ignorar la existencia de tal norma.

En el asunto Bankia [(65)](#ntr65-C_2021526ES.01000101-E0065), el Tribunal de Justicia recordó que un órgano jurisdiccional nacional que aprecie el carácter abusivo de las cláusulas contractuales a la luz de la DCCA, ya sea de oficio o a instancia de parte, tendrá la posibilidad de apreciar, en el marco de ese control, el carácter desleal de una práctica comercial sobre cuya base se haya celebrado el contrato [(66)](#ntr66-C_2021526ES.01000101-E0066).

En cambio, el Tribunal de Justicia dictaminó que, en los demás casos, los órganos jurisdiccionales nacionales no están obligados a apreciar de oficio si un determinado contrato o alguna de sus cláusulas se ha acordado sobre la base de prácticas comerciales desleales [(67)](#ntr67-C_2021526ES.01000101-E0067). En particular, el Tribunal falló que, durante un procedimiento de ejecución hipotecaria, no es necesario que los órganos jurisdiccionales nacionales puedan controlar la validez del título ejecutivo a la luz de la DPCD, ya que esta Directiva no les impone tal obligación.

Esta interpretación se ha justificado por el hecho de que la DPCD no prevé consecuencias contractuales, a diferencia del artículo 6, apartado 1, de la DCCA. Además, el Tribunal de Justicia explicó que la DPCD, en particular su artículo 11, no contiene requisitos similares a los establecidos en el artículo 7, apartado 1, de la DCCA, que se opone a una normativa nacional que no disponga la posibilidad de adoptar medidas cautelares en los procedimientos de ejecución La ausencia de medidas cautelares limitaría los recursos de que disponen los consumidores en virtud de la DCCA a una protección a posteriori meramente indemnizatoria en aquellos casos en que la ejecución se lleve a cabo antes de que el órgano jurisdiccional competente dicte una sentencia por la que se declare el carácter abusivo de la cláusula contractual en que se basa la hipoteca y, en consecuencia, la nulidad del procedimiento de ejecución [(68)](#ntr68-C_2021526ES.01000101-E0068).

Sin embargo, la Directiva (UE) 2019/2161 relativa a la mejora de la aplicación y la modernización de las normas de protección de los consumidores de la Unión introduce medidas correctoras individuales para las víctimas de infracciones de las disposiciones de la DPCD en un nuevo artículo 11 bis
 de dicha Directiva, aplicable a partir del 28 de mayo de 2022. Con arreglo a esta nueva disposición, los consumidores perjudicados por prácticas comerciales desleales tendrán acceso a medidas correctoras proporcionadas y eficaces, incluida una indemnización por los daños y perjuicios sufridos por el consumidor y, cuando proceda, una reducción del precio o la resolución del contrato (para más información, véase el punto 1.4). La adición de esta nueva disposición clara e inequívoca podría suponer una ampliación del requisito de control de oficio a las prácticas comerciales desleales en el marco de la DPCD (pendiente de confirmación por el Tribunal de Justicia).

1.2.5.   Interacción con la Directiva sobre indicación de los precios

La Directiva 98/6/CE del Parlamento Europeo y del Consejo sobre indicación de los precios [(69)](#ntr69-C_2021526ES.01000101-E0069) («DIP») obliga a los comerciantes a indicar el precio de venta y el precio por unidad de medida de los bienes al objeto de facilitar la comparación de precios por parte de los consumidores. Por otra parte, la Directiva (UE) 2019/2161 añadió a la DIP normas específicas acerca de las «reducciones de precios».

En cuanto a la interacción entre la DPCD y las disposiciones de la DIP referentes a la indicación del precio de venta, el Tribunal de Justicia aclaró en su sentencia en el asunto Citroën (apartados 44, 45 y 46) que la DIP regula aspectos concretos —en el sentido del artículo 3, apartado 4, de la DPCD— de prácticas comerciales desleales en las relaciones entre los comerciantes y los consumidores, concretamente las relativas a la indicación del precio de venta de los bienes en las ofertas de venta y en la publicidad [(70)](#ntr70-C_2021526ES.01000101-E0070). Por lo tanto, procede aplicar la DIP, en lugar de la DPCD [artículo 7, apartado 4, letra c)], «dado que el aspecto relativo al precio de venta mencionado en un anuncio como el controvertido en el litigio principal se rige por la Directiva 98/6».

En este caso, el aspecto pertinente era que el comerciante no había indicado como precio de venta el precio final, es decir, el precio con inclusión de los gastos adicionales obligatorios que se mencionaban por separado en el anuncio del automóvil. Por consiguiente, el artículo 2 de la DIP, que define el precio de venta como el precio final del bien, incluidos el IVA y todos los demás impuestos, no impide la aplicación de otros requisitos recogidos en el artículo 7, apartado 4, letra c), de la DPCD que no se rigen por aquel. En particular, los comerciantes deben cumplir el requisito previsto en la DPCD de que la invitación a comprar incluya asimismo información sobre los posibles gastos adicionales que no puedan calcularse razonablemente de antemano.

Las modificaciones que la Directiva (UE) 2019/2161 introduce en la DIP obligan a los Estados miembros a adoptar normas específicas sobre las reducciones de precios [(71)](#ntr71-C_2021526ES.01000101-E0071). Con arreglo al artículo 6 bis, el comerciante que anuncie una «reducción del precio» deberá indicar el «precio anterior», que se define como el precio más reducido aplicado por dicho comerciante durante un período no inferior a los treinta días anteriores.

Por analogía con las conclusiones del Tribunal de Justicia en el asunto Citroën, las normas específicas de la DIP en materia de reducción de precios deben prevalecer sobre la DPCD por lo que se refiere a los aspectos de la reducción del precio que se rigen por tales normas específicas, a saber, la definición e indicación del precio «anterior» en el anuncio de dicha reducción. No obstante, la DPCD sigue siendo aplicable a otros aspectos de las reducciones de precios, en particular su artículo 6, apartado 1, letra d), sobre las afirmaciones engañosas relativas a la existencia de una ventaja con respecto al precio. Se podría aplicar, por ejemplo, a diferentes aspectos engañosos de las prácticas de reducción de precios, tales como:

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| — | la prolongación excesiva de los períodos durante los que se anuncian reducciones de precios en comparación con el período durante el que los bienes se venden a su precio íntegro, o |

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| — | el anuncio de un descuento de, por ejemplo, «hasta el 70 %», cuando solo se rebajan unos pocos artículos al 70 % y en el resto se aplica un porcentaje inferior. |

Estas prácticas podrían considerarse contrarias a la DPCD [artículo 6, apartado 1, letra d)], previo examen caso por caso, a pesar de que el comerciante haya cumplido los requisitos establecidos en la DIP por lo que respecta a la definición e indicación del precio «anterior». A la inversa, un comerciante que incumpla las normas de la DIP en materia de reducción de precios, a saber, la definición y presentación del «precio anterior», también se podría considerar que ha incumplido la DPCD.

Además, la DIP se aplica únicamente a los bienes materiales y no a los servicios ni a los contenidos digitales, por lo que las disposiciones generales de la DPCD siguen siendo plenamente aplicables a las prácticas de reducción de precios en relación con esos otros productos y servicios.

Por último, dado que la DIP se aplica solo a las «reducciones de precios» tal como se definen específicamente en ella, la DPCD sigue siendo plenamente aplicable y regula otros tipos de prácticas que promueven ventajas respecto al precio, como comparaciones de precios, ofertas condicionadas conjuntas o vinculadas y programas de fidelidad (véase el punto 2.8.2). La DPCD también se aplica a los precios personalizados (véase el punto 4.2.8.).

1.2.6.   Interacción con la Directiva sobre publicidad engañosa y publicidad comparativa

La Directiva sobre publicidad engañosa y publicidad comparativa [(72)](#ntr72-C_2021526ES.01000101-E0072) (DPEC) regula las relaciones entre empresas («B2B»). Sin embargo, sus normas sobre la publicidad comparativa siguen proporcionando una referencia general, basada en criterios plenamente armonizados, para apreciar la legalidad de la publicidad comparativa también en las transacciones entre empresas y consumidores («B2C») [(73)](#ntr73-C_2021526ES.01000101-E0073).

El artículo 6, apartado 2, letra a), de la DPCD califica de engañosa toda práctica, incluida la publicidad comparativa, que cree confusión con cualesquiera productos, marcas registradas, nombres comerciales u otras marcas distintivas de un competidor. Al mismo tiempo, en virtud del artículo 4, letra a), de la DPEC, la publicidad comparativa no está permitida si es engañosa en el sentido de los artículos 6 y 7 de la DPCD.

Por tanto, cada una de estas dos Directivas remite a la otra. En la medida en que es pertinente tanto para las transacciones B2C como para las B2B, las condiciones de apreciación de la legalidad de la publicidad comparativa establecidas por el artículo 4 de la DPEC son más bien amplias e incluyen también algunos aspectos de competencia desleal (por ejemplo, la denigración de marcas). Por consiguiente, la DPEC establecerá las condiciones de dicha apreciación con arreglo a la DPCD en el caso de las transacciones B2C o impondrá requisitos adicionales relevantes para los comerciantes, principalmente competidores, en las transacciones B2B.

En el caso de los Estados miembros que hayan ampliado la totalidad o parte de las disposiciones de la DPCD a las transacciones B2B, las disposiciones de transposición al Derecho interno de aquellas sustituirán en la práctica a las disposiciones pertinentes de la DPEC en las relaciones B2B. Cabe señalar que algunos países también han adoptado normas específicas para las relaciones B2B.

El Tribunal de Justicia examinó la interacción entre la DPEC y la DPCD en el asunto Carrefour [(74)](#ntr74-C_2021526ES.01000101-E0074), que se refería a la publicidad comparativa que puede resultar engañosa en virtud del artículo 7 de la DPCD. La práctica consistía en la comparación de los precios de productos vendidos en establecimientos de tamaños o formatos diferentes que forman parte de grupos que, a su vez, poseen una gama de establecimientos de tamaños y formatos diferentes (por ejemplo, hipermercados y supermercados) y cuyo anunciante compara los precios aplicados en los establecimientos de tamaños o formatos superiores de su grupo con los aplicados en establecimientos de tamaños o formatos inferiores de los grupos competidores. El Tribunal de Justicia consideró que este tipo de práctica publicitaria podía ser ilícita en el sentido del artículo 4, letras a) y c), de la DPEC, en relación con el artículo 7, apartados 1, 2 y 3, de la DPCD, a menos que se informe a los consumidores, de manera clara y mediante el propio mensaje publicitario, de que la comparación se ha llevado a cabo entre los precios aplicados en los establecimientos de tamaños o formatos superiores del grupo del anunciante y los aplicados en establecimientos de tamaños o formatos inferiores de los grupos competidores [(75)](#ntr75-C_2021526ES.01000101-E0075).

1.2.7.   Interacción con la Directiva de servicios

Al contrario que la legislación sectorial, la Directiva de servicios [(76)](#ntr76-C_2021526ES.01000101-E0076) tiene un amplio ámbito de aplicación. Se aplica a los servicios en general tal como se definen en el Tratado de Funcionamiento de la Unión Europea («TFUE»), con algunas excepciones. Por tanto, no puede considerarse lex specialis con respecto a la DPCD en el sentido del artículo 3, apartado 4.

En consecuencia, los requisitos de información recogidos en el artículo 22 de la Directiva de servicios se aplican adicionalmente a la información requerida en las invitaciones a comprar en virtud del artículo 7, apartado 4, de la DPCD.

1.2.8.   Interacción con la Directiva sobre el comercio electrónico

La Directiva sobre el comercio electrónico [(77)](#ntr77-C_2021526ES.01000101-E0077) es aplicable a los servicios de la sociedad de la información, que suelen incluir los servicios prestados por los gestores de los sitios web y las plataformas en línea que permiten a los consumidores comprar un bien o servicio.

El artículo 5 de la Directiva sobre el comercio electrónico impone a los prestadores de servicios una serie de requisitos de información general, mientras que el artículo 6 establece la información exigida en las comunicaciones comerciales. Los requisitos de información contenidos en sendos artículos son requisitos mínimos.

En particular, el artículo 6 obliga a los Estados miembros a garantizar que los comerciantes determinen claramente las ofertas promocionales, como los descuentos, premios y regalos, cuando estén permitidos en el Estado miembro de establecimiento del prestador de servicios, así como las condiciones para acceder a dichas ofertas.

El 15 de diciembre de 2020 la Comisión publicó las propuestas de Ley de Servicios Digitales [(78)](#ntr78-C_2021526ES.01000101-E0078) («LSD») y de Ley de Mercados Digitales [(79)](#ntr79-C_2021526ES.01000101-E0079) («LMD»). El objetivo de la LSD es actualizar y ampliar las normas relativas al comercio electrónico y a las plataformas en la Unión, y la LMD tiene por objeto imponer obligaciones adicionales a determinados servicios operados por los denominados «guardianes de acceso» [(80)](#ntr80-C_2021526ES.01000101-E0080).

1.2.9.   Interacción con la Directiva de servicios de comunicación audiovisual

La Directiva de servicios de comunicación audiovisual [(81)](#ntr81-C_2021526ES.01000101-E0081) («DSCA») se aplica a los servicios de comunicación audiovisual lineales y no lineales (es decir, la radiodifusión televisiva y los servicios de comunicación audiovisual a petición), que pueden incluir las comunicaciones comerciales audiovisuales que promocionan, de manera directa o indirecta, bienes o servicios (por ejemplo, la publicidad televisiva, el patrocinio, la televenta y el emplazamiento de producto).

El artículo 5 de la DSCA establece requisitos de información general para los prestadores de servicios, mientras que su artículo 9 dispone los requisitos que deben cumplir todas las comunicaciones comerciales audiovisuales. Los artículos 10 y 11, respectivamente, establecen las condiciones que deben respetar el patrocinio y el emplazamiento de producto en los servicios de comunicación audiovisual. La DSCA contempla también otros criterios más estrictos que se aplican únicamente a la publicidad televisiva y la televenta (capítulo VII sobre publicidad por televisión y televenta).

La revisión de 2018 de la Directiva [(82)](#ntr82-C_2021526ES.01000101-E0082) ha ampliado algunas de estas normas a las plataformas de intercambio de vídeos (artículo 28 ter). Ahora deben cumplir los requisitos establecidos en el artículo 9, apartado 1, en lo que se refiere a las comunicaciones comerciales audiovisuales que sean comercializadas, vendidas u organizadas por ellas mismas, y tomar las medidas adecuadas para garantizar el cumplimiento de dichos requisitos en cuanto a las comunicaciones comerciales audiovisuales que no sean comercializadas, vendidas u organizadas por ellas. La Directiva modificada incluye asimismo requisitos de divulgación con respecto a las comunicaciones comerciales audiovisuales en las plataformas de intercambio de vídeos. La Comisión ha adoptado unas Directrices [(83)](#ntr83-C_2021526ES.01000101-E0083) relativas a la aplicación práctica de la definición de «servicio de intercambio de vídeos a través de plataforma».

La DPCD se aplica a las prácticas comerciales desleales que se producen en los servicios de comunicación audiovisual, tales como las prácticas engañosas y agresivas, en la medida en que no estén cubiertas por las disposiciones antes mencionadas.

1.2.10.   Interacción con el Reglamento General de Protección de Datos y la Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas

El respeto de la vida privada y familiar y la protección de datos de carácter personal constituyen derechos fundamentales en virtud de los artículos 7 y 8 de la Carta de los Derechos Fundamentales de la Unión Europea. En virtud del artículo 7, toda persona tiene derecho al respeto de su vida privada y familiar, de su domicilio y de sus comunicaciones. En lo concerniente a la protección de los datos de carácter personal, el artículo 8, apartado 2, de la Carta contiene los principios esenciales de la protección de datos (tratamiento leal, consentimiento o fundamento legítimo previsto por la ley, derecho de acceso y de rectificación). El artículo 8, apartado 3, de la Carta establece que el respeto de las normas de protección de datos estará sujeto al control de una autoridad independiente [(84)](#ntr84-C_2021526ES.01000101-E0084).

El Reglamento General de Protección de Datos [(85)](#ntr85-C_2021526ES.01000101-E0085) («RGPD») regula la protección de los datos personales y la libre circulación de estos datos. La aplicación de las normas de protección de datos corresponde a las autoridades de control y órganos jurisdiccionales nacionales. El RGPD se aplica al tratamiento de los «datos personales». Por «datos personales» se entiende toda información sobre una persona física identificada o identificable (el «interesado»). Se considerará persona física identificable toda persona cuya identidad pueda determinarse, directa o indirectamente, en particular mediante un número de identificación o uno o varios elementos propios de la identidad física, fisiológica, genética, psíquica, económica, cultural o social de dicha persona.

El tratamiento de datos personales, que incluye la recogida y la conservación de dichos datos, debe ser leal y lícito. Un aspecto del tratamiento leal es que se ha de facilitar al interesado la información pertinente, entre otros sobre la finalidad de dicho tratamiento, teniendo en cuenta las circunstancias específicas en que se obtengan los datos. El tratamiento leal y lícito de los datos personales exige el cumplimiento de los principios de protección de datos y de al menos una de las seis condiciones para la legitimación del tratamiento (véase el artículo 6, apartado 1, del RGPD). Una de esas condiciones es el consentimiento del interesado. Otra es que el Derecho de la Unión o del Estado miembro imponga al responsable del tratamiento una obligación legal de tratar los datos (como la obligación de conocimiento del cliente).

La Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas [(86)](#ntr86-C_2021526ES.01000101-E0086) especifica y completa el RGPD en lo que respecta al tratamiento de los datos personales en el sector de las comunicaciones electrónicas, ya que facilita la libre circulación de tales datos y de los equipos y servicios de comunicaciones electrónicas. En particular, el artículo 5, apartado 3, de la Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas exige el consentimiento del usuario cuando se utilicen los denominados «chivatos» (cookies) u otras formas de acceso a información y almacenamiento de esta en el dispositivo de una persona (por ejemplo, tableta o teléfono inteligente), salvo cuando dicho almacenamiento o acceso sea necesario para efectuar la transmisión de una comunicación o para prestar un servicio de la sociedad de la información expresamente solicitado por un usuario.

Las estructuras empresariales basadas en datos predominan cada vez más en el mundo en línea. En particular, las plataformas en línea analizan, tratan y venden datos relativos a las preferencias de los consumidores y otros contenidos generados por los usuarios. Esto, junto con la publicidad, constituye a menudo su principal fuente de ingresos. La recogida y el tratamiento de datos personales en este tipo de situaciones deben cumplir las obligaciones legales impuestas por el RGPD y la Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas que se han mencionado anteriormente.

Por sí mismo, el incumplimiento por parte de un comerciante del RGPD o de la Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas no siempre supone que la práctica en cuestión infrinja asimismo la DPCD. No obstante, es preciso tener en cuenta estas violaciones de la intimidad y la protección de datos al apreciar el carácter desleal general de las prácticas comerciales en virtud de la DPCD, en particular si el comerciante trata datos de los consumidores en contra de los requisitos de privacidad y protección de datos, es decir, con fines de venta directa u otros fines comerciales, como la elaboración de perfiles, tarificaciones personales o aplicaciones de datos masivos.

Desde la perspectiva de la DPCD, la primera cuestión que se ha de analizar se refiere a la transparencia de la práctica comercial. En virtud de los artículos 6 y 7 de la DPCD, los comerciantes no deben engañar a los consumidores acerca de los aspectos que puedan tener repercusiones en sus decisiones sobre transacciones. Más concretamente, el artículo 7, apartado 2, y el punto 22 del anexo I prohíben que los comerciantes oculten el propósito comercial de la práctica comercial. Véase asimismo el punto 3.4 sobre el uso de la palabra «gratuito» para describir productos digitales, que podría infringir el punto 20 del anexo I.

Por otro lado, los requisitos de información previstos en el RGPD y la Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas se pueden considerar sustanciales a tenor de lo dispuesto en el artículo 7, apartado 5, de la DPCD. Los datos personales, las preferencias de los consumidores y otros contenidos generados por los usuarios poseen un valor económico y a menudo se ponen a disposición de terceros. Por consiguiente, con arreglo al artículo 7, apartado 2, de la DPCD y al punto 22 de su anexo I, se podría considerar que existe una omisión engañosa de información sustancial, así como un incumplimiento de la exigencia de transparencia y demás requisitos establecidos en los artículos 12, 13 y 14 del RGPD, si el comerciante no informa a un consumidor de que los datos facilitados se utilizarán con fines comerciales.

1.2.11.   Interacción con los artículos 101 y 102 del TFUE (normas de la UE sobre competencia)

El Reglamento (CE) n.o 1/2003 del Consejo [(87)](#ntr87-C_2021526ES.01000101-E0087) establece el marco jurídico para la aplicación de las normas sobre competencia previstas en los artículos 101 y 102 del TFUE. Ambos artículos se entienden sin perjuicio de la DPCD.

El artículo 101, apartado 1, del TFUE prohíbe, en determinadas circunstancias, los acuerdos entre empresas, las decisiones de asociaciones de empresas y las prácticas concertadas, tales como la fijación de los precios de compra o de venta u otras condiciones de transacción, que tengan por objeto o efecto impedir, restringir o falsear el juego de la competencia en la UE.

El artículo 102 del TFUE prohíbe, en determinadas circunstancias, la explotación abusiva de una posición dominante por parte de una o más empresas. Tal práctica abusiva puede consistir, por ejemplo, en aplicar a terceros contratantes condiciones desiguales para prestaciones equivalentes, que ocasionen a estos una desventaja competitiva, o en imponer directa o indirectamente precios de compra o de venta no equitativos.

El hecho de que una determinada conducta infrinja los artículos 101 o 102 del TFUE no significa necesariamente que también sea desleal con arreglo a la DPCD (o viceversa). No obstante, conviene tener en cuenta la infracción de las normas de competencia al apreciar el carácter desleal de las prácticas comerciales en el marco de la DPCD, en la medida en que puedan considerarse contrarias a la cláusula general del artículo 5, apartado 2, de la DPCD relativa a la «diligencia profesional».

1.2.12.   Interacción con la Carta de los Derechos Fundamentales de la UE

Con arreglo a su artículo 51, apartado 1, la Carta de los Derechos Fundamentales de la UE está dirigida a los Estados miembros cuando apliquen el Derecho de la Unión y, por tanto, también cuando apliquen las disposiciones de la DPCD. La Carta contiene disposiciones relativas a, entre otras cosas, la protección de datos de carácter personal (artículo 8), los derechos del niño (artículo 24), la protección de los consumidores (artículo 38) y el derecho a la tutela judicial efectiva y a un juez imparcial (artículo 47).

El Tribunal de Justicia ha subrayado la importancia del artículo 47 de la Carta sobre el acceso a la justicia por lo que respecta a los medios de recurso de que disponen los consumidores en relación con los derechos que las Directivas de la UE les otorgan. Según lo indicado por el Tribunal de Justicia, el principio de efectividad supone que las disposiciones procesales nacionales no pueden hacer excesivamente difícil o imposible en la práctica el ejercicio de los derechos que confiere a los consumidores el Derecho de la Unión [(88)](#ntr88-C_2021526ES.01000101-E0088).

1.2.13.   Interacción con los artículos 34, 35 y 36 del TFUE

Toda medida nacional adoptada en un ámbito que haya sido armonizado con carácter exhaustivo en el Derecho de la Unión debe apreciarse a la luz de las disposiciones de la medida de armonización y no de las del TFUE [(89)](#ntr89-C_2021526ES.01000101-E0089). Así pues, cuando una medida nacional está comprendida en el ámbito de aplicación de la DPCD (véanse los puntos 1.1 y 1.2), procede examinarla a la luz de la DPCD y no del TFUE.

Las medidas nacionales que no estén comprendidas en el ámbito de aplicación de la DPCD ni en ningún otro instrumento de armonización del Derecho derivado de la Unión deben apreciarse a la luz de los artículos 34, 35 y 36 del TFUE. La prohibición de las medidas de efecto equivalente a las restricciones cuantitativas establecida en el artículo 34 del TFUE abarca todas las normas comerciales adoptadas por los Estados miembros que puedan obstaculizar directa o indirectamente, real o potencialmente, el comercio interior de la Unión [(90)](#ntr90-C_2021526ES.01000101-E0090). Para más orientación sobre la aplicación de estas disposiciones, véase también la Comunicación de la Comisión titulada «Guía sobre los artículos 34 a 36 del Tratado de Funcionamiento de la Unión Europea (TFUE)» [(91)](#ntr91-C_2021526ES.01000101-E0091).

El Tribunal de Justicia ha abordado a fondo la cuestión de si una norma nacional puede obstaculizar el comercio dentro de la Unión. En particular, en la sentencia Keck [(92)](#ntr92-C_2021526ES.01000101-E0092) el Tribunal de Justicia declaró que las disposiciones nacionales que limiten o prohíban ciertas modalidades de venta no son susceptibles obstaculizar directa o indirectamente, real o potencialmente, el comercio entre los Estados miembros, siempre que, en primer lugar, dichas disposiciones se apliquen a todos los operadores afectados que ejerzan su actividad en el territorio nacional y, en segundo lugar, afecten del mismo modo, de hecho y de Derecho, a la comercialización de los productos nacionales y a la de los procedentes de otros Estados miembros [(93)](#ntr93-C_2021526ES.01000101-E0093). El Tribunal de Justicia incluye en la lista de modalidades de venta medidas relativas a las condiciones y métodos de comercialización [(94)](#ntr94-C_2021526ES.01000101-E0094), al tiempo de venta de las mercancías [(95)](#ntr95-C_2021526ES.01000101-E0095), al lugar de venta de las mercancías o las restricciones relativas a quién puede venderlas [(96)](#ntr96-C_2021526ES.01000101-E0096) y medidas relativas a los controles de precios [(97)](#ntr97-C_2021526ES.01000101-E0097).

Algunos de los ejemplos de modalidades de venta mencionados en la jurisprudencia del Tribunal de Justicia, y en particular las disposiciones nacionales que regulan las condiciones y los métodos de comercialización, entrarían en el ámbito de aplicación de la DPCD si se refiriesen a prácticas comerciales entre empresas y consumidores y estuvieran destinadas a proteger los intereses económicos de estos últimos.

Muchas prácticas comerciales que no entran en el ámbito de aplicación de la DPCD ni de otros actos del Derecho derivado de la Unión se podrían considerar modalidades de venta en virtud de la sentencia Keck. Tales modalidades de venta quedan comprendidas en el ámbito de aplicación del artículo 34 del TFUE si, de hecho o de derecho, introducen una discriminación basada en el origen de los productos. La discriminación de derecho se produce cuando las medidas son manifiestamente discriminatorias, mientras que la discriminación de hecho es más compleja. Las medidas de este tipo habrán de evaluarse caso por caso.

Si una medida o práctica nacional vulnera el artículo 34 del TFUE, en principio podría estar justificada en virtud del artículo 36 de dicho Tratado o sobre la base de una de las razones imperiosas de interés general reconocidas por el Tribunal de Justicia. Corresponde a las autoridades nacionales demostrar que la restricción a la libre circulación de mercancías está justificada por uno de esos motivos [(98)](#ntr98-C_2021526ES.01000101-E0098). Además, el Estado miembro tiene que demostrar que la normativa en cuestión es necesaria para proteger de un modo efectivo los intereses públicos invocados [(99)](#ntr99-C_2021526ES.01000101-E0099).

Para que puedan admitirse, es preciso que estas normas sean proporcionadas al objetivo perseguido y que este objetivo no pueda lograrse aplicando medidas que restrinjan menos los intercambios dentro de la Unión [(100)](#ntr100-C_2021526ES.01000101-E0100). Más recientemente, el Tribunal de Justicia declaró que «a efectos del examen de la proporcionalidad de la restricción de que se trata, es preciso comprobar aún si los medios aplicados en este contexto no van más allá de lo necesario para alcanzar el objetivo legítimo perseguido. En otros términos, será necesario valorar si no existen medidas alternativas que puedan realizar igualmente ese objetivo, pero con un efecto menos restrictivo sobre el comercio comunitario» [(101)](#ntr101-C_2021526ES.01000101-E0101). Por otra parte, el Tribunal de Justicia declaró que «[e]s preciso recordar igualmente en este contexto que una medida restrictiva sólo puede considerarse conforme con las exigencias del Derecho de la Unión si responde verdaderamente a la finalidad de alcanzar la consecución del objetivo buscado de una manera coherente y sistemática» [(102)](#ntr102-C_2021526ES.01000101-E0102).

1.2.14.   Interacción con el Reglamento sobre las relaciones entre plataformas y empresas

El Reglamento sobre las relaciones entre plataformas y empresas («P2B») [(103)](#ntr103-C_2021526ES.01000101-E0103) establece normas para asegurar que se conceden opciones apropiadas de transparencia, de equidad y de reclamación a los usuarios profesionales de servicios de intermediación en línea y a los usuarios de sitios web corporativos en relación con los motores de búsqueda en línea. Los requisitos de transparencia del Reglamento P2B comprenden la clasificación de los resultados de las búsquedas (artículo 5).

La Comisión ha publicado unas directrices sobre la transparencia de la clasificación destinadas a facilitar el cumplimiento de los requisitos por parte de los proveedores de servicios de intermediación en línea y los proveedores de motores de búsqueda en línea [(104)](#ntr104-C_2021526ES.01000101-E0104).

La Directiva (UE) 2019/2161 introdujo un requisito similar relativo a la transparencia de la clasificación en el ámbito B2C mediante la inserción de un nuevo apartado 4 bis en el artículo 7 de la DPCD. Esta nueva disposición exige a los comerciantes que proporcionen a los consumidores información sobre los principales parámetros que determinan la clasificación de los productos presentados al consumidor como resultado de la búsqueda y la importancia relativa de dichos parámetros. La interacción entre la DPCD y el Reglamento P2B en el ámbito de la transparencia de la clasificación se aborda en el punto 4.2.3.

1.3.   Relación entre la DPCD y la autorregulación

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| --- |
| Artículo 2, letra f)  «código de conducta»: acuerdo o conjunto de normas no impuestas por disposiciones legales, reglamentarias o administrativas de un Estado miembro, en el que se define el comportamiento de aquellos comerciantes que se comprometen a cumplir el código en relación con una o más prácticas comerciales o sectores económicos concretos; |

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| Artículo 10  Códigos de conducta  La presente Directiva no excluye el control, que los Estados miembros pueden fomentar, de las prácticas comerciales desleales por parte de los responsables de códigos, ni el recurso a tales organismos por parte de las personas u organizaciones a las que se hace referencia en el artículo 11, siempre y cuando el procedimiento ante tales organismos sea adicional al procedimiento administrativo o judicial mencionado en dicho artículo. El recurso a tales órganos de control nunca supondrá la renuncia a las acciones judiciales o administrativas a que se refiere el artículo 11. |

La DPCD reconoce la importancia de los mecanismos de autorregulación y aclara la función que los responsables de códigos y los organismos autorreguladores pueden desempeñar en la aplicación. Los Estados miembros podrán alentar a los responsables de códigos a que controlen las prácticas comerciales desleales, además de aplicar la DPCD.

Si las normas incluidas en los códigos de autorregulación son aplicadas de forma estricta y rigurosa por los responsables de códigos o ejecutadas de manera enérgica por organismos autorreguladores independientes, pueden reducir en efecto la necesidad de tomar medidas administrativas o judiciales de ejecución. Además, cuando los estándares son elevados y los operadores del sector los cumplen con creces, estas normas pueden constituir un punto de referencia útil para las autoridades y órganos jurisdiccionales nacionales a la hora de apreciar el carácter desleal de una determinada práctica comercial.

La DPCD contiene varias disposiciones que impiden que los comerciantes se aprovechen indebidamente de la confianza que los consumidores puedan tener en los códigos de autorregulación. Este aspecto se aborda en el punto 2.8.4, relativa al incumplimiento de los códigos de conducta.

1.4.   Aplicación y medios de reparación

1.4.1.   Aplicación pública y aplicación privada

Con arreglo al artículo 11 de la DPCD, los Estados miembros han de velar por que existan medios adecuados y eficaces para luchar contra las prácticas comerciales desleales, con miras al cumplimiento de las disposiciones de la Directiva en interés de los consumidores.

Estos medios incluyen disposiciones legales en virtud de las cuales las personas o las organizaciones que tengan, con arreglo a la legislación nacional, un interés legítimo en combatir las prácticas comerciales desleales, incluidos los competidores, puedan proceder judicialmente contra tales prácticas ante los órganos jurisdiccionales nacionales o someterlas a un órgano administrativo competente, bien para que se pronuncie sobre las reclamaciones, bien para que entable las acciones judiciales pertinentes.

Los Estados miembros deben asegurar la coordinación de buena fe entre las diferentes autoridades públicas encargadas de aplicar la legislación. En aquellos Estados miembros donde las autoridades responsables de aplicar la DPCD y la legislación sectorial sean distintas, conviene establecer una estrecha cooperación entre ellas al objeto de garantizar que las conclusiones de sus respectivas investigaciones sobre un mismo comerciante o una misma práctica comercial sean coherentes.

En lo concerniente a la aplicación de la DPCD a través de procedimientos judiciales ante los órganos jurisdiccionales nacionales, el Tribunal de Justicia confirmó en el asunto Movic que el artículo 1, apartado 1, de la versión refundida del Reglamento Bruselas I «debe interpretarse en el sentido de que está comprendida en el concepto de “materia civil y mercantil”, que figura en dicho precepto, una acción ejercitada por las autoridades de un Estado miembro contra profesionales establecidos en otro Estado miembro mediante la cual dichas autoridades solicitan, con carácter principal, que se declare la existencia de infracciones consistentes en prácticas comerciales desleales supuestamente ilegales y que se ordene su cesación, así como, con carácter accesorio, que se ordenen medidas de publicidad y se imponga una multa coercitiva» [(105)](#ntr105-C_2021526ES.01000101-E0105).

En el ámbito de la aplicación privada, la Directiva (UE) 2020/1828 del Parlamento Europeo y del Consejo [(106)](#ntr106-C_2021526ES.01000101-E0106) relativa a las acciones de representación para la protección de los intereses colectivos de los consumidores introdujo en todos los Estados miembros la posibilidad de aplicar la DPCD mediante acciones de representación. Tales acciones podrían ser ejercidas por las entidades habilitadas para solicitar tanto medidas de cesación como medidas resarcitorias en nombre de los consumidores afectados.

Por último, las personas que denuncien infracciones de la DPCD (y de la DDC) están cubiertas por el régimen de protección de la Directiva (UE) 2019/1937 del Parlamento Europeo y del Consejo [(107)](#ntr107-C_2021526ES.01000101-E0107) («Directiva sobre denunciantes»), de conformidad con su artículo 2, apartado 1, letra a), inciso ix). Al sentir seguridad para hablar sin reservas, es probable que aumente el número de denuncias de infracciones presentadas, lo que mejorará la aplicación de la DPCD.

1.4.2.   Sanciones

El artículo 13 de la DPCD trata de las sanciones por incumplimiento de las disposiciones nacionales por las que se transponga la Directiva. El apartado 1 exige a los Estados miembros que establezcan el régimen de sanciones aplicables a cualquier infracción de las disposiciones nacionales adoptadas al amparo de la Directiva. Corresponde a los Estados miembros decidir el tipo de sanciones disponibles y determinar los procedimientos para su imposición, siempre que sean efectivas, proporcionadas y disuasorias.

La Directiva (UE) 2019/2161 modificó el artículo 13 y añadió una serie de requisitos adicionales. En primer lugar, proporciona una lista indicativa no exhaustiva de criterios para la aplicación de las sanciones (apartado 2). En segundo lugar, dispone normas más específicas (apartados 3 y 4) acerca de las multas por infracciones generalizadas e infracciones generalizadas con dimensión en la Unión que son objeto de medidas de ejecución coordinadas en virtud del Reglamento (UE) 2017/2394 del Parlamento Europeo y del Consejo [(108)](#ntr108-C_2021526ES.01000101-E0108) sobre la cooperación en materia de protección de los consumidores («Reglamento CPC»).

El considerando 15 de la Directiva (UE) 2019/2161 anima a los Estados miembros a «considerar reforzar la salvaguardia del interés general de los consumidores, así como de otros intereses públicos protegidos» a la hora de asignar los ingresos derivados de las multas.

El artículo 13, apartado 5, obliga a los Estados miembros a comunicar a la Comisión el régimen sancionador establecido y toda modificación posterior, a saber, mediante una notificación específica en la que se expliquen las disposiciones nacionales exactas de que se trate y no solo como parte de la notificación general de las medidas de transposición.

Criterios para la aplicación de sanciones

El artículo 13, apartado 2, establece una lista de seis criterios no exhaustivos e indicativos que las autoridades y órganos jurisdiccionales competentes de los Estados miembros han de tener en cuenta al imponer las sanciones. Se aplican «cuando proceda» a las infracciones, tanto a escala nacional como en situaciones de carácter transfronterizo:

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| Artículo 13   |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 2. | Los Estados miembros velarán por que se tengan debidamente en cuenta los siguientes criterios no exhaustivos e indicativos para la imposición de sanciones, cuando proceda: |  |  |  | | --- | --- | | a) | la naturaleza, gravedad, escala y duración de la infracción; |  |  |  | | --- | --- | | b) | las acciones emprendidas por el comerciante para mitigar o corregir los daños y perjuicios sufridos por los consumidores; |  |  |  | | --- | --- | | c) | toda infracción anterior del comerciante; |  |  |  | | --- | --- | | d) | los beneficios económicos obtenidos o las pérdidas evitadas por el comerciante debido a la infracción, si los datos pertinentes están disponibles; |  |  |  | | --- | --- | | e) | las sanciones impuestas al comerciante por la misma infracción en otros Estados miembros en casos transfronterizos cuando la información sobre tales sanciones esté disponible a través del mecanismo establecido por el Reglamento (UE) 2017/2394 del Parlamento Europeo y del Consejo; |  |  |  | | --- | --- | | f) | cualquier otro factor agravante o atenuante aplicable a las circunstancias del caso. | |

En el considerando 7 de la Directiva (UE) 2019/2161 se explican algunos de los criterios. El considerando 8 aclara que «podrían no ser relevantes para decidir sobre las sanciones en relación con todas las infracciones, y en particular en relación con las infracciones menos graves». Además, «[l]os Estados miembros deben tener en cuenta asimismo otros principios generales del Derecho aplicables a la imposición de sanciones, como el de non bis in idem».

El carácter intencionado de la infracción es pertinente para la aplicación de los criterios establecidos en las letras a) y f). Sin embargo, la intención no constituye una condición necesaria para la imposición de sanciones en caso de infracción.

El criterio establecido en la letra c) abarca las infracciones pertinentes de la DPCD cometidas anteriormente por el comerciante, ya sean reiteradas o diferentes.

El criterio previsto en la letra e) se refiere a los casos en que se ha cometido la misma infracción en varios Estados miembros. Solo se aplica cuando la información sobre las sanciones impuestas por la misma infracción en otros Estados miembros esté disponible a través del mecanismo de cooperación establecido por el Reglamento CPC.

En función de las circunstancias de cada caso, las sanciones impuestas al mismo comerciante por la misma infracción en otro u otros Estados miembros podrían ser un indicio de una mayor escala y gravedad en virtud de la letra a) o considerarse una «infracción anterior» con arreglo a la letra c). Por consiguiente, las sanciones impuestas por la misma infracción en otros Estados miembros podrían constituir un factor agravante. A la hora de imponer sanciones por la misma infracción en otros Estados miembros también podrían tenerse en cuenta otras circunstancias «agravantes» contempladas por los demás criterios a que se refiere la letra f), que alude en términos generales a «cualquier otro factor agravante o atenuante». No obstante, la imposición de una sanción al mismo comerciante por la misma infracción en otro Estado miembro puede asimismo resultar pertinente para la aplicación del principio non bis in idem de conformidad con el Derecho nacional y con el artículo 10, apartado 2, del Reglamento CPC [(109)](#ntr109-C_2021526ES.01000101-E0109).

Sanciones en el contexto de las medidas de ejecución coordinadas en virtud del Reglamento CPC

El artículo 13, apartados 3 y 4, establece normas adicionales más prescriptivas (en comparación con la norma general dispuesta en el apartado 1) relativas a las sanciones que la legislación nacional debe prever para las infracciones que sean objeto de acciones coordinadas en virtud del Reglamento CPC.

El artículo 21 del Reglamento CPC exige a las autoridades competentes de los Estados miembros afectadas por la acción coordinada que tomen medidas de ejecución, incluida la imposición de sanciones, de un modo efectivo, eficiente y coordinado contra el comerciante responsable de la infracción generalizada o la infracción generalizada con dimensión en la Unión. Las «infracciones generalizadas» y las «infracciones generalizadas con dimensión en la Unión» son infracciones transfronterizas que se definen en el artículo 3, puntos 3 y 4, del Reglamento CPC [(110)](#ntr110-C_2021526ES.01000101-E0110).

Con respecto a esta categoría de infracciones, el artículo 13, apartado 3, de la DPCD exige a los Estados miembros que prevean la posibilidad de imponer multas cuyo importe máximo equivaldrá al menos al 4 % del volumen de negocio anual del comerciante. En consecuencia, los Estados miembros pueden fijar asimismo el umbral de la multa máxima por encima del 4 % del volumen de negocio anual del comerciante. También pueden optar por basar la multa en un volumen de negocio de referencia más elevado, como el volumen de negocio mundial del comerciante. Del mismo modo, pueden ampliar a otros tipos de infracciones, como las nacionales, las sanciones aplicables en caso de iniciarse acciones coordinadas en virtud del Reglamento CPC.

En aquellos supuestos en que no se disponga de información sobre el volumen de negocio anual del comerciante, por ejemplo, en el caso de las empresas de reciente creación, el artículo 13, apartado 4, exige a los Estados miembros que introduzcan la posibilidad de imponer multas cuyo importe máximo equivalga al menos a 2 millones EUR. De nuevo, los Estados miembros pueden fijar asimismo el umbral de la multa máxima por encima de dicha cifra.

Esta armonización de las normas nacionales relativas a las multas tiene por objeto garantizar la viabilidad y coherencia de las medidas de ejecución en todos los Estados miembros que participen en una acción de ejecución coordinada en virtud del Reglamento CPC.

La imposición de multas de conformidad con el artículo 13, apartados 3 y 4, de la DPCD está sujeta a los criterios comunes establecidos en el artículo 13, apartado 2, que incluyen, en particular, la naturaleza, gravedad y duración o los efectos temporales de la infracción. La multa efectiva impuesta por la autoridad o el órgano jurisdiccional competentes en un caso concreto puede ser inferior a los importes máximos antes descritos, en función de la naturaleza, gravedad y otras características pertinentes de la infracción.

Sin perjuicio de las obligaciones de coordinación previstas en el Reglamento CPC, la autoridad o el órgano jurisdiccional competentes pueden decidir imponer multas coercitivas (como multas diarias) hasta que el comerciante ponga fin a la infracción. También podrían decidir imponer la multa de forma condicional si el comerciante no pone fin a la infracción dentro del plazo establecido a pesar del requerimiento cursado a tal efecto.

El volumen de negocio pertinente que debe tenerse en cuenta a efectos del cálculo de la multa es el realizado en el Estado miembro que la imponga. Sin embargo, el artículo 13, apartado 3, también permite determinar la multa sobre la base del volumen de negocio realizado por el comerciante en todos los Estados miembros afectados por la acción coordinada si la coordinación en virtud del Reglamento CPC da lugar a la imposición de la multa por un único Estado miembro en nombre de los Estados miembros participantes.

El considerando 10 de la Directiva (UE) 2019/2161 aclara que «[e]n determinados casos, el comerciante también puede ser un grupo de empresas». Por consiguiente, cuando el comerciante responsable de la infracción sea un grupo de empresas, a efectos del cálculo de la multa se tendrá en cuenta el volumen de negocio combinado del grupo en los Estados miembros pertinentes.

Dado que la Directiva no especifica el año de referencia para la definición del volumen de negocio anual, a la hora de establecer la multa, las autoridades nacionales pueden utilizar, por ejemplo, los últimos datos disponibles sobre el volumen de negocio anual en el momento de adoptar la decisión sobre la sanción (es decir, el ejercicio económico anterior).

Con arreglo al artículo 13, apartado 3, por motivos constitucionales nacionales, los Estados miembros podrán restringir la imposición de multas a: a) infracciones de los artículos 6, 7, 8 y 9 y del anexo I de la Directiva, y b) el uso continuado por parte de un comerciante de una práctica comercial considerada desleal por la autoridad nacional u órgano jurisdiccional competente cuando esa práctica comercial no sea una infracción contemplada en la letra a). Así pues, esta restricción tiene por objeto abordar circunstancias de carácter excepcional y permite a los Estados miembros no aplicar las disposiciones relativas a las multas a aquellas infracciones puntuales sujetas a una acción de ejecución coordinada en virtud del Reglamento CPC cuya única base jurídica sea el artículo 5 de la DPCD sobre la diligencia profesional.

1.4.3.   Medios de reparación a disposición de los consumidores

La Directiva (UE) 2019/2161 añadió a la DPCD un nuevo artículo 11 bis que exige a los Estados miembros que velen por que los consumidores perjudicados por las infracciones de la DPCD tengan acceso a medidas correctoras proporcionadas y eficaces, en particular una indemnización por los daños y perjuicios sufridos y, cuando proceda, una reducción del precio o la resolución del contrato, con arreglo a las condiciones establecidas a nivel nacional. Por consiguiente, los medios de reparación a disposición de los consumidores en virtud de la DPCD comprenden medidas correctoras contractuales y no contractuales.

Corresponde a los Estados miembros determinar las condiciones de aplicación de las medidas correctoras, que podrían incluir, cuando proceda, factores tales como la gravedad y la naturaleza de la práctica comercial desleal, los daños y perjuicios sufridos por el consumidor y otras circunstancias pertinentes. Los Estados miembros también se encargan de determinar los efectos concretos de las medidas correctoras, como si la resolución del contrato conlleva la nulidad ab initio del mismo (con la obligación de que ambas partes vuelvan a la situación anterior al contrato) o únicamente la supresión de sus efectos futuros, siempre que se respeten los principios de adecuación y efectividad y se salvaguarde el efecto útil de la Directiva.

Estas medidas correctoras se entienden sin perjuicio de las vías de recurso disponibles en otros instrumentos jurídicos de la UE, como la Directiva (UE) 2019/770 del Parlamento Europeo y del Consejo sobre contenidos digitales [(111)](#ntr111-C_2021526ES.01000101-E0111) y la Directiva (UE) 2019/771 del Parlamento Europeo y del Consejo sobre la compraventa de bienes [(112)](#ntr112-C_2021526ES.01000101-E0112). Tales medidas podrían solicitarse asimismo de forma colectiva a través de acciones de representación en virtud de la Directiva (UE) 2020/1828.

1.4.4.   Aplicación de la DPCD a los comerciantes establecidos en terceros países

La aplicabilidad de la DPCD a los comerciantes no pertenecientes a la UE se rige por el Reglamento (CE) n.o 864/2007 del Parlamento Europeo y del Consejo [(113)](#ntr113-C_2021526ES.01000101-E0113) relativo a la ley aplicable a las obligaciones extracontractuales («Roma II»). Este Reglamento se aplica «a las obligaciones extracontractuales en materia civil y mercantil, en las situaciones que comportan un conflicto de leyes». El Reglamento Roma II es aplicable en litigios civiles o mercantiles.

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| Artículo 6, apartado 1, del Reglamento Roma II:  La ley aplicable a una obligación extracontractual que se derive de un acto de competencia desleal será la ley del país en cuyo territorio las relaciones de competencia o los intereses colectivos de los consumidores resulten o puedan resultar afectados. |

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| Artículo 6, apartado 4, del Reglamento Roma II:  La ley aplicable con arreglo al presente artículo no podrá excluirse mediante un acuerdo adoptado en virtud del artículo 14. |

Cuando se cumplan las condiciones previstas en el artículo 6, apartado 1, del Reglamento Roma II, por ejemplo, si se dirige a los consumidores de la UE publicidad engañosa y ello perjudica a los intereses colectivos de dichos consumidores, será aplicable la DPCD. De conformidad con el artículo 6, apartado 4, del Reglamento Roma II, la ley aplicable no podrá excluirse mediante un acuerdo sobre la elección de la ley aplicable.

2.   PRINCIPALES CONCEPTOS DE LA DPCD

2.1.   Funcionamiento de la DPCD: organigrama de la Directiva

El siguiente organigrama ilustra la relación entre la «lista negra» de prácticas comerciales del anexo I y las cláusulas generales de la DPCD, a saber, los artículos 6 a 9 y el artículo 5, respectivamente. Para ser considerada desleal y, por tanto, quedar prohibida por la DPCD, basta que una práctica comercial corresponda a uno de los siguientes supuestos.

La práctica comercial…

![Image 1](./../../../resource.html?uri=uriserv:OJ.C_.2021.526.01.0001.01.SPA.xhtml.C_2021526ES.01002601.tif.jpg)

2.2.   Concepto de comerciante

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| Artículo 2, letra b)  «comerciante»: cualquier persona física o jurídica que, en las prácticas comerciales contempladas por la presente Directiva, actúe con un propósito relacionado con su actividad económica, negocio, oficio o profesión, así como cualquiera que actúe en nombre del comerciante o por cuenta de este; |

Esta definición no solo abarca a los comerciantes que actúan por cuenta propia, sino también a las personas, incluidos los consumidores, que actúan «en nombre» o «por cuenta» de otro comerciante.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional estimó que una sociedad que publicaba anuncios en los medios de comunicación en representación y beneficio de otra sociedad, que era el prestador de servicios, se consideraba un comerciante en el sentido de las disposiciones nacionales de transposición de la DPCD [(114)](#ntr114-C_2021526ES.01000101-E0114). |  |  |  | | --- | --- | | — | Las autoridades nacionales de protección de los consumidores llevaron a cabo, a través de la red europea de cooperación para la protección de los consumidores («red CPC»), una acción conjunta de vigilancia de los juegos en línea que ofrecen compras desde aplicaciones. Aclararon que, aunque la responsabilidad por el contenido de una aplicación corresponde en primera instancia a su desarrollador, los proveedores de las tiendas de aplicaciones también se podrían considerar responsables de que los juegos de sus plataformas no contengan una exhortación directa a los niños [(115)](#ntr115-C_2021526ES.01000101-E0115). | |

Por lo tanto, en virtud del artículo 2, letra b), leído en relación con la legislación nacional pertinente en materia de responsabilidad y sanciones, un comerciante puede ser considerado solidariamente responsable con otro comerciante de las infracciones de la DPCD cometidas por este en su nombre.

Asimismo, el Tribunal de Justicia ha precisado que, en una situación en que las prácticas comerciales de un operador sean llevadas a cabo por otra empresa, que actúe en nombre o por cuenta de ese operador, la DPCD podría, en determinados supuestos, ser oponible tanto a dicho operador como a la citada empresa cuando ambos respondan a la definición de «comerciante» [(116)](#ntr116-C_2021526ES.01000101-E0116). Esto significa que la Directiva puede utilizarse para examinar también las prácticas comerciales de los comerciantes cuando estas están directamente relacionadas con la transacción de un consumidor con otro comerciante en cuyo nombre o por cuenta del cual actúa dicho comerciante.

Puede haber situaciones en las que particulares que parecen ser consumidores que venden productos a otros consumidores sean en realidad comerciantes o personas que actúan en nombre de comerciantes («ventas encubiertas B2C»).

A fin de determinar si un vendedor puede considerarse un «comerciante» o un consumidor se ha de llevar a cabo una evaluación caso por caso. En el asunto Kamenova, una persona había publicado en un sitio de internet un total de ocho anuncios de venta de diversos bienes nuevos y usados [(117)](#ntr117-C_2021526ES.01000101-E0117). El Tribunal de Justicia señaló que el mero hecho de que con la venta se persiga una finalidad lucrativa o de que una persona física publique simultáneamente en una plataforma en línea una serie de anuncios en los que ofrece a la venta bienes nuevos y usados, no basta, por sí mismo, para calificar a dicha persona de «comerciante». La determinación de la condición de la persona por parte del órgano jurisdiccional nacional debe tener en cuenta diferentes criterios no taxativos ni exclusivos.

Entre dichos criterios figuran los siguientes:

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| — | si el vendedor tiene una motivación con fines de lucro, incluido el hecho de que pudiera haber percibido una retribución u otra compensación por actuar en nombre de un determinado comerciante; |

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| — | el número, importe y frecuencia de las transacciones; |

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| — | el volumen de negocio del vendedor; si el vendedor compra productos con intención de revenderlos; |

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| — | si el vendedor está sujeto al IVA; |

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| — | si la venta se ha efectuado de forma planificada; |

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| — | si el vendedor posee un estatuto jurídico que le permite realizar actos de comercio; |

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| — | si los bienes en venta son todos del mismo tipo o del mismo valor, en particular, si la oferta se concentra en un número limitado de bienes; |

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| — | si el vendedor dispone de información y competencias técnicas relativas a los productos de las que el consumidor no dispone necesariamente, de manera que lo coloca en una situación más ventajosa con respecto a dicho consumidor; |

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| — | si el vendedor ha comprado estos bienes con intención de revenderlos, confiriendo de este modo a dicha actividad un carácter regular, una frecuencia o una simultaneidad con respecto a su actividad comercial o profesional habitual [(118)](#ntr118-C_2021526ES.01000101-E0118). |

Por ejemplo, las personas cuya principal actividad consiste en vender en línea con mucha frecuencia productos que han comprado con objeto de revenderlos a un precio mayor podrían entrar en la definición de comerciante.

Las personas que realizan actividades de apoyo comercial en línea, como la comercialización por medio de influentes (para más información, véase el punto 4.2.6), podrían considerarse comerciantes si realizan tales prácticas con frecuencia, independientemente de su número de seguidores. Por otro lado, en caso de que las personas en cuestión no reúnan las condiciones para ser calificadas de comerciantes, cabría considerar, no obstante, que actúan «por cuenta» del comerciante cuyos productos sean promocionados por la práctica ejercida y, por tanto, entran en el ámbito de aplicación de la Directiva. La obligación de claridad de las comunicaciones comerciales, en particular en virtud del artículo 7, apartado 2, de la DPCD, se aplica a los comerciantes con independencia de que sean o no los proveedores de los productos.

Las organizaciones que persiguen objetivos éticos o caritativos se pueden considerar comerciantes con arreglo a la DPCD cuando participan en actividades comerciales (por ejemplo, la venta de productos que cumplan determinadas normas éticas) dirigidas a los consumidores. Cuando actúen como comerciantes, deberán ajustarse a la DPCD en lo que respecta a sus actividades comerciales. Por ejemplo, la información sobre el origen o los aspectos éticos del producto no debe ser engañosa.

El hecho de que una organización esté estructurada como «sin ánimo de lucro» no resulta determinante a la hora de apreciar su condición de comerciante.

Lo mismo se aplica a las autoridades públicas, que, en función de las circunstancias, también pueden considerarse comerciantes cuando realizan actividades comerciales.

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| Por ejemplo:  Un municipio que comercializa billetes con descuento para una exposición de arte que está organizando podría entrar en la definición de comerciante prevista en la DPCD. |

En el asunto BKK Mobil Oil, el Tribunal de Justicia confirmó que un organismo de Derecho público que tiene encomendada una misión de interés general, como la gestión de un régimen legal de seguro de enfermedad, puede ser calificado de «comerciante», pues

«el legislador de la Unión consagró una noción particularmente amplia del concepto de “comerciante”, que designa a “cualquier persona física o jurídica” siempre que ejerza una actividad remunerada y no excluye de su ámbito de aplicación ni a las entidades que cumplen una misión de interés general ni a las que están sujetas a un régimen de Derecho público» [(119)](#ntr119-C_2021526ES.01000101-E0119).

El Tribunal de Justicia también llegó a la siguiente conclusión:

«[…] [L]os afiliados de BKK, a los que evidentemente debe considerarse consumidores en el sentido de la Directiva sobre las prácticas comerciales desleales, pueden ser inducidos a error por la información engañosa divulgada por dicho organismo, impidiéndoles elegir con conocimiento de causa […] y llevándoles así a tomar una decisión que de no mediar tal información no habrían tomado, como prevé el artículo 6, apartado 1, de la propia Directiva. En este contexto, el carácter público o privado del organismo de que se trate y la misión específica que persiga son irrelevantes» [(120)](#ntr120-C_2021526ES.01000101-E0120).

En particular, en virtud del punto 22 del anexo I de la DPCD (la «lista negra»), se prohíbe afirmar de forma fraudulenta o crear la impresión falsa de que un comerciante no actúa a los fines propios de su actividad comercial, industrial, artesanal o profesional, o presentarse de forma fraudulenta como un consumidor.

Esto incluye la situación en la que un comerciante actúa inicialmente como comerciante, pero luego finge ser un consumidor, por ejemplo, cuando el vendedor se presenta como concesionario de automóviles a efectos de la transacción, pero posteriormente firma el contrato como persona física.

2.3.   Concepto de práctica comercial

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| Artículo 2, letra d)  «prácticas comerciales de las empresas en sus relaciones con los consumidores» […]: todo acto, omisión, conducta o manifestación, o comunicación comercial, incluidas la publicidad y la comercialización, procedente de un comerciante y directamente relacionado con la promoción, la venta o el suministro de un producto a los consumidores; |

El Tribunal de Justicia declaró que el único criterio contenido en el artículo 2, letra d), de la DPCD se basa en que la práctica del comerciante debe estar directamente vinculada con la promoción, la venta o el suministro de un bien o de un servicio al consumidor [(121)](#ntr121-C_2021526ES.01000101-E0121).

Una práctica comercial puede estar «directamente relacionada» con la promoción de un producto, por ejemplo, al ofrecer «información relativa a la disponibilidad de un producto a un precio ventajoso durante un período concreto» [(122)](#ntr122-C_2021526ES.01000101-E0122). Sobre la base de la jurisprudencia actualmente disponible, es difícil delimitar cuándo una práctica comercial ya no estaría «directamente relacionada» con la promoción de un producto. No obstante, a modo de ejemplo, cuando un comerciante vende un callejero que no contiene mensajes promocionales y posteriormente el consumidor utiliza ese callejero para averiguar cómo llegar a un determinado establecimiento, no parece razonable considerar la venta del callejero como una práctica comercial «directamente relacionada» con la promoción de un producto de este establecimiento concreto.

El Tribunal de Justicia declaró que la DPCD engloba las actividades del comerciante consecutivas a una transacción comercial en relación con cualquier bien o servicio, así como tras la celebración de un contrato y durante la ejecución de este [(123)](#ntr123-C_2021526ES.01000101-E0123).

Sobre esta base, el Tribunal de Justicia concluyó:

«[…] [L]a circunstancia de que la actuación del comerciante de que se trata sólo se produjese una única vez y afectase a un solo consumidor carece de toda pertinencia en este contexto.

En realidad, ni las definiciones dadas en el artículo 2, letras c) y d), en el artículo 3, apartado 1, y en el artículo 6, apartado 1, de la Directiva sobre las prácticas comerciales desleales ni la propia Directiva considerada en su conjunto contienen indicios que apunten a que la acción u omisión por parte del comerciante haya de revestir un carácter repetido o deba afectar a más de un consumidor.

[…] [L]a comunicación de una información errónea, como la controvertida en el litigio principal, por parte de un comerciante a un consumidor debe calificarse de “práctica comercial engañosa” en el sentido de dicha Directiva, aun cuando esa comunicación no haya afectado más que a un único consumidor» [(124)](#ntr124-C_2021526ES.01000101-E0124).

En el asunto Kirschstein, el Tribunal de Justicia proporcionó orientaciones sobre los límites del ámbito de aplicación de la DPCD en relación con el concepto de prácticas comerciales. Sostuvo que existe una diferencia entre las «prácticas comerciales» del comerciante que están estrechamente vinculadas a la promoción, la venta o el suministro de productos a los consumidores, de modo que entran en el ámbito de aplicación de la Directiva, y las normas a las que se remiten dichas prácticas, que se refieren al propio «producto» (por ejemplo, la autorización de prestadores de servicios para que puedan expedir títulos universitarios) y que, por tanto, quedan fuera del ámbito de aplicación de la DPCD.

«De lo anterior se desprende que no puede considerarse que una norma nacional que pretende determinar el operador autorizado para prestar un servicio objeto de una operación comercial, sin regular directamente las prácticas que ese operador puede llevar a cabo después para promover o vender dicho servicio, guarde relación con una práctica comercial directamente relacionada con la prestación de dicho servicio, en el sentido de la Directiva 2005/29» [(125)](#ntr125-C_2021526ES.01000101-E0125).

Por lo que respecta al ámbito de la publicidad en medios impresos, si bien el Tribunal de Justicia reconoció la formulación especialmente amplia de la definición de «prácticas comerciales» y que la DPCD puede aplicarse en una situación en que las prácticas comerciales de un operador sean llevadas a cabo por otra empresa, en el asunto RLvS falló que la DPCD, y en particular el punto 11 de su anexo I relativo a los publirreportajes, no puede invocarse frente a los editores de prensa [(126)](#ntr126-C_2021526ES.01000101-E0126). El Tribunal de Justicia aludió a la falta de normativa derivada de la Unión en lo referente a la prensa escrita y explicó que esta disposición no estaba destinada, como tal, a imponer a los editores de prensa la obligación de impedir las posibles prácticas comerciales desleales de los anunciantes [(127)](#ntr127-C_2021526ES.01000101-E0127).

Los comerciantes también deben ser prudentes a la hora de formular declaraciones éticas y de responsabilidad social de las empresas, que pueden abarcar diversos aspectos de los métodos operativos de los comerciantes, por ejemplo, por lo que respecta a las condiciones de trabajo, el bienestar animal, las donaciones benéficas, etc. La responsabilidad social de las empresas se refiere a las empresas que se responsabilizan de su impacto en la sociedad mediante la creación de un proceso destinado a integrar las preocupaciones sociales, medioambientales, éticas y de los consumidores en sus actividades empresariales y su estrategia básica.

Las declaraciones relativas a dichos aspectos se han convertido en una herramienta de mercadotecnia utilizada para dar respuesta a la creciente preocupación de los consumidores en relación con el cumplimiento de las normas éticas y sociales por parte de los comerciantes, y pueden influir en la decisión sobre una transacción de un consumidor que tenga que elegir entre dos productos competidores de calidad y precio similares. Por este motivo, se puede considerar que están «directamente relacionad[as] con la promoción, la venta o el suministro de un producto» y, por lo tanto, cumplen las condiciones para ser calificadas de prácticas comerciales en el sentido de la DPCD. Habida cuenta de las grandes similitudes existentes entre las declaraciones éticas o de responsabilidad social de las empresas y las declaraciones medioambientales, los principios fundamentales que se aplican a las declaraciones medioambientales también pueden aplicarse a las declaraciones éticas y de responsabilidad social de las empresas (véase el punto 4.1).

2.3.1.   Prácticas posventa, incluidas las actividades de cobro de deudas

En virtud del artículo 3, apartado 1, las prácticas comerciales no solo se producen durante las fases de comercialización y suministro, sino también después de que se haya efectuado la transacción (fase posventa). Estas prácticas posventa pueden quedar comprendidas en el ámbito de aplicación de la DPCD.

Por otra parte, el considerando 13 de la DPCD alude asimismo a las «prácticas comerciales desleales que se produzcan fuera de cualesquiera relaciones contractuales existentes entre un comerciante y un consumidor o tras la celebración de un contrato y durante su ejecución».

Las actividades de cobro de deudas se deben considerar prácticas comerciales posventa, pues el cobro de deudas está directamente relacionado con la venta o el suministro de productos. No existen razones objetivas para diferenciar dicha evaluación basándose en el hecho de que un comerciante la externalice o no por medio de agencias especializadas.

Esto también se desprende del punto 25 del anexo I, que considera desleal en cualquier circunstancia la práctica de «[r]ealizar visitas en persona al domicilio del consumidor, ignorando las peticiones de este de que el comerciante abandone su casa o no vuelva a personarse en ella, salvo en las circunstancias y en la medida en que esté justificado, con arreglo a la legislación nacional, para hacer cumplir una obligación contractual».

El Tribunal de Justicia confirmó en el asunto Gelvora que la relación jurídica entre una agencia de gestión de cobro y el deudor incumplidor de un contrato de crédito al consumo cuya deuda ha sido cedida a esta sociedad está incluida en el ámbito de aplicación material de la Directiva [(128)](#ntr128-C_2021526ES.01000101-E0128).

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional declaró que informar a un consumidor que no cumple sus obligaciones financieras de que su nombre se publicará como moroso en los medios de comunicación locales constituye una práctica comercial agresiva [(129)](#ntr129-C_2021526ES.01000101-E0129). |  |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad de protección de los consumidores denunció a un cobrador de deudas que utilizaba un logotipo, un nombre y documentos similares a los de los organismos oficiales. El comerciante dio a los consumidores la impresión errónea de que estaba ejecutando una orden judicial oficial para obligarlos a pagar sus deudas, cuando en realidad dichas competencias están reservadas a las autoridades públicas [(130)](#ntr130-C_2021526ES.01000101-E0130). |  |  |  | | --- | --- | | — | Otra autoridad de protección de los consumidores consideró que el cobro de deudas es una práctica comercial posventa que entra en el ámbito de aplicación de la DPCD y multó a una agencia de cobro de deudas por inducir a engaño a los consumidores deudores sobre el alcance y la gravedad de las consecuencias negativas a las que se enfrentarían en caso de no liquidar sus deudas inmediatamente. La agencia de gestión de cobro también omitió informar adecuadamente a los consumidores sobre el fundamento contractual exacto de la deuda y ejerció en ellos una presión psicológica indebida [(131)](#ntr131-C_2021526ES.01000101-E0131). | |

2.3.2.   Comerciantes que compran productos a consumidores

Es posible que algunos comerciantes, en el ejercicio de su actividad profesional, compren productos a consumidores. Ejemplos de ello son los concesionarios de automóviles, los anticuarios y los vendedores de bienes de segunda mano.

Según la definición incluida en la DPCD, las prácticas comerciales solo incluyen las «directamente relacionad[as] con la promoción, la venta o el suministro de un producto a los consumidores». La situación inversa, en la que los comerciantes compran productos a los consumidores, no está comprendida en el ámbito de aplicación de la DPCD. No obstante, hay casos en los que puede establecerse un vínculo entre la venta de un producto por el consumidor al comerciante y la promoción, venta o suministro de un producto (diferente) al consumidor.

Por ejemplo, los acuerdos de permuta son habituales en el sector comercial del automóvil. El comerciante compra un vehículo usado al consumidor, quien, a su vez, compra un vehículo al comerciante. En tales casos, la compra realizada por el comerciante se podría considerar parte de la remuneración dada por el consumidor por la parte de la transacción que tiene lugar entre la empresa y el consumidor. Los acuerdos de permuta entran claramente dentro del ámbito de aplicación de la DPCD.

La compra y reventa de oro podría entrar en el ámbito de aplicación de la DPCD en algunos casos. Por ejemplo, cabría considerar que un comerciante que ofrece a los consumidores una tasación profesional de su oro antes de comprarlo presta un servicio a los consumidores. Cuando este sea el caso, la DPCD será de aplicación y, por tanto, el comerciante no deberá proporcionar información engañosa sobre el verdadero valor del oro o sobre el precio de los servicios ofrecidos (por ejemplo, omisión de «tasas administrativas»).

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| Por ejemplo:  Un comerciante experto en cerámica china le dice a un consumidor que un jarrón de la dinastía Ming es falso. Si no lo es, esta declaración constituiría probablemente una acción engañosa. |

2.4.   Criterio de la decisión sobre una transacción

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| Artículo 2, letra k)  «decisión sobre una transacción»: toda decisión por la que un consumidor opta por comprar o no un producto y resuelve de qué manera y en qué condiciones efectúa la compra, si realiza un pago íntegro o parcial, si conserva un producto o se deshace de él y si ejerce un derecho contractual en relación con dicho producto, tanto si el consumidor opta por actuar como por abstenerse de actuar; |

Las disposiciones generales de la DPCD (artículos 5 a 9) abarcan las prácticas comerciales desleales, engañosas y agresivas que puedan distorsionar el comportamiento económico de los consumidores, de manera que les haga o pueda hacerles tomar una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubieran tomado.

La redacción del artículo 2, letra k), sugiere que la definición debe interpretarse en sentido amplio y que el concepto de «decisión sobre una transacción» debe englobar una amplia gama de decisiones tomadas por el consumidor en relación con un producto.

El Tribunal de Justicia declaró que la «decisión sobre una transacción» incluye no solo la decisión de adquirir o no un producto, sino también las decisiones que presentan un vínculo directo con esta, en particular, la de entrar en la tienda:

«En efecto, en la medida en que, en el asunto principal, la práctica comercial se refiere a información relativa a la disponibilidad de un producto a un precio ventajoso durante un período concreto, procede determinar si puede considerarse que unos actos preparatorios de la eventual compra de un producto, como el desplazamiento del consumidor al punto de venta o el hecho de entrar en este, constituyen decisiones sobre una transacción en el sentido de la mencionada Directiva.

[…] [E]s una decisión sobre una transacción “toda decisión por la que un consumidor opta por comprar o no un producto y resuelve de qué manera y en qué condiciones efectúa la compra”. Por tanto, dicho concepto incluye no solo la decisión de adquirir o no un producto, sino también la que presenta un vínculo directo con esta, en particular, la de entrar en la tienda.

[…] El artículo 2, letra k), de dicha Directiva debe interpretarse en el sentido de que está comprendida en el concepto de “decisión sobre una transacción” toda decisión relacionada directamente con la de adquirir o no un producto» [(132)](#ntr132-C_2021526ES.01000101-E0132).

En este sentido, el concepto de decisión sobre una transacción abarca también las decisiones previas y posteriores a la compra.

Existe una amplia gama de decisiones sobre una transacción que un consumidor puede tomar en relación con un producto o servicio distintas de la decisión de comprar o no.

Estas decisiones sobre una transacción pueden dar lugar a acciones que carecen de consecuencias jurídicas con arreglo al Derecho contractual nacional y pueden tomarse en cualquier momento entre la primera vez que el consumidor se ve expuesto a la comercialización y el final de la duración del producto o de la utilización del servicio.

Muchas de las decisiones previas a una compra se podrían considerar decisiones sobre una transacción.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | La decisión de trasladarse a un punto de venta o establecimiento como resultado de una oferta comercial |  |  |  | | --- | --- | | — | La decisión de aceptar la presentación de un producto por un comerciante |  |  |  | | --- | --- | | — | La decisión de hacer clic en un sitio web como resultado de una oferta comercial | |

Muchas de las decisiones posteriores a la compra que los consumidores toman tras adquirir un producto o contratar un servicio también pueden considerarse decisiones sobre una transacción.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | La decisión de revocar o rescindir un contrato de servicios |  |  |  | | --- | --- | | — | La decisión de cambiar de proveedor de servicios | |

Además, una práctica comercial desleal dirigida a un consumidor podría dar lugar a la adopción de una decisión sobre una transacción por parte de otro consumidor que no la habría tomado en caso contrario.

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| Por ejemplo:  Las prácticas comerciales de un comerciante que ofrece reseñas de usuarios en línea ocultando las reseñas negativas podrían constituir una acción u omisión engañosa aun cuando la decisión sobre la transacción pertinente se refiera a una decisión de un consumidor distinto del presionado para que elimine o no publique una reseña negativa. En esta situación, la creación por el comerciante de una impresión general falsa o engañosa sobre la naturaleza del sitio web de valoración o sobre su funcionamiento podría inducir al consumidor medio que lee las reseñas en línea a tomar la decisión de ponerse en contacto con un comerciante de la lista (y, posteriormente, celebrar un contrato con él) que no habría tomado si hubiera sabido que se habían ocultado las reseñas negativas. |

Las disposiciones generales de la DPCD (artículos 5 a 9) abarcan las prácticas comerciales desleales engañosas y agresivas que puedan distorsionar el comportamiento económico de los consumidores. Estas disposiciones utilizan términos ligeramente diferentes para expresar estos requisitos.

Con arreglo al artículo 5, apartado 2, de la DPCD, una práctica comercial es desleal si es contraria a los requisitos de la diligencia profesional y «distorsiona o puede distorsionar de manera sustancial» el comportamiento económico del consumidor medio. No obstante, los artículos 6, 7 y 8 prohíben las prácticas comerciales engañosas o agresivas que hagan o puedan hacer que el consumidor medio tome «una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado».

El requisito de que una práctica comercial debe poder distorsionar el comportamiento económico del consumidor para ser considerada desleal se formula de manera diferente en el artículo 5, apartado 2, que en los artículos 6, 7 y 8. A primera vista, esta aparente contradicción podría ocasionar problemas de interpretación. Sin embargo, el artículo 5, apartado 2, debe leerse en relación con el artículo 2, letra e), que dispone lo siguiente:

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| Artículo 2, letra e)  «distorsionar de manera sustancial el comportamiento económico de los consumidores»: utilizar una práctica comercial para mermar de manera apreciable la capacidad del consumidor de adoptar una decisión con pleno conocimiento de causa haciendo así que éste tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado; |

Por consiguiente, sobre la base del artículo 5, apartado 2, lo que determina si una práctica comercial «distorsiona o puede distorsionar de manera sustancial» el comportamiento económico del consumidor es que le haga o pueda hacerle «tomar una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado».

Se trata de la misma apreciación que se ha de efectuar sobre la base de los artículos 6, 7 y 8. De ello se desprende que, si bien la redacción del artículo 5, apartado 2, difiere de la redacción de estos últimos artículos, el requisito relativo a la distorsión sustancial del comportamiento del consumidor es el mismo.

El amplio concepto de decisión sobre una transacción desarrollado por el Tribunal de Justicia [(133)](#ntr133-C_2021526ES.01000101-E0133) permite que la DPCD se aplique a toda una serie de casos en los que el comportamiento desleal de un comerciante no ha de inducir necesariamente al consumidor a celebrar un contrato de compraventa o de prestación de servicios.

Una práctica comercial puede considerarse desleal no solo si puede inducir al consumidor medio a comprar o no comprar un producto, sino también cuando pueda hacerle, por ejemplo:

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| — | entrar en una tienda; |

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| — | pasar más tiempo en internet inmerso en un proceso de reserva; |

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| — | decidir no cambiar de proveedor de servicios o producto; |

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| — | hacer clic en un enlace o anuncio en línea; |

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| — | seguir utilizando el servicio navegando por internet o desplazándose dentro de una misma página. |

La DPCD no exige demostrar si el comportamiento económico del consumidor (es decir, su decisión sobre una transacción) se ha visto realmente distorsionado, sino que permite evaluar si una práctica comercial «puede» tener esta incidencia en el consumidor medio (es decir, si es susceptible de tenerla). Por lo tanto, las autoridades nacionales de ejecución deben investigar los hechos y circunstancias de cada caso (es decir, in concreto), así como apreciar la «probabilidad» de que la práctica incida en la decisión de un consumidor medio sobre una transacción (es decir, in abstracto).

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| Por ejemplo:  Un anuncio comercial afirmaba que un nuevo modelo de automóvil era «el más seguro del mundo». A la hora de decidir si esta afirmación había afectado a algún consumidor en cuanto a la toma de una decisión fundada sobre una transacción, un órgano jurisdiccional nacional declaró que para considerar que se trataba de una decisión sobre una transacción, bastaba que las técnicas de comercialización pudieran suscitar el interés del consumidor medio y  hacer que este decidiera realizar alguna otra acción  (por ejemplo, visitar una tienda o un sitio web para obtener más información sobre el producto) [(134)](#ntr134-C_2021526ES.01000101-E0134). |

2.5.   Consumidor medio

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| Considerando 18  Es importante que todos los consumidores estén protegidos de las prácticas comerciales desleales; sin embargo, el Tribunal de Justicia ha considerado necesario, al fallar sobre casos relacionados con la publicidad desde la entrada en vigor de la Directiva 84/450/CEE, estudiar los efectos de dichas prácticas en la figura teórica del consumidor típico.  Atendiendo al principio de proporcionalidad ,  la presente Directiva , con objeto de permitir la aplicación efectiva de las disposiciones de protección que contiene,  toma como referencia al consumidor medio, que, según la interpretación que ha hecho de este concepto el Tribunal de Justicia, está normalmente informado y es razonablemente atento y perspicaz, teniendo en cuenta los factores sociales, culturales y lingüísticos , pero incluye además disposiciones encaminadas a impedir la explotación de consumidores cuyas características los hacen especialmente vulnerables a las prácticas comerciales desleales. Cuando una práctica comercial se dirija específicamente a un grupo concreto de consumidores, como los niños, es conveniente que el efecto de la práctica comercial se evalúe desde la perspectiva del miembro medio de ese grupo. […]  La referencia del consumidor medio no es una referencia estadística .  Los tribunales y autoridades nacionales deben aplicar su propio criterio, teniendo en cuenta la jurisprudencia del Tribunal de Justicia, para determinar la reacción típica del consumidor medio en un caso concreto . |

Como se indica en el considerando 18 y se especifica con más detalle en los artículos 5 a 9, la referencia que toma la DPCD para evaluar el impacto de una práctica comercial es el concepto de «consumidor medio», desarrollado previamente por el Tribunal de Justicia:

«[…] para determinar si la denominación, marca o mención publicitaria consideradas son o no engañosas, hay que tomar en consideración la expectativa que se presumía en un consumidor medio, normalmente informado y razonablemente atento y perspicaz» [(135)](#ntr135-C_2021526ES.01000101-E0135).

Este concepto fue desarrollado por el Tribunal de Justicia antes de la DPCD. Posteriormente, quedó codificado por la DPCD para proporcionar a las autoridades y órganos jurisdiccionales nacionales criterios comunes con vistas a aumentar la seguridad jurídica y reducir la posibilidad de divergencias de apreciación.

En la jurisprudencia del Tribunal de Justicia, el consumidor medio es una persona razonablemente crítica, consciente y perspicaz en su comportamiento en el mercado.

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| Por ejemplo:  El «consumidor razonablemente perspicaz» no supondrá que existe necesariamente un nexo entre el tamaño de una mención publicitaria en el envoltorio de un producto y el aumento promocional de la cantidad de este [(136)](#ntr136-C_2021526ES.01000101-E0136). Por lo general, el consumidor medio no atribuirá a los bienes que lleven la expresión «controlado mediante análisis dermatológicos» unos efectos curativos que dichos bienes no poseen [(137)](#ntr137-C_2021526ES.01000101-E0137). |

En cualquier caso, con arreglo a la DPCD el consumidor medio no es alguien que solo necesite una pequeña protección por estar siempre en condiciones de obtener la información disponible y de actuar con sensatez basándose en ella. Al contrario, tal como se subraya en el considerando 18, este criterio se basa en el principio de proporcionalidad. La DPCD adoptó este concepto para alcanzar el equilibrio adecuado entre la necesidad de proteger a los consumidores y la de fomentar el libre comercio en un mercado abiertamente competitivo.

Por tanto, el concepto de consumidor medio con arreglo a la DPCD siempre debe interpretarse teniendo en cuenta el artículo 114 del Tratado, que contempla un alto nivel de protección de los consumidores.

Al mismo tiempo, la DPCD se basa en la idea de que, por ejemplo, una medida nacional que prohíba las declaraciones que solo puedan engañar a un consumidor sumamente crédulo, ingenuo o superficial (por ejemplo, exageraciones [(138)](#ntr138-C_2021526ES.01000101-E0138)) sería desproporcionada y crearía un obstáculo injustificado al comercio.

Según se menciona explícitamente en el considerando 18, «la referencia del consumidor medio no es una referencia estadística». Ello significa que las autoridades y órganos jurisdiccionales nacionales deben ser capaces de determinar si una práctica puede inducir a error al consumidor medio aplicando su propio criterio y teniendo en cuenta las expectativas generales que se presuman de un consumidor medio, sin necesidad de encargar informes periciales ni la realización de sondeos de opinión [(139)](#ntr139-C_2021526ES.01000101-E0139).

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional declaró que las personas con visión reducida también se pueden considerar consumidores medios y que la información impresa en caracteres muy pequeños puede calificarse de práctica comercial engañosa [(140)](#ntr140-C_2021526ES.01000101-E0140). Otra autoridad de ejecución adoptó una decisión similar a este respecto [(141)](#ntr141-C_2021526ES.01000101-E0141). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional constató que un consumidor que actúa razonablemente no es suspicaz y tiende a confiar en que la información recibida es válida y exacta. Un consumidor que actúa razonablemente no está obligado a seguir buscando todo el contenido exacto del mensaje que ha recibido, a menos que el remitente del mensaje llame expresamente su atención sobre la obligación de hacerlo o que exista una referencia firme a tal obligación en el texto del mensaje [(142)](#ntr142-C_2021526ES.01000101-E0142). | |

El artículo 5, apartado 2, letra b), de la DPCD precisa más la referencia del consumidor medio cuando están en juego los intereses de grupos concretos de consumidores. Cuando la práctica se dirija a un grupo concreto de consumidores, su efecto debe evaluarse desde la perspectiva del miembro medio de ese grupo. Este podría ser el caso, por ejemplo, de una práctica comercial que se refiera a un producto único, promocionado a través de canales de comercialización dirigidos a un grupo específico y limitado de destinatarios, como los profesionales de un determinado ámbito. En tal supuesto, el miembro medio de ese grupo concreto podría tener unas características o conocimientos más específicos que un consumidor medio no tendría por qué poseer, lo que incide directamente en la evaluación de los efectos de la práctica comercial. Habida cuenta de la distinción de la categoría general de consumidor medio, el «grupo concreto de consumidores» debe ser suficientemente identificable, de carácter limitado y homogéneo. Si no se puede identificar un grupo concreto, la evaluación debe centrarse entonces en la referencia general del consumidor medio.

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| Por ejemplo:  En un asunto relativo a una publicidad engañosa de pañales infantiles que aludía en particular a una correlación entre las alergias y los pañales del comerciante, un órgano jurisdiccional nacional identificó al consumidor medio como los padres de niños pequeños, que carecen de conocimientos específicos acerca de las alergias [(143)](#ntr143-C_2021526ES.01000101-E0143). |

También es posible que diferentes grupos de consumidores se vean afectados por la misma práctica comercial. Por ejemplo, puede haber un consumidor medio al que afecte o se dirija la práctica [artículo 5, apartado 1, letra b)] y que, al mismo tiempo, esta se dirija a un grupo de consumidores vulnerables. En general, la evaluación debe tener en cuenta a los consumidores realmente afectados por la práctica, con independencia de si se corresponden o no con los destinatarios que el comerciante había previsto.

Al confeccionar sus mensajes comerciales, es posible que, en ocasiones y en función de las características específicas de los productos en cuestión, los comerciantes necesiten tener en cuenta ciertas peculiaridades sociales, lingüísticas y culturales típicas del consumidor medio al que se dirigen los productos. Por tanto, en algunos casos esas peculiaridades sociales, lingüísticas y culturales, que también pueden ser específicas de un determinado Estado miembro, pueden justificar que la autoridad de ejecución o el órgano jurisdiccional competentes realicen una interpretación diferente del mensaje comunicado en la práctica comercial. En un asunto relacionado con la publicidad engañosa de productos cosméticos, el Tribunal de Justicia declaró:

«Para aplicar este criterio al caso de autos, hay que tomar en consideración varios elementos. En particular, hay que verificar si los factores sociales, culturales o lingüísticos pueden justificar que los consumidores alemanes [medios] entiendan el término “lifting”, empleado en relación con una crema antiarrugas de manera diferente que los consumidores de los demás Estados miembros o si las propias condiciones de utilización del producto bastan para destacar el carácter transitorio de sus efectos, neutralizando cualquier conclusión contraria que pueda deducirse del término “lifting”» [(144)](#ntr144-C_2021526ES.01000101-E0144).

En otro asunto, el Tribunal de Justicia sostuvo lo siguiente:

«[U]na prohibición de comercialización basada en la naturaleza engañosa de una marca no está, en principio, excluida por la circunstancia de que, en otros Estados miembros, la misma marca no tenga esa consideración. En efecto, […] es posible que, debido a las diferencias lingüísticas, culturales y sociales entre los Estados miembros, una marca que no puede inducir a error al consumidor en un Estado miembro, pueda hacerlo en otro» [(145)](#ntr145-C_2021526ES.01000101-E0145).

Por consiguiente, sobre la base de la referencia del consumidor medio y a pesar del carácter de armonización plena de la DPCD, podría estar justificado desde el punto de vista teórico exigir a los comerciantes extranjeros que faciliten información adicional sobre las circunstancias sociales, culturales o lingüísticas. En otras palabras, la omisión de tal información podría inducir a engaño a los consumidores de los países de destino, a diferencia de lo que ocurre con los del país de origen.

2.6.   Consumidores vulnerables

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| Artículo 5, apartado 3: Prohibición de las prácticas comerciales desleales  3. Las prácticas comerciales que puedan distorsionar de manera sustancial, en un sentido que el comerciante pueda prever razonablemente, el comportamiento económico únicamente de un grupo claramente identificable de consumidores  especialmente vulnerables  a dichas prácticas o al producto al que se refieran,  por padecer estos últimos una dolencia física o un trastorno mental o por su edad o su credulidad , deberán  evaluarse desde la perspectiva del miembro medio de ese grupo . Ello se entenderá sin perjuicio de la práctica publicitaria habitual y legítima de efectuar afirmaciones exageradas o afirmaciones respecto de las cuales no se pretenda una interpretación literal. |

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| Considerando 19  Cuando determinadas características como la edad, una dolencia física o un trastorno mental o la credulidad  hagan que los consumidores sean especialmente sensibles a una práctica comercial  o al producto correspondiente y, con toda probabilidad, únicamente el comportamiento económico de tales consumidores sea susceptible de distorsión merced a la práctica en cuestión en un sentido que el comerciante pueda prever razonablemente, debe garantizarse que estén adecuadamente protegidos, para lo cual es necesario que  la práctica se evalúe desde la perspectiva de un miembro medio de ese grupo. |

La DPCD se basa en la idea de que, si bien conviene proteger a todos los tipos de consumidores frente a las prácticas comerciales desleales, a los consumidores considerados miembros de uno de los grupos enumerados en el artículo 5, apartado 3, se les debe brindar un nivel de protección más elevado que al «consumidor medio» a que se refiere el artículo 5, apartado 2.

El considerando 19 del preámbulo aclara en mayor medida la interpretación del artículo 5, apartado 3: si bien el artículo 5, apartado 3, parece considerar vulnerables exclusivamente a los consumidores que padecen «una dolencia física o un trastorno mental o por su edad o su credulidad», el considerando 19 proporciona una lista no exhaustiva de características que hacen que los consumidores sean «especialmente sensibles».

El concepto de vulnerabilidad no se limita a las características enumeradas en el artículo 5, apartado 3, sino que engloba asimismo las vulnerabilidades dependientes del contexto. Las formas multidimensionales de vulnerabilidad [(146)](#ntr146-C_2021526ES.01000101-E0146) son especialmente graves en el entorno digital, que se caracteriza cada vez más por la recopilación de datos sobre características sociodemográficas, pero también sobre características personales o psicológicas, como intereses, preferencias, perfil psicológico y estado de ánimo. El concepto de vulnerabilidad en el entorno digital se analiza más a fondo en el punto 4.2.7.

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| Por ejemplo:  En un asunto relativo a la omisión de información sustancial por parte de una entidad de crédito, una autoridad de ejecución consideró que los consumidores vetados por las entidades de crédito debido a su escasa capacidad de pago eran especialmente sensibles a una oferta concreta [(147)](#ntr147-C_2021526ES.01000101-E0147). |

Las dolencias físicas y los trastornos mentales incluyen la discapacidad sensorial, la movilidad reducida y otras discapacidades.

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| Por ejemplo:  Una autoridad de protección de los consumidores consideró especialmente grave la publicidad de productos que se presentan engañosamente como capaces de curar enfermedades graves, pues puede hacer que los consumidores vulnerables, tales como las personas afectadas por una de dichas enfermedades tomen una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubieran tomado [(148)](#ntr148-C_2021526ES.01000101-E0148). |

Por lo que se refiere a la edad, puede resultar apropiado considerar una práctica comercial desde el punto de vista de los consumidores de diversas edades.

Las personas de edad avanzada pueden ser más vulnerables a determinadas prácticas a causa de su edad. Métodos agresivos de venta a domicilio que pueden no afectar al consumidor medio quizá intimiden a un determinado grupo de consumidores, especialmente a las personas de edad avanzada, que pueden ser más vulnerables a las ventas bajo presión.

Aparte de lo dispuesto en el artículo 5, apartado 3, de la DPCD, los niños disfrutan de una protección específica gracias a la prohibición de las exhortaciones directas prevista en el punto 28 del anexo I de la DPCD. Esta prohibición, que comprende la presión ejercida sobre los niños para que compren un producto directamente o convenzan a adultos de que lo compren (pester power, o «factor fastidio»), se aborda más a fondo en el punto 3.7.

La capacidad de los niños para comprender la publicidad en línea y fuera de línea varía en gran medida de un niño a otro y en función de su edad y de su madurez [(149)](#ntr149-C_2021526ES.01000101-E0149). Hasta cierto punto, este hecho se puede tener en cuenta en virtud de la DPCD, ya que su artículo 5, apartado 3, permite evaluar una práctica comercial desde la perspectiva de un miembro medio de un grupo de edad concreto.

Los adolescentes representan otra categoría de consumidores a los que a menudo se dirigen los comerciantes deshonestos. La promoción de productos especialmente atractivos para los adolescentes podría aprovechar su falta de atención o reflexión, así como sus comportamientos temerarios, debido a su inmadurez y su credulidad.

El concepto de «credulidad» abarca los grupos de consumidores que pueden creerse más fácilmente ciertas afirmaciones. El término es neutro y circunstancial, por lo que su efecto es el de proteger a los miembros de un grupo que, por cualquier motivo, son especialmente susceptibles de verse influenciados por una práctica comercial determinada. Cualquier consumidor podría ser considerado miembro de dicho grupo.

El estudio de la vulnerabilidad de los consumidores llevado a cabo por la Comisión en 2016 constató que las personas que no superan una prueba de credulidad son más propensas que otras a tener problemas en la elección de ofertas. Por otra parte, las personas que se consideran crédulas reclaman menos cuando se enfrentan a un problema y tienen más probabilidades de sentirse vulnerables como consumidores.

El criterio del «consumidor vulnerable» se aplica cuando una práctica comercial distorsiona el comportamiento económico de un grupo de consumidores especialmente vulnerables «en un sentido que el comerciante pueda prever razonablemente».

Este criterio añade un elemento de proporcionalidad a la apreciación de una práctica comercial en relación con los consumidores vulnerables.

Tiene por objeto responsabilizar a los comerciantes únicamente si cabe razonablemente estimar que el efecto negativo de una práctica comercial en una categoría de consumidores vulnerables era previsible por el comerciante.

Ello significa que los comerciantes no están obligados a hacer nada más que lo razonable, tanto a la hora de tener en cuenta si la práctica tendrá un efecto negativo en un grupo claramente identificable de consumidores como a la de tomar medidas para limitar dichos efectos.

En consecuencia, una práctica comercial no sería susceptible de ser considerada engañosa si algunos consumidores, debido a su extrema ingenuidad o ignorancia, son inducidos a error por una práctica comercial leal o actúan de manera irracional en respuesta a ella.

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| Por ejemplo:  Puede haber consumidores que crean que los «Spaghetti Bolognese» se hacen realmente en Bolonia. Sin embargo, no se considerará que los comerciantes son responsables de cualquier interpretación posible que los consumidores hagan de sus prácticas comerciales o de las medidas que tomen en respuesta a aquellas. |

2.7.   Artículo 5: diligencia profesional

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| Artículo 5: Prohibición de las prácticas comerciales desleales  [(150)](#ntr150-C_2021526ES.01000101-E0150)   |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 1. | Se prohibirán las prácticas comerciales desleales. |  |  |  |  |  |  |  |  | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | |  | 2. | Una práctica comercial será desleal si:  |  |  | | --- | --- | | a) | es contraria a los requisitos de la diligencia profesional, y |  |  |  | | --- | --- | | b) | distorsiona o puede distorsionar de manera sustancial, con respecto al producto de que se trate, el comportamiento económico del consumidor medio al que afecta o al que se dirige la práctica, o del miembro medio del grupo, si se trata de una práctica comercial dirigida a un grupo concreto de consumidores. | | |

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| Artículo 2, letra h)  «diligencia profesional»: el nivel de competencia y cuidado especiales que cabe razonablemente esperar del comerciante en sus relaciones con los consumidores, acorde con las prácticas honradas del mercado o con el principio general de buena fe en el ámbito de actividad del comerciante; |

El artículo 5, apartado 2, contiene una cláusula general que establece dos criterios acumulativos para determinar si una práctica comercial debe considerarse desleal. Funciona como una «red de seguridad» que asegura que toda práctica desleal no cubierta por otras disposiciones de la DPCD (es decir, que no sea engañosa, agresiva ni esté enumerada en el anexo I) pueda, sin embargo, ser sancionada. Esta disposición es también «a prueba de futuro», ya que permite abordar las nuevas prácticas desleales.

El artículo 5, apartado 2, prohíbe las prácticas comerciales contrarias a los requisitos de la diligencia profesional que puedan distorsionar de manera sustancial el comportamiento económico del consumidor medio.

Se trata de un criterio autónomo y no de una condición acumulativa más que debe cumplirse para considerar que una práctica incurre en alguna de las categorías específicas de prácticas desleales contempladas en los artículos 6 a 9 o en el anexo I de la DPCD. Esto queda ilustrado en el organigrama de la DPCD.

Este extremo fue confirmado por el Tribunal de Justicia:

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| «45 | […] [H]abida cuenta tanto del tenor como de la estructura de los artículos 5 y 6, apartado 1, de la citada Directiva, así como de la sistemática general de esta, una práctica comercial se considerará “engañosa” en el sentido de la segunda de dichas disposiciones cuando se reúnan los requisitos enumerados en ella, sin que sea necesario comprobar si también se cumple el criterio relativo a que la práctica comercial sea contraria a los requisitos de la diligencia profesional prevista en el artículo 5, apartado 2, letra a), de dicha Directiva. |

|  |  |
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| 46 | La anterior interpretación es la única que garantiza el efecto útil de las normas especiales previstas en los artículos 6 a 9 de la Directiva sobre las prácticas comerciales desleales. En efecto, si los requisitos de aplicación de dichos artículos fuesen idénticos a los enunciados en el artículo 5, apartado 2, de la misma Directiva, en la práctica los referidos artículos quedarían privados de contenido, a pesar de que tienen por objeto proteger al consumidor frente a las prácticas comerciales desleales más frecuentes […]» [(151)](#ntr151-C_2021526ES.01000101-E0151). |

El concepto de «diligencia profesional» integra principios que ya estaban arraigados en los ordenamientos jurídicos de los Estados miembros antes de la adopción de la DPCD, tales como los de «prácticas honradas del mercado», «buena fe» y «buena práctica de mercado», y que destacan valores normativos aplicables en el ámbito específico de la actividad empresarial. Asimismo, puede incluir principios derivados de normas y códigos de conducta nacionales e internacionales (véase también el punto 2.8.4 sobre el incumplimiento de los códigos de conducta).

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad de ejecución emprendió acciones contra una empresa de servicios de televisión por satélite por no haber mostrado diligencia profesional. Aunque los contratos se limitaban en el tiempo, si el consumidor no tomaba medidas para evitar su renovación en la fecha de expiración, el comerciante consideraba automáticamente que el contrato quedaba renovado [(152)](#ntr152-C_2021526ES.01000101-E0152). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional declaró que, en el marco de un recurso interpuesto por una autoridad de ejecución, una agencia de gestión de cobro que presionaba a los consumidores para que pagaran facturas por acuerdos jurídicamente inválidos y se negaba a responder a sus preguntas vulneraba la diligencia profesional. Los consumidores tienen derecho a saber qué factura reclama la agencia de cobros y si tal reclamación es correcta o no. La autoridad basó la interpretación de los requisitos de diligencia profesional en el código de conducta de una asociación de agencias de gestión de cobro, y un órgano jurisdiccional nacional confirmó dicha interpretación. También dictaminó que, incluso en el caso de las empresas que no son miembros de la asociación, este código de conducta puede tomarse como referencia para determinar lo que constituye una conducta profesional [(153)](#ntr153-C_2021526ES.01000101-E0153). | |

Del artículo 5, apartado 2, letra b), se desprende que, para que una práctica comercial se considere contraria a los requisitos de la diligencia profesional, también se ha de estimar que «puede distorsionar de manera sustancial […] el comportamiento económico del consumidor». Este factor se examina en el punto 2.4.

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| Por ejemplo:  Una autoridad de ejecución incoó un procedimiento contra un cobrador de deudas y constató que el comerciante aplicaba una presión indebida y repetía prácticas agresivas contra los consumidores. La autoridad llegó a la conclusión de que dicha conducta era contraria a los requisitos de la diligencia profesional y vulneraba la libertad de elección del consumidor medio, haciendo así que este tomase una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado [(154)](#ntr154-C_2021526ES.01000101-E0154). |

2.8.   Artículo 6: acciones engañosas

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| Artículo 6: Acciones engañosas   |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | |  | 1. | Se considerará engañosa toda práctica comercial que contenga información falsa y por tal motivo carezca de veracidad o información que, en la forma que sea, incluida su presentación general, induzca o pueda inducir a error al consumidor medio, aun cuando la información sea correcta en cuanto a los hechos, sobre uno o más de los siguientes elementos, y que en cualquiera de estos dos casos le haga o pueda hacerle tomar una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado:  |  |  | | --- | --- | | a) | la existencia o la naturaleza del producto; |  |  |  | | --- | --- | | b) | las características principales del producto, tales como su disponibilidad, sus beneficios, sus riesgos, su ejecución, su composición, sus accesorios, la asistencia posventa al cliente y el tratamiento de las reclamaciones, el procedimiento y la fecha de su fabricación o suministro, su entrega, su carácter apropiado, su utilización, su cantidad, sus especificaciones, su origen geográfico o comercial o los resultados que pueden esperarse de su utilización, o los resultados y características esenciales de las pruebas o controles efectuados al producto; |  |  |  | | --- | --- | | c) | el alcance de los compromisos del comerciante, los motivos de la práctica comercial y la naturaleza del proceso de venta, así como cualquier afirmación o símbolo que indique que el comerciante o el producto son objeto de un patrocinio o una aprobación directos o indirectos; |  |  |  | | --- | --- | | d) | el precio o su modo de fijación, o la existencia de una ventaja específica con respecto al precio; |  |  |  | | --- | --- | | e) | la necesidad de un servicio o de una pieza, sustitución o reparación; |  |  |  | | --- | --- | | f) | la naturaleza, las características y los derechos del comerciante o su agente, tales como su identidad y su patrimonio, sus cualificaciones, su situación, su aprobación, su afiliación o sus conexiones y sus derechos de propiedad industrial, comercial o intelectual, o los premios y distinciones que haya recibido; |  |  |  | | --- | --- | | g) | los derechos del consumidor, incluidos los derechos de sustitución o de reembolso previstos por la Directiva 1999/44/CE del Parlamento Europeo y del Consejo, de 25 de mayo de 1999, sobre determinados aspectos de la venta y las garantías de los bienes de consumo (1), o los riesgos que pueda correr. | |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | |  | 2. | También se considerará engañosa toda práctica comercial que, en su contexto fáctico, y teniendo en cuenta todas sus características y circunstancias, haga o pueda hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado, y que suponga:  |  |  | | --- | --- | | a) | cualquier operación de comercialización de un producto, incluida la publicidad comparativa, que cree confusión con cualesquiera productos, marcas registradas, nombres comerciales u otras marcas distintivas de un competidor; |  |  |  |  |  |  |  | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | b) | el incumplimiento por parte del comerciante de compromisos incluidos en códigos de conducta que aquel se haya obligado a respetar, siempre y cuando:   |  |  | | --- | --- | | i) | el compromiso no remita a una aspiración u objetivo sino que sea firme y pueda ser verificado, y |  |  |  | | --- | --- | | ii) | el comerciante indique en una práctica comercial que está vinculado por el código; | |  |  |  | | --- | --- | | c) | cualquier operación de comercialización de un producto, en un Estado miembro, como idéntico a un producto comercializado en otros Estados miembros, cuando dicho producto presente una composición o unas características significativamente diferentes, a menos que esté justificado por factores legítimos y objetivos. | | |

Junto con el artículo 7, sobre las omisiones engañosas, el artículo 6 es, con diferencia, la disposición que se invoca más frecuentemente con fines de aplicación.

Los nuevos datos sobre economía del comportamiento indican que no solo el contenido de la información facilitada, sino también el modo en que esta se presenta, pueden tener una repercusión considerable en la respuesta de los consumidores ante ella. Por este motivo, el artículo 6 abarca de manera explícita las situaciones de prácticas comerciales que puedan inducir a error a los consumidores «en la forma que sea, incluida su presentación general», «aun cuando la información sea correcta en cuanto a los hechos».

Corresponde a los órganos jurisdiccionales y las autoridades administrativas nacionales apreciar el carácter engañoso de las prácticas comerciales teniendo en cuenta las conclusiones más recientes en materia de economía del comportamiento. Por ejemplo, la utilización de opciones predeterminadas (elecciones que se supone que realizan los consumidores salvo que indiquen otra cosa de forma expresa) o el suministro de información innecesariamente compleja se pueden considerar prácticas engañosas.

2.8.1.   Información general engañosa

El artículo 6, apartado 1, letras a) a g), prohíbe las acciones engañosas que puedan inducir a error al consumidor medio en una amplia gama de elementos, entre los cuales figuran:

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| — | la existencia del producto; |

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| — | sus características principales (por ejemplo, su composición, su procedimiento de fabricación, su origen geográfico o comercial, sus riesgos y los resultados que cabe esperar de su utilización); |

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| — | el precio o su modo de fijación, o la existencia de una ventaja específica con respecto al precio; |

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| — | la naturaleza, las características y los derechos del comerciante. |

El artículo 6 abarca claramente toda práctica comercial que «contenga información falsa y por tal motivo carezca de veracidad».

La información sobre las «características principales» del producto debe facilitarse en la invitación a comprar de conformidad con el artículo 7, apartado 4, de la DPCD, y antes de la celebración del contrato con arreglo a lo dispuesto en la Directiva sobre los derechos de los consumidores. El artículo 6, apartado 1, letra b), de la DPCD prohíbe facilitar información incorrecta sobre las características principales del producto si puede hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad de protección de los consumidores incoó un procedimiento contra un comerciante que había afirmado falsamente que sus préstamos a los consumidores tenían los tipos de interés más bajos del mercado. Además, el comerciante incluía información incorrecta en la publicidad, al indicar que se concederían préstamos a los consumidores independientemente de su historial crediticio [(155)](#ntr155-C_2021526ES.01000101-E0155). |  |  |  | | --- | --- | | — | En el caso de los productos informáticos, como los discos duros externos, las memorias USB, los teléfonos móviles y las tabletas, la capacidad de almacenamiento o memoria constituye un elemento importante de sus características principales. Una autoridad de protección de los consumidores tomó medidas contra un comerciante que anunciaba capacidades de almacenamiento de productos informáticos que diferían en gran medida de la capacidad real [(156)](#ntr156-C_2021526ES.01000101-E0156). De manera similar, una asociación de consumidores incoó un procedimiento de acción colectiva sobre la base de unas investigaciones entre distintas marcas de dispositivos informáticos que pusieron de manifiesto una diferencia media de un tercio entre las memorias anunciadas y las reales. |  |  |  | | --- | --- | | — | Una agencia de vuelos se comunicó con los consumidores en una lengua nacional antes de la transacción. Sin embargo, el servicio posventa solo se prestaba en inglés, de lo que no se informó a los consumidores antes de la transacción. Esta práctica comercial se consideró que infringía el artículo 6, apartado 1, letra b), de la DPCD, leído en relación con el punto 8 del anexo I [(157)](#ntr157-C_2021526ES.01000101-E0157). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional declaró que el hecho de que se hubiera revendido una entrada constituía una característica principal de esta, ya que el vendedor original podría denegar el acceso al comprador de una entrada de reventa [(158)](#ntr158-C_2021526ES.01000101-E0158). | |

El artículo 6, apartado 1, comprende en sus letras c) y f) diversos datos relativos al comerciante y a la naturaleza del proceso de venta. Aquí se podrían incluir también las prácticas comerciales en las que un comerciante afirma o da a entender de forma fraudulenta que está autorizado a vender un producto perteneciente a una red de distribución selectiva.

Existe una práctica comercial, basada en la utilización de afirmaciones formuladas con «hasta…», por la que los comerciantes invocan, como argumento de comercialización, el beneficio máximo que los consumidores pueden obtener con el uso de un producto. Estas afirmaciones pueden considerarse engañosas a tenor de lo dispuesto en el artículo 6 si no reflejan la realidad de la oferta realizada por el comerciante y pueden hacer que el consumidor tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado. Las afirmaciones formuladas con «hasta…» podrían resultar engañosas si los comerciantes no se hallan en condiciones de probar que los consumidores pueden lograr el resultado máximo prometido en circunstancias normales. Véase también el punto 2.8.2 sobre las ventajas con respecto al precio.

El posible carácter engañoso de una afirmación formulada con «hasta…» ha de apreciarse caso por caso. Existen diferentes criterios que podrían ser pertinentes, como:

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| — | si se revelan claramente los resultados y beneficios que el consumidor medio puede esperar obtener razonablemente, incluida cualquier condición o limitación aplicable; no hacerlo podría considerarse engañoso en relación con las «características principales del producto»:   |  |  | | --- | --- | | — | o por omisión de información sustancial en el sentido del artículo 7, apartado 4, letra a) (en caso de invitación a comprar), o |  |  |  | | --- | --- | | — | o como acción engañosa en el sentido del artículo 6, apartado 1, letra b), de la DPCD; | |

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| — | si el comerciante dispone de pruebas suficientes para justificar la afirmación en el sentido del artículo 12 de la DPCD. |

Además, la información facilitada a los consumidores no debe inducir ni poder inducir a error al consumidor en la forma que sea, incluida su presentación general, aun cuando la información sea correcta en cuanto a los hechos.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Una entidad financiera anunciaba un producto de inversión como depósito de bajo riesgo a cinco años, a un interés privilegiado y con rendimiento de capital garantizado al vencimiento. En la práctica, los inversores perdieron los intereses sobre el capital y una parte importante del capital invertido inicialmente. Una autoridad de protección de los consumidores constató que esta práctica comercial era engañosa, ya que los inversores habían recibido información inadecuada y engañosa sobre el producto financiero ofrecido [(159)](#ntr159-C_2021526ES.01000101-E0159). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional consideró engañosa la publicidad realizada por un operador de telefonía móvil que anunciaba tarifas móviles un 30 % más baratas que las de sus competidores, pero no indicaba claramente que el primer minuto de conversación telefónica no se cobraba por segundos. El órgano jurisdiccional estimó que, debido a la ambigüedad en la presentación de la oferta, el consumidor no estaba en condiciones de tomar una decisión con conocimiento de causa [(160)](#ntr160-C_2021526ES.01000101-E0160). | |

Si bien la DPCD no establece ninguna obligación formal de indicar el origen geográfico (o comercial) de un producto o su composición [(161)](#ntr161-C_2021526ES.01000101-E0161), es posible que la legislación sectorial sí disponga este tipo de requisitos [(162)](#ntr162-C_2021526ES.01000101-E0162). Además, en virtud de la DPCD, inducir a error al consumidor sobre tales elementos podría estar comprendido en la prohibición prevista en su artículo 6, apartado 1, letra b), si dicha información falsa o engañosa puede hacer que el consumidor tome una decisión de compra que de otro modo no hubiera tomado.

Algunas resoluciones de órganos jurisdiccionales nacionales se refieren específicamente a la aplicación de la DPCD a afirmaciones engañosas sobre el origen.

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| Por ejemplo:  Una empresa de la República Dominicana comercializaba su producción de ron en la Unión haciendo varias referencias a Cuba en las botellas y en los materiales comerciales. El órgano jurisdiccional nacional competente declaró que la mención de una famosa ubicación geográfica en un producto que no procede de dicho lugar constituye una práctica comercial engañosa [(163)](#ntr163-C_2021526ES.01000101-E0163). |

También se han planteado dudas sobre la información relativa a la composición de los productos, como los bienes que no contienen componentes de origen animal, pero están etiquetados o marcados con el término «cuero».

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| Por ejemplo:  Unos órganos jurisdiccionales nacionales resolvieron que es engañoso comercializar muebles que no contienen cuero afirmando que algunas partes del mueble se han confeccionado con «cuero textil». Los órganos jurisdiccionales destacaron que el consumidor medio supondría una presencia de cuero en los muebles en cuestión [(164)](#ntr164-C_2021526ES.01000101-E0164). |

Con arreglo al artículo 6, apartado 1, letra g), los comerciantes no deben inducir a error a los consumidores acerca de sus derechos como tales.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional falló en contra de un recurso presentado por un comerciante que había sido multado por una autoridad de ejecución por inducir a error a los consumidores acerca de su derecho de desistimiento. En lugar de hacer referencia explícita al hecho de que el consumidor disponía de catorce días para desistir del contrato, los contratos solo incluían una referencia a las disposiciones pertinentes de la legislación nacional, en un lenguaje poco claro y engañoso [(165)](#ntr165-C_2021526ES.01000101-E0165). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante anunciaba visiblemente un año de garantía comercial gratuita para promover una ampliación de pago de dicha garantía de hasta tres o cinco años. La empresa no informó adecuadamente a los consumidores de la existencia de la garantía legal de conformidad, a la que tenían derecho en virtud de la Directiva sobre la venta y las garantías de los bienes de consumo durante los dos años siguientes a la entrega del producto. Una autoridad de protección de los consumidores consideró que esta práctica comercial era engañosa, en particular sobre la base del artículo 6, apartado 1, letra g), de la DPCD [(166)](#ntr166-C_2021526ES.01000101-E0166). Esta decisión fue confirmada posteriormente por un órgano jurisdiccional nacional [(167)](#ntr167-C_2021526ES.01000101-E0167). | |

2.8.2.   Ventajas con respecto al precio

El artículo 6, apartado 1, letra d), prohíbe la información engañosa sobre el precio. La aplicación de la DPCD a las reducciones del precio, que están sujetas a normas específicas en virtud de la Directiva 98/6/CE, sobre indicación de los precios, se analiza en el punto 1.2.5. La DPCD sigue siendo plenamente aplicable y regula otros tipos de prácticas que promueven ventajas con respecto al precio, como comparaciones de precios, ofertas condicionadas conjuntas o vinculadas y programas de fidelidad. Hay varias disposiciones de la DPCD que resultan pertinentes a efectos de tales prácticas promocionales [por ejemplo, el artículo 6, apartado 1, letra d), sobre la existencia de una ventaja específica con respecto al precio, y el punto 20 del anexo I sobre las ofertas gratuitas]. La DPCD también se aplica a los precios personalizados (véase el punto 4.2.8.).

En particular, la DPCD continúa siendo de aplicación a las prácticas promocionales consistentes en comparar un determinado precio con los precios fijados por otros comerciantes o con otros precios de referencia, como los denominados «precios de venta al público recomendados» por el fabricante. Los comerciantes interesados deberán procurar informar claramente al consumidor de que el precio de referencia indicado es una comparación y no supone la reducción del precio aplicado anteriormente por dicho comerciante. Dicha explicación deberá facilitarse de forma directa e inmediata junto con el precio de referencia. Este aspecto resulta especialmente pertinente cuando se utilizan técnicas tales como el precio de referencia tachado, que es probable que los consumidores perciban como una reducción del precio cobrado anteriormente por ese mismo comerciante. Corresponde a las autoridades de los Estados miembros apreciar caso por caso si estas prácticas no son engañosas y se ajustan a lo dispuesto en la DPCD.

Conviene explicar cualquier uso de «precios de venta al público recomendados» en las comparaciones de precios, ya que podría ser contrario al artículo 6, apartado 1, letra d), de la DPCD si dichos precios son injustificadamente elevados y poco realistas, dando a los consumidores la impresión de que se les ofrece una ventaja más significativa de lo que es en realidad.

En el asunto Canal Digital Danmark [(168)](#ntr168-C_2021526ES.01000101-E0168), el Tribunal de Justicia aclaró que una práctica comercial consistente en fraccionar el precio de un producto en varios elementos y destacar uno de ellos debe calificarse de engañosa en virtud del artículo 6, apartado 1, siempre que dicha práctica pueda, por una parte, dar al consumidor medio la impresión errónea de que se le ofrece un precio interesante y, por otra parte, hacer que tome una decisión sobre la transacción que de otro modo no hubiera tomado, extremos que corresponde verificar al órgano jurisdiccional remitente, teniendo en cuenta el conjunto de circunstancias pertinentes del procedimiento principal [(169)](#ntr169-C_2021526ES.01000101-E0169).

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| Por ejemplo:   |  |  |  |  |  |  |  |  | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | — | En 2020, la Comisión y las autoridades nacionales pertenecientes a la red europea de cooperación para la protección de los consumidores («red CPC») obtuvieron compromisos de los sitios web de reserva de viajes Booking y Expedia. Como plataformas, acordaron garantizar la presentación clara de los descuentos y reducciones de precios con arreglo al Derecho de la Unión en materia de protección de los consumidores, en particular:   |  |  | | --- | --- | | — | no presentar como descuento (por ejemplo, utilizando una tachadura o expresiones como «% de descuento») los precios calculados en función de diferentes fechas de estancia; |  |  |  | | --- | --- | | — | dejar claro si los precios más bajos solo están a disposición de los miembros de programas de recompensas; |  |  |  | | --- | --- | | — | no presentar una oferta como de duración limitada si posteriormente va a seguir estando disponible al mismo precio [(170)](#ntr170-C_2021526ES.01000101-E0170). | |  |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante anunciaba material deportivo comparando su precio con el precio algo más elevado de venta al público recomendado por el importador, a pesar de que este último no vendía directamente ese producto al consumidor. Un órgano jurisdiccional nacional consideró que se trataba de una práctica engañosa y prohibió al comerciante comparar su precio con el precio de venta al público recomendado, salvo que dicho precio coincidiese con el que realmente suelen cobrar otros minoristas por el mismo producto [(171)](#ntr171-C_2021526ES.01000101-E0171). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional constató que un comerciante había infringido el artículo 6, apartado 1, letra d), de la DPCD al utilizar precios de referencia tachados para muebles que nunca se habían ofertado a ese precio. De este modo, el comerciante había creado una ventaja inexistente en cuanto al precio, que inducía o podía inducir a error a los consumidores [(172)](#ntr172-C_2021526ES.01000101-E0172). | |

2.8.3.   Comercialización que induce a confusión

El artículo 6, apartado 2, letra a), de la DPCD aborda la comercialización que induce a confusión.

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| Artículo 6, apartado 2, letra a):  También se considerará engañosa toda práctica comercial que, en su contexto fáctico, y teniendo en cuenta todas sus características y circunstancias, haga o pueda hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado, y que suponga:   |  |  | | --- | --- | | a) | cualquier operación de comercialización de un producto, incluida la publicidad comparativa, que cree confusión con cualesquiera productos, marcas registradas, nombres comerciales u otras marcas distintivas de un competidor; | |

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional estimó que enviar facturas que imitan la marca de otro comerciante (nombre, signos distintivos y diseño de la factura) y crear la impresión de que los servicios han sido prestados por ese otro comerciante constituye una práctica comercial desleal. Este hecho también se consideró contrario a lo dispuesto en el punto 21 del anexo I de la DPCD (incluir en la documentación de comercialización una factura o un documento similar de pago que dé al consumidor la impresión de que ya ha encargado el producto comercializado sin que este haya hecho el pedido correspondiente) [(173)](#ntr173-C_2021526ES.01000101-E0173). |  |  |  | | --- | --- | | — | Ese mismo órgano jurisdiccional estimó asimismo que el uso de las indicaciones «Taxi» y «Taxi Göteborg», ambas en un logotipo amarillo sobre un taxi, constituían publicidad comparativa y creaban confusión con los signos distintivos de un competidor. Esto se debía a que otro comerciante había prestado servicios de taxi en la zona de Gotemburgo desde 1922 con las palabras «Taxi Göteborg» y el color amarillo como marcas registradas [(174)](#ntr174-C_2021526ES.01000101-E0174). | |

Una práctica que plantea problemas de compatibilidad con esta disposición es la de las «copias parasitarias», que puede producirse en los canales de venta en línea y fuera de línea. Esta práctica consiste en diseñar el envase de un producto (o su presentación comercial) de forma que dé la impresión general de que se trata de una marca competidora de renombre.

Las copias parasitarias se distinguen de la falsificación en que no suelen incluir la copia de marcas registradas. El riesgo que entraña esta práctica es la confusión del consumidor y, por consiguiente, la distorsión de su comportamiento comercial.

El engaño de que es objeto el consumidor a causa de las copias parasitarias puede adoptar distintas formas:

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| — | confusión total: el consumidor adquiere el producto de imitación confundiéndolo con el de marca; |

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| — | error en cuanto al origen: el consumidor se da cuenta de que el producto de imitación es diferente, pero cree, debido a la similitud del envase, que ha sido producido por el mismo fabricante; |

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| — | error en cuanto a calidad o naturaleza: también en este caso, el consumidor se da cuenta de que el producto de imitación es diferente, pero cree, debido a la similitud del envase, que la calidad es la misma o similar a la del producto copiado. |

El envasado similar sugiere a los consumidores que la calidad o naturaleza del producto imitado son comparables a las de la marca en cuestión o, al menos, más comparables de lo que hubieran supuesto en caso contrario. De este modo, la similitud del envase da la impresión a los consumidores de que el único punto de comparación entre los productos es exclusivamente el precio (en lugar de la combinación de precio y calidad).

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| Por ejemplo:  Un comerciante denomina sus nuevas gafas de sol o les atribuye una marca de tal modo que se parecen en gran medida a la denominación o la marca de las de un competidor. Esta práctica podría contravenir el artículo 6, apartado 2, de la DPCD si la similitud es suficiente para confundir al consumidor medio, aumentando la probabilidad de que opte por las nuevas gafas de sol cuando, sin dicha confusión, no lo habría hecho. |

El anexo I de la DPCD prohíbe en cualquier circunstancia una serie de prácticas comerciales específicas que implican la comercialización confusa en relación con las marcas comerciales, signos distintivos y otros elementos relacionados:

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| Punto 3 del anexo I  Exhibir un sello de confianza o de calidad o un distintivo equivalente sin haber obtenido la necesaria autorización. |

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| Punto 4 del anexo I  Afirmar que un comerciante (incluidas sus prácticas comerciales) o un producto ha sido aprobado, aceptado o autorizado por un organismo público o privado cuando este no sea el caso, o hacer esa afirmación sin cumplir las condiciones de la aprobación, aceptación o autorización. |

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| Punto 13 del anexo I  Promocionar un producto similar al producto de un determinado fabricante para inducir de manera deliberada al consumidor a creer que el producto procede de ese mismo fabricante no siendo cierto. |

Una práctica que puede inducir a error a los consumidores es la venta por comerciantes o en mercados en línea de marcas como palabras clave cuando ello pueda crear confusión con respecto a la identidad del comerciante que realmente ofrece el producto. La DPCD, y en particular su artículo 6, apartado 1, letra a), y apartado 2, letra a), será de aplicación si los resultados mostrados pueden inducir a error a los consumidores en cuanto a la naturaleza del producto o crear confusión entre los productos, marcas, nombres comerciales u otros signos distintivos de los competidores. Las empresas que utilizan marcas registradas como palabras clave para vender productos falsificados podrían infringir el punto 9 del anexo I de la DPCD.

2.8.4.   Incumplimiento de los códigos de conducta

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| Artículo 6, apartado 2, letra b):   |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 2. | También se considerará engañosa toda práctica comercial que, en su contexto fáctico, y teniendo en cuenta todas sus características y circunstancias, haga o pueda hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado, y que suponga: |   […]   |  |  |  |  |  |  |  | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | |  | b) | el incumplimiento por parte del comerciante de compromisos incluidos en códigos de conducta que aquel se haya obligado a respetar, siempre y cuando:  |  |  | | --- | --- | | i) | el compromiso no remita a una aspiración u objetivo sino que sea firme y pueda ser verificado, y |  |  |  | | --- | --- | | ii) | el comerciante indique en una práctica comercial que está vinculado por el código. | | |

La DPCD contiene varias disposiciones destinadas a impedir que los comerciantes se aprovechen indebidamente de la confianza que los consumidores puedan tener en los códigos de autorregulación. No proporciona normas específicas relativas a la validez de un código de conducta, sino que se basa en la presunción de que las afirmaciones engañosas sobre la afiliación de un comerciante o el refrendo de un organismo autorregulador pueden distorsionar el comportamiento económico de los consumidores y socavar la confianza que estos puedan tener en los códigos de autorregulación. En primer lugar, el artículo 6, apartado 2, letra b), obliga a los comerciantes a cumplir los códigos de conducta con los que se han comprometido en las comunicaciones comerciales.

El Tribunal de Justicia precisó en el asunto Bankia que la DPCD no se opone a una normativa nacional que no confiere carácter jurídicamente vinculante a un código de conducta [(175)](#ntr175-C_2021526ES.01000101-E0175). Si bien el Tribunal de Justicia reconoció que el artículo 6, apartado 2, letra b), dispone que el incumplimiento por parte de un comerciante de un código de conducta puede constituir una práctica comercial desleal, la Directiva en sí no exige a los Estados miembros prever consecuencias directas para los comerciantes por la única razón de que no se hayan atenido a un código de conducta [(176)](#ntr176-C_2021526ES.01000101-E0176).

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| Por ejemplo:  Una autoridad de protección de los consumidores tomó medidas sobre la base de esta disposición contra un proveedor de servicios de suministro de energía. El proveedor, que era miembro de una asociación representante de las empresas del sector de la energía, afirmaba estar sujeto a un código de conducta elaborado por dicha asociación. El código de conducta establecía que cuando los consumidores únicamente solicitan información, no se les deben presentar ofertas de productos o servicios. Sin embargo, en el caso de autos los consumidores o bien no recibieron la información solicitada, o bien acabaron vinculados por un contrato al que no habían dado su consentimiento. El código de conducta también indicaba que un miembro no debía beneficiarse de la inexperiencia o la vulnerabilidad de los consumidores (edad). No obstante, el proveedor de energía en cuestión se había aprovechado de varias personas de edad avanzada con las que se había puesto en contacto [(177)](#ntr177-C_2021526ES.01000101-E0177). |

En segundo lugar, el anexo I de la DPCD prohíbe determinadas prácticas en cualquier circunstancia al objeto de garantizar que los comerciantes hagan un uso responsable de los códigos de conducta en el ámbito de la comercialización (véanse los puntos 1 y 3 sobre los códigos de conducta, el punto 2 sobre los sellos de confianza y el punto 4 sobre la aceptación por un organismo público o privado).

2.8.5.   Comercialización de «calidad dual»

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| Artículo 6, apartado 2, letra c)   |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 2. | También se considerará engañosa toda práctica comercial que, en su contexto fáctico, y teniendo en cuenta todas sus características y circunstancias, haga o pueda hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado, y que suponga: |   […]   |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | c) | cualquier operación de comercialización de un producto, en un Estado miembro, como idéntico a un producto comercializado en otros Estados miembros, cuando dicho producto presente una composición o unas características significativamente diferentes, a menos que esté justificado por factores legítimos y objetivos. | |

La libre circulación de bienes no conlleva inexorablemente que todos los productos deban ser idénticos en todos los rincones del mercado único. Si bien los consumidores son libres de comprar los productos que deseen, los explotadores de empresas también tienen libertad para comercializar y vender mercancías que tengan una composición o características diferentes, siempre que respeten plenamente la legislación de la UE (ya sea en el ámbito de la seguridad de los productos, del etiquetado o de otra normativa horizontal o sectorial).

Sin embargo, tal como se establece en el considerando 52 de la Directiva (UE) 2019/2161, la comercialización entre Estados miembros de bienes como idénticos cuando, en realidad, presentan una composición o unas características significativamente diferentes puede inducir a error a los consumidores y dar lugar a que adopten una decisión sobre una transacción que de otro modo no habrían adoptado. Estas prácticas de comercialización se denominan a menudo «calidad dual».

Así pues, la Directiva (UE) 2019/2161 introdujo en la DPCD una disposición específica [artículo 6, apartado 2, letra c)] para abordar situaciones en las que los comerciantes ofertan bienes en diversos Estados miembros como idénticos, cuando en realidad presentan diferencias significativas en cuanto a su composición o características, a menos que esté justificado por factores legítimos y objetivos. La aplicación del artículo 6, apartado 2, letra c), se basa en las circunstancias objetivas y evidentes de la presentación y la composición o características de los bienes de que se trate.

El artículo 6, apartado 2, letra c), de la DPCD aclara la aplicación de esta Directiva a las prácticas engañosas de comercialización de «calidad dual» y proporciona a las autoridades nacionales de protección de los consumidores una base jurídica más clara y específica para abordar tales prácticas. La presente Guía sustituye a la Comunicación de la Comisión de 2017 relativa a la aplicación de la DPCD (original) a la cuestión de la «calidad dual» de los alimentos [(178)](#ntr178-C_2021526ES.01000101-E0178).

Objeto y comerciantes afectados

En su versión original, el artículo 6, apartado 2, letra c), se aplica únicamente a los «bienes» (goods), que no se definen en la DPCD. La DPCD se aplica a los «productos» (products) definidos en sentido amplio, de modo que engloban los bienes, los servicios y el contenido digital. Por lo tanto, ha de aplicarse por analogía la definición de «bienes» que figura en la Directiva (UE) 2019/771, relativa a la compraventa de bienes. Así pues, se entenderá por «bienes» todo objeto mueble tangible, así como el agua, el gas y la electricidad en un volumen delimitado o en cantidades determinadas. Por consiguiente, el artículo 6, apartado 2, letra c), no se aplica a los servicios ni al contenido digital, que siguen estando sujetos a las normas generales de la DPCD sobre acciones u omisiones engañosas.

La mayoría de los problemas que presentan las prácticas de comercialización de «calidad dual» se concentran en el ámbito de los alimentos (incluidas las bebidas). Sin embargo, el artículo 6, apartado 2, letra c), de la DPCD se aplica asimismo a otros tipos de bienes.

El artículo 6, apartado 2, letra c), se aplica a la «comercialización», concepto amplio que incluye tanto la presentación de los bienes en su envase, la publicidad conexa, las promociones y la venta de los bienes a los consumidores.

El principal grupo destinatario del artículo 6, apartado 2, letra c), son los comerciantes que determinan la presentación y composición de los bienes en cuestión. Estos suelen ser los productores, incluidos los propietarios de «marcas blancas» y marcas de distribución. Por lo tanto, las medidas de ejecución relativas al artículo 6, apartado 2, letra c), deben centrarse principalmente en los productores de bienes.

Los meros minoristas no suelen influir en la composición ni en el envasado de los bienes que venden. No obstante, una vez que se haya establecido el carácter engañoso de una práctica de «calidad dual» en relación con un determinado bien, las autoridades de ejecución también podrán exigir medidas correctoras a los minoristas que vendan el bien en cuestión. En particular, pueden exigir a los minoristas que proporcionen información adicional a los consumidores en el punto de venta a fin de garantizar que estos últimos sean conscientes de que el bien en cuestión no es realmente idéntico al vendido en otros países. Puesto que la DPCD no se aplica a las relaciones entre empresas («B2B»), no regula las consecuencias de tales medidas de ejecución en el contexto de las relaciones contractuales B2B entre minoristas y productores.

Debido al carácter transfronterizo que presentan los casos de «calidad dual», las autoridades competentes deben cooperar, cuando proceda, en virtud del Reglamento (UE) 2017/2394 sobre la cooperación en materia de protección de los consumidores («Reglamento CPC»). En particular, el Reglamento CPC dispone claramente obligaciones de asistencia mutua entre las autoridades competentes con miras a garantizar que las autoridades del Estado miembro en que se encuentre establecido el comerciante adopten las medidas necesarias para poner fin a las infracciones que afecten a los consumidores de otras jurisdicciones de la Unión.

Determinación de las diferencias y de si los bienes se comercializan como «idénticos»

De conformidad con el artículo 6, apartado 2, letra c), de la DPCD, existen prácticas potencialmente desleales de comercialización de «calidad dual» en relación con un bien cuando se cumplen las dos condiciones siguientes:

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| 1. | el bien se comercializa como idéntico a un bien comercializado en otros Estados miembros, y |

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| 2. | dicho bien presenta una composición o unas características significativamente diferentes con respecto al bien comercializado en otros Estados miembros. |

Debe entenderse que la referencia a «otros Estados miembros» abarca a uno o varios Estados miembros además de aquel que lleva a cabo la ejecución [(179)](#ntr179-C_2021526ES.01000101-E0179).

La expresión «comercialización como idéntico» se refiere a la forma en que los bienes se presentan al consumidor medio y a cómo este los percibe. Por consiguiente, la presentación del bien no tiene por qué ser completamente idéntica en todos los aspectos para ser percibida como idéntica por una persona media. Con arreglo al considerando 53 de la Directiva (UE) 2019/2161, las autoridades nacionales competentes deben evaluar si la diferenciación del bien resulta fácilmente identificable por los consumidores examinando la disponibilidad y adecuación de la información.

Cuando los comerciantes presenten a los consumidores de distintos Estados miembros versiones de un bien con diferencias significativas en cuanto a su composición o características, deben ponerse en el lugar del consumidor medio para comprobar si es probable que este perciba las diferentes versiones como idénticas. En este sentido, los comerciantes pueden inspirarse en las buenas prácticas existentes de comercialización de bienes, por las que las empresas presentan diferentes versiones de sus productos alimenticios (disponibles paralelamente en cada uno de los mercados nacionales) de manera que sus diferencias queden muy claras para el consumidor, al tiempo que mantienen los elementos comunes que identifican la marca.

Puesto que la aplicación del artículo 6, apartado 2, letra c), se activa por la existencia de «diferencias», no requiere la determinación de un «bien de referencia», es decir, no exige que se determine cuál de los bienes comercializados de idéntica forma es el «original» y cuál es la versión «diferenciada». Lo único que importa es si los bienes comercializados en distintos Estados miembros presentan una composición o unas características significativamente diferentes o no. Esto implica asimismo que corresponde a los comerciantes decidir cómo garantizar que los consumidores puedan distinguir claramente las diferentes versiones del bien.

A fin de determinar las diferencias existentes con los bienes comercializados en otros Estados miembros, las autoridades nacionales de ejecución deben comparar la información disponible en el envase (es decir, en la parte frontal del envase y en la etiqueta). Si se constata que la información que ha de constar obligatoriamente por ley en el etiquetado es incorrecta (mediante pruebas de laboratorio), se confirmará en primer lugar un incumplimiento de la normativa alimentaria de la UE (véase más adelante y en los puntos 1.2.2 y 3.3).

Evaluación caso por caso y «significación» de las diferencias

De conformidad con las disposiciones generales del artículo 6 de la DPCD, la comercialización de bienes que presentan una composición o unas características diferentes como idénticos en distintos Estados miembros es engañosa y, por tanto, desleal y está prohibida, si puede influir en la decisión de un consumidor medio sobre una transacción. A tal efecto, es necesario realizar una evaluación caso por caso de las prácticas comerciales en cuestión. El criterio de la decisión sobre una transacción constituye la piedra angular y el requisito previo para la aplicación de todas las principales disposiciones relativas a las prácticas comerciales desleales recogidas en la DPCD (es decir, los artículos 5 a 9).

En este sentido, cabe señalar que los consumidores por lo general entienden que en el mercado único se garantizan la libre circulación de mercancías y la igualdad de acceso a estas. En particular, las marcas actúan en la mente de los consumidores como un certificado de calidad controlada y constante. La publicidad de marcas y las campañas de imagen contribuyen a esta percepción de los consumidores. Además, expresiones tales como «original», «único» y «receta original», que son frecuentes, por ejemplo, en los envases de alimentos, refuerzan aún más el mensaje del titular de la marca sobre las características uniformes del bien en todos los mercados.

Así pues, los consumidores no esperan a priori que los bienes de marca vendidos en distintos países presenten una composición o unas características diferentes. Por consiguiente, podrían haberse abstenido de comprar el bien si hubieran sabido que el que se ofrece a la venta en su país difiere del ofertado a los consumidores de otros países en cuanto a sus características o composición. No obstante, por lo que respecta a los alimentos, un estudio del JRC publicado en 2020 reveló que la diferenciación de versiones influía de forma heterogénea en las decisiones de compra de los consumidores en los distintos productos alimenticios estudiados y entre Estados miembros. En concreto, el suministro de información sobre las diferencias de los productos alimenticios a los consumidores dio lugar a la preferencia, en unos casos, por las versiones «nacionales» y, en otros, por las versiones «extranjeras» de los productos en cuestión [(180)](#ntr180-C_2021526ES.01000101-E0180).

El informe del JRC constató asimismo que el comportamiento del consumidor ante la diferenciación de los bienes también dependía de la magnitud de la diferencia. Es más probable que este aspecto influya en la decisión del consumidor medio sobre una transacción si tiene conocimiento de que uno o varios de los ingredientes fundamentales o su contenido en un alimento, por ejemplo, difieren sustancialmente [(181)](#ntr181-C_2021526ES.01000101-E0181). Cuanto mayores sean las diferencias existentes en la composición, más fácil es que se vean afectadas las características organolépticas, que constituyen uno de los principales factores determinantes de la calidad de los alimentos para los consumidores. Sin embargo, dicho esto, también es importante subrayar que la percepción sensorial de los alimentos es solo uno de los elementos que pueden influir en las decisiones de los consumidores. Por ejemplo, es posible asimismo que los consumidores deseen evitar determinados tipos de ingredientes por diversas razones distintas de las relacionadas con su salud (por ejemplo, alérgenos). En particular, los consumidores conceden cada vez más importancia al impacto medioambiental de determinados bienes o de sus ingredientes, su origen geográfico, su modo de fabricación o su composición química, entre otros [(182)](#ntr182-C_2021526ES.01000101-E0182).

La clasificación de las diferencias «significativas» y «no significativas» no puede determinarse de antemano por lo que respecta, por ejemplo, a ingredientes específicos de los alimentos, sino que la «significación» de la diferencia es un elemento inherente a la evaluación caso por caso del efecto de la práctica de comercialización de «calidad dual» en el consumidor medio. Es en este sentido del efecto en el consumidor medio en el que se utiliza este concepto en el artículo 6, apartado 2, letra c), de la DPCD.

Excepciones justificadas

El artículo 6, apartado 2, letra c), permite a los comerciantes comercializar (o seguir comercializando) como idénticos bienes que presenten diferencias significativas en su composición o características cuando ello esté justificado por «factores legítimos y objetivos». En el considerando 53 de la Directiva (UE) 2019/2161 figura una lista indicativa no exhaustiva de estos factores, a saber: disposiciones legales nacionales, la disponibilidad o estacionalidad de las materias primas, y las estrategias voluntarias para mejorar el acceso a alimentos saludables y nutritivos, así como el derecho de los comerciantes a ofrecer productos de la misma marca en paquetes de distinto peso o volumen en diferentes mercados geográficos.

De hecho, las normas nacionales pueden establecer requisitos específicos en cuanto a la composición de determinados tipos de alimentos vendidos en algunos países, que no existen en otros Estados miembros. Por otra parte, pueden existir diferencias objetivas de abastecimiento, debido a la disponibilidad geográfica o estacional de las materias primas, que influyan en la composición o el sabor de los productos. Los comerciantes también pueden introducir nuevas recetas en virtud de políticas voluntarias de reformulación de nutrientes, que no pueden llevarse a cabo simultáneamente en todos los mercados por razones técnicas o económicas.

Además, dado que los ejemplos que se mencionan en el considerando 53 de la Directiva (UE) 2019/2161 no son exhaustivos, la diferenciación de los bienes comercializados en distintos Estados miembros también podría justificarse por otros factores objetivos.

El fundamento de cualquier justificación aducida por los comerciantes con respecto a la diferenciación de los bienes debería apreciarse caso por caso. Los comerciantes deben demostrar la validez de la excepción. En particular, cuando un comerciante adapta las versiones nacionales de los productos a las preferencias de los consumidores locales, debe poder demostrar (por ejemplo, mediante estudios económicos o de mercado) la existencia de preferencias de los consumidores y que la diferenciación del producto responde verdaderamente a dichas preferencias.

El considerando 53 de la Directiva (UE) 2019/2161 subraya que los comerciantes que diferencien versiones de sus bienes debido a factores legítimos y objetivos deben informar igualmente de ello a los consumidores. Si bien los comerciantes tienen libertad para elegir el método que desean utilizar para informar a los consumidores, en el considerando se indica que, por lo general, deben inclinarse por alternativas distintas a la de facilitar esta información en la etiqueta de los bienes. Entre estos otros medios figura el suministro de información en los establecimientos minoristas, en interfaces de venta en línea, en sitios web de productos (a los que se debe poder acceder de forma fácil y directa, por ejemplo, mediante el escaneado de un código QR situado en el envase) o en la publicidad del producto. En cualquier caso, los consumidores medios, incluidos los consumidores vulnerables, deben poder acceder de forma fácil y directa a dicha información. Mediante una comunicación activa y transparente sobre la diferenciación de los bienes a través de estos otros medios, los comerciantes no solo informarán a los consumidores, sino que también les dejarán claro tanto a ellos como a las autoridades nacionales de ejecución que consideran justificado en virtud de la DPCD que los bienes en cuestión sigan comercializándose como idénticos. Por otro lado, también debe existir un interés comercial en dicha comunicación activa y transparente, en particular cuando la diferenciación de las versiones del bien tenga realmente por objeto cumplir las disposiciones legales nacionales o mejorar la experiencia de los consumidores.

Las afirmaciones del comerciante relativas a la justificación de la comercialización de los bienes como idénticos pese a presentar diferencias significativas están comprendidas en el ámbito de aplicación del artículo 12 de la DPCD. El artículo 12 establece que los Estados miembros deben facultar a los órganos jurisdiccionales y autoridades nacionales para exigir a los comerciantes que aporten pruebas de la exactitud de sus afirmaciones de hecho. Esta facultad debe aplicarse asimismo a las afirmaciones de los comerciantes relativas a la justificación de la diferenciación.

Productos alimenticios

La legislación alimentaria de la Unión se aplica paralelamente a la DPCD y también puede resultar pertinente a la hora de abordar los casos de «calidad dual», ya que estos parecen darse principalmente en el sector alimentario.

Concretamente, el Reglamento (CE) n.o 178/2002, por el que se establecen los principios y los requisitos generales de la legislación alimentaria, tiene por objeto asegurar un nivel elevado de protección de la salud de las personas y de los intereses de los consumidores en relación con los alimentos, al tiempo que se garantiza el funcionamiento eficaz del mercado interior. Constituye el fundamento de la legislación alimentaria de la Unión y dispone, entre otras cosas, los principios comunes de la legislación alimentaria (nacional y de la Unión), así como las responsabilidades de los explotadores de empresas alimentarias y de empresas de piensos en todas las etapas de la producción, la transformación y la distribución de alimentos y piensos.

En este sentido, establece la protección de los intereses de los consumidores como principio general de la legislación alimentaria [(183)](#ntr183-C_2021526ES.01000101-E0183). Así pues, la legislación alimentaria tendrá como objetivo proteger los intereses de los consumidores y ofrecerles una base para elegir con conocimiento de causa los alimentos que consumen. En particular, deberá tener como objetivo prevenir: a) las prácticas fraudulentas o engañosas; b) la adulteración de alimentos, y c) cualquier otra práctica que pueda inducir a engaño al consumidor.

Asimismo, impone a los explotadores de empresas alimentarias y de empresas de piensos la obligación general de que el etiquetado, la publicidad y la presentación de los alimentos o los piensos, incluidos su forma, apariencia o envasado, los materiales de envasado utilizados, la forma en que se disponen los alimentos o los piensos y el lugar en el que se muestran, así como la información que se ofrece sobre ellos a través de cualquier medio, no induzca a error a los consumidores [(184)](#ntr184-C_2021526ES.01000101-E0184). Solo se podrán comercializar en la Unión los alimentos y piensos que sean seguros [(185)](#ntr185-C_2021526ES.01000101-E0185). Por último, se exige a los explotadores de empresas alimentarias y de empresas de piensos que se aseguren, en todas las etapas de la producción, la transformación y la distribución que tienen lugar en las empresas bajo su control, de que los alimentos o los piensos cumplen todos los requisitos de la legislación alimentaria pertinentes a los efectos de sus actividades y que verifiquen que se cumplen dichos requisitos [(186)](#ntr186-C_2021526ES.01000101-E0186).

Por otra parte, el Reglamento (UE) n.o 1169/2011, sobre la información alimentaria facilitada al consumidor («Reglamento IAC»), establece una serie de normas y requisitos generales de etiquetado, incluida la obligación de proporcionar una lista completa de ingredientes, la cantidad de determinados ingredientes o de determinadas categorías de ingredientes, información sobre alérgenos, la información nutricional, etc. Esto permite que los consumidores queden plenamente informados de la composición de los productos alimenticios y evita la información alimentaria engañosa. La información alimentaria será clara, precisa y fácil de comprender para el consumidor. A estos efectos, el Reglamento IAC establece requisitos específicos para la presentación de la información obligatoria, incluido el tamaño de letra mínimo.

La legislación alimentaria de la UE establece un marco jurídico integral destinado a garantizar no solo un elevado nivel de protección de la salud de los consumidores y de sus intereses sociales y económicos, sino también la libre circulación de alimentos seguros en el mercado único de la Unión.

Los requisitos de información previstos en el Reglamento IAC constituyen información «sustancial» en el sentido del artículo 7, apartado 5, de la DPCD. La omisión de esta información podría considerarse engañosa, tras una evaluación individualizada del caso, en la medida en que pueda influir en las decisiones del consumidor medio sobre una transacción.

La investigación de prácticas de «calidad dual» potencialmente engañosas por parte de las autoridades nacionales encargadas de velar por el cumplimiento de la DPCD se basará normalmente en la información sobre la composición del producto facilitada en el envase con arreglo a los requisitos de la legislación alimentaria de la UE [(187)](#ntr187-C_2021526ES.01000101-E0187).

Sin embargo, también podrían producirse prácticas engañosas de «calidad dual» en las que las diferencias de los productos no se aprecien en su etiquetado. En tales situaciones, las autoridades competentes en materia de legislación alimentaria comprobarán el cumplimiento del Reglamento IAC y de los reglamentos aplicables a productos específicos por los que se establezcan normas de composición. En aquellos Estados miembros donde las autoridades responsables de aplicar la DPCD y la legislación alimentaria pertinente sean distintas, conviene establecer una estrecha cooperación entre ellas al objeto de garantizar que las conclusiones de sus respectivas investigaciones sobre un mismo comerciante o una misma práctica comercial sean coherentes.

Otros bienes

Dado que la prohibición de las prácticas engañosas de «calidad dual» no se limita a los productos alimenticios, y habida cuenta de las preocupaciones existentes sobre prácticas similares en el contexto de otros bienes de consumo [(188)](#ntr188-C_2021526ES.01000101-E0188), la Comisión ha puesto en marcha en 2021 un estudio piloto en el ámbito de los productos de limpieza, detergentes y cosméticos. El objetivo de este estudio es examinar si la metodología común desarrollada por el Centro Común de Investigación en el ámbito de los productos alimenticios que se ha mencionado anteriormente puede aplicarse a la comparación de la composición de dichos bienes, así como la viabilidad de crear un instrumento de control de los casos de «calidad dual» por parte de las autoridades competentes de los Estados miembros, las ONG o la industria.

2.9.   Artículo 7: omisiones engañosas

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| Artículo 7: Omisiones engañosas   |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 1. | Se considerará engañosa toda práctica comercial que, en su contexto fáctico, teniendo en cuenta todas sus características y circunstancias y las limitaciones del medio de comunicación, omita información sustancial que necesite el consumidor medio, según el contexto, para tomar una decisión sobre una transacción con el debido conocimiento de causa y que, en consecuencia, haga o pueda hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado. |  |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 2. | Se considerará también que hay omisión engañosa cuando un comerciante oculte la información sustancial contemplada en el apartado 1, teniendo en cuenta las cuestiones contempladas en dicho apartado, o la ofrezca de manera poco clara, ininteligible, ambigua o en un momento que no sea el adecuado, o no dé a conocer el propósito comercial de la práctica comercial en cuestión en caso de que no resulte evidente por el contexto, siempre que, en cualquiera de estos casos, haga o pueda hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado. |  |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 3. | Cuando el medio utilizado para comunicar la práctica comercial imponga limitaciones de espacio o de tiempo, a la hora de decidir si se ha omitido información deberán tenerse en cuenta esas limitaciones y todas las medidas adoptadas por el comerciante para poner la información a disposición del consumidor por otros medios. |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  |  | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | |  | 4. | En los casos en que haya una invitación a comprar se considerará sustancial la información que figura a continuación, si no se desprende ya claramente del contexto:  |  |  | | --- | --- | | a) | las características principales del producto, en la medida adecuada al medio utilizado y al producto; |  |  |  | | --- | --- | | b) | la dirección geográfica y la identidad del comerciante, tal como su nombre comercial y, en su caso, la dirección geográfica y la identidad del comerciante por cuya cuenta actúa; |  |  |  | | --- | --- | | c) | el precio, incluidos los impuestos, o, en caso de que este no pueda calcularse razonablemente de antemano por la naturaleza del producto, la forma en que se determina el precio, así como, cuando proceda, todos los gastos adicionales de transporte, entrega o postales o, cuando tales gastos no puedan ser calculados razonablemente de antemano, el hecho de que pueden existir dichos gastos adicionales; |  |  |  | | --- | --- | | d) | los procedimientos de pago, entrega y funcionamiento, si se apartan de las exigencias de la diligencia profesional; |  |  |  | | --- | --- | | e) | en el caso de los productos y transacciones que lleven aparejado un derecho de revocación o cancelación, la existencia de tal derecho; |  |  |  | | --- | --- | | f) | en el caso de productos ofrecidos en mercados en línea, si el tercero que ofrece el producto es un comerciante o no, con arreglo a la declaración de dicho tercero al proveedor del mercado en línea. | |  |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 4bis. | Cuando se ofrezca a los consumidores la posibilidad de buscar productos ofrecidos por distintos comerciantes o consumidores sobre la base de una consulta en forma de palabra clave, expresión u otro tipo de dato introducido, independientemente de dónde se realicen las transacciones en último término, se considerará esencial facilitar, en una sección específica de la interfaz en línea que sea fácil y directamente accesible desde la página en la que se presenten los resultados de la búsqueda, información general relativa a los principales parámetros que determinan la clasificación de los productos presentados al consumidor como resultado de la búsqueda y la importancia relativa de dichos parámetros frente a otros. El presente apartado no se aplicará a proveedores de motores de búsqueda en línea, tal como se definen en el artículo 2, punto 6, del Reglamento (UE) 2019/1150 del Parlamento Europeo y del Consejo. |  |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 5. | Se considerarán sustanciales los requisitos establecidos por el Derecho comunitario en materia de información relacionados con las comunicaciones comerciales, con inclusión de la publicidad o la comercialización, de los que el anexo II contiene una lista no exhaustiva. |  |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 6. | Cuando un comerciante facilite el acceso a las reseñas de los consumidores sobre los productos, se considerará esencial la información acerca de si el comerciante garantiza que las reseñas publicadas pertenezcan a consumidores que hayan realmente utilizado o adquirido el producto. | |

2.9.1.   Información sustancial

El artículo 7, apartados 1 y 2, establece en términos muy generales la obligación positiva para el comerciante de suministrar toda la información que el consumidor medio necesite para tomar una decisión de compra con conocimiento de causa. Es lo que en el artículo 7 se denomina «información sustancial».

La DPCD no define el concepto de «información sustancial», excepto en el caso específico de la «invitación a comprar» a la que se refiere el artículo 7, apartado 4 (véase el punto 2.9.5). Asimismo, el artículo 7, apartado 5, de la DPCD aclara que «[s]e considerarán sustanciales los requisitos establecidos por el Derecho comunitario en materia de información relacionados con las comunicaciones comerciales, con inclusión de la publicidad» (véase el punto 1.2.2).

Por el contrario, tal como se explica en el considerando 15, «[c]uando los Estados miembros hayan introducido requisitos de información más allá de lo especificado en el Derecho comunitario, sobre la base de cláusulas mínimas, la omisión de esta información complementaria no se considerará una omisión engañosa con arreglo a la presente Directiva».

A fin de apreciar caso por caso si se ha omitido información sustancial, las autoridades y organismos jurisdiccionales nacionales han de tener en cuenta todas las características y circunstancias de la práctica comercial de que se trate, incluidas las limitaciones del medio utilizado para comunicarla.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad nacional tomó medidas contra un comerciante que ofrecía productos de seguro de vida sin incluir la información sustancial en la publicidad. La empresa afirmaba que los familiares de una persona cubierta por el seguro obtendrían todas las prestaciones del seguro si dicha persona fallecía. Sin embargo, el comerciante omitió informar a los consumidores de que si el asegurado fallecía dentro de los primeros veinticuatro meses del contrato por razones distintas de un accidente, las prestaciones que recibirían los familiares serían limitadas [(189)](#ntr189-C_2021526ES.01000101-E0189). |  |  |  | | --- | --- | | — | Algunas herramientas comparativas utilizan expresiones como «ganga» para identificar transacciones que no siempre son las más baratas, sino las que ofrecen la mejor relación calidad-precio. La omisión de información acerca de los criterios para utilizar la expresión «ganga» podría considerarse engañosa con arreglo al artículo 7 de la DPCD. | |

2.9.2.   Publicidad encubierta y falta de identificación del propósito comercial

De conformidad con el artículo 7, apartado 2, no dar a conocer el propósito comercial de una práctica comercial se considerará una omisión engañosa cuando ello pueda hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado.

La Directiva sobre el comercio electrónico [(190)](#ntr190-C_2021526ES.01000101-E0190), la Directiva de servicios de comunicación audiovisual [(191)](#ntr191-C_2021526ES.01000101-E0191) y la Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas [(192)](#ntr192-C_2021526ES.01000101-E0192) establecen de modo similar determinados requisitos a este respecto en relación con las comunicaciones comerciales y el envío de correos electrónicos con fines de comercialización directa. El artículo 8, apartado 5, de la Directiva sobre los derechos de los consumidores regula también un aspecto específico de la publicidad encubierta.

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| Artículo 8, apartado 5, de la Directiva sobre los derechos de los consumidores:  «[…] [S]i el comerciante llama por teléfono al consumidor para celebrar un contrato a distancia, deberá revelar, al inicio de la conversación con el consumidor, su identidad y, si procede, la identidad de la persona por cuenta de la cual efectúa la llamada, así como indicar el objetivo comercial de la misma.» |

Si bien estas disposiciones se centran en prácticas o sectores comerciales específicos, el artículo 7, apartado 2, tiene un ámbito de aplicación general y más amplio y abarca cualquier práctica comercial.

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| Por ejemplo:  Una autoridad de protección de los consumidores emprendió acciones contra un comerciante que invitaba a consumidores a reuniones en las que les ofrecía una revisión médica gratuita en el marco de un programa denominado «Cuido mi salud». El comerciante no reveló que el propósito principal de las reuniones era presentar productos para venderlos a los consumidores [(193)](#ntr193-C_2021526ES.01000101-E0193). |

Además de lo dispuesto en el artículo 7, apartado 2, la DPCD prohíbe en cualquier circunstancia determinadas prácticas específicas en las que no se da a conocer el propósito comercial.

El punto 11 del anexo I prohíbe la utilización de «contenido editorial en los medios de comunicación para promocionar un producto, pagando el comerciante por dicha promoción, pero sin que ello quede claramente especificado en el contenido o mediante imágenes y sonidos claramente identificables para el consumidor (publirreportajes)».

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| Por ejemplo:  Un importante periódico se asoció con un operador de telecomunicaciones que financia una sección determinada de la publicación con el título «Vida digital». Dicha sección y todos sus materiales, incluida la promoción de los productos que el operador de telecomunicaciones estaba a punto de lanzar, aparecían como contenido editorial del periódico; la única información al público sobre la naturaleza comercial del material presentado era el texto «en colaboración con», impreso de forma discreta y seguido de la marca comercial del operador de telecomunicaciones. Se consideró que esta práctica infringía el punto 11 del anexo I de la DPCD [(194)](#ntr194-C_2021526ES.01000101-E0194). |

El punto 22 del anexo I prohíbe «[a]firmar de forma fraudulenta o crear la impresión falsa de que un comerciante no actúa a los fines propios de su actividad comercial, industrial, artesanal o profesional, o presentarse de forma fraudulenta como un consumidor».

El artículo 7, apartado 2, junto con los puntos 11 y 22 del anexo I, pueden resultar especialmente pertinentes para los comerciantes en línea (véanse los puntos 4.2.5 sobre los medios sociales y 4.2.6 sobre la comercialización por medio de influentes).

2.9.3.   Información sustancial facilitada de manera poco clara

De conformidad con el artículo 7, apartado 2, proporcionar información sustancial «de manera poco clara, ininteligible, ambigua o en un momento que no sea el adecuado» constituye una omisión engañosa si ello puede hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional llegó a la conclusión de que un comerciante había infringido el artículo 7 de la DPCD al informar a los consumidores de sus derechos de forma poco clara, ambigua y no razonablemente comprensible. El comerciante había informado a los consumidores de su derecho de desistimiento proporcionándoles el texto íntegro de un Decreto del Gobierno. El órgano jurisdiccional constató que el texto incluía numerosas disposiciones no aplicables a los contratos en cuestión y consideró que, al facilitar todo el texto del Decreto del Gobierno, no se proporcionaba información que permitiera a los consumidores conocer de manera sencilla y concreta las condiciones que regían su derecho a desistir del contrato [(195)](#ntr195-C_2021526ES.01000101-E0195). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un operador telefónico anunciaba en televisión un abono de telefonía móvil y destacaba los beneficios concretos de su precio, pero las restricciones y condiciones de la oferta se presentaban en pantalla en letra pequeña y durante un intervalo de tiempo muy breve. Se sostuvo que, a pesar de las limitaciones de espacio y tiempo del medio de comunicación utilizado (televisión), nada impedía que el comerciante indicara de forma más clara estos importantes datos. Por consiguiente, se consideró que dicha publicidad era engañosa en la medida en que se había omitido información sustancial [(196)](#ntr196-C_2021526ES.01000101-E0196). |  |  |  | | --- | --- | | — | El requisito de proporcionar la información sustancial de manera clara, inteligible y en el momento adecuado podría no cumplirse en una situación en la que un comerciante en línea se dirija a los consumidores de un determinado Estado miembro, facilitando parte de la información sustancial en la lengua de ese país, pero suministrando el resto de la misma en una única lengua diferente [(197)](#ntr197-C_2021526ES.01000101-E0197), por ejemplo en las condiciones generales [(198)](#ntr198-C_2021526ES.01000101-E0198). La aplicación de la DPCD en tales casos es complementaria y se entiende sin perjuicio de los requisitos lingüísticos más específicos establecidos con arreglo a otros actos jurídicos de la Unión, como la opción reglamentaria prevista en la Directiva 2011/83/UE en relación con la información contractual en los contratos a distancia y los contratos celebrados fuera del establecimiento (véase el punto 4.1.8 del Documento de orientación sobre la DDC). | |

2.9.4.   Contexto fáctico y limitaciones del medio de comunicación utilizado

El artículo 7, apartado 1, subraya que, para determinar si una práctica comercial es engañosa, se ha considerar «en su contexto fáctico, teniendo en cuenta todas sus características y circunstancias y las limitaciones del medio de comunicación».

El artículo 7, apartado 3, debe interpretarse en relación con el artículo 7, apartado 1. Según el artículo 7, apartado 3, para determinar si se ha omitido información sustancial debe tenerse en cuenta lo siguiente:

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| — | las limitaciones de espacio y de tiempo del medio de comunicación utilizado; |

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| — | todas las medidas adoptadas por el comerciante para poner la información a disposición del consumidor por otros medios. |

Las disposiciones anteriores se aplican a todos los apartados del artículo 7. Además, con arreglo a la parte introductoria del artículo 7, apartado 4, los comerciantes no necesitan facilitar en las invitaciones a comprar información que se desprenda ya claramente del contexto.

El Tribunal de Justicia ha aclarado que, a la hora de apreciar si una práctica debe calificarse de omisión engañosa en el sentido del artículo 7, apartados 1 y 3, de la DPCD, se deben tener en cuenta los factores antes mencionados, aun cuando tal exigencia no se deduzca expresamente de la letra de la normativa nacional aplicable, sino que pueda encontrarse, por ejemplo, en los antecedentes legislativos correspondientes [(199)](#ntr199-C_2021526ES.01000101-E0199).

En el mismo asunto, el Tribunal de Justicia también declaró que las limitaciones de espacio o de tiempo que imponga el medio de comunicación utilizado deben ponderarse atendiendo a la naturaleza y a las características del producto de que se trate. Es necesario determinar si al comerciante le resultaba imposible incluir la información en cuestión o presentarla de forma clara. Cuando resulte imposible incluir toda la información sustancial relativa a un producto, el comerciante podrá remitir en este a su sitio web, siempre que dicho sitio contenga la información relativa a las principales características del producto, al precio y a las demás condiciones, de conformidad con las exigencias establecidas en el artículo 7 [(200)](#ntr200-C_2021526ES.01000101-E0200).

De conformidad con el artículo 7, apartado 2, proporcionar información sustancial «de manera poco clara, ininteligible, ambigua o en un momento que no sea el adecuado» constituye una omisión engañosa si ello puede hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado.

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| Por ejemplo:  Un operador telefónico anunciaba en televisión un abono de telefonía móvil y destacaba los beneficios concretos de su precio, pero las restricciones y condiciones de la oferta se presentaban en pantalla en letra pequeña y durante un intervalo de tiempo muy breve. Un órgano jurisdiccional nacional sostuvo que, a pesar de las limitaciones de espacio y de tiempo del medio de comunicación utilizado (televisión), nada impedía que el comerciante indicara más claramente estos importantes datos. Por consiguiente, se consideró que dicha publicidad era engañosa en la medida en que se había omitido información sustancial [(201)](#ntr201-C_2021526ES.01000101-E0201). |

El artículo 7, apartado 4, letra a), indica asimismo que, en las invitaciones a comprar, deben tenerse en cuenta el medio utilizado y el producto a la hora de aclarar si las características principales del producto constituyen uno de los elementos que han de considerarse información sustancial.

En el asunto Ving Sverige, el Tribunal de Justicia declaró que «puede bastar con que se indiquen determinadas características del producto, si el comerciante remite, por lo demás, a su sitio en Internet, siempre que dicho sitio contenga las informaciones esenciales relativas a las características principales del producto, al precio y al resto de requisitos, con arreglo al artículo 7 de dicha Directiva» [(202)](#ntr202-C_2021526ES.01000101-E0202).

Dada su importancia para la decisión de compra del consumidor, la información sobre el precio total de un producto y sus características principales debe estar claramente visible.

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| Por ejemplo:  Un órgano jurisdiccional nacional consideró engañoso un folleto en el que se indicaba que la tarjeta de crédito publicitada proporcionaría al usuario un ahorro del 3 % del importe de las compras que con ella se realizasen. El órgano jurisdiccional consideró que el mensaje general del folleto inducía a los consumidores la falsa creencia de que el ahorro publicitado lo obtendrían con cualquier tipo de compra que realizasen con la tarjeta de crédito, cuando, en realidad, se aplicaban limitaciones importantes. Dichas limitaciones solo se especificaban en las cláusulas del contrato, lo que no se consideró suficiente, pues se había omitido información sustancial sobre las características del producto publicitado [(203)](#ntr203-C_2021526ES.01000101-E0203). |

El alcance general de la información exigida sobre las características principales de un producto se debe determinar en función del contexto de la invitación a comprar, de la tipología de producto y del medio de comunicación utilizado.

2.9.5.   Información sustancial en las invitaciones a comprar: artículo 7, apartado 4

Invitaciones a comprar

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| Artículo 2, letra i)  «invitación a comprar»: comunicación comercial que indica las características del producto y su precio de una manera adecuada al medio de la comunicación comercial utilizado, y permite así al consumidor realizar una compra; |

En el caso de las «invitaciones a comprar», el artículo 7, apartado 4, de la DPCD considera «sustancial» determinada información. Esto significa que los comerciantes tendrán que ofrecer a los consumidores esta información si no se desprende de otro modo del contexto.

Las «características del producto» se encuentran invariablemente presentes a partir del momento en que existe una presentación escrita o visual del producto. Una interpretación diferente podría alentar a los comerciantes a que facilitasen descripciones vagas de los productos u omitiesen información en sus ofertas comerciales con objeto de eludir los requisitos de información establecidos en el artículo 7, apartado 4, de la DPCD.

La última parte de la definición prevista en el artículo 2, letra i), a saber, «y permite así al consumidor realizar una compra», no exige que la comunicación comercial proporcione al consumidor un mecanismo para comprar realmente (por ejemplo, un número de teléfono o un cupón). Significa que la información contenida en la comercialización del producto debe ser suficiente para permitir que el consumidor tome la decisión de comprar o no un producto determinado a un precio determinado.

En el asunto Ving Sverige, el Tribunal de Justicia declaró:

«De ello se desprende que, a fin de que una comunicación comercial pueda calificarse de invitación a comprar, no es necesario que incluya un medio concreto de compra, o que aparezca en conexión con tal medio o con ocasión de él» [(204)](#ntr204-C_2021526ES.01000101-E0204).

El concepto de invitación a comprar es más restringido que el de publicidad, y no todas las comunicaciones comerciales se considerarán invitaciones a comprar en el sentido del artículo 2, letra i).

Sin embargo, el concepto de invitación a comprar es más amplio que el de información precontractual. Mientras que los requisitos de información precontractual se refieren a la información que se ha de facilitar antes de que el consumidor suscriba un contrato, una invitación a comprar no implica necesariamente que el siguiente paso del consumidor sea celebrar un contrato con un comerciante.

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| Por ejemplo:  Una publicidad en la radio que incluye las características y el precio de un producto es una invitación a comprar, pero por lo general no se considerará información precontractual. |

Esta distinción es especialmente importante por lo que respecta a la interacción entre la DPCD y la DDC. Una amplia variedad de comunicaciones comerciales se considerarían normalmente invitaciones a comprar.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | El sitio web de una compañía aérea que presenta ofertas de vuelos y sus precios |  |  |  | | --- | --- | | — | Un anuncio de venta por correo [(205)](#ntr205-C_2021526ES.01000101-E0205) |  |  |  | | --- | --- | | — | Un folleto de un supermercado que anuncia precios rebajados en determinados productos | |

La DPCD permite a los comerciantes elegir si incluyen o no el precio en sus comunicaciones comerciales. Una comunicación comercial o publicidad que incluya una descripción exhaustiva de la naturaleza de un producto o servicio, así como de sus características y prestaciones, pero no su precio no puede considerarse una «invitación a comprar» en el sentido del artículo 2, letra i), de la DPCD. Un ejemplo de comunicaciones comerciales que no son invitaciones a comprar son los anuncios que promueven la «marca» de un comerciante más que un determinado producto (es decir, la publicidad de marcas).

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| Por ejemplo:  Un órgano jurisdiccional nacional falló que un anuncio que invitaba al consumidor a visitar un sitio web para obtener una oferta de seguros no constituía una invitación a comprar [(206)](#ntr206-C_2021526ES.01000101-E0206). |

Información sustancial

El artículo 7, apartado 4, enumera una serie de requisitos de información que se consideran sustanciales. Con ello se pretende garantizar la máxima seguridad jurídica para los consumidores en ese momento crítico [(207)](#ntr207-C_2021526ES.01000101-E0207). La finalidad del artículo 7, apartado 4, consiste en asegurar que, siempre que los comerciantes hagan ofertas comerciales, faciliten simultáneamente, de forma inteligible e inequívoca, información suficiente para que el consumidor pueda tomar una decisión de compra con conocimiento de causa, salvo que dicha información se desprenda ya claramente del contexto.

No facilitar a los consumidores la información exigida en el artículo 7, apartado 4, en los casos en que haya una invitación a comprar se considerará una omisión engañosa cuando ello pueda hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado.

El Tribunal de Justicia ha precisado que el artículo 7, apartado 4, contiene una enumeración exhaustiva de la información sustancial que debe figurar en una invitación a comprar. Sin embargo, el hecho de que el comerciante facilite la totalidad de la información enumerada en el artículo 7, apartado 4, no excluye que esa invitación pueda calificarse de práctica engañosa con arreglo al artículo 6, apartado 1, o al artículo 7, apartado 2 [(208)](#ntr208-C_2021526ES.01000101-E0208).

No obstante, con el fin de no imponer a los comerciantes cargas de información desproporcionadas o innecesarias, los requisitos del artículo 7, apartado 4, no son estáticos y exigen distintos tipos de información dependiendo de la situación. Esto se desprende, en particular, de las aclaraciones efectuadas en el artículo 7, apartados 1, 3 y 4, según las cuales deben tenerse en cuenta el contexto fáctico y las limitaciones del medio de comunicación utilizado, tal como se expone en el punto anterior.

El asunto Verband Sozialer Wettbewerb versaba sobre un anuncio publicado por una plataforma que mostraba diferentes productos que no eran suministrados por la propia plataforma, sino por terceros vendedores que operaban en ella [(209)](#ntr209-C_2021526ES.01000101-E0209). El mercado facilitaba la celebración de contratos entre comerciantes y compradores, incluidos los consumidores. El Tribunal de Justicia aclaró que la publicidad puede apreciarse con arreglo al artículo 7, apartado 4, en particular para comprobar si se ha proporcionado toda la información sustancial, como los nombres de los comerciantes que ofrecen productos concretos, teniendo en cuenta al mismo tiempo las limitaciones de espacio y otras circunstancias específicas del caso. El Tribunal de Justicia precisó asimismo que puede haber limitaciones de espacio en el sentido del artículo 7, apartado 3, que justifiquen la omisión de la dirección geográfica y la identidad de cada comerciante. No obstante, dicha información debe comunicarse de manera sencilla y rápida al acceder a la plataforma [(210)](#ntr210-C_2021526ES.01000101-E0210).

El artículo 7, apartado 4, letra a), precisa expresamente que, a la hora de apreciar si se ha omitido información sustancial respecto de las características principales del producto, deben tenerse en cuenta el medio utilizado y el producto.

La determinación de cuáles son las características principales de un producto depende, por tanto, del producto de que se trate y de lo que pueda considerarse «adecuado»habida cuenta del «medio» utilizado por el comerciante para realizar la comunicación comercial.

La información sobre las características principales de los bienes puede desprenderse ya de su apariencia o facilitarse en el propio envase o etiquetado, que el consumidor puede consultar en el momento de la venta. Los bienes más complejos pueden requerir la comunicación de información adicional (en los carteles descriptivos del producto que se colocan en el establecimiento o en páginas en línea) para dar a conocer sus características principales.

En este último caso, los consumidores deben ser informados en particular de las características y condiciones restrictivas del producto que el consumidor medio normalmente no espere de la categoría o el tipo de producto de que se trate, ya que estas son especialmente susceptibles de influir en sus decisiones sobre una transacción. Entre dichas características cabría mencionar, por ejemplo, la limitación de la duración o de la naturaleza y prestación de un servicio (por ejemplo, si un servicio de internet de «fibra» es de «fibra al hogar» u de otro tipo) o una determinada composición o especificación de un bien (por ejemplo, el origen sintético de piedras preciosas como los diamantes).

Las advertencias de seguridad pueden, en función de una evaluación caso por caso, constituir una de las características principales de un producto en el sentido del artículo 7, apartado 4. En la actualidad, la legislación sectorial de la UE sobre seguridad de los productos suele exigir a los comerciantes que informen de los aspectos de seguridad en el propio producto o en su embalaje. Así pues, en el caso de las ventas en línea puede ser difícil para los consumidores tomar las decisiones sobre transacciones con verdadero conocimiento de causa si el sitio web en cuestión no ofrece una imagen legible del etiquetado del producto o del embalaje. El artículo 11, apartado 2, de la Directiva 2009/48/CE del Parlamento Europeo y del Consejo sobre la seguridad de los juguetes [(211)](#ntr211-C_2021526ES.01000101-E0211) contiene una importante excepción a este enfoque, pues establece explícitamente que las advertencias de seguridad de los juguetes, como las que especifican las edades mínimas y máximas de los usuarios, deben estar claramente visibles antes de la compra, inclusive cuando la compra se efectúe en línea. Para la mayoría de los productos restantes, la DPCD puede servir de base jurídica para exigir a los comerciantes, especialmente en lo concerniente a la promoción de productos en línea, que informen a los consumidores sobre los aspectos de seguridad que, habida cuenta de la naturaleza del producto, pueden considerarse características principales en el sentido del artículo 7, apartado 4.

Con arreglo al artículo 7, apartado 4, letra b), el hecho de no informar a los consumidores de la dirección geográfica y la identidad del comerciante puede constituir una omisión engañosa.

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| Por ejemplo:  En un asunto relativo a un servicio de citas en línea, un órgano jurisdiccional nacional ordenó a un comerciante que informase de su nombre, dirección, número de registro y dirección de correo electrónico de forma directa y permanente al comercializar los servicios que prestaba en internet. El órgano jurisdiccional sostuvo que el hecho de que el comerciante no publicara su dirección correcta ni ninguna dirección de correo electrónico en su sitio web constituía una omisión engañosa que podía hacer que el consumidor tomase una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado [(212)](#ntr212-C_2021526ES.01000101-E0212). |

Por otra parte, en ocasiones se puede considerar que no se proporciona información sobre la identidad del comerciante porque «se desprende ya claramente del contexto» en el sentido del artículo 7, apartado 4.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | La dirección de una tienda o restaurante donde ya se encuentra el consumidor |  |  |  | | --- | --- | | — | En el caso de las tiendas en línea, el artículo 5 de la Directiva sobre el comercio electrónico obliga a los comerciantes a que  permitan acceder con facilidad y de forma directa y permanente  a su nombre, su dirección y otros datos de contacto, incluida su dirección de correo electrónico. Además, de conformidad con el artículo 10 de la Directiva sobre el comercio electrónico, también hay que facilitar otros datos (por ejemplo, los diferentes pasos técnicos que deben darse para celebrar el contrato) antes de que se efectúe el pedido. | |

Sobre la base de una evaluación caso por caso, indicar el nombre comercial de un comerciante podría bastar para cumplir el requisito establecido en el artículo 7, apartado 4, letra b), sobre la identidad del comerciante. La denominación legal debe figurar en las condiciones generales de la venta, pero no tiene por qué considerarse información sustancial en el sentido del artículo 7, apartado 4.

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| Por ejemplo:  En su material publicitario, una empresa de comida rápida no tendrá que especificar su personalidad jurídica, como Ltd., S.A., SARL, Inc. |

Aparte del requisito previsto en el artículo 7, apartado 4, letra b), la DDC establece otros requisitos de información relativos a los datos de contacto del comerciante, concretamente en el artículo 5, apartado 1 (ventas dentro del establecimiento), y en el artículo 6, apartado 1 (ventas a distancia y fuera del establecimiento).

El artículo 5, apartado 1, letra c), de la Directiva sobre el comercio electrónico obliga a los prestadores de servicios en línea a permitir a los destinatarios de sus servicios y a las autoridades competentes acceder a unas «señas que permitan ponerse en contacto rápidamente con el prestador de servicios y establecer una comunicación directa y efectiva con él, incluyendo su dirección de correo electrónico».

Por tanto, las direcciones de correo electrónico de los comerciantes que desarrollan su actividad por medios electrónicos se puede considerar información sustancial en el sentido del artículo 7, apartado 5, de la DPCD. Esta información ha de ser fácil de encontrar (es decir, no debe figurar únicamente en las condiciones generales) y se debe poder acceder ella de forma directa y permanente.

Asimismo, con arreglo al RGPD, el responsable del tratamiento de los datos deberá facilitar al interesado determinada información obligatoria que, entre otras cosas, incluye la identidad (y los datos de contacto) del responsable y, en su caso, de su representante (salvo que el interesado ya disponga de dicha información).

El artículo 7, apartado 4, letra c), exige a los comerciantes que en las invitaciones a comprar indiquen el precio total (o final). Este precio deberá incluir todos los impuestos (como el IVA) y gastos aplicables. El precio final debe comprender los impuestos y gastos aplicables que sean inevitables y previsibles en el momento de la publicación de la oferta. En caso de que la naturaleza del producto impida que el precio se calcule razonablemente de antemano, se debe informar adecuadamente los consumidores de la forma en que se determina el precio, así como, cuando proceda, todos los gastos adicionales de transporte, entrega o postales o, cuando tales gastos no puedan ser calculados razonablemente de antemano, el hecho de que pueden existir dichos gastos adicionales (véanse también el artículo 5, apartado 1, y el artículo 6, apartado 1, de la DDC).

En el asunto Canal Digital Danmark, el Tribunal de Justicia declaró que, cuando un comerciante fija el precio de un abono de tal modo que el consumidor debe pagar tanto una cuota mensual como una cuota semestral, esta práctica debe calificarse de omisión engañosa en virtud del artículo 7 en el caso de que en la comunicación comercial se destaque especialmente el importe de la cuota mensual, mientras que el importe de la cuota semestral se omite por completo o se presenta de forma menos notoria, si tal omisión hace que el consumidor tome una decisión sobre la transacción que de otro modo no hubiera tomado [(213)](#ntr213-C_2021526ES.01000101-E0213).

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad de protección de los consumidores emprendió acciones contra un operador de telecomunicaciones que no había informado a los consumidores de que tendrían que pagar una cuota de activación para utilizar sus servicios. Los consumidores no fueron informados de esta cuota hasta después de haber firmado el contrato [(214)](#ntr214-C_2021526ES.01000101-E0214). |  |  |  | | --- | --- | | — | Otra autoridad de protección de los consumidores impuso multas administrativas a un operador de telecomunicaciones que había aplicado unos gastos, de los que los consumidores no habían sido informados, por la prestación de servicios que la empresa no podía suministrar [(215)](#ntr215-C_2021526ES.01000101-E0215). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional falló a favor de la decisión de un ayuntamiento de imponer una multa a un proveedor de internet que no había mostrado el precio completo de sus servicios en sus ofertas comerciales, especialmente por no incluir la cuota de línea y los impuestos aplicables [(216)](#ntr216-C_2021526ES.01000101-E0216). | |

En virtud del artículo 7, apartado 4, letra c), de la DPCD, la utilización de «precios de partida», es decir, la indicación de un precio «a partir de» cierto umbral mínimo, está permitida si el precio final no puede «calcularse razonablemente de antemano» debido a la naturaleza del producto.

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| Por ejemplo:  Una agencia de viajes indicó los precios de partida para determinados vuelos y viajes combinados. Un órgano jurisdiccional nacional declaró que la DPCD no excluye la utilización de precios de partida, a condición de que la información proporcionada satisfaga los requisitos de la Directiva, teniendo en cuenta las circunstancias del caso real. Sostuvo que «[p]or consiguiente, la mera indicación de un precio de partida puede estar justificada en los supuestos en los que el precio no pueda calcularse razonablemente de antemano, teniendo en cuenta, en particular, la naturaleza y las características del producto» [(217)](#ntr217-C_2021526ES.01000101-E0217). |

No obstante, el precio mínimo debe ser un precio real aplicable a determinados productos, de conformidad con la publicidad.

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| Por ejemplo:  Una empresa anunciaba la venta de viviendas utilizando expresiones como «Más barato de lo que pueda imaginar. Precios a partir de 2 150 EUR por metro cuadrado». Sin embargo, resultó que no existían viviendas disponibles al precio publicitado. Además, el precio indicado no incluía el IVA. Esta práctica comercial fue considerada engañosa por una autoridad de protección de los consumidores [(218)](#ntr218-C_2021526ES.01000101-E0218). |

Las prácticas comerciales en las que los comerciantes anuncian precios que no existen también podrían constituir una infracción de los puntos 5 y 6 del anexo I de la DPCD, ya que se pueden considerar casos de publicidad señuelo (punto 5) o señuelo y cambio (punto 6).

Con arreglo al artículo 7, apartado 4, letra d), los comerciantes deben facilitar información sobre los procedimientos de pago, entrega y funcionamiento, si se apartan de las exigencias de la diligencia profesional. Esto significa que tal información solo tendrá que mostrarse si dichos procedimientos ponen al consumidor en situación de desventaja en comparación con el nivel de competencia y cuidado especiales que cabe razonablemente esperar de un comerciante en sus relaciones con los consumidores.

La obligación de facilitar información sobre el sistema de tratamiento de las reclamaciones se suprimió a raíz de las modificaciones introducidas por la Directiva (UE) 2019/2161. Esta información es más pertinente en la fase precontractual, que ya está regulada por la DDC, de modo que no era necesario aplicar dicho requisito a las invitaciones a comprar en la fase de publicidad en el marco de la DPCD.

En virtud del artículo 7, apartado 4, letra e), en las invitaciones a comprar se debe mencionar, en su caso, la existencia de un derecho de revocación (desistimiento) o cancelación. Con arreglo a este requisito, los comerciantes únicamente están obligados a informar a los consumidores acerca de la existencia de tales derechos, sin detallar las condiciones y procedimientos necesarios para ejercerlos.

La DDC establece más normas sobre la información precontractual que debe facilitarse al consumidor antes de la firma del contrato, verbigracia en los sitios web de comercio electrónico, durante la visita de un vendedor a domicilio o durante una venta por teléfono [artículo 5, apartado 1, letra d), y artículo 6, apartado 1, letra g)].

Por ejemplo, la Directiva obliga al comerciante a facilitar información sobre el «precio total» antes de que el consumidor quede vinculado por el contrato [artículo 5, apartado 1, letra c), y artículo 6, apartado 1, letra e)]. Además, el consumidor tiene derecho al reembolso de cualquier pago adicional cuando no haya dado su consentimiento expreso para dicho pago, pero el comerciante lo haya deducido utilizando opciones por defecto, como las casillas marcadas previamente (artículo 22).

En los contratos de venta a distancia y fuera del establecimiento, el comerciante deberá facilitar información sobre las condiciones, el plazo y los procedimientos para ejercer el derecho de desistimiento. Asimismo, deberá proporcionar el modelo de formulario de desistimiento reproducido en el anexo I, letra B, de la Directiva sobre los derechos de los consumidores [artículo 6, apartado 1, letra h)].

Las obligaciones recogidas en el artículo 7, apartado 4, letra f), apartado 4 bis, y apartado 6, en relación con los mercados en línea, la transparencia de los resultados de las búsquedas y las reseñas de los usuarios se analizan en el punto 4.2.

2.9.6.   Pruebas gratuitas y trampas de suscripción

Las pruebas gratuitas son instrumentos de comercialización que permiten a los consumidores pedir un producto o suscribirse a un servicio sin coste o por un pequeño importe (a saber, gastos de envío de la muestra). Algunas pruebas gratuitas constituyen prácticas comerciales desleales que llevan a los consumidores a realizar una suscripción no deseada. Un estudio llevado a cabo en 2017 por la Comisión sobre las pruebas gratuitas y las trampas de suscripción en línea reveló la prevalencia de diversas prácticas descritas a continuación [(219)](#ntr219-C_2021526ES.01000101-E0219).

Si un comerciante no facilita su dirección geográfica y su identidad en una invitación a comprar, puede estar incumpliendo el artículo 7, apartado 4, letra b), de la DPCD. Además, el artículo 6, apartado 1, de la DDC y el artículo 5, apartado 1, letra c), de la Directiva sobre el comercio electrónico exigen a los comerciantes en línea que den acceso a información que permita a los consumidores ponerse en contacto con ellos. Los requisitos de estas Directivas pueden considerarse información sustancial a tenor del artículo 7, apartado 5, de la DPCD.

Si un comerciante no deja claro a los consumidores que al registrarse para obtener una prueba gratuita pueden estar realizando una suscripción, podría estar infringiendo el artículo 7, apartados 1 y 2 y apartado 4, letra a), de la DPCD, al omitir información sustancial. En función de las circunstancias, también podría existir una infracción del artículo 6, apartado 1, letra a), de la DPCD.

La omisión de información sobre los pagos recurrentes de una suscripción, o su facilitación de manera poco clara, podrían ser contrarias al artículo 6, apartado 1, letra d), o al artículo 7, apartados 1, 2 y 4, letra c), de la DPCD.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un operador de telecomunicaciones anunció en vallas publicitarias que los consumidores podían recibir dos tabletas o un teléfono móvil y una tableta por el precio de 1 PLN. Sin embargo, el comerciante no informó claramente a los consumidores de que, para poder aprovechar esa oferta, tenían que firmar un contrato de abono de 24 meses y un contrato de compra de los productos con 36 cuotas mensuales. La autoridad de protección de los consumidores competente consideró que se trataba de publicidad engañosa en el sentido del artículo 6, apartado 1, letra d), de la DPCD [(220)](#ntr220-C_2021526ES.01000101-E0220). |  |  |  | | --- | --- | | — | En 2021, la Comisión y las autoridades nacionales de protección de los consumidores tomaron medidas en relación con la falta de información clara al efectuar compras con tarjetas de crédito, que puede encerrar problemas como el encubrimiento de los costes reales mediante la indicación de los pagos recurrentes en letra pequeña u oculta [(221)](#ntr221-C_2021526ES.01000101-E0221). Aunque las entidades emisoras de tarjetas de crédito no son las que gestionan estos sistemas, tienen el deber de informar adecuadamente a sus clientes. En la ventana de pago en la que los consumidores introducen los datos de su tarjeta de crédito al comprar en línea, a menudo solo figura información sobre el importe de un pago único, no sobre la suscripción recurrente. En virtud de la DPCD y de la Directiva sobre servicios de pago, los consumidores deben ser informados de los importes específicos de todas las operaciones de pago, incluidas las recurrentes. |  |  |  | | --- | --- | | — | En 2020, una autoridad nacional multó al operador de dos sitios web de citas por infracciones de la DPCD en relación con los modelos de suscripción a sitios web. En concreto, la autoridad constató que, aunque los sitios web se anunciaban como gratuitos, los servicios esenciales (por ejemplo, contactar con otros usuarios) eran de pago, de modo que los consumidores recibían información engañosa sobre las suscripciones, renovaciones y comisiones. Por otra parte, el elevado número de reclamaciones de los consumidores, así como su deficiente tramitación, pusieron de manifiesto la negativa del comerciante a modificar sus prácticas de comunicación [(222)](#ntr222-C_2021526ES.01000101-E0222). | |

Además, la DDC establece en su artículo 8, apartado 2, normas específicas para mejorar la transparencia de los pagos electrónicos. Con arreglo a dicha disposición, en los contratos a distancia celebrados por medios electrónicos se deberá facilitar de manera clara y destacada, y justo antes de que el consumidor efectúe su pedido, la información relativa a las características principales del bien o servicio, el precio total, incluidos los impuestos, y la duración del contrato y de las obligaciones de los consumidores; no basta con facilitar esta información en las fases previas del procedimiento de compra. Asimismo, el consumidor deberá poder confirmar expresamente que es consciente de que el pedido implica una obligación de pago, incluidos los importes recurrentes, por ejemplo activando un botón de pedido inequívocamente etiquetado. Se debe informar claramente al consumidor tanto del importe de un pago único como del importe de los pagos recurrentes que puedan sucederse.

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| Por ejemplo:  Un comerciante se puso en contacto con consumidores a través de llamadas telefónicas no solicitadas para promover la venta de un libro de rompecabezas gratuito junto con una suscripción de seis meses, que implicaba la compra de cinco libros adicionales al precio correspondiente. Un órgano jurisdiccional nacional consideró que, sobre la base de la información facilitada y del hincapié que se hacía en el primer libro gratuito, los consumidores podrían haber pensado que se comprometían a realizar un pago único, cuando en realidad estaban contratando una suscripción. Se constató que el comerciante había infringido el artículo 6, apartado 1, letra a), de la DPCD al no facilitar información clara sobre la naturaleza del producto [(223)](#ntr223-C_2021526ES.01000101-E0223). |

Por otra parte, describir un producto como «gratuito», «regalo», «sin gastos» o cualquier fórmula equivalente si el consumidor tiene que abonar dinero por cualquier concepto distinto del coste inevitable de la respuesta a la práctica comercial y la recogida del producto o del pago por la entrega de este es una práctica comercial que se considera desleal en cualquier circunstancia, y por tanto está prohibida por la DPCD, tal como se desprende del punto 20 del anexo I de la Directiva.

El suministro no solicitado (exigir el pago, la devolución o la custodia de productos que no hayan sido solicitados por el consumidor) es también una práctica comercial que está prohibida en cualquier circunstancia por la DPCD, tal como se desprende del punto 29 del anexo I de la Directiva.

2.10.   Artículos 8 y 9: prácticas comerciales agresivas

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| Artículo 8: Prácticas comerciales agresivas  Se considerará agresiva toda práctica comercial que, en su contexto fáctico, teniendo en cuenta todas sus características y circunstancias, merme o pueda mermar de forma importante, mediante el acoso, la coacción, incluido el uso de la fuerza, o la influencia indebida, la libertad de elección o conducta del consumidor medio con respecto al producto y, por consiguiente, le haga o pueda hacerle tomar una decisión sobre una transacción que de otra forma no hubiera tomado. |

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| Artículo 9: Utilización del acoso, la coacción y la influencia indebida  Para determinar si una práctica comercial hace uso del acoso, la coacción, con inclusión del uso de la fuerza, o la influencia indebida se tendrán en cuenta:   |  |  | | --- | --- | | a) | el momento y el lugar en que se produce, su naturaleza o su persistencia; |  |  |  | | --- | --- | | b) | el empleo de un lenguaje o un comportamiento amenazador o insultante; |  |  |  | | --- | --- | | c) | la explotación por parte del comerciante de cualquier infortunio o circunstancia específicos lo suficientemente graves como para mermar la capacidad de discernimiento del consumidor, de los que el comerciante tenga conocimiento, para influir en la decisión del consumidor con respecto al producto; |  |  |  | | --- | --- | | d) | cualesquiera obstáculos no contractuales onerosos o desproporcionados impuestos por el comerciante cuando un consumidor desee ejercitar derechos previstos en el contrato, incluidos el derecho de poner fin al contrato o el de cambiar de producto o de comerciante; |  |  |  | | --- | --- | | e) | la amenaza de ejercer cualquier acción que, legalmente, no pueda ejercerse. | |

La DPCD proporciona una definición única de prácticas comerciales agresivas que se puede aplicar en toda la Unión. La Directiva impide que los comerciantes adopten técnicas de venta que limiten la libertad de elección o conducta del consumidor con respecto al producto, de forma que distorsionen su comportamiento económico.

Son prácticas comerciales agresivas las que utilizan el acoso, la coacción, la fuerza física o la influencia indebida. Pueden implicar comportamientos en la fase de comercialización, así como prácticas durante la transacción o después de que esta haya tenido lugar. Como ha precisado el Tribunal de Justicia, salvo que se evalúen prácticas prohibidas en el anexo I, una práctica comercial únicamente puede calificarse de agresiva «al término de una evaluación concreta y específica de sus elementos, en la que se efectúe una apreciación con arreglo a los criterios enunciados en los artículos 8 y 9 de esa Directiva» [(224)](#ntr224-C_2021526ES.01000101-E0224).

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| Por ejemplo:  Un órgano jurisdiccional nacional falló que, para que una práctica comercial pudiera calificarse de agresiva y desleal, no solo debía influir en la decisión del consumidor sobre una transacción, sino que también tenía que llevarse a cabo con determinados métodos. Esto significa que una práctica agresiva debe llevar aparejado un comportamiento activo por parte del comerciante («el acoso, la coacción, incluido el uso de la fuerza, o la influencia indebida») que limite la libertad de elección del consumidor [(225)](#ntr225-C_2021526ES.01000101-E0225). |

Las prácticas agresivas pueden incluir conductas ya cubiertas por otros ámbitos de la legislación nacional, como el Derecho contractual y el Derecho penal. La DPCD crea un nivel complementario de protección que puede activarse por medios de coerción pública sin tener necesariamente que incoar procedimientos civiles o penales.

El artículo 9, letra c), prohíbe las prácticas que ejerzan una influencia indebida en los consumidores, tales como la explotación por parte del comerciante de cualquier infortunio o circunstancia específicos de los que tenga conocimiento para influir en la decisión del consumidor sobre un producto. Véase el punto 4.2.7 para una explicación más detallada sobre la pertinencia de esta base jurídica en el entorno digital.

El artículo 9, letra d), impide a los comerciantes imponer obstáculos no contractuales desproporcionados en perjuicio de los consumidores que deseen ejercitar derechos previstos en el contrato, incluidos el derecho de poner fin al contrato o el de cambiar de producto o de comerciante. Esta disposición es importante en particular para evitar los obstáculos no contractuales al cambio en los contratos de servicios públicos de telecomunicaciones y energía [(226)](#ntr226-C_2021526ES.01000101-E0226). Véase el punto 4.2.11 para una explicación más detallada sobre la cuestión de la «cautividad del consumidor».

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| Por ejemplo:  Un órgano jurisdiccional nacional declaró que la práctica de que un comerciante hiciera especialmente gravoso para sus clientes rescindir sus contratos de servicios con él, hasta el punto de que a menudo se hallaban atrapados en renovaciones automáticas de hecho, constituía una práctica comercial agresiva [(227)](#ntr227-C_2021526ES.01000101-E0227). |

El artículo 9, letra e), se refiere a la amenaza de ejercer cualquier acción que, legalmente, no pueda ejercerse. Las prácticas agresivas se producen con frecuencia en las ventas a domicilio u otro tipo de ventas de bienes de consumo fuera del establecimiento y en el sector del aprovechamiento por turno de bienes de uso turístico. También se observan prácticas agresivas en el cobro de deudas por terceros. Asimismo, deben considerarse prácticas agresivas los obstáculos onerosos o desproporcionados al cambio.

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| Por ejemplo:  Una autoridad de protección de los consumidores dictaminó que el envío de una citación a un consumidor para que compareciera ante un juez que carecía de competencia y que no había recibido ninguna solicitud del comerciante constituía una práctica agresiva. La finalidad de dicha práctica consistía en intimidar a los consumidores por medio de una influencia indebida [(228)](#ntr228-C_2021526ES.01000101-E0228). |

El Tribunal de Justicia ha proporcionado orientaciones adicionales sobre la apreciación de las prácticas agresivas en asuntos concretos.

En el asunto Wind Tre, el Tribunal de Justicia sostuvo que la comercialización de tarjetas SIM en las que se habían preinstalado y preactivado unos servicios sin haber informado de modo adecuado al consumidor de dichos servicios ni de su coste se podía considerar una práctica agresiva prohibida de suministro no solicitado a tenor del punto 29 del anexo I [(229)](#ntr229-C_2021526ES.01000101-E0229). A efectos de la apreciación, resulta indiferente que la utilización de los servicios haya podido requerir una acción consciente por parte del consumidor o que el consumidor haya tenido la posibilidad de desactivar los servicios, ya que, a falta de información adecuada, no cabe considerar que tal acción demuestre la existencia de una libre elección con respecto a tales servicios [(230)](#ntr230-C_2021526ES.01000101-E0230).

Por otra parte, el Tribunal de Justicia precisó en el asunto Waternet que el punto 29 del anexo I no abarca una práctica consistente en mantener la conexión a la red pública de distribución de agua cuando se instala un consumidor en una vivienda que había estado previamente ocupada si dicho consumidor no puede elegir el proveedor de tal servicio, este proveedor factura, en función del consumo de agua, tarifas que cubren los costes y son transparentes y no discriminatorios, y dicho consumidor sabe que la citada vivienda está conectada a la red pública de distribución de agua y que el abastecimiento de agua es de pago [(231)](#ntr231-C_2021526ES.01000101-E0231). El Tribunal de Justicia distinguió estas circunstancias del asunto Wind Tre y señaló que el consumo de agua requiere una acción voluntaria por parte del consumidor y que es probable que un consumidor medio sepa que una vivienda está conectada a la red pública de distribución de agua potable y que el abastecimiento de agua es de pago [(232)](#ntr232-C_2021526ES.01000101-E0232).

En el asunto Orange Polska, el Tribunal de Justicia sostuvo que la firma de un contrato en presencia de un mensajero no puede considerarse en cualquier circunstancia una práctica agresiva por influencia indebida con arreglo a los artículos 8 y 9 [(233)](#ntr233-C_2021526ES.01000101-E0233), sino que debe tenerse en cuenta si el comportamiento del comerciante en el caso concreto produce el efecto de ejercer presión sobre el consumidor de manera que se merme de forma significativa su libertad de elección y si incomoda al consumidor o turba su reflexión relativa a la decisión comercial que ha de tomar. Así pues, ha de apreciarse la «significación» del menoscabo de la libertad de elección o conducta del consumidor medio con respecto a un producto.

El hecho de que no se haya dado al consumidor la oportunidad de leer con antelación las cláusulas contractuales tipo no implica, por sí mismo, que el modo de celebración del contrato se califique de práctica agresiva (apartado 43). No obstante, el Tribunal de Justicia proporcionó en el apartado 48 ejemplos de situaciones que podían considerarse agresivas:

«A modo de ejemplo, puede estar incluida en esa categoría de comportamiento, por un lado, la mención de que cualquier retraso en la firma del contrato o de la cláusula adicional implica que la posterior celebración del contrato o de la cláusula adicional solo será posible en condiciones menos favorables, o el hecho de que el consumidor se exponga al pago de penalizaciones contractuales o, en el supuesto de modificación del contrato, a la suspensión de la prestación del servicio del comerciante. Por otro lado, puede estar comprendido en esa misma categoría de comportamiento el hecho de que el mensajero informe al consumidor de que, en caso de que no firme el contrato o la cláusula adicional que le ha entregado o se demore en hacerlo, podría recibir una valoración desfavorable por parte de su empresario».

3.   LISTA NEGRA DE PRÁCTICAS COMERCIALES (ANEXO I)

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| Artículo 5, apartado 5  En el anexo I figura una lista de las prácticas comerciales que se considerarán desleales en cualquier circunstancia. La misma lista única se aplicará en todos los Estados miembros y sólo podrá modificarse mediante una revisión de la presente Directiva. |

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| Considerando 17  Para incrementar la seguridad jurídica, es importante que estén identificadas aquellas prácticas comerciales que se consideran desleales en cualquier circunstancia. Ese tipo de prácticas se enumeran exhaustivamente en la lista del anexo I. Se trata exclusivamente de las prácticas comerciales que pueden considerarse desleales sin necesidad de un examen pormenorizado de que se dan en cada caso concreto los supuestos contemplados en los artículos 5 a 9. La lista solo puede modificarse mediante una revisión de la presente Directiva. |

La lista del anexo I se elaboró para que las autoridades de ejecución, los comerciantes, los profesionales de la comercialización y los clientes pudieran identificar determinadas prácticas y darles una respuesta eficaz más inmediata. Por tanto, conduce a una mayor seguridad jurídica. Si puede demostrarse que el comerciante ha llevado a cabo una práctica comercial incluida en la lista negra, las autoridades nacionales de ejecución pueden adoptar medidas para sancionarlo sin tener que realizar un examen individual (es decir, evaluar el posible efecto de la práctica en el comportamiento económico del consumidor medio).

3.1.   Productos que no pueden ser legalmente vendidos: punto 9

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| Punto 9 del anexo I  «Afirmar o crear por otro medio la impresión de que un producto puede ser legalmente vendido no siendo cierto.» |

Esta práctica se ha prohibido para evitar que, al comercializar un producto o servicio, un comerciante omita informar claramente a los consumidores de que existen normas jurídicas que pueden restringir la venta, posesión o utilización de un determinado producto. Se trata de productos o servicios cuya venta está prohibida o es ilegal en cualquier circunstancia, tales como las drogas ilícitas o las mercancías robadas. Dado que estas prácticas suelen implicar actividades delictivas o a comerciantes deshonestos, son fáciles de identificar. Tales prácticas suelen constituir asimismo violaciones graves de otras leyes que normalmente son más específicas y que prevalecen sobre la DPCD.

La segunda categoría de prácticas se refiere a productos o servicios que no son ilegales pero que solo pueden comercializarse y venderse legalmente en determinadas condiciones o con determinadas restricciones.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Los viajes combinados solo pueden ser organizados por comerciantes que cumplan los requisitos de protección frente a la insolvencia impuestos por la Directiva relativa a los viajes combinados [(234)](#ntr234-C_2021526ES.01000101-E0234). Un órgano jurisdiccional nacional dictaminó que una agencia de viajes que ofrecía tales viajes combinados pese a no haber efectuado un depósito de garantía en un fondo nacional de insolvencias había infringido el punto 9 del anexo I al dar a los consumidores la falsa impresión de que la oferta se ajustaba plenamente a Derecho [(235)](#ntr235-C_2021526ES.01000101-E0235). |  |  |  | | --- | --- | | — | Crear la impresión de que unas entradas pueden venderse legalmente cuando existe una prohibición legislativa nacional en el Estado del EEE de venta, en el Estado del EEE de ejecución o en ambos se considera una práctica comercial desleal, en virtud de la sentencia del Tribunal de la AELC en un asunto relativo a la comercialización y reventa de entradas a los Juegos Olímpicos y Paralímpicos de Londres de 2012 por un comerciante [(236)](#ntr236-C_2021526ES.01000101-E0236). | |

3.2.   Planes piramidales: punto 14

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| Punto 14 del anexo I  «Crear, dirigir o promocionar un plan de venta piramidal en el que el consumidor realice una contraprestación a cambio de la oportunidad de recibir una compensación derivada fundamentalmente de la entrada de otros consumidores en el plan, y no de la venta o el consumo de productos.» |

Esta práctica se ha prohibido para impedir que los comerciantes induzcan a los consumidores a contratar un plan que les prometa recibir una compensación cuando, en realidad, se les compensará fundamentalmente por atraer a nuevos miembros al plan, y no por la venta o el consumo de productos. Por lo general, la estructura piramidal del plan se ha concebido de tal forma que solo aporta ventajas a los organizadores situados en la parte superior, mientras que los consumidores captados no suelen tener ninguna posibilidad razonable de recuperar lo que han invertido. El Tribunal de Justicia ha aclarado las condiciones en las cuales un plan de venta comercial puede considerarse un «plan de venta piramidal» en el sentido del punto 14 del anexo I. El Tribunal de Justicia señaló lo siguiente:

«[L]a prohibición de los planes de ventas piramidales se basa […] en tres requisitos comunes. En primer lugar, que tal plan se base en la promesa de que el consumidor tendrá la posibilidad de obtener un beneficio económico. En segundo lugar, el cumplimiento de esta promesa depende de la entrada de otros consumidores en el plan. Por último, la mayoría de los ingresos que permiten financiar la compensación prometida a los consumidores no procede de una actividad económica real» [(237)](#ntr237-C_2021526ES.01000101-E0237).

En el mismo asunto, el Tribunal de Justicia precisó que

«un plan de venta piramidal sólo constituye una práctica comercial desleal en cualquier circunstancia cuando tal plan exija al consumidor una contraprestación financiera, con independencia de cuál sea su importe, a cambio de la oportunidad de recibir una compensación derivada fundamentalmente de la entrada de otros consumidores en el plan, y no de la venta o el consumo de productos» [(238)](#ntr238-C_2021526ES.01000101-E0238).

En el caso que nos ocupa, la empresa había anunciado una prima a los nuevos clientes por cada cliente que captasen. Todos los clientes nuevos tenían que pagar gastos de registro. El Tribunal de Justicia expresó dudas en cuanto a si la posibilidad de que el consumidor recibiera una compensación se derivaba fundamentalmente de la entrada de otros consumidores en el plan, y señaló que las primas abonadas a los participantes anteriores únicamente se financiaron en una pequeña parte mediante las contraprestaciones financieras solicitadas a los nuevos miembros. El Tribunal de Justicia recordó asimismo que, aunque una determinada práctica no esté prohibida por las disposiciones del anexo I, se puede considerar que dicha práctica es desleal en el sentido de las disposiciones generales de la Directiva (artículos 5 a 9).

El asunto Loterie Nationale versaba sobre un plan en el que se captaba a jugadores para que participaran de forma colectiva en los sorteos de Lotto. Se incorporaba constantemente a nuevos jugadores, cuyas contraprestaciones servían, de hecho, para financiar las compensaciones de los jugadores anteriores y beneficiar a los organizadores del plan. Los nuevos miembros debían abonar una cuota de ingreso de 10 EUR y una contribución mensual de 43 EUR para participar en los sorteos. Los ganadores percibían en efecto el 50 % del premio que les correspondía y también existía un límite máximo de ganancia de un millón de euros, de modo que los importes superiores a esa cifra no se abonaban a los jugadores. El Tribunal de Justicia aclaró que basta con que exista una vinculación indirecta entre las contraprestaciones realizadas por los nuevos participantes y las compensaciones percibidas por los participantes anteriores para que este tipo de práctica pueda calificarse de plan piramidal. Una interpretación contraria privaría a la prohibición de su efecto útil [(239)](#ntr239-C_2021526ES.01000101-E0239).

«En cambio, no cabe deducir del tenor literal de esa disposición que la vinculación económica exigida deba ser necesariamente directa. Lo que importa es la calificación como “fundamental” o “principal” de las contraprestaciones realizadas por los nuevos participantes en tal plan» [(240)](#ntr240-C_2021526ES.01000101-E0240).

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| Por ejemplo:  Una autoridad de protección de los consumidores tomó medidas en tres asuntos de planes piramidales. En uno de los asuntos, el sistema de compensación del plan de ventas no se basaba en los volúmenes de ventas, sino en el número de nuevos agentes de ventas que cada uno de los revendedores era capaz de atraer al plan [(241)](#ntr241-C_2021526ES.01000101-E0241). Otro asunto versaba sobre un plan de ventas cuya estructura de recompensas tenía el objetivo principal de atraer a nuevos consumidores mediante la recuperación de los gastos de registro a partir de la incorporación de otros agentes [(242)](#ntr242-C_2021526ES.01000101-E0242). En un tercer asunto, se proponía a los consumidores que adquiriesen productos a través de mecanismos destinados a captar a otros vendedores, a quienes se les pedía una contribución inicial o la suscripción a un programa de compras personales [(243)](#ntr243-C_2021526ES.01000101-E0243). La autoridad también tuvo en cuenta cómo funcionaban los planes en la práctica. Se centró en el número de agentes que realmente generaban ventas en comparación con el número total de consumidores captados y con la importancia diversa de los ingresos o adquisiciones procedentes de los agentes o de las ventas realizadas a personas externas. Las investigaciones pusieron de manifiesto que los mecanismos en cuestión impedían que el consumidor hiciera una contribución a cambio de la oportunidad de recibir una compensación derivada fundamentalmente de la entrada de otros consumidores en el plan, y no de la venta o el consumo de productos. |

Las estructuras jerárquicas como los planes piramidales son complejas y puede resultar difícil cuantificar los beneficios que supone para la empresa la incorporación de nuevos miembros. También pueden existir diversos métodos para calcular la compensación recibida por los miembros existentes.

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| Por ejemplo:  Una autoridad de protección de los consumidores emprendió acciones contra un plan piramidal cuyo organizador ofrecía a los participantes la oportunidad de recibir donaciones en efectivo a cambio de la entrada de nuevos miembros en el plan [(244)](#ntr244-C_2021526ES.01000101-E0244). Para obtener tales beneficios financieros, los participantes tenían que: pagar una cuota de registro, hacer una donación en efectivo a otro participante, hacer otras donaciones a otro participante y pagar una comisión al organizador del sistema. La posibilidad de obtener donaciones en efectivo de un nuevo participante solo surgiría cuando se crease un «círculo azul» compuesto por participantes introducidos por personas introducidas previamente por un nuevo participante. |

Parece necesario distinguir entre la práctica comercial prohibida n.o 14, cuyos participantes ganan dinero mayoritaria o exclusivamente captando a nuevos participantes para el programa, y la comercialización multinivel, en la que los miembros del equipo de ventas obtienen una compensación basada sobre todo en las ventas que generan personalmente y también en las ventas de los demás agentes que han captado.

Por otra parte, es difícil trazar la línea divisoria entre consumidores y comerciantes: tras entrar en un plan, un consumidor podría, a partir del momento en que comience su promoción, ser considerado un comerciante y verse también sujeto a la prohibición de la DPCD por lo que respecta a las conductas profesionales adoptadas en el marco del plan.

3.3.   Productos que curan enfermedades, disfunciones o malformaciones: punto 17

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| Punto 17 del anexo I  «Proclamar falsamente que un producto puede curar enfermedades, disfunciones o malformaciones.» |

Esta prohibición abarca las situaciones en que un comerciante afirma que su producto o servicio puede mejorar o curar determinadas dolencias físicas o trastornos mentales.

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| Por ejemplo:  Una autoridad de protección de los consumidores dictaminó que la afirmación de que un sillón de masaje tenía efectos curativos en la salud humana (incluida la curación de enfermedades de la columna y del sistema circulatorio) incurría en la prohibición impuesta en el punto 17 del anexo I [(245)](#ntr245-C_2021526ES.01000101-E0245). |

La información errónea relacionada con las declaraciones de propiedades saludables ha sido frecuente durante la pandemia de COVID-19. Comerciantes deshonestos anunciaban y vendían productos, como mascarillas y gorros de protección o desinfectantes para manos, que supuestamente prevenían o curaban la infección. Sin embargo, estas declaraciones se formulaban a menudo sin remitirse a pruebas científicas sólidas o sin atender plenamente a las recomendaciones oficiales de los expertos. Tales alegaciones podrían infringir los artículos 5 y 6 de la DPCD, que prohíben las acciones engañosas en relación con las características principales del producto; en determinados casos, también podrían incurrir en la prohibición prevista en el punto 17 del anexo I. Para ayudar a combatir tales prácticas, la Comisión reunió a las autoridades nacionales que colaboran en la red de cooperación para la protección de los consumidores y adoptaron una posición común [(246)](#ntr246-C_2021526ES.01000101-E0246) sobre la manera de hacer frente a las estafas relacionadas con la COVID-19.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad nacional bloqueó el sitio web de un comerciante que anunciaba un medicamento que contenía los principios activos de un antiviral para el tratamiento del VIH como «el único medicamento contra el coronavirus (COVID-19)» y «la única solución para combatir el coronavirus (COVID-19)», a pesar de las declaraciones oficiales de las autoridades sanitarias de que no existe un remedio eficaz para luchar contra el virus [(247)](#ntr247-C_2021526ES.01000101-E0247). |  |  |  | | --- | --- | | — | En tres asuntos, las autoridades nacionales y un órgano jurisdiccional consideraron agresivas las prácticas de comerciantes que creaban la impresión de que los productos que vendían podían proteger frente al coronavirus. En particular, se constató que los comerciantes se aprovechaban del temor de los consumidores a infectarse por coronavirus, lo que nublaba su juicio, y que las prácticas de comercialización llevadas a cabo sacaban partido de una situación de grave preocupación social [(248)](#ntr248-C_2021526ES.01000101-E0248). | |

Estas declaraciones también se abordan en parte en la legislación específica de la UE. La DPCD ha de entenderse asimismo sin perjuicio de las normas de la UE acerca de las propiedades saludables de los productos. Por consiguiente, el punto 17 se aplica únicamente como complemento de la normativa vigente de la Unión sobre las declaraciones de propiedades saludables. Sin embargo, cualquier práctica engañosa relacionada con los productos de salud y bienestar aún se puede evaluar a la luz del artículo 6 de la DPCD (por ejemplo, cuando la presentación general induzca a error).

La prohibición se refiere, en primer lugar, a las alegaciones relativas a las condiciones físicas que la ciencia médica califica de patologías, disfunciones o malformaciones. Sin embargo, como estas alegaciones están también reguladas por la legislación sectorial de la UE, la utilidad práctica del punto 17 en relación con estas prácticas es escasa.

De conformidad con el artículo 7, apartado 3, del Reglamento IAC [(249)](#ntr249-C_2021526ES.01000101-E0249), la información sobre un alimento facilitada por un comerciante a un consumidor «no atribuirá a ningún alimento las propiedades de prevenir, tratar o curar ninguna enfermedad humana, ni hará referencia a tales propiedades». Esta disposición general se aplica a los explotadores de empresas alimentarias en todas las fases de la cadena alimentaria, en caso de que sus actividades conciernan a la información alimentaria facilitada al consumidor. Por «información alimentaria» se entiende la información relativa a un alimento y puesta a disposición por medio de una etiqueta, otro material de acompañamiento, o cualquier otro medio, incluidas las herramientas tecnológicas o la comunicación verbal.

Por otra parte, el Reglamento de la UE relativo a las declaraciones nutricionales y de propiedades saludables en los alimentos [(250)](#ntr250-C_2021526ES.01000101-E0250) establece normas detalladas sobre el uso de tales declaraciones en las comunicaciones comerciales, ya sea en el etiquetado, la presentación o la publicidad de los alimentos.

Con arreglo al Reglamento, las declaraciones nutricionales («cualquier declaración que afirme, sugiera o dé a entender que un alimento posee propiedades nutricionales benéficas específicas») solo se autorizarán si están enumeradas en el anexo y se ajustan a las condiciones fijadas en dicho Reglamento. En cuanto a las declaraciones de propiedades saludables («cualquier declaración que afirme, sugiera o dé a entender que existe una relación entre una categoría de alimentos, un alimento o uno de sus constituyentes, y la salud»), quedarán prohibidas a no ser que estén autorizadas de conformidad con el citado Reglamento e incluidas en las listas de declaraciones autorizadas previstas en los artículos 13 y 14. Además, el Reglamento prohíbe expresamente las siguientes declaraciones de propiedades saludables [(251)](#ntr251-C_2021526ES.01000101-E0251):

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| — | las declaraciones que sugieran que la salud podría verse afectada si no se consume el alimento de que se trate; |

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| — | las declaraciones que hagan referencia al ritmo o la magnitud de la pérdida de peso; |

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| — | las declaraciones que hagan referencia a recomendaciones de médicos individuales u otros profesionales de la salud y otras asociaciones no mencionadas en el artículo 11 del citado Reglamento. |

Las declaraciones de propiedades saludables también están reguladas por la legislación sanitaria y farmacéutica de la UE. El artículo 6, apartado 1, de la Directiva 2001/83/CE sobre medicamentos deja claro que no podrá comercializarse ningún medicamento en un Estado miembro sin que se haya concedido una autorización de comercialización. Los artículos 86 a 100 de dicha Directiva recogen, asimismo, disposiciones específicas sobre la publicidad de medicamentos destinada al público. Se prohíbe la publicidad de medicamentos que solo puedan dispensarse con receta médica y de productos que contengan sustancias psicotrópicas o estupefacientes. Los Estados miembros también pueden prohibir la publicidad de los medicamentos reembolsables. Se permite la publicidad de los medicamentos de venta libre, pero con determinadas condiciones. Por ejemplo:

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| — | deberá realizarse de manera tal que resulte evidente el carácter publicitario del mensaje y quede claramente especificado que el producto es un medicamento; |

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| — | deberá favorecer la utilización racional del mismo, presentándolo de forma objetiva y sin exagerar sus propiedades; |

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| — | no podrá ser engañosa; |

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| — | no se podrá dirigir, exclusiva o principalmente, a niños; |

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| — | no podrá utilizar de forma abusiva, alarmante o engañosa representaciones visuales de las alteraciones del cuerpo humano producidas por enfermedades o lesiones, o de la acción de un medicamento en el cuerpo humano; |

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| — | no podrá referirse a una recomendación que hayan formulado científicos o profesionales de la salud que puedan, debido a su notoriedad, incitar al consumo de medicamentos. |

El artículo 7 del Reglamento (UE) 2017/745 del Parlamento Europeo y del Consejo [(252)](#ntr252-C_2021526ES.01000101-E0252) sobre los productos sanitarios y el artículo 7 del Reglamento (UE) 2017/746 del Parlamento Europeo y del Consejo [(253)](#ntr253-C_2021526ES.01000101-E0253) sobre los productos sanitarios para diagnóstico in vitro han introducido una prohibición a escala de la UE de las declaraciones en el etiquetado, instrucciones de utilización o publicidad que puedan inducir a error al usuario o al paciente en cuanto a la finalidad prevista, la seguridad y el funcionamiento del producto por alguno de los siguientes medios:

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| — | atribuir al producto funciones y propiedades que no posee; |

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| — | crear una falsa impresión sobre tratamiento o diagnóstico, funciones o propiedades que el producto no posee; |

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| — | no informar al usuario o al paciente sobre los posibles riesgos que conlleva la utilización del producto conforme a su finalidad prevista; |

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| — | dar a entender usos del producto diferentes de los indicados como parte de la finalidad prevista para la que se realizó la evaluación de la conformidad. |

Asimismo, existen limitaciones específicas (es decir, prohibiciones) sobre la promoción de productos farmacéuticos y tratamientos médicos entre profesionales, a saber, comerciantes y médicos. La elección del producto o tratamiento depende del médico o especialista que lo receta. Cualquier publicidad engañosa en este ámbito (se trate o no de un comerciante autorizado) supondrá la aplicación de las normas nacionales o de la UE pertinentes y estará sujeta a los respectivos sistemas de ejecución y a las sanciones correspondientes, que prevalecerán sobre la DPCD.

El punto 17 también se aplica a bienes o servicios tales como tratamientos estéticos, productos de bienestar y similares en caso de que se comercialicen con afirmaciones falsas de que pueden curar enfermedades, disfunciones o malformaciones.

Por lo que se refiere a los productos cosméticos, el artículo 20, apartado 1, del Reglamento (CE) n.o 1223/2009 del Parlamento Europeo y del Consejo [(254)](#ntr254-C_2021526ES.01000101-E0254) sobre los productos cosméticos exige a los Estados miembros que prohíban la utilización de textos, denominaciones, marcas, imágenes o cualquier otro símbolo, figurativo o no, en el etiquetado, en la comercialización o en la publicidad de los productos cosméticos, que atribuyan a los productos en cuestión características de las que carezcan.

Un comerciante que no aporte pruebas adecuadas y pertinentes de los efectos físicos que un consumidor puede esperar de la utilización del producto incurrirá en la práctica comercial prohibida n.o 17 por haber formulado una afirmación falsa, a no ser que el producto esté regulado por legislación sectorial de la UE.

Para eludir la prohibición, los comerciantes deben poder justificar con pruebas científicas cualquier afirmación de hecho que realicen a tal efecto. El hecho de que la carga de la prueba recaiga sobre el comerciante refleja el principio, formulado de manera más amplia en el artículo 12 de la DPCD, que establece que «[l]os Estados miembros atribuirán a los tribunales o a los órganos administrativos competencias que les faculten, en el caso de los procedimientos civiles o administrativos […]: a) para exigir que el comerciante aporte pruebas de la exactitud de las afirmaciones de hecho realizadas en la práctica comercial si, habida cuenta de los intereses legítimos del comerciante y de cualquier otra parte en el procedimiento, tal exigencia parece apropiada a la vista de las circunstancias del caso».

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| Por ejemplo:  Un comerciante en línea anunciaba en su sitio web una serie de productos, entre ellos ropa y cosméticos, con distintos efectos positivos en la salud (por ejemplo, reducir el dolor, mejorar el sueño y atenuar las arrugas). Sin embargo, no pudo fundamentar sus alegaciones con pruebas apropiadas. Una autoridad nacional consideró que se trataba de un ejemplo de práctica comercial engañosa prohibida en virtud del anexo I de la DPCD [(255)](#ntr255-C_2021526ES.01000101-E0255). |

3.4.   Utilización de la afirmación «gratuito»: punto 20

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| Punto 20 del anexo I  Describir un producto como «gratuito», «regalo», «sin gastos» o cualquier fórmula equivalente si el consumidor tiene que abonar dinero por cualquier concepto distinto del coste inevitable de la respuesta a la práctica comercial y la recogida del producto o del pago por la entrega de este. |

Esta prohibición se basa en la idea de que los consumidores esperan que la afirmación «gratuito» signifique exactamente eso, es decir, que reciben algo sin dar dinero a cambio. Por tanto, una oferta solo se puede describir como gratuita si los consumidores no pagan más de:

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| — | el coste mínimo inevitable de responder a la práctica comercial (por ejemplo, las tarifas postales públicas vigentes, el coste de la llamada telefónica con la tarifa nacional estándar o el coste mínimo inevitable del envío de un mensaje de texto); |

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| — | el coste real de transporte o entrega; |

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| — | el coste, incluidos los gastos adicionales, de cualquier desplazamiento del consumidor para recoger la oferta. |

Por consiguiente, los comerciantes no deben cobrar por el empaquetado, la manipulación o la administración de un producto comercializado como «gratuito». Cuando los comerciantes hacen ofertas «gratuitas», también deben indicar claramente en todo el material si el consumidor ha de asumir los costes inevitables, como se ha señalado anteriormente.

Resulta más difícil determinar si la práctica comercial es desleal cuando la afirmación «gratuito» se utiliza en ofertas conjuntas, que son ofertas comerciales en las que se incluye más de un producto o servicio. Las ofertas conjuntas suelen consistir en promociones condicionadas a la compra o en ofertas combinadas («paquetes»). A continuación se exponen algunos principios que las autoridades nacionales podrían tener en cuenta al apreciar las ofertas conjuntas y que ya se plasman en gran medida en algunos códigos que regulan la publicidad:

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| — | Los comerciantes no deben intentar recuperar sus costes reduciendo la calidad o la composición ni inflando el precio de ningún producto que deba comprarse como condición previa para la obtención de un artículo gratuito aparte. |

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| — | Los comerciantes no deben describir un elemento individual de un paquete como «gratuito» si el coste de dicho elemento está incluido en el precio del paquete. |

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | En una oferta conjunta de un teléfono móvil con una suscripción, un operador de telecomunicaciones anunciaba un precio de 0 SEK. Sin embargo, una vez que el consumidor había aceptado la oferta, las cuotas mensuales de suscripción aumentaban. Un órgano jurisdiccional nacional consideró que esta práctica estaba comprendida en el punto 20 del anexo I de la DPCD [(256)](#ntr256-C_2021526ES.01000101-E0256). |  |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad de protección de los consumidores consideró que el caso de una oferta de un «crédito gratuito» incurría en el punto 20 del anexo I de la DPCD si el consumidor tenía que firmar un contrato de seguro de crédito con costes adicionales para obtener el préstamo concedido. | |

La prohibición no impide a los comerciantes utilizar la afirmación «gratuito» en promociones condicionadas a la compra que obliguen a los clientes a adquirir otros artículos (a saber, ofertas del tipo «pague uno y llévese dos»), siempre que:

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| — | quede claro para los consumidores que han de pagar todos los costes; |

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| — | no se haya reducido la calidad o composición de los artículos pagados; y |

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| — | no se haya inflado el precio de los artículos pagados para recuperar el coste de suministro del artículo gratuito. |

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| Por ejemplo:  Un comerciante puso en marcha una campaña de promoción en internet y en la prensa en la que ofrecía dos neumáticos gratuitos por la compra de otros dos nuevos. En realidad, el precio fijado para los dos neumáticos en la campaña era el doble del precio de venta al público aplicado anteriormente. Una autoridad nacional declaró que esta promoción condicionada a la compra estaba prohibida en virtud del punto 20 del anexo I [(257)](#ntr257-C_2021526ES.01000101-E0257). |

La característica distintiva fundamental de una promoción condicionada a la compra es que el producto descrito como «gratuito» debe ser verdaderamente independiente de los artículos que el consumidor debe abonar y adicional a ellos. Así pues, en tales promociones condicionadas, los comerciantes deben poder demostrar:

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| — | que el artículo gratuito es realmente adicional a los artículos que suelen venderse a ese precio o verdaderamente separable de los artículos de pago; |

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| — | que solo suministran el artículo «gratuito» con los artículos de pago si el consumidor cumple las condiciones de la promoción; y |

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| — | que los consumidores tienen conocimiento del precio separado de los artículos pagados y que ese precio sigue siendo el mismo con y sin el artículo gratuito. |

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Se admite la declaración «póster gratuito con la compra del periódico del jueves» si el periódico se vende al mismo precio otros días sin el póster. |  |  |  | | --- | --- | | — | La declaración «seguro de viaje gratuito para los clientes que reserven sus vacaciones en línea» es legítima si a los clientes que reservan el mismo viaje por teléfono se les ofrece el mismo precio pero sin seguro gratuito. |  |  |  | | --- | --- | | — | La afirmación de que los consumidores pueden obtener una «suscripción gratuita a un servicio de emisión en continuo durante un determinado número de meses» al adquirir un bien, como una televisión, se considerará legítima si el consumidor no está obligado a pagar por dicha suscripción y el precio del bien no se incrementa debido a la suscripción añadida. | |

El punto 20 del anexo I prohíbe describir como «gratuito» un elemento individual de una oferta combinada si el coste de dicho elemento está incluido en el precio global. Se entiende por «oferta combinada» un paquete o conjunto previamente concertado de prestaciones que se ofrece a un único precio global en el que los clientes no pueden elegir realmente cuántos elementos del paquete reciben por ese precio.

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| Por ejemplo:  Si se anuncia un automóvil con asientos de cuero, aire acondicionado y sistema multimedia por un precio global de 10 000 EUR, ese conjunto de características constituye una oferta combinada o paquete. El consumidor abona un precio global por el automóvil según se anuncia. Si se suprimiera alguna de las características anunciadas, disminuirían la calidad y composición del automóvil por las que el cliente paga 10 000 EUR. Para poder afirmar que el sistema multimedia es gratuito y que los 10 000 EUR corresponden a los demás elementos, el comerciante debe demostrar, o bien a) que se cumplen los requisitos de una promoción condicionada a la compra, o bien b) que el sistema multimedia es una nueva característica adicional y que el precio del automóvil no ha aumentado. |

Sin embargo, a veces los comerciantes añaden nuevos elementos a los paquetes ya existentes sin aumentar su precio global ni reducir la calidad ni la composición de los elementos incluidos. En estos casos es probable que los consumidores consideren que el elemento añadido al paquete es adicional a este durante cierto período después de su introducción. No obstante, si el precio de un paquete sube o su calidad o composición se reducen tras añadir un nuevo elemento, este no puede ser descrito como «gratuito».

La necesidad de efectuar pagos únicos iniciales, por ejemplo, para la adquisición o instalación de equipos, no invalida las afirmaciones de que los productos o servicios suministrados sin abono son «gratuitos» en el sentido del punto 20 del anexo I. Por ejemplo, los canales de televisión digital en abierto solo están disponibles para los consumidores que disponen de los receptores digitales necesarios; del mismo modo, los paquetes de llamadas solo están disponibles para los consumidores que tienen una línea telefónica.

Igualmente, las cuotas de conexión que deben pagarse a un tercero por la activación de un servicio de internet no significan que sean falsas las afirmaciones de que el servicio de internet es gratuito, siempre que dichas cuotas no se hayan inflado para recuperar el coste de suministro del servicio gratuito. Los comerciantes siempre deben informar adecuadamente a los consumidores del requisito de efectuar estos pagos iniciales.

Los productos presentados como «gratuitos» son especialmente frecuentes en el sector en línea. Sin embargo, muchos de estos servicios recopilan datos personales de los usuarios, como su identidad y su dirección de correo electrónico. Es importante señalar que la DPCD abarca todas las prácticas comerciales relativas a productos «gratuitos» y no condiciona su aplicación al pago con dinero. Las prácticas basadas en los datos conllevan una interacción entre la legislación de la UE en materia de protección de datos y la DPCD. Cada vez existe una mayor conciencia del valor económico de la información relacionada con las preferencias de los consumidores, los datos personales y otros contenidos generados por los usuarios. La comercialización de esos productos como «gratuitos» sin explicar debidamente a los consumidores cómo se van a utilizar sus preferencias, sus datos personales y los contenidos generados por los usuarios podría considerarse una práctica engañosa e infringir la legislación en materia de protección de datos.

Por otra parte, la Directiva (UE) 2019/770 [(258)](#ntr258-C_2021526ES.01000101-E0258) se aplica a los contratos por los que se suministran contenidos o servicios digitales a los consumidores y estos facilitan o se comprometen a facilitar datos personales. La Directiva sobre contenidos digitales se aplica independientemente de que los datos personales se faciliten al comerciante en el momento en que se celebre el contrato o en un momento posterior, por ejemplo, cuando el consumidor dé su consentimiento para el tratamiento de sus datos personales. A raíz de las modificaciones introducidas por la Directiva (UE) 2019/2161, la Directiva sobre los derechos de los consumidores también se aplica (a partir del 28 de mayo de 2022) a los contratos de suministro de servicios y contenidos digitales en los que los consumidores faciliten o se comprometan a facilitar datos personales.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad de protección de los consumidores multó a una plataforma en línea por proporcionar información engañosa con arreglo al artículo 6 de la DPCD al afirmar que su servicio era «gratuito» o «sin gastos», ya que la empresa obtiene sus ingresos del análisis de los datos privados de los usuarios y del suministro de la información a terceros comerciantes [(259)](#ntr259-C_2021526ES.01000101-E0259). |  |  |  | | --- | --- | | — | Otra autoridad de protección de los consumidores multó a una plataforma en línea por inducir a los usuarios (de conformidad con los artículos 6 y 7 de la DPCD) a registrarse y no informarles de forma inmediata y adecuada durante el proceso de creación de la cuenta de que los datos facilitados se utilizarían con fines comerciales y, de manera más general, del ánimo de lucro subyacente al servicio, haciendo, en cambio, hincapié en el carácter gratuito de este [(260)](#ntr260-C_2021526ES.01000101-E0260). | |

3.5.   Reventa de entradas de espectáculos adquiridas por medios automatizados: punto 23 bis

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| Punto 23 bis del anexo I  «Revender entradas de espectáculos a los consumidores si el comerciante las adquirió empleando medios automatizados para sortear cualquier límite impuesto al número de entradas que puede adquirir cada persona o cualquier otra norma aplicable a la compra de entradas.» |

La Directiva (UE) 2019/2161 añadió a la DPCD una nueva práctica comercial prohibida en el punto 23 bis, que prohíbe a los comerciantes revender a los consumidores entradas de espectáculos culturales y deportivos que hayan adquirido empleando programas («software») especializados («bots»).

Estos medios automatizados permiten a los comerciantes comprar un número de entradas que exceda los límites técnicos impuestos por el vendedor primario de las entradas o sortear cualquier otro medio técnico empleado por el vendedor primario para garantizar la accesibilidad de las entradas a todos los individuos, como la organización de la cola de compra en línea. La prohibición también se aplicaría en caso de que las entradas fueran «reservadas» por el programa («software») automatizado, pero luego se pagaran por separado por otros medios. También se aplica cuando el revendedor de entradas las adquiere de un tercero que ha utilizado bots para comprar entradas. El hecho de que el vendedor primario de las entradas tenga conocimiento de que el revendedor ha utilizado bots no es pertinente a efectos de la prohibición, siempre que su uso haya permitido al revendedor adquirir esas entradas en un número mayor de lo que era posible para otros compradores.

La prohibición se aplica de manera general a los «espectáculos», que incluyen los espectáculos culturales y deportivos mencionados específicamente en el considerando 50 de la Directiva (UE) 2019/2161 y otros tipos de actividades de ocio. Solo se aplica a las medidas técnicas utilizadas por el revendedor para sortear las medidas técnicas aplicadas por el vendedor primario con el fin de limitar el número de entradas vendidas a cada comprador o de gestionar el proceso de venta. Estas medidas podrían ser aplicadas por el vendedor primario a iniciativa propia o sobre la base de los requisitos de la legislación nacional.

La prohibición del punto 23 bis del anexo I complementa las disposiciones generales de la DPCD sobre prácticas desleales en lo que respecta a este aspecto específico de la reventa de entradas. El considerando 50 de la Directiva (UE) 2019/2161 explica que la prohibición se entiende sin perjuicio de cualquier otra medida nacional que los Estados miembros puedan adoptar para proteger los intereses legítimos de los consumidores y velar por la política cultural y el acceso generalizado de todos los individuos a espectáculos culturales y deportivos, como por ejemplo la regulación del precio de reventa de las entradas.

3.6.   Comercialización persistente por herramientas a distancia: punto 26

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| Punto 26 del anexo I  «Realizar proposiciones no solicitadas y persistentes por teléfono, fax, correo electrónico u otros medios a distancia, salvo en las circunstancias y en la medida en que esté justificado, con arreglo a la legislación nacional, para hacer cumplir una obligación contractual. Este supuesto se entenderá sin perjuicio del artículo 10 de la Directiva 97/7/CE y de las Directivas 95/46/CE y 2002/58/CE.» |

Esta prohibición pretende proteger a los consumidores de las peticiones insistentes por instrumentos de comercialización a distancia. El punto 26 del anexo I no prohíbe la comercialización a distancia per se, sino las proposiciones no solicitadas y persistentes [(261)](#ntr261-C_2021526ES.01000101-E0261).

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| Por ejemplo:  Un asesor de seguros buscaba en diarios en línea y fuera de línea información sobre accidentes y a continuación enviaba a las víctimas cartas estándar ofreciéndoles asesoramiento y ayuda sobre cuestiones relacionadas con indemnizaciones. Un órgano jurisdiccional nacional dictaminó que el envío de una carta a una persona no puede considerarse «proposiciones no solicitadas y persistentes» en el sentido del punto 26 del anexo I [(262)](#ntr262-C_2021526ES.01000101-E0262). |

En el artículo 13 de la Directiva 2002/58/CE, sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas, se establecen normas específicas relativas a las comunicaciones no solicitadas realizadas por medio de redes de comunicación electrónica (es decir, por teléfono o por correo electrónico). Los aparatos de llamada automática, el fax y el correo electrónico solo se pueden utilizar con fines de comercialización directa para ponerse en contacto con los usuarios que hayan dado su consentimiento previo. No obstante, cuando una persona física o jurídica obtenga de sus clientes la dirección de correo electrónico, en el contexto de la venta de un producto o de un servicio, esa misma persona física o jurídica podrá utilizar dichas señas electrónicas para la venta directa de sus propios productos o servicios de características similares, a condición de que se ofrezca con absoluta claridad a los clientes, sin cargo alguno y de manera sencilla, la posibilidad de oponerse a dicha utilización de las señas electrónicas en el momento en que se recojan y, en caso de que el cliente no haya rechazado inicialmente su utilización, cada vez que reciban un mensaje ulterior. Estas disposiciones sectoriales prevalecerán sobre la DPCD, en el sentido de que las proposiciones no tienen que ser persistentes y los Estados miembros deben sancionar las proposiciones desde la primera llamada o el primer correo electrónico.

La utilización de datos personales (por ejemplo, el nombre o la dirección del destinatario u otros datos relativos a una persona identificable) con fines comerciales por un responsable del tratamiento constituye tratamiento de tales datos en virtud de la normativa europea de protección de datos. Las garantías y obligaciones previstas en el RGPD deben cumplirse, en particular para informar a los interesados, antes de cualquier comercialización, de que el tratamiento se va a llevar a cabo, y para permitirles oponerse a que sus datos personales se traten a tal fin (artículo 21, apartado 2, del RGPD).

No existen normas sectoriales de la UE similares para la comercialización por correo y otros productos publicitarios impresos. Estos se regulan exhaustivamente por la DPCD, y en particular por el punto 26 del anexo. Por lo tanto, las disposiciones nacionales que prohíben todo tipo de publicidad impresa sin destinatario, a menos que los consumidores den su consentimiento previo (opt-in), irían más allá de las disposiciones plenamente armonizadas de la DPCD. Dicha prohibición debería permitirse solamente si la iniciativa está fuera del ámbito de aplicación de la Directiva, es decir, no tiene el objetivo de proteger los intereses económicos de los consumidores. Algunos Estados miembros han defendido estas prohibiciones por diversas razones, por ejemplo, proteger el medio ambiente (reducir el desperdicio de papel en el material de comercialización).

3.7.   Exhortaciones directas a los niños: punto 28

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| Punto 28 del anexo I  «Incluir en una publicidad una exhortación directa a los niños para que compren o convenzan a sus padres u otros adultos de que les compren los productos anunciados. Esta disposición se entiende sin perjuicio de lo dispuesto en el artículo 16 de la Directiva 89/552/CEE relativa a la radiodifusión televisiva.» |

Esta prohibición incluye presionar a los niños para que compren un producto directamente o para que convenzan a los adultos de que les compren los artículos («factor fastidio»). Una declaración acerca de esta prohibición que numerosos comerciantes formulan de manera reiterada es que puede ser difícil distinguir la comercialización destinada a los niños de la comercialización destinada a los demás consumidores. Del mismo modo, en ocasiones podría no estar claro si una práctica comercial incluye una exhortación directa a los niños.

No obstante, el control para determinar si una práctica comercial se inscribe en el punto 28 del anexo I deberá realizarse teniendo en cuenta todos los hechos y circunstancias del caso concreto. La evaluación puede tener en cuenta diversos factores, como el diseño de la comercialización, el medio utilizado para enviar la comercialización, el tipo de lenguaje utilizado, la presencia de temas o personajes que pueden, en particular, atraer a los niños, la presencia de restricciones de edad, la facilitación de enlaces directos para realizar compras, etc [(263)](#ntr263-C_2021526ES.01000101-E0263). La autoridad nacional de ejecución o el órgano jurisdiccional no tiene que atenerse necesariamente a la definición que dé el comerciante del grupo destinatario para la práctica comercial de que se trate, si bien dicha definición se puede tener en cuenta. La evaluación también debe tener en cuenta las medidas adoptadas por el comerciante para proteger a los menores frente a la exhortación directa. Los comerciantes deben adaptar la comercialización en función de los consumidores a los que realmente podría llegar la práctica, no solo en función del grupo destinatario previsto.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Una práctica comercial en línea con una comunidad de jugadores en la que los niños visten muñecas virtuales invitaba a los niños a «Comprar más», «Comprar aquí», «Actualizar ahora» y «Convertirse en superestrella». Un órgano jurisdiccional nacional prohibió tales prácticas porque las declaraciones eran exhortaciones directas a los niños en el sentido del punto 28 del anexo I [(264)](#ntr264-C_2021526ES.01000101-E0264). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un organizador de conciertos hizo publicidad de entradas para un concierto Justin Bieber utilizando expresiones como «Belibers, sigue habiendo tarjetas RIMI disponibles en muchas tiendas. Corre, coge la bici o dile a alguien que te lleve» y «Recuerda comprar también entradas para el Bieberexpress al comprar hoy las entradas del concierto en RIMI». Un órgano jurisdiccional nacional consideró que esto infringía el punto 28 del anexo I [(265)](#ntr265-C_2021526ES.01000101-E0265). |  |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad nacional consideró que el hecho de que un banco enviara una carta de comercialización directa a los niños cuando cumplían diez años era una práctica agresiva. En la carta se daba la bienvenida los niños a una sucursal del banco para obtener una tarjeta Visa Electron personal con el fin de conmemorar su décimo cumpleaños [(266)](#ntr266-C_2021526ES.01000101-E0266). |  |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad nacional encontró una exhortación directa en un anuncio de concurso que se llevó a cabo utilizando realidad aumentada (RA). El lector descargaría una aplicación de RA en su teléfono y la utilizaría para escanear los paneles de una historia con material de vídeo. Los vídeos incluían numerosos elementos visuales y efectos sonoros similares a los de los cómics. Al final de la historia, la aplicación mostraba una ruleta de la fortuna en la que el lector tenía la oportunidad de ganar entradas para un concierto. Si el lector no tenía la suerte de ganar, aparecía un enlace emergente junto a la ruleta de la fortuna que animaba al lector a «echar un vistazo a las entradas». En la misma situación, el avatar virtual animaba al lector a «hacer clic aquí y conseguir entradas». Según la autoridad nacional, se trataba de una invitación directa a comprar, sobre todo porque era posible comprar entradas desde el enlace asociado. La autoridad nacional también consideró que el contenido y la publicidad de la RA estaban dirigidos a los niños y se publicaban en una revista de cómics, dirigida a un público infantil [(267)](#ntr267-C_2021526ES.01000101-E0267). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional de un Estado miembro examinó si la presentación de un enlace a una tienda en línea constituye una invitación directa a comprar. El órgano jurisdiccional consideró que un anuncio dirigido al espectador en una segunda persona del singular, que utiliza términos típicos de los niños, se dirige a los niños en primera instancia, y que estas invitaciones directas a comprar están cubiertas por el punto 28 del anexo I, aunque los precios y las características de los productos anunciados no aparezcan hasta que se haga clic en el enlace [(268)](#ntr268-C_2021526ES.01000101-E0268). |  |  |  | | --- | --- | | — | En un asunto similar, el órgano jurisdiccional del Estado miembro consideró que las invitaciones indirectas a comprar no están sujetas a la prohibición del punto 28 del anexo I, y se definen como referencias al uso previsto de los productos anunciados. En este caso, los mensajes publicitarios y los enlaces a la tienda en línea iban acompañados del mensaje «Si también quieres una copia para ti mismo, también puedes pedirla para tu consola utilizando los enlaces que figuran a continuación». Se constató que no es inadmisible facilitar información sobre una oportunidad de compra o invitar al usuario a establecimientos comerciales virtuales [(269)](#ntr269-C_2021526ES.01000101-E0269). |  |  |  | | --- | --- | | — | En 2021, una autoridad de ejecución multó al operador de un juego en línea y a varias agencias de influentes en línea por infringir la prohibición establecida en el punto 28 del anexo I. Los anuncios del juego se promocionaron a través de una serie de canales en línea, animando a niños y adolescentes a interactuar con un personaje animal mediante el envío de mensajes SMS de tarifa elevada. Por lo tanto, se invitaba directamente a los niños a realizar compras. Además, la multa tuvo en cuenta las prácticas engañosas del comerciante y de los influentes, ya que determinados anuncios y promociones no estaban marcados debidamente e inducían a error a los consumidores para ver un anuncio [(270)](#ntr270-C_2021526ES.01000101-E0270). | |

Entre 2013 y 2014, la Comisión y las autoridades nacionales llevaron a cabo una acción conjunta de vigilancia de los juegos en línea que ofrecen posibilidades de realizar compras al jugar (compras desde aplicaciones móviles) y que son susceptibles de atraer a los niños o de ser jugados por ellos, lo que se analiza con más detalle en el punto 4.2.9 [(271)](#ntr271-C_2021526ES.01000101-E0271). Las autoridades consideraron que el punto 28 del anexo I de la DPCD es aplicable a los juegos que son susceptibles de atraer a los niños, y no solo a aquellos exclusiva o específicamente destinados a los niños. Un juego o aplicación, y la exhortación contenida en el mismo, pueden considerarse dirigidas a los niños en el sentido del punto 28 del anexo I si cabe esperar razonablemente que el comerciante prevea que son susceptibles de atraer a los niños.

3.8.   Premios: punto 31

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| Punto 31 del anexo I  «Crear la impresión falsa de que el consumidor ha ganado ya, ganará, o conseguirá si realiza un acto determinado, un premio o cualquier otra ventaja equivalente, cuando en realidad:   |  |  | | --- | --- | | — | no existe tal premio o ventaja equivalente,  o |  |  |  | | --- | --- | | — | la realización de una acción relacionada con la obtención del premio o ventaja equivalente está sujeta a la obligación, por parte del consumidor, de efectuar un pago o incurrir en un gasto.» | |

La evaluación de la primera categoría de situaciones (premio inexistente) es bastante sencilla. Con objeto de no infringir la prohibición, los comerciantes deben poder demostrar siempre que han concedido los premios o ventajas equivalentes en los términos exactos indicados en su anuncio a los consumidores. De no hacerlo, la práctica estará incluida en la prohibición.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante creó la falsa impresión de que los consumidores podían ganar un premio al afirmar que toda persona que participara en determinado sorteo tendría la oportunidad de ganar un ordenador portátil. En realidad, no se podía ganar el ordenador [(272)](#ntr272-C_2021526ES.01000101-E0272). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante creó la falsa impresión de que un consumidor había ganado un premio al afirmar inequívocamente en una carta dirigida al consumidor que había ganado un premio de 18 000 EUR, cuando en realidad no existía tal premio. Un órgano jurisdiccional nacional aclaró que esta práctica comercial era contraria a la legislación nacional por la que se transpone el punto 31 del anexo I de la DPCD [(273)](#ntr273-C_2021526ES.01000101-E0273). | |

La segunda parte del punto 31 (es decir, el premio o ventaja están sujetos a que el consumidor pague una cantidad de dinero o incurra en un gasto) comprende las prácticas deshonestas por las que, por ejemplo, se informa a los consumidores de que han ganado un premio, pero para recibirlo deben llamar a una línea de tarificación incrementada, o por las que se informa inicialmente a los consumidores de que han ganado un premio, pero luego se les dice que deben pedir otro bien o servicio para recibir el premio anunciado o la prestación equivalente.

El Tribunal de Justicia ha aclarado que, incluso cuando el coste impuesto al consumidor para reclamar el premio (es decir, la petición de información sobre la naturaleza del premio o su toma de posesión) sea mínimo, como el precio de un sello de correos, en comparación con el valor del premio, e independientemente de si el pago de estos costes genera un beneficio para el comerciante, estas prácticas están prohibidas por el punto 31 del anexo I [(274)](#ntr274-C_2021526ES.01000101-E0274).

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| Por ejemplo:  Una empresa de venta por correo envió una publicidad en la que se afirmaba: «Se garantiza al 100 % que el consumidor es una de las personas seleccionadas para recibir un producto electrónico. ¡Este producto es gratuito!». En realidad, los consumidores tenían que responder en el plazo de dos días y pagar 19,99 EUR para financiar los «gastos de transporte y administración». Una autoridad de protección de los consumidores constató que dar a los consumidores la falsa impresión de que ya han ganado un premio y obligarlos a pagar una tasa en los dos días siguientes a la recepción de la notificación de la acción de promoción estaba comprendido en el punto 31 del anexo I, así como otras acciones incluidas en la «lista negra», como la n.o 20, por el uso de la palabra «gratuito» [(275)](#ntr275-C_2021526ES.01000101-E0275). |

4.   APLICACIÓN DE LA DPCD A SECTORES ESPECÍFICOS

4.1.   Sostenibilidad

4.1.1.   Declaraciones medioambientales

Las expresiones «declaraciones medioambientales» y «declaraciones ecológicas» se refieren a la práctica consistente en sugerir o crear de alguna otra manera la impresión (en la comunicación comercial, la comercialización o la publicidad) de que un bien o servicio tiene un impacto positivo o nulo en el medio ambiente o de que es menos dañino para el medio ambiente que los bienes o servicios competidores. Esto puede deberse a su composición, a cómo ha sido fabricado, a cómo se puede reciclar y a la reducción de energía o contaminación que se espera de su uso. Cuando estas declaraciones no son ciertas o no pueden ser verificadas, tal práctica se suele llamar «blanqueo ecológico». El cribado coordinado de sitios web («barrido») llevado a cabo por la Comisión y las autoridades nacionales de protección de los consumidores en 2020 confirmó la prevalencia de declaraciones ecológicas vagas, exageradas, falsas o engañosas [(276)](#ntr276-C_2021526ES.01000101-E0276).

El «blanqueo ecológico» en el contexto de las relaciones entre empresas y consumidores puede referirse a todas las formas de prácticas comerciales de las empresas en sus relaciones con los consumidores relativas a las propiedades medioambientales de los productos. Según las circunstancias, eso puede incluir todo tipo de declaraciones, información, símbolos, logotipos, gráficos y marcas, y su interacción con colores, envases, etiquetas y publicidad en todos los medios de comunicación, (incluidos los sitios web) y lo puede hacer cualquier organización, si tiene la condición de «comerciante» y lleva a cabo prácticas comerciales hacia los consumidores.

La DPCD no contiene normas específicas sobre las declaraciones medioambientales. No obstante, proporciona una base jurídica para velar por que los comerciantes no realicen declaraciones medioambientales engañosas para los consumidores. No prohíbe la utilización de «declaraciones ecológicas» siempre que no sean engañosas. Antes al contrario, la DPCD puede ayudar a los comerciantes a invertir en el comportamiento ambiental de sus productos para que puedan comunicar estos esfuerzos a los consumidores de forma transparente e impidiendo que los competidores presenten declaraciones medioambientales engañosas.

La Nueva Agenda del Consumidor [(277)](#ntr277-C_2021526ES.01000101-E0277) y el Plan de acción para la economía circular de 2020 [(278)](#ntr278-C_2021526ES.01000101-E0278) prevén nuevas propuestas para luchar contra el blanqueo ecológico. Además, la Comisión está trabajando en iniciativas como el establecimiento de normas para la certificación de las absorciones de carbono [(279)](#ntr279-C_2021526ES.01000101-E0279).

Por lo que se refiere a los medios de reparación a disposición de los consumidores por los daños causados por un incumplimiento de la DPCD relacionado con declaraciones medioambientales, como la indemnización por daños y perjuicios, la reducción del precio y la resolución del contrato, véase el punto 1.4.3.

4.1.1.1.   Interacción con otros actos legislativos de la UE relativos a las declaraciones medioambientales

El artículo 3, apartado 4, y el considerando 10 establecen el principio de que la DPCD complementa otros actos legislativos de la UE como «red de seguridad» que garantiza un elevado nivel común de protección del consumidor frente a las prácticas comerciales desleales en todos los sectores. En el ámbito de las declaraciones medioambientales, la DPCD complementa instrumentos como los siguientes:

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| — | el Reglamento (CE) n.o 66/2010 del Parlamento Europeo y del Consejo [(280)](#ntr280-C_2021526ES.01000101-E0280) relativo a la etiqueta ecológica de la UE; |

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| — | el Reglamento (UE) 2017/1369 del Parlamento Europeo y del Consejo [(281)](#ntr281-C_2021526ES.01000101-E0281) por el que se establece un marco para el etiquetado energético; |

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| — | la Directiva 1999/94/CE relativa a la información sobre el consumo de combustible y sobre las emisiones de CO2 facilitada al consumidor al comercializar turismos nuevos; |

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| — | la Directiva 2012/27/UE relativa a la eficiencia energética [(282)](#ntr282-C_2021526ES.01000101-E0282), modificada por la Directiva (UE) 2018/2002 [(283)](#ntr283-C_2021526ES.01000101-E0283); |

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| — | la Directiva 2010/31/UE relativa a la eficiencia energética de los edificios [(284)](#ntr284-C_2021526ES.01000101-E0284); |

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| — | el Reglamento (UE) 2020/740 relativo al etiquetado de los neumáticos en relación con la eficiencia en términos de consumo de carburante y otros parámetros [(285)](#ntr285-C_2021526ES.01000101-E0285); |

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| — | la Directiva (UE) 2019/944 del Parlamento Europeo y del Consejo [(286)](#ntr286-C_2021526ES.01000101-E0286) sobre normas comunes para el mercado interior de la electricidad; |

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| — | la Directiva 2009/125/CE por la que se instaura un marco para el establecimiento de requisitos de diseño ecológico aplicables a los productos relacionados con la energía [(287)](#ntr287-C_2021526ES.01000101-E0287); |

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| — | el Reglamento (UE) 2018/848 del Parlamento Europeo y del Consejo [(288)](#ntr288-C_2021526ES.01000101-E0288) sobre producción ecológica y etiquetado de los productos ecológicos; |

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| — | la Directiva (UE) 2018/2001 del Parlamento Europeo y del Consejo [(289)](#ntr289-C_2021526ES.01000101-E0289) relativa al fomento del uso de energía procedente de fuentes renovables; |

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| — | la Directiva 2009/73/CE del Parlamento Europeo y del Consejo [(290)](#ntr290-C_2021526ES.01000101-E0290) sobre normas comunes para el mercado interior del gas natural. |

A continuación figura una serie de ejemplos de la interacción entre la DPCD y la legislación específica de la UE sobre las declaraciones medioambientales.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | El Reglamento (UE) 2017/1369 por el que se establece un marco para el etiquetado energético prohíbe etiquetas y símbolos adicionales que, por sí mismos, puedan inducir a error a los consumidores en lo que respecta al consumo de energía u otros recursos [(291)](#ntr291-C_2021526ES.01000101-E0291). Sin embargo, no incluye normas específicas sobre lo que se considera que puede inducir a error. A este respecto, puede entrar en juego la DPCD. Por ejemplo, un órgano jurisdiccional consideró que el uso del eslogan «Ahorra mucha energía» de un frigorífico/congelador de la clase «A» de eficiencia energética era una práctica comercial engañosa con arreglo a la DPCD. 308 de los 543 aparatos presentes en el mercado en aquel momento pertenecían a la clase «A+» y el 17 % de todos los aparatos disponibles pertenecían a la clase «A++» de eficiencia energética [(292)](#ntr292-C_2021526ES.01000101-E0292). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un fabricante de neumáticos tenía su propia etiqueta para comercializar neumáticos. El objetivo de la etiqueta era mostrar las capacidades de conducción de un neumático en condiciones invernales. La etiqueta propia de la empresa es muy similar a la etiqueta oficial de neumáticos de la UE  [(293)](#ntr293-C_2021526ES.01000101-E0293), obligatoria desde noviembre de 2012. El fabricante de neumáticos comercializó sus neumáticos con la etiqueta de propietario, lo cual pudo dar a los consumidores la impresión errónea de que los neumáticos cumplían los requisitos de ensayo y clasificación de la etiqueta de neumáticos de la UE. Además, la etiqueta de neumáticos no proporcionaba una imagen fiable de las propiedades de los neumáticos, en comparación con los neumáticos de otros fabricantes que llevaban la etiqueta de la UE. Un órgano jurisdiccional prohibió al fabricante de neumáticos utilizar las etiquetas de la empresa en la comercialización de neumáticos destinada a los consumidores, a menos que la empresa distinguiera claramente esta etiqueta de la etiqueta de neumáticos de la UE [(294)](#ntr294-C_2021526ES.01000101-E0294). |  |  |  | | --- | --- | | — | Con arreglo a la Directiva (UE) 2019/944, los proveedores de electricidad deben especificar en su información de facturación el impacto ambiental de la electricidad, «al menos en cuanto a las emisiones de CO2 y los residuos radiactivos resultantes de la producción de electricidad a partir de la combinación energética total del suministrador durante el año anterior», y las empresas proveedoras tendrán que especificar la huella real de CO2 de su combinación energética de conformidad con su anexo I, apartado 5, letra b). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante anunció sus vehículos diésel a los consumidores como «respetuosos con el medio ambiente», mientras que, en realidad, las pruebas de las emisiones de gases de escape fueron manipuladas mediante el uso de dispositivos de desactivación programados (escándalo «Dieselgate»). Las declaraciones sobre las características medioambientales de los vehículos en cuestión se publicaron en el sitio web del comerciante, en el material publicitario y en las listas de productos. El Tribunal de Justicia confirmó en su sentencia de 17 de diciembre de 2020 en el asunto C-693/18 que los dispositivos de desactivación programados eran ilegales con arreglo a la legislación de la UE sobre homologación de tipo  [(295)](#ntr295-C_2021526ES.01000101-E0295). Desde el punto de vista de la DPCD, la práctica en cuestión suscita preocupación con arreglo al artículo 5 (práctica contraria a la diligencia profesional), el  artículo 6  (facilitar a los consumidores información engañosa sobre las principales características del producto, como el impacto ambiental anunciado del producto) y el  anexo I, punto 4  (declarar que un producto ha sido aprobado por un organismo público sin cumplir las condiciones de la aprobación). Las autoridades nacionales de protección de los consumidores han impuesto multas sobre la base de estas disposiciones [(296)](#ntr296-C_2021526ES.01000101-E0296). | |

4.1.1.2.   Principios fundamentales

La aplicación de la DPCD a las declaraciones medioambientales puede resumirse en los siguientes principios fundamentales [(297)](#ntr297-C_2021526ES.01000101-E0297).

Sobre la base de los artículos 6 y 7 de la DPCD relativos a las acciones y omisiones engañosas, las declaraciones ecológicas deben ser veraces, no contener información falsa y presentarse de manera clara, específica, precisa e inequívoca, de modo que no se induzca a error a los consumidores.

Sobre la base del artículo 12 de la DPCD, los comerciantes deberán tener pruebas que apoyen sus afirmaciones y estar dispuestos a proporcionarlas a las autoridades de ejecución competentes de manera comprensible en caso de que la afirmación se ponga en duda.

Además, el anexo I de la DPCD contiene una lista de prácticas desleales que están prohibidas en todos los casos. Varios puntos del anexo I se refieren a afirmaciones específicas o a la comercialización de certificaciones, etiquetas y códigos de conducta pertinentes.

La cláusula general del artículo 5, apartado 2, de la DPCD ofrece una posibilidad adicional para evaluar las prácticas comerciales desleales. Funciona como una «red de seguridad» adicional, para abarcar toda práctica desleal no cubierta por otras disposiciones de la DPCD (es decir, que no sea engañosa ni agresiva y que no esté enumerada en el anexo I). Prohíbe las prácticas comerciales contrarias a los requisitos de la diligencia profesional que puedan distorsionar de manera sustancial el comportamiento económico del consumidor medio.

La norma relativa a la diligencia profesional en el ámbito de las declaraciones medioambientales podrá incluir principios derivados de normas y códigos de conducta nacionales e internacionales. Por ejemplo, la diligencia profesional puede exigir que los sistemas de certificación que utilizan los comerciantes para promover las virtudes medioambientales de sus productos cumplan dichas normas y ofrezcan beneficios sustanciales a los consumidores, y que estén controlados y auditados de forma independiente. Las prácticas contrarias a la diligencia profesional serán desleales si provocan o pueden provocar que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no habría tomado, como la compra de un producto específico como resultado de los beneficios esperados derivados de la adhesión a un sistema de certificación alegada. Las autoridades nacionales de ejecución evaluarán tales situaciones sobre la base de los hechos y circunstancias de cada caso individual.

4.1.1.3.   Aplicación del artículo 6 de la DPCD a las declaraciones medioambientales

El artículo 6 de la DPCD implica que los consumidores deben poder confiar en las declaraciones medioambientales realizadas por los comerciantes. En consecuencia, a fin de no inducir a error, las declaraciones medioambientales deben ser veraces, no contener información falsa y presentarse de manera clara, específica, inequívoca y precisa.

Una declaración medioambiental que «contenga información falsa y por tal motivo carezca de veracidad» en relación con uno de los elementos contemplados en el artículo 6, apartado 1, letras a) a g) puede ser engañosa.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Utilizar el término «biodegradable» para referirse a un producto que no sea realmente biodegradable o con el que no se hayan efectuado ensayos [(298)](#ntr298-C_2021526ES.01000101-E0298). |  |  |  | | --- | --- | | — | Presentar aparatos eléctricos, como planchas, aspiradoras o cafeteras, como «respetuosos con el medio ambiente» («ecológicos»), aunque en muchos casos las pruebas realizadas demuestren que no consiguen mejores resultados que otros productos similares o cuando no se han realizado pruebas [(299)](#ntr299-C_2021526ES.01000101-E0299). |  |  |  | | --- | --- | | — | Presentar neumáticos de automóviles como «ecológicos» y anunciar su impacto medioambiental y su impacto en el consumo de combustible, aunque en los ensayos obtengan resultados contradictorios [(300)](#ntr300-C_2021526ES.01000101-E0300). |  |  |  | | --- | --- | | — | Presentar vajilla que contenga bambú como alternativa sostenible, reciclable y respetuosa con el medio ambiente a los materiales plásticos, cuando estos productos son en realidad una mezcla de plástico, bambú (a veces polvo de bambú) y resina de melamina y formaldehído que es necesaria para producir diversas formas (platos, cuencos, etc.) y grados de rigidez [(301)](#ntr301-C_2021526ES.01000101-E0301). | |

Una declaración medioambiental también puede resultar engañosa si induce o puede «inducir a error al consumidor medio, aun cuando la información sea correcta en cuanto a los hechos» respecto a los elementos mencionados en el artículo 6, apartado 1, letras a) a g).

Por consiguiente, también las imágenes y la presentación general del producto (es decir, el diseño, la elección de los colores, las imágenes, las ilustraciones, los sonidos, los símbolos y las etiquetas) deben ser una representación veraz y precisa de la magnitud de los beneficios medioambientales y no deben exagerar los beneficios obtenidos. Dependiendo de las circunstancias del caso, las declaraciones implícitas pueden incluir el uso de imágenes (por ejemplo, árboles, bosques tropicales, agua, animales) y colores (por ejemplo, fondo o texto azul o verde) asociados a la sostenibilidad medioambiental.

Es probable que las declaraciones medioambientales induzcan a error si consisten en afirmaciones vagas y generales de la existencia de beneficios medioambientales sin una justificación adecuada del beneficio y sin indicar el aspecto pertinente del producto al que se refiere la declaración. Ejemplos de tales declaraciones son «inocuo para el medio ambiente», «respetuoso con el medio ambiente», «eco», «verde», «amigo de la naturaleza», «ecológico», «correcto desde el punto de vista medioambiental», «respetuoso con el clima», «delicado con el medio ambiente», «libre de contaminantes», «biodegradable», «cero emisiones», «inocuo en términos de carbono», «bajas emisiones de CO2», «neutro en términos de carbono», «climáticamente neutro» e incluso las declaraciones más amplias de «consciente» y «responsable».

Es probable que, en algunos casos, estas declaraciones infundadas den la impresión a los consumidores de que un producto o una actividad del comerciante no tienen ninguna incidencia negativa o solo tienen un impacto positivo en el medio ambiente. Podrían estar cubiertas por el artículo 6, apartado 1, letras a) y b), de la DPCD si pueden inducir a error al consumidor medio y dar lugar a que tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado.

Dado que términos como «consciente» y «responsable» pueden referirse a numerosos aspectos, incluidas las condiciones sociales o económicas, podría considerarse que tales declaraciones inducen a error incluso si se matizan, ya que son vagas y ambiguas.

Si se utilizan declaraciones vagas y ambiguas, las matizaciones deben ser suficientemente detalladas para que las declaraciones no puedan entenderse de ningún modo distinto a la intención del comerciante.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Declarar que el alquiler de coches eléctricos es «ecológico» puede resultar engañoso sin facilitar información para poner en perspectiva la declaración. En particular, si la electricidad necesaria para recargar los vehículos no procede de fuentes de energía renovables, el servicio de alquiler de vehículos seguiría teniendo un impacto negativo en el medio ambiente [(302)](#ntr302-C_2021526ES.01000101-E0302). |  |  |  | | --- | --- | | — | Cada vez más, los comerciantes hacen declaraciones sobre la neutralidad en carbono al invertir en proyectos que compensan las emisiones de CO2. Por ejemplo, una empresa de alquiler de automóviles ofrece a los consumidores la posibilidad de «conducir de forma neutra en términos de CO2» eligiendo una opción que compense las emisiones. Esta práctica puede resultar problemática si los créditos de carbono subyacentes son de baja integridad medioambiental o no se contabilizan adecuadamente, de modo que no representan reducciones de las emisiones reales y adicionales. Las declaraciones de eliminación de carbono deben ser auténticas, sólidas, transparentes, comunicadas, controlables, verificables, creíbles y certificadas, no deben socavar las medidas de reducción de las emisiones a corto plazo en los sectores emisores y deben garantizar la adicionalidad, así como una contabilidad adecuada de las eliminaciones de carbono en los inventarios nacionales de GEI. Una autoridad nacional de protección de los consumidores consideró en sus directrices que los consumidores debían estar debidamente informados sobre el funcionamiento de las medidas que compensan las emisiones de CO2, como el número de kilómetros que se compensan plenamente y la manera en que se logra, y cómo y dónde se contabiliza la compensación [(303)](#ntr303-C_2021526ES.01000101-E0303). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional consideró que la comercialización de productos para el cuidado del cabello y de la piel, en la que el comerciante había declarado que sus productos son ecológicos con declaraciones como «eco» y «ecológico», era vaga y carecía de matizaciones claras. El órgano jurisdiccional también consideró que no queda suficientemente claro lo que significa orgánico o eco si la única matización es el símbolo gráfico/logotipo/etiqueta de una etiqueta de certificación de terceros [(304)](#ntr304-C_2021526ES.01000101-E0304). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante anunciaba la venta de bolsas de golosinas declarando que, por cada bolsa vendida, plantaría un árbol. No obstante, el comerciante ya había acordado plantar cierto número de árboles, independientemente del número de bolsas de golosinas vendidas. Un órgano jurisdiccional nacional estimó una reclamación del Defensor del Pueblo correspondiente porque, con esta declaración, considerada como publicidad engañosa, el comerciante se aprovechaba de la credulidad de los consumidores preocupados por el medio ambiente [(305)](#ntr305-C_2021526ES.01000101-E0305). | |

Las declaraciones se volverán a evaluar y actualizar cuando sea necesario, habida cuenta de los desarrollos tecnológicos y la aparición de productos comparables o de otras circunstancias que puedan afectar a la precisión o la pertinencia de la declaración. Las declaraciones medioambientales no deben referirse a una mejora respecto de un producto del mismo comerciante o un competidor que ya no esté disponible en el mercado o que el comerciante ya no venda a los consumidores, a menos que esta mejora sea importante y reciente.

Si un comerciante utiliza declaraciones medioambientales en su denominación social, marca, nombre del producto, etc., y alguno de ellos se utiliza con fines comerciales, dicha comercialización está sujeta a los mismos requisitos de justificación que los que se aplican a otras declaraciones medioambientales en las comunicaciones publicitarias, a menos que la empresa pueda demostrar que dicha denominación no tiene ninguna connotación medioambiental o que ya existía antes. Sin embargo, para ser contrario a la DPCD, es necesario que un nombre utilizado en la comercialización induzca a error al consumidor medio y pueda dar lugar a que tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado.

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| Por ejemplo:  Un órgano jurisdiccional se pronunció sobre la comercialización de un producto derivado del petróleo y declaró que los términos «ecológico» y «plus» en la denominación de los productos daban la impresión de que el producto tenía determinadas ventajas medioambientales, aunque los combustibles fósiles siempre provocan daños en el medio ambiente. A este respecto, el órgano jurisdiccional consideró que el término «ecológico» no puede utilizarse en la denominación del producto [(306)](#ntr306-C_2021526ES.01000101-E0306). |

Al evaluar una declaración medioambiental son pertinentes los principales impactos ambientales de un producto durante su ciclo de vida, incluida su cadena de suministro. La declaración medioambiental debe referirse a los aspectos significativos desde el punto de vista del impacto ambiental del producto.

Las industrias altamente contaminantes deben garantizar que sus declaraciones medioambientales sean exactas en el sentido de que sean relativas, por ejemplo, «menos nocivas para el medio ambiente» en lugar de «respetuosas con el medio ambiente» (véase también el punto 4.1.1.7 sobre declaraciones medioambientales comparativas). Esto permite al consumidor medio comprender mejor el impacto relativo del producto. En cualquier caso, la declaración medioambiental debe referirse a los aspectos significativos desde el punto de vista de todos los impactos ambientales del producto a lo largo de su ciclo de vida. Los órganos jurisdiccionales o las autoridades pueden exigir a las industrias altamente contaminantes que indiquen claramente al consumidor, en sus declaraciones medioambientales, que el producto tiene un impacto negativo general en el medio ambiente.

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| Por ejemplo:  Un organismo autorregulador constató que una declaración en un sitio web que presentaba el gas fósil como «fuente de energía respetuosa con el medio ambiente» infringía la normativa sobre publicidad aplicable, ya que la redacción era demasiado categórica y no estaba justificada ni contextualizada [(307)](#ntr307-C_2021526ES.01000101-E0307). |

Por otra parte, las declaraciones deben ser claras e inequívocas en cuanto al aspecto del producto o de su ciclo de vida al que se refieren [(308)](#ntr308-C_2021526ES.01000101-E0308). Si un comerciante realiza una declaración medioambiental señalando solo uno de los diversos impactos que el producto tiene en el medio ambiente, la declaración podría ser engañosa en el sentido de los artículos 6 o 7 de la DPCD.

Además, los comerciantes no deben distorsionar las declaraciones sobre la composición del producto (incluidas las materias primas) o sobre su uso, proceso de fabricación, transporte o efectos al final de su vida útil, por ejemplo, haciendo hincapié indebidamente en la importancia de los aspectos positivos, que en realidad son solo marginales, o considerando que el impacto ambiental general resultante del ciclo de vida del producto es negativo.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Una declaración que diga «utilizando un 100 % de energía renovable» puede inducir a error si no especifica que la energía renovable solo se utilizó durante una determinada fase del ciclo de vida del producto. En cambio, una declaración que diga «100 % de material renovable (excepto accesorios)» deja claro qué componentes del producto no se fabricaron con materiales renovables [(309)](#ntr309-C_2021526ES.01000101-E0309). |  |  |  | | --- | --- | | — | Anunciar que un producto contiene «algodón sostenible» podría inducir a error si el origen del algodón no se puede rastrear ni este se ha separado del algodón convencional en la cadena de producción. |  |  |  | | --- | --- | | — | Anunciar que un producto como el césped artificial es respetuoso con el medio ambiente porque no necesita agua, fertilizante o mantenimiento durante su fase de utilización podría no justificar la declaración si las fases de fabricación y final de la vida útil tienen un gran impacto negativo en el medio ambiente. |  |  |  | | --- | --- | | — | Información engañosa sobre las fuentes de energía indicadas en la información de facturación, como información abstracta sobre la combinación energética nacional o información engañosa sobre el impacto ambiental o la contribución real de las fuentes de energía renovables a la electricidad comprada por el cliente final (por ejemplo, énfasis indebido en la cuota de energías renovables). | |

El beneficio declarado no debe dar lugar a una transferencia indebida de impactos, es decir, debe evitarse la creación o el aumento de otros impactos ambientales negativos en otras fases del ciclo de vida del producto, a menos que se haya mejorado significativamente el beneficio medioambiental neto total, por ejemplo, con arreglo a una evaluación del ciclo de vida y métodos reconocidos o generalmente aceptados aplicables al tipo de producto de que se trate y verificados por terceros.

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| Por ejemplo:  Un fabricante declara que su producto consume poca agua. Sin embargo, al mismo tiempo el producto consume más energía que un producto comparable de la misma categoría, lo que aumenta considerablemente el impacto ambiental general del producto. En tales circunstancias, la declaración podría ser engañosa en relación con la naturaleza del producto [artículo 6, apartado 1, letra a)] o sus características principales [artículo 6, apartado 1, letra b), de la DPCD]. |

Los códigos de conducta pueden incluir compromisos voluntarios en materia de protección del medio ambiente o «comportamiento ecológico». El consumidor medio esperará que los signatarios de dicho código vendan productos que se ajusten a este. Se podría considerar que un comerciante que haya anunciado su vinculación pero no cumpla dicho código induce a error si la adhesión declarada al código afecta o es probable que afecte a la decisión de los consumidores sobre una transacción. Esta situación está cubierta por el artículo 6, apartado 2, letra b), de la DPCD.

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| Por ejemplo:  Un comerciante ha suscrito un código de conducta que fomenta el uso sostenible de la madera, y presenta el logotipo del código en su sitio de Internet. El código de conducta contiene un compromiso de que sus miembros no usarán madera dura de bosques explotados de forma no sostenible. Sin embargo, se descubre que los productos anunciados en el sitio web contienen madera de una zona explotada de forma no sostenible. En tales circunstancias, la declaración podría infringir el punto 4 del anexo I o inducir a error según el artículo 6, apartado 2, letra b), de la DPCD. |

Determinadas prácticas comerciales engañosas en relación con los códigos de conducta se consideran abusivas per se de conformidad con el anexo I de la DPCD (véase el punto 4.1.1.6).

No se espera que un consumidor medio conozca el sentido o significado de diversos códigos de conducta, sistemas de etiquetado, certificados o logotipos públicos y privados. Los comerciantes deben informar a los consumidores sobre estos elementos y las características pertinentes en relación con la declaración en cuestión, con una referencia a dónde puede encontrarse toda la información sobre la certificación, incluido si la certificación la realiza un tercero o no. Los comerciantes también deben garantizar que los consumidores tengan la posibilidad de recibir información adicional de manera clara y accesible, por ejemplo, a través de un enlace o de una sección de información ubicado cerca de la declaración. Por ejemplo, los comerciantes deben informar a los consumidores sobre los sistemas de certificación privados cuyos logotipos están mostrando. En general, no basta con referirse brevemente a la certificación de terceros.

Si un comerciante o una industria opta por utilizar sistemas de etiquetado, símbolos o certificados privados con fines de comercialización, estos deberán aplicarse únicamente a los productos, servicios o comerciantes que cumplan los criterios establecidos para beneficiarse de su uso. Los criterios deben mostrar claros beneficios medioambientales en comparación con los productos o los comerciantes competidores y deben ser fácilmente accesibles al público. En caso contrario, dicho etiquetado podría inducir a error. Puede ser necesario matizar aún más el etiquetado, de modo que se destaquen el significado y los criterios más pertinentes de dicho etiquetado (por ejemplo, destacar si el consumo de agua es el criterio más pertinente para un producto determinado). Además, los comerciantes deben plantearse la posibilidad de que se realicen verificaciones por parte de terceros para garantizar la credibilidad y la pertinencia de la etiqueta. El carácter privado de la etiqueta (si este es el caso) y su sentido o significado también deben quedar claros para el consumidor. Por último, no ha de ser posible confundir estas etiquetas con otras, incluidas, por ejemplo, las de los sistemas de etiquetado de gestión pública o las de los sistemas de los competidores.

4.1.1.4.   Aplicación del artículo 7 de la DPCD a las declaraciones medioambientales

El artículo 7 de la DPCD enumera los elementos específicos que resultan pertinentes para apreciar si una práctica comercial supone una omisión engañosa.

Las declaraciones ecológicas pueden inducir a error si consisten en afirmaciones vagas y generales de beneficios medioambientales (véase asimismo el punto 4.1.1.3 anterior sobre acciones engañosas). Tales afirmaciones resultan menos engañosas con arreglo al artículo 7 si se completan con especificaciones importantes o declaraciones interpretativas del impacto ambiental del producto, por ejemplo limitando la declaración a beneficios medioambientales específicos.

Facilitar dicha información adicional ayuda a garantizar el cumplimiento del artículo 7, apartado 4, letra a) (en caso de invitación a comprar), que prohíbe proporcionar a los consumidores información sustancial relacionada con las «características principales del producto»«de manera poco clara, ininteligible, ambigua o en un momento que no sea el adecuado».

Si el comerciante proporciona información adicional a los consumidores, por ejemplo, en su sitio web, esta debe ser clara y comprensible para el consumidor medio. La complejidad y la naturaleza técnica de la información no deben utilizarse para inducir a error a los consumidores sobre la veracidad de las declaraciones ecológicas.

En caso de que se hagan declaraciones medioambientales en el envase de los productos o a través de otros canales de comunicación (por ejemplo, carteles, vallas publicitarias, revistas), que tengan un espacio limitado para las especificaciones, la ubicación de la declaración medioambiental principal y la información adicional sobre la declaración deben permitir a un consumidor medio comprender el vínculo entre ambas. Si la información adicional no se facilita o se facilita de manera poco clara o ambigua, puede considerarse engañosa, dependiendo de la evaluación de las circunstancias del caso concreto. Si no hay espacio para matizar la declaración medioambiental, en general esta no debe hacerse.

Por analogía, en el ámbito de las declaraciones nutricionales y de propiedades saludables de los alimentos, el punto 3 del anexo de la Decisión de Ejecución 2013/63/UE de la Comisión [(310)](#ntr310-C_2021526ES.01000101-E0310) establece que, cuando nos referimos a los beneficios generales y no específicos para la salud, es necesario acompañar estas referencias con una declaración de propiedades saludables específica de las listas de declaraciones de propiedades saludables permitidas en el registro de la Unión. A los efectos del Reglamento, la declaración de propiedades saludables específica autorizada que acompañe a la mención relativa a beneficios generales y no específicos para la salud debe figurar «junto a» dicha mención o «a continuación de» esta. Según el Tribunal de Justicia, cuando en la cara frontal del envase aparezca una referencia a beneficios generales y no específicos para la salud de un nutriente o un alimento, mientras que la declaración de propiedades saludables específica destinada a acompañarla figure únicamente en la cara posterior de dicho envase, debe existir una remisión explícita, como un asterisco, entre ambas, para garantizar la comprensión del consumidor [(311)](#ntr311-C_2021526ES.01000101-E0311).

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | A veces, los comerciantes facilitan información sobre las declaraciones medioambientales de una manera que requiere que el consumidor tome medidas adicionales para acceder a ella (por ejemplo, un consumidor puede tener que hacer clic una vez más en el contexto de una publicación en medios sociales o de una lista de productos para obtener la información adicional necesaria), lo que puede inducir a error en algunos casos. Los representantes de la red CPC de las autoridades nacionales de protección de los consumidores consideraron que, en función de las circunstancias del caso y, en particular, de las limitaciones del medio, puede resultar engañoso exigir al consumidor que tome dichas medidas para obtener la información pertinente, especialmente si es posible proporcionarla de manera más destacada, por ejemplo, junto a la declaración [(312)](#ntr312-C_2021526ES.01000101-E0312). |  |  |  | | --- | --- | | — | Los comerciantes pueden optar por presentar de forma destacada determinadas declaraciones medioambientales (por ejemplo, en la parte frontal del envase del producto), dejando al mismo tiempo información adicional sobre la declaración en un lugar menos destacado (por ejemplo, en la parte trasera del envase del producto). Los representantes de la red CPC de las autoridades nacionales de protección de los consumidores consideraron que, en función de las circunstancias del caso y, en particular, de las limitaciones del medio, esto puede resultar engañoso [(313)](#ntr313-C_2021526ES.01000101-E0313). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional consideró que las matizaciones para declaraciones vagas como «ecológico» y «orgánico» para determinados productos debían colocarse directamente junto a las declaraciones. No basta con colocar la matización en otra página del sitio web (a un clic de distancia de la declaración) [(314)](#ntr314-C_2021526ES.01000101-E0314). |  |  |  | | --- | --- | | — | Las declaraciones de que un producto es «compostable» en el envase pueden inducir a error si solo es compostable por medios industriales y si el envase no especifica las medidas que debe tomar el consumidor para convertir el producto en compost. | |

En algunos casos puede justificarse el uso de una declaración sobre beneficios generales (sin más matizaciones).

Este es el caso de los productos con una declaración «ecológica» cubiertos por el Reglamento (UE) 2018/848 sobre producción ecológica y etiquetado de los productos ecológicos.

Este también podría ser el caso cuando un producto está cubierto por la licencia de uso de la etiqueta ecológica de un sistema de gestión pública (como la etiqueta ecológica de la UE, la del «Cisne Nórdico» o la alemana del «Ángel azul») u otros sistemas de etiquetado rigurosos y de prestigio sujetos a verificaciones de terceros (por ejemplo, el artículo 11 del Reglamento sobre la etiqueta ecológica se refiere a sistemas de etiquetado ecológico EN ISO 14024 tipo I reconocidos oficialmente a escala nacional o regional).

También podría ser el caso si los estudios de evaluación del ciclo de vida del producto han demostrado su comportamiento ambiental [(315)](#ntr315-C_2021526ES.01000101-E0315). Estos estudios deberán efectuarse con arreglo a métodos reconocidos o comúnmente aceptados aplicables al tipo de producto de que se trate y deberán ser verificados por terceros. Estas evaluaciones del comportamiento ambiental pueden incluir comparaciones (véase también el punto 4.1.1.7 sobre declaraciones medioambientales comparativas). Si estos métodos todavía no se han desarrollado en el ámbito pertinente, los comerciantes deben abstenerse de utilizar declaraciones sobre beneficios generales. Para estos productos, los comerciantes deben, no obstante, garantizar la transparencia acerca de los aspectos ambientales pertinentes y asegurarse de que esta información sea fácilmente accesible a los consumidores, en particular mediante la exhibición del logotipo correspondiente.

Del mismo modo, una declaración medioambiental puede ser engañosa con arreglo al artículo 7, apartado 2, si se presenta de manera poco clara, ininteligible o ambigua. Sobre la base de una evaluación caso por caso, esto podría suceder si no quedan claros el ámbito de aplicación y las limitaciones de la declaración.

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| Por ejemplo:  No está claro si la declaración cubre el producto entero o solo uno de sus componentes, o el comportamiento ambiental general de la empresa o solo algunas de sus actividades, o a qué impacto o proceso ambiental se refiere. |

En una declaración medioambiental, los impactos ambientales más importantes del producto son pertinentes. Además, una declaración medioambiental relativa a un producto debe referirse a un impacto ambiental real de ese producto específico y distinguirse de las declaraciones medioambientales más generales relativas al comerciante, sus prácticas y sus políticas de sostenibilidad.

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| Por ejemplo:  Un comerciante presenta varias declaraciones medioambientales generales en su sitio web, como afirmaciones sobre su programa de responsabilidad social de las empresas y una etiqueta de sostenibilidad que es pertinente para determinadas gamas de productos. A fin de evitar inducir a error a los consumidores, el comerciante debe velar por que las declaraciones medioambientales que figuran en la página de inicio del producto se refieran al impacto ambiental real del producto específico y se distingan de otras declaraciones más amplias relativas a dicho comerciante y sus prácticas [(316)](#ntr316-C_2021526ES.01000101-E0316). |

4.1.1.5.   Aplicación del artículo 12 de la DPCD a las declaraciones medioambientales

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| Artículo 12:  Los Estados miembros atribuirán a los tribunales o a los órganos administrativos competencias que les faculten, en el caso de los procedimientos civiles o administrativos a los que se refiere el artículo 11:   |  |  | | --- | --- | | a) | para exigir que el comerciante aporte pruebas de la exactitud de las afirmaciones de hecho realizadas en la práctica comercial si, habida cuenta de los intereses legítimos del comerciante y de cualquier otra parte en el procedimiento, tal exigencia parece apropiada a la vista de las circunstancias del caso; |  |  |  | | --- | --- | | b) | para considerar inexactas las afirmaciones de hecho si no se presentan las pruebas exigidas de conformidad con la letra a) o si tales pruebas son consideradas insuficientes por el tribunal o el órgano administrativo. | |

El artículo 12 de la DPCD aclara que toda declaración (incluidas las declaraciones medioambientales) se debe basar en pruebas que las autoridades competentes pertinentes puedan verificar. Los comerciantes deben respaldar las declaraciones medioambientales con pruebas apropiadas. Por consiguiente, las declaraciones deben basarse en pruebas sólidas, independientes, verificables y generalmente admitidas que tengan en cuenta datos científicos y métodos actualizados. En la DPCD no existe ninguna obligación equivalente por la que el comerciante deba facilitar documentación u otras pruebas justificativas a los consumidores.

La carga de la prueba sobre la exactitud de la declaración recae en el comerciante. El artículo 12, letra a), de la DPCD, establece que las autoridades de ejecución deben tener competencias «para exigir que el comerciante aporte pruebas de la exactitud de las afirmaciones de hecho realizadas en la práctica comercial».

La aplicación de este requisito debe tener en cuenta los intereses legítimos del comerciante, como en el caso de los secretos comerciales o la protección de la propiedad intelectual, que las autoridades pueden tener que tratar confidencialmente.

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| Por ejemplo:  Una empresa de aguas minerales presentaba sus productos con la declaración «Impacto cero», indicando que la fabricación y venta de las botellas de agua no tenían incidencia alguna en el medio ambiente. Sin embargo, la empresa no pudo demostrar su participación en actividades concretas de reducción del impacto ambiental de sus productos, aparte de su intervención en un proyecto para reparar los daños medioambientales. Sobre esta base, la autoridad nacional de ejecución en materia de protección de los consumidores concluyó que la campaña «Impacto cero» constituía una práctica comercial desleal, susceptible de influir en las decisiones de los consumidores sobre transacciones [(317)](#ntr317-C_2021526ES.01000101-E0317). |

Con el fin de velar por que las declaraciones ecológicas estén justificadas, los comerciantes deben disponer de las pruebas necesarias para sustentar sus declaraciones desde el momento en que se haga uso de ellas o asegurarse de que pueden obtenerlas y presentarlas cuando se les solicite.

Es posible que una declaración sea correcta y pertinente para un producto cuando se realizó por primera vez, pero que con el tiempo vaya perdiendo pertinencia. Con el fin de garantizar que están en condiciones de proporcionar la documentación necesaria a las autoridades nacionales con arreglo al artículo 12 de la Directiva, los comerciantes deben asegurarse de que la documentación de las declaraciones esté actualizada mientras estas se sigan utilizando en la comercialización.

Las pruebas presentadas deben ser claras y sólidas. Si la declaración se pone en duda, se habrá de presentar a los organismos competentes una prueba realizada por un tercero independiente. Si los estudios de expertos dan lugar a discrepancias o dudas importantes sobre el impacto ambiental, el comerciante deberá abstenerse de realizar la declaración. El contenido y alcance de la documentación que debe presentarse dependerán del contenido específico de la declaración. La complejidad del producto o la actividad son relevantes a este respecto.

4.1.1.6.   Aplicación del anexo I a las declaraciones medioambientales

Las siguientes prácticas recogidas en el anexo I son particularmente pertinentes para las declaraciones medioambientales:

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| Punto 1 del anexo I  Afirmar el comerciante ser signatario de un código de conducta no siendo cierto. |

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| Por ejemplo:  Un comerciante que declara falsamente en su sitio web que es signatario de un código de conducta sobre el comportamiento ambiental de un producto. |

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| Punto 2 del anexo I  Exhibir un sello de confianza o de calidad o un distintivo equivalente sin haber obtenido la necesaria autorización. |

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| Por ejemplo:  Utilizar cualquier etiqueta nacional o de la UE (por ejemplo: etiqueta ecológica de la UE, etiqueta del «Cisne Nórdico», etiqueta del «Ángel azul» u otro logotipo) sin autorización. |

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| Punto 3 del anexo I  Afirmar que un código de conducta ha recibido el refrendo de un organismo público o de otro tipo no siendo cierto. |

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| Por ejemplo:  Un comerciante proclama falsamente que el código de conducta de su empresa productora de automóviles está aprobado por la agencia de medio ambiente, por el ministerio o por la organización de consumidores nacionales. |

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| Punto 4 del anexo I  «Afirmar que un comerciante (incluidas sus prácticas comerciales) o un producto ha sido aprobado, aceptado o autorizado por un organismo público o privado cuando este no sea el caso, o hacer esa afirmación sin cumplir las condiciones de la aprobación, aceptación o autorización.» |

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| Por ejemplo:  Afirmar falsamente que un vehículo cumple los términos de la legislación sobre homologación de tipo, al tiempo que utiliza dispositivos de desactivación ilegales. |

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| Punto 10 del anexo I  «Presentar los derechos que otorga la legislación a los consumidores como si fueran una característica distintiva de la oferta del comerciante.» |

Esta disposición aclara que los comerciantes no deben engañar a los consumidores destacando indebidamente atributos que proceden de los requisitos reglamentarios.

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| Por ejemplo:  Los comerciantes no deben declarar que un producto está libre de determinadas sustancias si esas sustancias ya están prohibidas por la legislación. |

4.1.1.7.   Declaraciones medioambientales comparativas

Las declaraciones medioambientales pueden sugerir que un producto tiene un impacto más positivo en el medio ambiente o que es menos perjudicial para el medio ambiente que los bienes o servicios competidores, o versiones anteriores de sus propios bienes o servicios. Los productos que presenten tales declaraciones comparativas deben evaluarse con respecto a productos similares (o, en su caso, con una versión anterior del mismo producto) y el mismo método de evaluación debe aplicarse de manera coherente para permitir dicha comparación.

Las autoridades nacionales de ejecución y los organismos autorreguladores suelen interpretar que este principio significa que las comparaciones deben referirse a productos de la misma categoría. No obstante, parece igualmente importante que el método utilizado para elaborar la declaración medioambiental sea el mismo, que se aplique de forma coherente (es decir, aplicación de las mismas opciones metodológicas y las mismas normas, resultados reproducibles), y que permita comparaciones; de lo contrario, cualquier comparación será engañosa [(318)](#ntr318-C_2021526ES.01000101-E0318). Por ejemplo, dependiendo de los productos en cuestión, es probable que las declaraciones medioambientales comparativas sean engañosas si excluyen factores como el transporte, en particular cuando tales factores sean los que más contribuyan a la huella ambiental de un producto.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Una empresa presenta una declaración comparativa de que una cuchilla de afeitar A contiene menos plástico que otras cuchillas de afeitar presentes en el mercado. Es probable que esta declaración sea engañosa si las otras cuchillas de afeitar seleccionadas para la comparación no son representativas del mercado en su conjunto, y la cantidad de plástico en las cuchillas de afeitar suele ser, por término medio, inferior a la de la cuchilla de afeitar A. |  |  |  | | --- | --- | | — | Una aerolínea afirma que es la «compañía aérea más ecológica» y que tiene «las menores emisiones de CO2 de todas las grandes aerolíneas» [(319)](#ntr319-C_2021526ES.01000101-E0319). En su publicidad, la aerolínea compara sus emisiones de CO2 por pasajero/km con las de otras cuatro «grandes» compañías europeas, y muestra que sus emisiones de CO2 por pasajero/km son las más bajas. Esta declaración podría ser engañosa si las emisiones comparadas no se calculan del mismo modo, si las emisiones totales de CO2 de la compañía aérea son superiores a las de otras compañías aéreas y si las emisiones han aumentado significativamente en los últimos años. Sería más claro declarar más específicamente que tiene las menores emisiones de CO2 por pasajero/km en comparación con las otras cuatro grandes compañías aéreas europeas, siempre que el método permita dicha comparación y que la compañía aérea no oculte que sus emisiones han aumentado en términos absolutos. Si las declaraciones relacionadas con el clima se basan en compensaciones de emisiones de carbono/gases de efecto invernadero, estas deben ser transparentes y detalladas, habida cuenta de los riesgos de blanqueo ecológico asociados. Además, la comparación entre todos los modos de transporte pertinentes, no solo el transporte aéreo, sería aún más objetiva e informativa. Las necesidades de movilidad de los consumidores pueden satisfacerse no solo a través de un vuelo, sino también con otros medios de transporte, dependiendo de la ruta. Por lo tanto, una comparación de las emisiones medias por pasajero/km entre el ferrocarril, el transporte por carretera y el transporte aéreo evitaría inducir a error a los consumidores en el sentido de que su elección es «ecológica», cuando existen alternativas viables con menores emisiones. |  |  |  | | --- | --- | | — | Una empresa hace una declaración comparativa de que su «producto remanufacturado» es más respetuoso con el medio ambiente que un «producto nuevo». Esta declaración podría ser engañosa si las soluciones de reciclado o recogida aplicables son comparativamente peores y la huella ambiental global es, por tanto, más significativa. | |

La Directiva 2006/114/CE, sobre publicidad engañosa y publicidad comparativa, que abarca las relaciones entre empresas, establece las condiciones en las que se autoriza la publicidad comparativa. Estas condiciones también son pertinentes para evaluar si la publicidad comparativa es lícita en las relaciones entre empresas y consumidores en el contexto de la DPCD. La comparación de las ventajas medioambientales de los productos debe, entre otras cosas:

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| 1. | no ser engañosa en el sentido de los artículos 6 y 7 de la DPCD; |

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| 2. | comparar bienes o servicios que satisfagan las mismas necesidades o tengan la misma finalidad; |

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| 3. | comparar de modo objetivo una o más características esenciales, pertinentes, verificables y representativas de dichos bienes y servicios. |

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| Por ejemplo:  Un órgano jurisdiccional estimó engañosa una publicidad que afirmaba que el agua filtrada era más respetuosa con el medio ambiente que el agua mineral embotellada, con lo que daba a los consumidores la impresión de que si consumían agua filtrada en lugar de agua mineral contribuían a la protección del medio ambiente. En particular, se consideró que la referencia a una mayor protección del medio ambiente era engañosa, pues la comparación no se basaba en ningún criterio objetivo, como un estudio de impacto. [(320)](#ntr320-C_2021526ES.01000101-E0320) |

4.1.2.   Obsolescencia programada

Los consumidores pueden encontrarse con prácticas de obsolescencia temprana según las cuales los bienes duran menos que su «vida útil» normal, de acuerdo con las expectativas razonables de los consumidores. En particular, el fallo prematuro de los bienes puede deberse a la obsolescencia programada, u obsolescencia incorporada en el diseño industrial, que es una política comercial que consiste en planificar o diseñar deliberadamente un producto con una vida útil limitada, de modo que llegue a ser obsoleto o no funcional tras un determinado período de tiempo. Como se ha explicado en el punto 2.3.1, la DPCD abarca también las prácticas comerciales que se producen después de que se haya realizado la transacción. Por lo que respecta a los bienes inteligentes y conectados, tales prácticas comerciales después de la compra pueden consistir en reducir la funcionalidad o ralentizar el funcionamiento de los bienes mediante actualizaciones de software
 sin un motivo válido.

La DPCD no contiene disposiciones que aborden específicamente la obsolescencia. No obstante, cuando el comerciante, incluido el fabricante, lleve a cabo prácticas comerciales con respecto al consumidor, el hecho de no informar a este de que un producto ha sido diseñado con una vida útil limitada podría considerarse, previa evaluación caso por caso, omisión de información sustancial con arreglo al artículo 7 de la DPCD. Además, estas prácticas también pueden ser contrarias a los requisitos de la diligencia profesional establecidos en el artículo 5, apartado 2, de la DPCD si es probable que distorsionen de manera sustancial el comportamiento económico del consumidor medio.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Omitir la información de que la batería de un teléfono inteligente (que está sujeta a un desgaste particular) no puede sustituirse o de que los  cartuchos de tinta de una impresora  están programados de tal manera que haya que sustituirlos antes de que se gasten podría infringir el artículo 7 de la DPCD, incluso si puede haber justificaciones técnicas para diseñar el bien de esta manera. |  |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad nacional de protección de los consumidores multó a un fabricante de impresoras por prácticas engañosas y agresivas, incluido el hecho de no destacar adecuadamente las limitaciones del uso de cartuchos de tinta de impresora no originales en los envases de venta [(321)](#ntr321-C_2021526ES.01000101-E0321). |  |  |  | | --- | --- | | — | Las autoridades nacionales de protección de los consumidores tomaron medidas en relación con la obsolescencia prematura de los teléfonos inteligentes [(322)](#ntr322-C_2021526ES.01000101-E0322). Algunos modelos de teléfonos inteligentes se vieron afectados negativamente por la instalación de un nuevo sistema operativo y sus posteriores actualizaciones, lo que dio lugar a una reducción de la vida útil de las baterías y a una ralentización del rendimiento. No se informó adecuadamente a los consumidores sobre la finalidad de las actualizaciones y sus consecuencias en el rendimiento del producto con arreglo al artículo 7 de la DPCD. | |

Otra legislación de la UE ofrece medios adicionales para luchar contra la obsolescencia programada para categorías de productos específicas.

La Directiva sobre diseño ecológico [(323)](#ntr323-C_2021526ES.01000101-E0323) permite a la Comisión establecer requisitos mínimos obligatorios para mejorar el comportamiento ambiental de los productos, también en relación con la reparabilidad y la durabilidad. Ya hay en vigor requisitos de durabilidad de diseño ecológico para las aspiradoras (para algunos componentes) [(324)](#ntr324-C_2021526ES.01000101-E0324) y las bombillas [(325)](#ntr325-C_2021526ES.01000101-E0325), así como requisitos de reparabilidad de diseño ecológico para lavadoras [(326)](#ntr326-C_2021526ES.01000101-E0326), lavavajillas [(327)](#ntr327-C_2021526ES.01000101-E0327), frigoríficos [(328)](#ntr328-C_2021526ES.01000101-E0328), televisores [(329)](#ntr329-C_2021526ES.01000101-E0329), etc. Se están elaborando nuevos requisitos de diseño ecológico para otros bienes de consumo, como, por ejemplo, teléfonos inteligentes y tabletas [(330)](#ntr330-C_2021526ES.01000101-E0330), en consonancia con el Plan de acción para la economía circular y los planes de trabajo sobre diseño ecológico subyacentes [(331)](#ntr331-C_2021526ES.01000101-E0331). Los requisitos de diseño ecológico suelen ir acompañados de etiquetas energéticas nuevas o actualizadas para los mismos productos, que proporcionan información sobre la eficiencia energética del producto, pero también sobre otros parámetros [(332)](#ntr332-C_2021526ES.01000101-E0332).

En el contexto de la iniciativa sobre productos sostenibles, se está estudiando una modificación de la Directiva sobre diseño ecológico para ampliar su ámbito de aplicación más allá de los productos relacionados con la energía y hacerla aplicable a la gama más amplia posible de productos [(333)](#ntr333-C_2021526ES.01000101-E0333).

El Reglamento sobre la etiqueta ecológica [(334)](#ntr334-C_2021526ES.01000101-E0334) establece un sistema voluntario de concesión de la etiqueta ecológica destinado a promover productos con un impacto ambiental reducido durante todo su ciclo de vida y a proporcionar a los consumidores información precisa sobre el impacto ambiental de los productos. Los criterios de la etiqueta ecológica tienen en cuenta la posibilidad de reducir el impacto ambiental por razón de la durabilidad y la reusabilidad de los productos, por ejemplo, en el caso de productos textiles, pantallas electrónicas y muebles.

La Directiva (UE) 2019/771 sobre compraventa de bienes protege a los consumidores contra la falta de conformidad con el contrato (un defecto) que exista en el momento de la entrega de los bienes y que se manifieste en un plazo de dos años a partir de la entrega de estos («garantía legal»; véase el artículo 10, apartados 1 y 2). A fin de reforzar la protección de los consumidores, los Estados miembros pueden mantener o introducir plazos aún más largos para la responsabilidad del vendedor. La garantía legal puede aplicarse cuando la no conformidad se deba a prácticas de obsolescencia.

En caso de litigio, el consumidor tiene que demostrar la falta de conformidad. El artículo 11 aclara que, en el plazo de un año a partir de la entrega, el consumidor no tendrá que demostrar que la falta de conformidad ya existía en el momento de la entrega. Los Estados miembros podrán mantener o introducir un plazo de dos años para esta inversión de la carga de la prueba.

El artículo 7, apartado 3, también obliga al vendedor a garantizar que se faciliten actualizaciones a los consumidores para los «bienes inteligentes» durante el período que el consumidor pueda razonablemente esperar (para un único acto de suministro del elemento digital), o durante todo el período de garantía legal (para el suministro continuo del elemento digital). Además, si el contrato establece que los contenidos o servicios digitales del bien inteligente se suministrarán continuamente durante un período más largo que el período de garantía legal, el vendedor estará obligado a proporcionar actualizaciones para ese período más largo.

Además, el artículo 7, apartado 1, letra d), añade la durabilidad como requisito de conformidad objetivo (definida como «la capacidad de los bienes de mantener sus funciones y rendimiento requeridos en condiciones normales de utilización» en el artículo 2, punto 13). Si bien los requisitos relacionados con los productos en relación con tipos o grupos de productos específicos se dejan a la legislación de la Unión específica sobre los productos, la Directiva establece de manera general que los bienes deben poseer la durabilidad normal para los bienes del mismo tipo que el consumidor puede esperar razonablemente, dada la naturaleza de los bienes y cualquier declaración pública realizada por cualquier persona en la cadena de transacciones o en su nombre.

El artículo 17, apartado 1, también se refiere a la «garantía comercial de durabilidad» ofrecida por un productor como forma específica de «garantía comercial» voluntaria. Un productor que ofrezca tal garantía será responsable directamente frente al consumidor, durante todo el período de la garantía comercial de durabilidad, de la reparación o la sustitución de los bienes conforme al artículo 14 de la Directiva, es decir, de forma gratuita, en un plazo razonable y sin inconvenientes significativos para el consumidor.

La Nueva Agenda del Consumidor [(335)](#ntr335-C_2021526ES.01000101-E0335) y el Plan de acción para la economía circular de 2020 [(336)](#ntr336-C_2021526ES.01000101-E0336) prevén nuevas propuestas para luchar contra la obsolescencia prematura.

4.2.   Sector digital

La Directiva tiene un ámbito de aplicación amplio, pues cubre la totalidad de las transacciones entre empresas y consumidores, tanto en línea como fuera de ella. Es neutra desde el punto de vista tecnológico y se aplica con independencia del canal, medio o dispositivo utilizado para llevar a cabo la práctica comercial de las empresas en sus relaciones con los consumidores. Se aplica a los intermediarios en línea, incluidos los medios sociales, los mercados en línea y las tiendas de aplicaciones, los motores de búsqueda, las herramientas comparativas [(337)](#ntr337-C_2021526ES.01000101-E0337) y otros comerciantes que operan en el sector digital.

La Directiva se aplica también a las prácticas y los productos que implican el uso de tecnologías como algoritmos, decisiones automatizadas e inteligencia artificial (IA). Esto incluye todas las prácticas de las empresas en sus relaciones con los consumidores adoptadas por los comerciantes en relación con los consumidores en las fases publicitaria, de venta y posventa, como el uso de tecnologías de seguimiento y selección, personalización algorítmica, optimización dinámica y tecnologías de registro descentralizado.

4.2.1.   Plataformas en línea y sus prácticas comerciales

Por lo general, las plataformas en línea proporcionan infraestructuras y posibilitan las interacciones entre proveedores y usuarios para el suministro de bienes, servicios, contenidos digitales e información en línea. Los modelos de negocio de las plataformas en línea van desde el mero hecho de permitir a los usuarios buscar información facilitada por terceros hasta permitir directamente las transacciones de carácter contractual entre terceros comerciantes y consumidores. Las plataformas también pueden anunciar y vender, en su propio nombre, diferentes tipos de productos.

La DPCD se aplica a las prácticas comerciales de la plataforma y de los comerciantes que utilizan la plataforma para promocionar sus productos entre los consumidores. Dado que la DPCD solo se aplica en situaciones de B2C, el primer paso a la hora de evaluar su aplicabilidad a un proveedor de una plataforma en línea debería ser determinar si tiene la condición de «comerciante» o actúa «en nombre del comerciante o por cuenta de éste» con arreglo a la definición del artículo 2, letra b), de la DPCD. Con una evaluación caso por caso será posible reconocer si un proveedor de plataforma puede estar actuando con fines relacionados con su empresa cuando, por ejemplo, cobra una comisión por las operaciones entre proveedores y usuarios, presta servicios adicionales de pago u obtiene ingresos de publicidad dirigida.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional estimó que un servicio de comparación de precios de comestibles era el sitio web de un comerciante y un instrumento de publicidad comparativa [(338)](#ntr338-C_2021526ES.01000101-E0338). |  |  |  | | --- | --- | | — | En principio, una organización de consumidores que gestione una herramienta comparativa en la que se ofrezca información a los consumidores a cambio del pago de una suscripción ha de cumplir los requisitos de la DPCD. Este servicio podría formar parte de la estrategia de la organización para obtener un beneficio comercial de los servicios que presta a los consumidores, lo que convierte a la organización en un «comerciante» en el sentido del artículo 2, letra b), de la Directiva. | |

El segundo paso para evaluar si la DPCD es aplicable será determinar si los proveedores de la plataforma se dedican a «prácticas comerciales de las empresas en sus relaciones con los consumidores» en el sentido del artículo 2, letra d), con los usuarios (proveedores y clientes), que pueden considerarse «consumidores» en el sentido del artículo 2, letra a), de la DPCD.

Una plataforma calificada como comerciante debe cumplir siempre el Derecho de la UE en materia de protección de los consumidores en lo que respecta a sus propias prácticas comerciales, independientemente de que estas prácticas puedan referirse a productos suministrados por terceros y no por las propias plataformas. Esto es posible debido a la amplia definición de «práctica comercial» del artículo 3, apartado 1, de la DPCD como práctica directamente relacionada «con la promoción, la venta o el suministro de un producto a los consumidores», sin establecer requisitos adicionales en cuanto al origen del producto.

En el asunto Verband Sozialer Wettbewerb, el Tribunal de Justicia confirmó este amplio ámbito de «práctica comercial» en la cuestión relativa a la publicidad por parte de una plataforma en línea en un soporte impreso:

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| «31. | Por último, es preciso señalar que la obligación de indicar en una invitación a comprar [productos] la información mencionada en el artículo 7, apartado 4, letra b), de la Directiva 2005/29 no depende de si el proveedor de los productos en cuestión es el autor de dicha invitación [es decir, la plataforma en línea] o un tercero. Por consiguiente, en el supuesto de que un anuncio [de una plataforma en línea], en un medio impreso, promocione productos de varios proveedores, la información exigida en esta disposición sigue siendo necesaria, sin perjuicio de las limitaciones de espacio mencionadas en el apartado 29 de la presente sentencia». [(339)](#ntr339-C_2021526ES.01000101-E0339) |

Obligaciones de transparencia

En particular, las plataformas están sujetas a los requisitos de transparencia de los artículos 6 y 7 de la DPCD, que las obligan a abstenerse de llevar a cabo acciones y omisiones engañosas cuando participan en la promoción, la venta o el suministro de un producto a los consumidores.

Por ejemplo, las plataformas en línea deben ser transparentes en cuanto a las principales características de sus servicios con arreglo al artículo 7 de la DPCD. Dependiendo del modelo de negocio específico de la plataforma, diversos elementos podrían ser pertinentes para el consumidor, como la cobertura de la oferta de la plataforma (por ejemplo, sectores y tipos y número de proveedores), la frecuencia de las actualizaciones de la información (en particular sobre el precio y la disponibilidad de los productos), el modo en que selecciona a los proveedores que operan a través de ella y si realiza controles en relación con su fiabilidad, y, en caso afirmativo, cuáles.

Dicha información puede permitir a los consumidores comprender que la disponibilidad de productos y proveedores en la plataforma no es exhaustiva y que pueden encontrar otras ofertas en otro canal de información. También ayudará a evitar el riesgo de que el consumidor pueda ser inducido a error por listas marcadas como «ganga» o «recomendado».

Promocionar precios o productos cuando la plataforma es razonablemente consciente de que en realidad no están disponibles podría estar infringiendo los artículos 6 y 7 de la DPCD y, según las circunstancias, varias disposiciones de la lista negra del anexo I de la DPCD, que prohíbe, en cualquier circunstancia, la publicidad señuelo (punto 5), el señuelo y cambio (punto 6) y la transmisión de información materialmente inexacta sobre las condiciones del mercado con la intención de inducir al consumidor a adquirir un producto en condiciones menos favorables que las condiciones normales de mercado (punto 18). Las afirmaciones engañosas acerca de la disponibilidad limitada de un producto pueden estar infringiendo el artículo 6, apartado 1, letra b), de la DPCD.

Cuando una plataforma permita a los consumidores comprar juntos productos a un precio más favorable (plataformas de compra colectiva), debe informar claramente a los consumidores sobre las características y el precio de la oferta y su proveedor. En particular, las características del producto o servicio obtenido a raíz de una compra en grupo no deben ser inferiores a las disponibles al precio normal, salvo que se informe claramente a los consumidores acerca de ello. Las condiciones en las que los consumidores se pueden beneficiar del producto (por ejemplo, número mínimo de compradores, duración de la oferta, etc.) deberán explicarse claramente.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Una oferta para un tratamiento específico en un centro de bienestar físico se anuncia con una reducción del 50 % si se adquiere en una plataforma de compra en grupo. Si el tratamiento ofrecido solo dura 30 minutos, mientras que al precio completo ordinario dura 60 minutos, dicha oferta puede entrar en el ámbito de aplicación del artículo 6, apartado 1, letras b) y d) (como indicación engañosa de un precio ventajoso), salvo que se haya informado claramente de ello a los consumidores. |  |  |  | | --- | --- | | — | En caso de ofertas combinadas, es decir, combinaciones de varios productos o servicios, cuando el precio pueda variar en función del número y el volumen de los productos o servicios adquiridos, se debe indicar el precio global del paquete para evitar la impresión de que se puede adquirir un mayor número de productos o servicios a un precio más bajo cuando no se pueda [(340)](#ntr340-C_2021526ES.01000101-E0340). | |

Diligencia profesional

Por otra parte, en virtud del artículo 5, apartado 2, de la DPCD, ninguna plataforma que se considere comerciante debe obrar de forma contraria a los requisitos de la diligencia profesional en sus prácticas comerciales con los consumidores. Con arreglo al artículo 2, letra h), de la DPCD, la «diligencia profesional» es el nivel de competencia y cuidado especiales que cabe razonablemente esperar del comerciante en sus relaciones con los consumidores, acorde con las prácticas honradas del mercado o con el principio general de buena fe en el ámbito de actividad del comerciante.

Los deberes de la diligencia profesional de estos comerciantes frente a los consumidores con arreglo a la DPCD son distintos, aunque complementarios, del régimen de exenciones de responsabilidad establecido en virtud del artículo 14 de la Directiva sobre el comercio electrónico para la información ilegal ofrecida por los prestadores de servicios a petición de terceros. Además, el artículo 15, apartado 1, de la Directiva sobre el comercio electrónico impide que los Estados miembros impongan a los prestadores de servicios de alojamiento de datos una obligación general de supervisar los datos que almacenen o realizar búsquedas activas de hechos.

En este sentido, el artículo 1, apartado 3, de la Directiva sobre el comercio electrónico precisa que dicha Directiva «completará el ordenamiento jurídico comunitario aplicable a los servicios de la sociedad de la información, sin perjuicio del nivel de protección, en particular, de la salud pública y de los intereses del consumidor, fijados tanto en los instrumentos comunitarios como en las legislaciones nacionales que los desarrollan, en la medida en que nos restrinjan la libertad de prestar servicios de la sociedad de la información». Así pues, la Directiva sobre el comercio electrónico y el acervo de la UE en materia de protección de los consumidores son aplicables, en principio, de forma complementaria [(341)](#ntr341-C_2021526ES.01000101-E0341).

Como resultado de sus obligaciones en materia de diligencia profesional en virtud de la DPCD, las plataformas deben adoptar las medidas adecuadas que, sin suponer una obligación general de supervisión o de llevar a cabo investigaciones, permitan a los terceros comerciantes pertinentes cumplir los requisitos del Derecho de la UE en materia de protección de los consumidores y comercialización.

Por ejemplo, dichas medidas podrían implicar que las plataformas diseñen sus interfaces de modo que permitan a los terceros comerciantes presentar información a los usuarios de la plataforma en cumplimiento de la legislación de la UE sobre comercialización y protección de los consumidores, y especialmente la información exigida en virtud del artículo 7, apartado 4, de la DPCD, en caso de invitación a comprar, y del artículo 6 de la DDC. Por ejemplo, los mercados en línea deben permitir a los terceros proveedores informar a los consumidores sobre su identidad, sus datos de contacto, el precio del producto y cualquier coste adicional al que pueda hacer frente el consumidor, por ejemplo, a través de compras integradas en la aplicación.

Si las plataformas en línea incluidas en el ámbito de aplicación de la DPCD incumplen dichos requisitos de la diligencia profesional o promocionan, venden o suministran un producto de manera desleal a los usuarios, pueden considerarse contrarias al Derecho de la UE en materia de protección de los consumidores. No podrán invocar la exención de responsabilidad de los intermediarios con arreglo a la Directiva sobre el comercio electrónico en lo que respecta a sus propias prácticas comerciales, dado que dicha exención se refiere únicamente a la información ilegal almacenada a petición de terceros.

4.2.2.   Intermediación de contratos celebrados por consumidores con terceros

Tras las modificaciones introducidas por la Directiva (UE) 2019/2161, la DPCD incluye una definición específica de «mercado en línea», que es una plataforma en línea que permite a los clientes comprar productos ofrecidos por terceros proveedores (comerciantes o consumidores) directamente en la interfaz del mercado. El «mercado en línea» es un concepto neutro desde el punto de vista tecnológico, que también incluye tiendas de aplicaciones que suministran contenidos y servicios digitales.

Muchos mercados en línea ofrecen también sus propios productos además de los productos de terceros comerciantes. Algunos mercados solo acogen terceros proveedores profesionales, otros tienen una combinación de ofertas de particulares y profesionales o solo facilitan las relaciones entre consumidores homólogos (determinadas plataformas de economía colaborativa o compartida en las que los proveedores y usuarios comparten realmente activos, recursos, tiempo y competencias sin ánimo de lucro, como trayectos en coche, dividiendo los costes).

Los mercados en línea deben adoptar medidas para garantizar que el consumidor esté debidamente informado sobre la identidad del comerciante sobre la base de la información facilitada por el propio comerciante. De hecho, si el mercado no informa sobre la identidad del comerciante real y se crea la impresión de que el mercado es el comerciante real, esto puede derivar en que el mercado tenga que asumir la responsabilidad por las obligaciones del comerciante.

El Tribunal de Justicia analizó la cuestión de la identidad del comerciante en el asunto Wathelet [(342)](#ntr342-C_2021526ES.01000101-E0342), que se ocupó de la responsabilidad de un intermediario físico (un taller) en cuanto a la conformidad de los bienes vendidos a los consumidores con arreglo a la anterior Directiva 1999/44/CE del Parlamento Europeo y del Consejo sobre la venta de bienes de consumo [(343)](#ntr343-C_2021526ES.01000101-E0343).

El Tribunal de Justicia declaró (apartados 33 y 34) que, si bien la Directiva 1999/44/CE no aborda la cuestión de la responsabilidad de los intermediarios frente a los consumidores, «no excluye por sí sola que pueda interpretarse el concepto de “vendedor”, conforme al artículo 1, apartado 2, letra c), de la Directiva 1999/44, en el sentido de que engloba al profesional que actúa por cuenta de un particular cuando se muestra, desde el punto de vista del consumidor, como vendedor de un bien de consumo mediante contrato en el marco de su actividad profesional. De hecho, el profesional podría confundir al consumidor al dar la impresión errónea de que actúa en calidad de vendedor titular del bien».

Asimismo, el Tribunal de Justicia declaró (apartado 44) que «[p]ueden ser pertinentes a este respecto, para determinar si el consumidor podía entender que el intermediario actuaba por cuenta de un particular, aspectos como el grado de participación y la intensidad de los esfuerzos empleados por el intermediario en la compraventa, las circunstancias en las que el bien se mostró al consumidor o el comportamiento de este último».

Las conclusiones del Tribunal de Justicia relativas a la responsabilidad del intermediario físico por la conformidad de los bienes también podrían ser pertinentes para otros intermediarios y otras obligaciones de los comerciantes en virtud de la legislación de la UE, también en un contexto en línea. En particular, los intermediarios en línea podrían ser declarados responsables de las obligaciones del comerciante en lo que respecta a la información precontractual o a la ejecución contractual cuando se muestren, desde el punto de vista del consumidor, como comerciantes en virtud del contrato (propuesto).

En el asunto Wathelet, el Tribunal de Justicia subrayó (apartado 37) que «el conocimiento por parte del consumidor de la identidad del vendedor y, en especial, de su condición de particular o de profesional es imprescindible para que este último pueda disfrutar de la protección que la Directiva 1999/44 le confiere». Sin embargo, aun cuando el verdadero proveedor fuera también un comerciante y el consumidor, en consecuencia, no se viera privado de sus derechos, puede que este último no hubiera celebrado el contrato en caso de haber conocido la identidad del comerciante real debido, por ejemplo, a dudas sobre la fiabilidad de dicho comerciante y la posibilidad de hacer valer sus derechos como consumidor con respecto a él.

Cabe esperar más orientación sobre el concepto de «comerciante» en el asunto pendiente Tiketa, C-536/20, que aborda la cuestión de si un intermediario en línea (plataforma de venta de entradas) puede ser considerado responsable conjuntamente con el comerciante que presta realmente el servicio, si el intermediario no ha facilitado información clara de que actúa como mero intermediario.

La Directiva (UE) 2019/2161 añadió la letra f) al artículo 7, apartado 4. En ella se exige específicamente a los proveedores de un mercado en línea que informen al consumidor, en cualquier invitación a comprar, de si el tercero que ofrece los productos es un comerciante o no (como un consumidor homólogo), sobre la base de la información facilitada por dicho tercero proveedor. La Directiva (UE) 2019/2161 añadió los mismos y otros requisitos de información para los mercados en línea en la DDC (artículo 6 bis).

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| Artículo 7: omisiones engañosas   |  |  |  |  |  | | --- | --- | --- | --- | --- | |  | 4. | En los casos en que haya una invitación a comprar se considerará sustancial la información que figura a continuación, si no se desprende ya claramente del contexto:  |  |  | | --- | --- | | f) | en el caso de productos ofrecidos en mercados en línea, si el tercero que ofrece el producto es un comerciante o no, con arreglo a la declaración de dicho tercero al proveedor del mercado en línea. | | |

El objetivo de este requisito de información específico para los mercados en línea es garantizar que los consumidores siempre sepan a quién compran un producto en el mercado en línea: a un comerciante o a otro consumidor. Una suposición errónea de que el tercero proveedor es un comerciante puede causar problemas al consumidor si algo sale mal con la compra en línea (por ejemplo, la no conformidad de los bienes) y si resulta que las normas de protección del consumidor, como el derecho de desistimiento en el plazo de catorce días o la garantía legal, no se aplican realmente al contrato celebrado.

La disposición de la DPCD (y la DDC) especifica que la información sobre la situación del tercero proveedor debe basarse en una declaración de dicho proveedor que el mercado en línea transmite posteriormente al consumidor. Por lo tanto, el mercado en línea puede basarse principalmente en la declaración facilitada por el tercero proveedor. Este enfoque está en consonancia con la prohibición de imponer obligaciones generales de supervisión a los intermediarios en línea en virtud de la Directiva sobre el comercio electrónico, en la medida en que las disposiciones pertinentes de dicha Directiva se apliquen al mercado en línea. Al mismo tiempo, se entiende sin perjuicio de las obligaciones del mercado en relación con los contenidos ilícitos, tales como actuar sobre la base de un aviso que informa a la plataforma sobre ofertas fraudulentas específicas de los comerciantes [(344)](#ntr344-C_2021526ES.01000101-E0344).

Cabe destacar que esta disposición es un requisito de información para promover la claridad para los consumidores que compran en mercados en línea. La autodeclaración es un buen indicador de la situación jurídica del proveedor, pero no sustituye a la definición de «comerciante» que queda por aplicar de conformidad con los criterios especificados. A este respecto, debe hacerse referencia al punto 22 del anexo I de la DPCD, que prohíbe a los comerciantes fingir que son no comerciantes. Esta prohibición se aplica a toda declaración incorrecta o inexacta de ser no comerciante con arreglo a esta nueva norma de información.

Para animar a los comerciantes a declarar correctamente su condición, el artículo 6 bis, apartado 1, letra c), de la DDC también exige que el proveedor del mercado en línea advierta al consumidor de que no se beneficia de los derechos de los consumidores cuando el tercero proveedor haya declarado su condición de no comerciante.

Por último, en el asunto Kamenova, relativo a un vendedor particular en una plataforma en línea, el Tribunal de Justicia proporcionó criterios adicionales para determinar si una persona puede ser calificada de «comerciante» (véase el punto 2.2 sobre el concepto de comerciante).

4.2.3.   Transparencia de los resultados de las búsquedas

Los motores de búsqueda permiten buscar información en internet con arreglo a un algoritmo específico. Otros intermediarios, como los mercados en línea y los servicios de comparación de precios, ofrecen también la posibilidad de buscar entre los diferentes productos y proveedores accesibles a través de sus servicios. Los consumidores esperan que los resultados de las búsquedas sean «naturales» u «orgánicos» y se basen en criterios suficientemente imparciales. Sin embargo, los proveedores también incluyen en los resultados de las búsquedas publicidad de pago o mejoran la clasificación de los productos debido al pago directo o indirecto que reciben de los terceros comerciantes pertinentes.

La Directiva (UE) 2019/2161 añadió al artículo 7 de la DPCD un nuevo apartado 4 bis que establece un requisito específico de información sobre los principales parámetros que determinan la clasificación. Además, se añadió un nuevo punto 11 bis al anexo I de la DPCD, que prohíbe la publicidad no divulgada y la promoción remunerada en los resultados de las búsquedas.

Información sobre los parámetros de clasificación

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| Artículo 7  |  |  | | --- | --- | | «4 bis. | Cuando se ofrezca a los consumidores la posibilidad de buscar productos ofrecidos por distintos comerciantes o consumidores sobre la base de una consulta en forma de palabra clave, expresión u otro tipo de dato introducido, independientemente de dónde se realicen las transacciones en último término, se considerará esencial facilitar, en una sección específica de la interfaz en línea que sea fácil y directamente accesible desde la página en la que se presenten los resultados de la búsqueda, información general relativa a los principales parámetros que determinan la clasificación de los productos presentados al consumidor como resultado de la búsqueda y la importancia relativa de dichos parámetros frente a otros. El presente apartado no se aplicará a proveedores de motores de búsqueda en línea, tal como se definen en el artículo 2, punto 6, del Reglamento (UE) 2019/1150 […].» | |

El nuevo requisito de información del artículo 7, apartado 4 bis, solo se aplica a los comerciantes que permiten a los consumidores buscar productos ofrecidos por otros, terceros, comerciantes o consumidores, es decir, mercados en línea y herramientas comparativas. No se aplica a los comerciantes que ofrecen a sus consumidores la posibilidad de buscar únicamente entre sus propias ofertas de diferentes productos.

El requisito de información tampoco se aplica a los «motores de búsqueda en línea», tal como se definen en el Reglamento (UE) 2019/1150 («Reglamento P2B»). Esto se debe a que el Reglamento P2B ya exige a todos los proveedores de motores de búsqueda en línea que publiquen «una descripción de acceso fácil y público» de sus parámetros principales, que, en consecuencia, también sea accesible para los consumidores y no solo para los usuarios profesionales.

Además, el requisito de información de la DPCD se aplica a los comerciantes cuando el consumidor realiza una consulta. En cambio, no se aplica a la organización predeterminada de la interfaz en línea que se muestra al consumidor y que no es el resultado de una consulta específica en esa interfaz en línea.

La Directiva (UE) 2019/2161 añadió una obligación de información similar a la DDC que solo se aplica a los mercados en línea, es decir, a los intermediarios que permiten la celebración directa de contratos de consumidores con terceros (tanto entre empresas y consumidores como entre consumidores).

El concepto de «clasificación» se define en el artículo 2, letra m), de la DPCD como «la preeminencia relativa atribuida a los productos, en su presentación, organización o comunicación por parte del comerciante, independientemente de los medios tecnológicos empleados para dicha presentación, organización o comunicación». Se aplica la misma definición en el contexto de la DDC.

El considerando 19 de la Directiva (UE) 2019/2161 explica además que resulta, «entre otros, del empleo de mecanismos de secuenciación algorítmica, calificación o valoración, énfasis visual u otras herramientas de resalte o combinaciones de las mismas».

Por lo que se refiere al contenido de la información, la plataforma debe proporcionar información «general» sobre los parámetros principales que determinan la clasificación de los productos y sobre la «importancia relativa» de dichos parámetros con respecto a otros.

Según el considerando 22 de la Directiva (UE) 2019/2161, «[p]or parámetros que determinan la clasificación se entienden los criterios generales, procesos, señales específicas incorporadas en los algoritmos u otros mecanismos de ajuste o degradación que se utilicen en la clasificación».

La información sobre la clasificación se entiende sin perjuicio de lo dispuesto en la Directiva (UE) 2016/943 del Parlamento Europeo y del Consejo [(345)](#ntr345-C_2021526ES.01000101-E0345) sobre secretos comerciales. Como se explica en la obligación paralela de transparencia de la clasificación para todas las plataformas en línea y los motores de búsqueda en línea establecida en el artículo 5 del Reglamento P2B, esto significa que la consideración de los intereses comerciales de los proveedores pertinentes nunca debe dar lugar a la negativa a revelar los parámetros principales que determinan la clasificación. Al mismo tiempo, ni la Directiva (UE) 2016/943 ni el Reglamento P2B exigen la divulgación del funcionamiento detallado de los mecanismos de clasificación de los proveedores pertinentes, incluidos sus algoritmos [(346)](#ntr346-C_2021526ES.01000101-E0346). El mismo enfoque se aplica al requisito de información en virtud de la DPCD.

La descripción de los parámetros de clasificación por defecto puede mantenerse en un nivel general y no es necesario que se presente de un modo personalizado para cada una de las consultas concretas efectuadas [(347)](#ntr347-C_2021526ES.01000101-E0347). La información deberá facilitarse de manera clara, comprensible y adecuada a los medios de comunicación a distancia. Además, se especifica que debe figurar en una sección específica de la interfaz en línea que sea accesible directa y fácilmente desde la página en la que se presenten las ofertas.

La obligación de información también se aplica cuando un comerciante permite realizar búsquedas en una interfaz en línea mediante comandos por voz (a través de «asistentes digitales»), en lugar de tecleando. También en este caso, la información debe estar disponible para su consulta en el sitio web o la aplicación del comerciante «en una sección específica de la interfaz en línea».

Las nuevas normas sobre la transparencia de la clasificación hacia los consumidores (en la DDC y la DPCD) definen la «clasificación» en términos sustancialmente similares a los del Reglamento P2B. Dicho Reglamento obliga a las plataformas a informar a los usuarios profesionales a través de la información contenida en las condiciones generales de las relaciones entre empresas de la plataforma, o a facilitar la información en la fase precontractual.

Aunque los requisitos de información respectivos son similares, sus «públicos» son diferentes. Por este motivo, las nuevas disposiciones de la DPCD (y de la DDC) solo requieren información «general» sobre los principales parámetros de clasificación y su importancia relativa. Esta diferencia con respecto al Reglamento P2B refleja las necesidades de información de los consumidores, que necesitan información concisa y fácil de comprender. Por la misma razón, las normas de la DPCD y la DDC tampoco requieren una explicación de los «motivos» de la importancia relativa de los principales parámetros de clasificación que exige el Reglamento P2B.

En términos prácticos, los proveedores de servicios de intermediación en línea podrán utilizar la información más detallada que proporcionan a sus usuarios profesionales en virtud del Reglamento P2B como base para diseñar una explicación orientada al consumidor de los parámetros de clasificación. La Comisión ha publicado directrices sobre la clasificación de la transparencia de conformidad con dicho Reglamento [(348)](#ntr348-C_2021526ES.01000101-E0348). Estas directrices abordan varias cuestiones que también son pertinentes en la aplicación de las normas de la DPCD y la DDC relativas a la transparencia de la clasificación, como el concepto de «parámetros principales», «preeminencia relativa» y «remuneración directa e indirecta».

Divulgación de publicidad y clasificación de pago

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| Punto 11 bis del anexo I  |  |  | | --- | --- | | «11 bis) | Facilitar resultados de búsquedas en respuesta a las consultas en línea efectuadas por un consumidor sin revelar claramente cualquier publicidad retribuida o pago dirigidos específicamente a que los productos obtengan una clasificación superior en los resultados de las búsquedas.» | |

El nuevo punto 11 bis se aplica a cualquier comerciante que ofrezca la posibilidad de buscar «productos» (es decir, bienes, servicios, contenidos digitales), incluidos los motores de búsqueda.

No prohíbe la inclusión de publicidad o una clasificación superior debido a los pagos recibidos de los comerciantes de que se trate, pero exige que el proveedor del servicio de búsqueda informe claramente al consumidor cuando los resultados de la búsqueda incluyan productos o sitios web o URL de comerciantes que hayan pagado para ser incluidos en los resultados de la búsqueda (publicidad) o cuando la clasificación esté influida por pagos directos o indirectos.

Por «publicidad» se entiende la inserción, en la parte superior o entre los resultados «naturales», de entradas que, de otro modo, no se habrían presentado al consumidor con arreglo a los criterios de búsqueda objetivos aplicables.

Por «clasificación superior» se entiende las situaciones en las que la posición de una o más entradas de la clasificación ha mejorado debido a los pagos directos o indirectos. El considerando 20 de la Directiva (UE) 2019/2161 ofrece ejemplos no exhaustivos de pagos indirectos a efectos de la clasificación superior:

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| — | aceptación por parte de un comerciante de obligaciones adicionales de cualquier tipo respecto del proveedor; |

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| — | comisión mayor por transacción; |

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| — | distintos sistemas de compensación que den lugar en concreto a una clasificación superior. |

Por el contrario, los pagos indirectos no incluyen los pagos por servicios generales, como comisiones de venta o suscripciones de miembros, que hacen referencia a una amplia gama de funcionalidades, siempre y cuando tales pagos no estén destinados a obtener una clasificación superior.

Los anuncios en los resultados de las búsquedas y los resultados de las búsquedas que sean objeto de pago específicamente para obtener una clasificación superior deben destacarse de forma clara y prominente como tales. La información sobre el anuncio o el pago específico para obtener una clasificación superior debe presentarse de forma directamente asociada al resultado de la búsqueda pertinente de una forma visualmente destacada, que destaque del resto de la interfaz en línea general, de manera que el consumidor no pueda evitar advertirla al ver el resultado de la búsqueda.

No obstante, cuando los pagos efectuados específicamente para lograr una clasificación superior formen parte de los parámetros de clasificación e influyan en la clasificación de todos los resultados mostrados, la información sobre dichos pagos también podrá facilitarse mediante una única declaración clara y visible en la página de resultados de las búsquedas. Dicha declaración debe ser independiente y ha de ofrecerse además de la información general sobre los parámetros de clasificación que los comerciantes deben facilitar de conformidad con el artículo 7, apartado 4 bis, de la DPCD anteriormente mencionada.

La Comisión y las autoridades nacionales de protección de los consumidores de la red CPC abordaron la divulgación de publicidad y la clasificación de pago en los resultados de las búsquedas en las acciones conjuntas relativas a las plataformas Booking.com y Expedia [(349)](#ntr349-C_2021526ES.01000101-E0349) (véase también el punto 4.3.6). Como resultado de estas acciones, dichas plataformas aceptaron mostrar en la página de resultados de las búsquedas cuándo afectan los pagos a la clasificación de los alojamientos. También añadieron un enlace para ofrecer una explicación más detallada y etiquetaron claramente dichas propiedades. Además, la indicación anterior de «patrocinado» se sustituyó por las etiquetas más elocuentes de «Anuncio», «Promocionado» o un texto equivalente similar en la lengua local, y estas indicaciones se hicieron más visibles.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un sitio web de comparación de precios ofrecía colocar en el nivel superior de una clasificación los productos de los comerciantes que pagaban una tasa adicional. Un órgano jurisdiccional nacional dictaminó que las decisiones de los consumidores sobre transacciones pueden verse influidas por una comparativa a la que pueden no atribuir ningún propósito u objetivo comercial. Sobre esta base, la práctica comercial del sitio web de comparación se consideró engañosa. El órgano jurisdiccional señaló que, al no indicar claramente que esta clasificación en el nivel superior obedecía a un pago, la herramienta comparativa podía distorsionar de manera sustancial el comportamiento económico de los consumidores [(350)](#ntr350-C_2021526ES.01000101-E0350). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un órgano jurisdiccional nacional consideró que la práctica de un importante proveedor de servicios de comparación y reserva para permitir a los hoteles manipular la clasificación pagando comisiones más elevadas era engañosa [(351)](#ntr351-C_2021526ES.01000101-E0351). | |

4.2.4.   Reseñas de los usuarios

Muchas plataformas en línea, así como los comerciantes individuales, ofrecen a los consumidores la posibilidad de informar a otros consumidores de su experiencia con diferentes productos o comerciantes. Los servicios de reseñas se suelen incluir en los mercados en línea, los motores de búsqueda, los sitios web especializados en la valoración de viajes, las herramientas comparativas y las redes sociales. Diversos estudios demuestran la importancia de las reseñas para las decisiones de compra de los consumidores. Por lo tanto, es importante que los comerciantes que dan acceso a las reseñas de los consumidores adopten medidas razonables y proporcionadas para garantizar que reflejan la experiencia de consumidores reales con el producto de que se trate. El concepto de «reseñas» debe interpretarse en sentido amplio, incluidas las prácticas relacionadas con las calificaciones.

Sin embargo, se han detectado una serie de prácticas desleales en este ámbito. Los comerciantes utilizan diferentes técnicas para aumentar el número de reseñas positivas de sus productos en las plataformas o para reducir o restar importancia al número de reseñas negativas. Para impulsar sus productos, algunos comerciantes organizan la publicación de reseñas positivas falsas mediante, por ejemplo, la participación de empresas especializadas que contratan a consumidores reales a través de redes sociales u otros medios. A continuación, estos consumidores compran los productos de los respectivos comerciantes en plataformas en línea y dejan calificaciones de cinco estrellas a cambio de beneficios específicos, o los comerciantes incentivan a los consumidores para probar sus productos a cambio de publicar sus reseñas (reseñas patrocinadas) sin desvelar el patrocinio.

Además, las reseñas incentivadas o falsas pueden influir en la clasificación del producto y, por tanto, en la visibilidad en la plataforma si los parámetros de búsqueda de esta tienen en cuenta la puntuación de las reseñas.

Tales prácticas distorsionan las opciones de los consumidores. Aunque algunas plataformas informan de la adopción de medidas para limitar las reseñas falsas, el problema parece aumentar y ha dado lugar a un aumento de las medidas de ejecución pública. El efecto de estas prácticas engañosas se ve agravado por la constante falta de oferta de reseñas normales, en particular para los nuevos productos o para los recién llegados al mercado [(352)](#ntr352-C_2021526ES.01000101-E0352).

La DPCD se aplica no solo a las prácticas comerciales de las plataformas en línea y otros comerciantes que ponen a disposición las reseñas de los consumidores o facilitan el acceso a ellas, sino también a cualquier comerciante que organice el suministro de reseñas en beneficio de otros comerciantes. Como se explica en el punto 2.3 sobre la definición de práctica comercial, las prácticas comerciales de un comerciante están sujetas a la DPCD con independencia de que dichas prácticas comerciales promocionen sus propios productos o productos suministrados por otros comerciantes.

En cambio, la DPCD no se aplica a los consumidores que facilitan información sobre su experiencia con productos o servicios, a menos que pueda considerarse que actúan «en nombre del comerciante o por cuenta de éste» (véase más adelante el punto 4.2.6 sobre la comercialización por medio de influentes).

Las prácticas engañosas en relación con las reseñas y aprobaciones de los consumidores pueden infringir el artículo 7, apartado 2, de la DPCD, que obliga a los comerciantes a dar a conocer el propósito comercial de la práctica comercial en cuestión en caso de que no resulte evidente por el contexto.

La Directiva (UE) 2019/2161 reforzó la DPCD mediante la introducción de disposiciones específicas en el ámbito de las reseñas y aprobaciones de los consumidores. En concreto, el punto 23 ter del anexo I prohíbe a los comerciantes afirmar que las reseñas de un producto son añadidas por consumidores que han utilizado o adquirido realmente el producto, sin tomar medidas razonables para comprobar que dichas reseñas pertenezcan a tales consumidores. El punto 23 quater prohíbe expresamente añadir o encargar a otra persona física o jurídica que añada reseñas de consumidores falsas con el fin de promocionar productos. También prohíbe distorsionar reseñas de consumidores con el fin de promocionar productos. Por último, los comerciantes que faciliten el acceso a las reseñas deberán informar a los consumidores sobre si garantizan que las reseñas publicadas pertenecen a consumidores, y cómo lo garantizan, de conformidad con el artículo 7, apartado 6.

La DPCD se aplica a las prácticas de las empresas en sus relaciones con los consumidores directamente relacionadas con la promoción, la venta o el suministro de un producto a los consumidores. Por lo tanto, la referencia a «productos» en estas nuevas disposiciones de la DPCD sobre las reseñas tiene por objeto subrayar que no se aplican a otros tipos de reseñas no relacionadas con la promoción, la venta o el suministro de un producto.

Por consiguiente, estas disposiciones se aplican también a las reseñas que, si bien no abordan los productos ni sus características strictu sensu, tienen como objeto principal las cualidades y el desempeño de los comerciantes al ofrecer o vender dichos productos. Cuando las reseñas sobre el desempeño de los «comerciantes» en ese marco se utilicen como herramienta para promocionar sus productos, dichas reseñas también podrían considerarse sustanciales para el consumidor a la hora de tomar la decisión sobre la transacción relativa a los productos de ese comerciante. En particular, cuando las reseñas evalúen al comerciante sobre parámetros como la calidad, la fiabilidad o la rapidez de entrega de los productos, dichas reseñas pueden tener por objeto la promoción de los productos del comerciante o estar interrelacionadas con ella. Por consiguiente, las nuevas disposiciones de la DPCD pueden aplicarse a dichas reseñas.

En cambio, las reseñas que evalúen las cualidades del comerciante fuera del contexto de las relaciones entre empresas y consumidores, como la responsabilidad social, las condiciones laborales, la fiscalidad, el liderazgo en el mercado, los aspectos éticos, etc., probablemente quedarán fuera del ámbito de aplicación de la DPCD, incluidas las nuevas disposiciones sobre las reseñas de los consumidores.

Información sobre el tratamiento de las reseñas

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| Artículo 7, apartado 6   |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 6. | Cuando un comerciante facilite el acceso a las reseñas de los consumidores sobre los productos, se considerará esencial la información acerca de si el comerciante garantiza que las reseñas publicadas pertenezcan a consumidores que hayan realmente utilizado o adquirido el producto. | |

La nueva obligación de información se aplica a todo comerciante que proporcione acceso a las reseñas de los consumidores, incluso cuando un comerciante promocione en su interfaz en línea las reseñas facilitadas por otro comerciante, como una herramienta de valoración especializada. El considerando 47 de la Directiva (UE) 2019/2161 explica el alcance del requisito de manera amplia. En concreto, la información debe referirse no solo a las medidas específicas para comprobar que las reseñas pertenecen a consumidores que realmente han utilizado o adquirido el producto, sino también al tratamiento de las reseñas de manera más general. Esto incluye información sobre si todas las reseñas se publican, cómo se obtienen, cómo se calculan las puntuaciones medias de las reseñas y si se ven influidas por reseñas patrocinadas o por relaciones contractuales con los comerciantes alojados en la plataforma.

La información de los comerciantes sobre las medidas adoptadas para garantizar que las reseñas publicadas pertenezcan a consumidores que hayan realmente utilizado o adquirido el producto también es importante porque se analizará para evaluar si el comerciante puede realmente presentar reseñas como reseñas de los consumidores, de conformidad con el nuevo punto 23 ter del anexo I.

Esta información debe ser clara, comprensible y estar disponible al facilitar «el acceso a las reseñas de los consumidores», es decir, la información debe estar disponible desde la misma interfaz en la que se publican las reseñas para su consulta, incluso a través de hipervínculos claramente identificados y expuestos de forma destacada.

Prácticas prohibidas

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| Anexo I, punto 23 ter   |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 23 ter | Afirmar que las reseñas de un producto son añadidas por consumidores que han utilizado o adquirido realmente el producto, sin tomar medidas razonables y proporcionadas para comprobar que dichas reseñas pertenezcan a tales consumidores. | |

El nuevo punto 23 ter del anexo I impide que los comerciantes induzcan a error a sus usuarios en cuanto al origen de las reseñas: no deben declarar que las reseñas que ponen a disposición pertenecen a usuarios reales, salvo que adopten medidas razonables y proporcionadas que, sin suponer una obligación general de supervisión o de realizar investigaciones (véase el artículo 15, apartado 1, de la Directiva sobre el comercio electrónico), aumenten la probabilidad de que tales reseñas reflejen la experiencia real de los usuarios.

El hecho de que la presentación de las reseñas por parte del comerciante equivalga a afirmar que «son añadidas por consumidores que han utilizado o adquirido realmente el producto» depende de cómo lo perciba el consumidor medio. Las reseñas no tienen que presentarse necesariamente en estos términos, sino que también las referencias más generales a reseñas de «consumidores» o «clientes/usuarios» pueden llevar al consumidor medio a percibirlas como reseñas de otros consumidores que han utilizado o adquirido el producto.

Las medidas necesarias «razonables y proporcionadas» deben evaluarse teniendo en cuenta, entre otras cosas, el modelo de negocio del comerciante: un mercado en línea que presenta las reseñas de sus propios clientes puede tener que aplicar medidas distintas a las de un servicio de valoración especializado que solicite las reseñas del público en general sin tener una relación contractual. También deben tenerse en cuenta la magnitud de la actividad del comerciante y el nivel de riesgo para determinar lo que es «razonable y proporcionado» para ese comerciante concreto. Por ejemplo, se espera que las grandes plataformas con un alto riesgo de actividad fraudulenta y mayores recursos desplieguen medios más significativos para combatir el fraude con las reseñas de los consumidores que los comerciantes más pequeños.

No obstante, las medidas para comprobar el origen de las reseñas deben ser proporcionadas también en el sentido de que no deben dificultar excesivamente el envío de reseñas, disuadiendo así a los consumidores que hayan adquirido o utilizado realmente el producto de presentar reseñas.

El considerando 47 de la Directiva (UE) 2019/2161 explica que las medidas razonables y proporcionadas podrían incluir solicitar «información para comprobar que el consumidor ha adquirido o utilizado realmente el producto». Esta información podría consistir, por ejemplo, en un número de reserva. Otras «medidas razonables y proporcionadas» podrían incluir:

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| — | exigir a las personas que publican las reseñas que se registren; |

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| — | utilizar medios técnicos para verificar que la persona que publica las reseña es realmente un consumidor (por ejemplo, comprobación de la dirección IP, verificación por correo electrónico); |

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| — | establecer normas claras para las personas que publican las reseñas que prohíban las reseñas patrocinadas falsas y no divulgadas; |

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| — | desplegar herramientas para detectar automáticamente las actividades fraudulentas; |

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| — | disponer de medidas y recursos adecuados para responder a las reclamaciones sobre reseñas sospechosas, incluso cuando el comerciante afectado por estas aporte pruebas de que no son presentadas por consumidores que realmente utilizaron o adquirieron el producto. |

Gracias a la información que los comerciantes publicarán de conformidad con el artículo 7, apartado 6, se espera que tanto los usuarios como las autoridades de ejecución puedan analizar y evaluar las medidas adoptadas por el comerciante, comparándolas también con las mejores prácticas del sector que puedan desarrollarse a lo largo del tiempo. Existe una norma ISO en este ámbito: «Reseñas en línea del consumidor: principios y requisitos para su recopilación, moderación y publicación» (ISO 20488:2018).

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| Anexo I, punto 23 quater   |  |  |  | | --- | --- | --- | |  | 23 quater. | Añadir o encargar a otra persona física o jurídica que añada reseñas o aprobaciones de consumidores falsas, o distorsionar reseñas de consumidores o aprobaciones sociales con el fin de promocionar productos. | |

El nuevo punto 23 quater cubre dos tipos de prácticas comerciales desleales:

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| — | El primer elemento está dirigido a los comerciantes que añadan o encarguen reseñas o aprobaciones falsas, incluidas las compras a terceros (por ejemplo, a «fábricas de “me gusta”» o personas físicas). Abarca, en particular, la práctica de implicar a consumidores reales que compran el producto y reciben una remuneración por la publicación de reseñas positivas. Esta parte del punto 23 quater se aplica tanto a los profesionales como a los consumidores que participan en estas actividades engañosas, en la medida en que se considere que actúan «en nombre del comerciante o por cuenta de éste». Sin embargo, no se aplica a los comerciantes, en particular a las plataformas en línea, que albergan y dan acceso a las reseñas de los consumidores sin participar en su presentación (publicación). |

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| — | El segundo elemento se dirige a los comerciantes, incluidas las plataformas en línea, que dan acceso a las reseñas de los consumidores o a las aprobaciones sociales y las distorsionan, por ejemplo, solicitando y facilitando únicamente reseñas positivas y consiguiendo la retirada de las reseñas negativas. |

El concepto de «aprobaciones» debe interpretarse en sentido amplio, abarcando también las prácticas relacionadas con los seguidores, las reacciones y las visualizaciones falsos.

El primer elemento tiene por objeto garantizar que las reseñas de los consumidores reflejen las opiniones, conclusiones, creencias o experiencias de consumidores reales. Por lo tanto, prohíbe la práctica de los comerciantes de presentar reseñas falsas o de implicar a otras personas, como los consumidores reales, para presentarlas.

Por lo que se refiere al segundo elemento, que prohíbe la distorsión de las reseñas de los consumidores o de las aprobaciones sociales, el considerando 49 de la Directiva (UE) 2019/2161 ofrece los siguientes ejemplos de prácticas de manipulación prohibidas:

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| — | publicar únicamente las reseñas positivas y eliminar las negativas; |

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| — | vincular las aprobaciones de los consumidores a contenidos diferentes a los previstos por estos. |

Otros ejemplos de prácticas de manipulación son situaciones en las que el comerciante:

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| — | proporciona a los consumidores plantillas de reseñas positivas precumplimentadas; |

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| — | participa con los consumidores en el proceso de moderación para alentarlos a cambiar sus reseñas o retirar las reseñas negativas; |

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| — | presenta las calificaciones de reseñas consolidadas sobre la base de criterios no divulgados u opacos. |

La prohibición de distorsión de las reseñas de los consumidores se entiende sin perjuicio de los derechos y la obligación del comerciante que las pone a disposición de suprimir las reseñas negativas falsas como parte de las medidas para garantizar que las reseñas pertenecen a consumidores que realmente adquirieron o utilizaron el producto.

Aunque las nuevas disposiciones del anexo I de la DPCD prohíben las prácticas comerciales respectivas relativas a las reseñas de los usuarios en cualquier circunstancia, cabe señalar que los comerciantes que ofrecen reseñas, pero suprimen las reseñas negativas de los consumidores sin una razón válida, también pueden provocar que los consumidores medios que leen las reseñas en línea sigan utilizando los servicios del comerciante o, en el caso de las plataformas, decidan ponerse en contacto con un comerciante, algo que no habrían hecho si hubieran sabido que se habían suprimido las reseñas negativas.

Además, los comerciantes que colaboran con los consumidores u otros comerciantes que ofrecen reseñas para evitar que se publiquen reseñas negativas sobre ellos o eliminarlas tras su publicación también pueden provocar que el consumidor medio (que todavía no ha estado en contacto con este comerciante) seleccione a este comerciante en lugar de a un competidor que no haya participado en tales prácticas comerciales desleales.

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| Por ejemplo:  Un comerciante publicó «me gusta» en sus productos dentales en su propio sitio web y declaró que se trataba de «reseñas garantizadas de clientes reales». Posteriormente, asoció los «me gusta» a un sitio web de valoración en el que las reseñas positivas de los clientes se vieron favorecidas en comparación con las neutras o negativas. Un órgano jurisdiccional nacional consideró engañoso que el comerciante declarase que eran «reseñas garantizadas de clientes reales» [(353)](#ntr353-C_2021526ES.01000101-E0353). |

4.2.5.   Medios sociales

Las plataformas de medios sociales como Facebook, Twitter, YouTube, Instagram y TikTok permiten a los usuarios elaborar perfiles y comunicarse entre sí, lo que incluye el intercambio de información y contenidos. Las plataformas de medios sociales presentan cada vez más prácticas comerciales que pueden resultar problemáticas en el marco de la DPCD y del Derecho de la UE en materia de protección de los consumidores en general, tales como:

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| — | publicidad encubierta por parte de la plataforma de medios sociales o de terceros comerciantes, incluida la comercialización engañosa por medio de influentes; |

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| — | cláusulas contractuales tipo desleales; |

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| — | servicios de medios sociales presentados a los consumidores como «gratuitos» cuando se basan en un modelo publicitario que procesa grandes cantidades de datos personales a cambio de acceso; |

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| — | prácticas algorítmicas problemáticas, como la publicidad dirigida manipuladora o las prácticas destinadas a captar la atención del consumidor para que siga utilizando el servicio (véase también el punto 4.2.7); |

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| — | prácticas desleales relacionadas con las compras en plataformas, como artículos virtuales; |

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| — | prácticas comerciales aplicadas por terceros comerciantes a través de plataformas de medios sociales, incluidas las estafa y el fraude, las reseñas o aprobaciones de usuarios falsas o engañosas, las exhortaciones directas a los niños, el correo basura y las trampas de suscripción. |

Algunas plataformas de medios sociales se han convertido en entornos para la publicidad, el emplazamiento de productos y las reseñas de los consumidores. Por tanto, pueden presentar un riesgo creciente de publicidad encubierta, dado que mezclan elementos comerciales con contenido social y cultural generado por los usuarios. Además, es posible que los consumidores no siempre sean conscientes de que los comerciantes utilizan los medios sociales para fines de comercialización.

Las plataformas de medios sociales presentan diferentes tipos de publicidad, como la publicidad nativa, que consiste en mezclar contenidos comerciales con contenidos no comerciales y a menudo se muestra con el mismo formato y en la misma posición que el contenido generado por los usuarios (por ejemplo, noticias personales de un usuario). También es más visible en entornos móviles, ya que el contenido puede ocupar todo el espacio en una pantalla más pequeña. El contenido suele ser desarrollado por anunciantes utilizando las opciones de publicación disponibles en la plataforma publicitaria. Otro tipo común de publicidad consiste en el uso de influentes, que se explica con más detalle en el punto siguiente.

Deben divulgarse claramente todas las formas de comunicación comercial en las plataformas de medios sociales. Las prohibiciones de publicidad encubierta establecidas en el artículo 7, apartado 2, y en el anexo I, punto 22, de la DPCD podrían invocarse tanto contra las plataformas de medios sociales como contra los terceros comerciantes que utilizan plataformas de medios sociales. Un requisito de divulgación similar se deriva del artículo 6, letra a), de la Directiva sobre el comercio electrónico y de los artículos 9, 10 y 28 ter de la Directiva de servicios de comunicación audiovisual. Las obligaciones de las plataformas de medios sociales pueden reforzarse aún más en relación con la publicidad en línea en la Ley de Servicios Digitales y la Ley de Mercados Digitales propuestas.

Además, muchos usuarios de los medios sociales son niños y jóvenes. Por consiguiente, el artículo 5, apartado 3, de la DPCD puede ser pertinente como base jurídica para proteger a los consumidores vulnerables, y la divulgación de comunicaciones comerciales debe ser comprensible para el público destinatario probable, teniendo en cuenta las circunstancias específicas de cada caso y el entorno de la plataforma de medios sociales específica. Además, el punto 28 del anexo I prohíbe las exhortaciones directas a los niños en las comunicaciones comerciales. Por lo tanto, las prácticas de publicidad dirigida centradas en los niños como grupo destinatario no pueden contener ninguna exhortación directa a comprar los productos anunciados en el marco de la DPCD. Además, existen normas específicas con arreglo al RGPD sobre la validez del consentimiento de los niños y el suministro de información cuando los servicios de la sociedad de la información se ofrecen directamente a los niños. La publicidad dirigida también puede estar sujeta a las normas sobre decisiones automatizadas del artículo 22 del RGPD [(354)](#ntr354-C_2021526ES.01000101-E0354).

En el período 2016-2019, la Comisión y las autoridades nacionales obtuvieron compromisos de Facebook, Twitter y Google+ para adaptar sus prácticas al Derecho de la UE en materia de protección de los consumidores. Estos abordaban prácticas como la falta de transparencia en relación con su modelo de negocio para los consumidores, y algunas de sus condiciones [(355)](#ntr355-C_2021526ES.01000101-E0355), que incluían la limitación o la exclusión total de la responsabilidad de la plataforma en relación con la prestación del servicio y la identificación de las comunicaciones comerciales, la renuncia a los derechos obligatorios de los consumidores de la UE y la privación a los consumidores de sus derechos de la UE en relación con la jurisdicción y la legislación aplicable.

4.2.6.   Comercialización por medio de influentes

La comercialización por medio de influentes implica la promoción de marcas o productos específicos a través de influentes utilizando el impacto positivo que estos pueden tener en las percepciones de los consumidores. Por lo general, un influente se describe como una persona física o una entidad virtual [(356)](#ntr356-C_2021526ES.01000101-E0356) que tiene un alcance superior a la media en una plataforma pertinente. En comparación con la mayoría de las demás formas de publicidad en línea, la comercialización por medio de influentes presenta aún menos características que permitan a los consumidores identificar el carácter comercial del contenido. Incluso si el influente utiliza cláusulas de exención de responsabilidad para destacar la presencia de comunicaciones comerciales, el consumidor medio, especialmente los niños y los jóvenes, podría suponer que el contenido se presenta, al menos en parte, como una aprobación personal y no comercial en lugar de como un anuncio directo y claramente identificable.

A efectos de la DPCD, un influente se consideraría un «comerciante» o, alternativamente, una persona que actúa «en nombre o por cuenta de este». Es probable que las personas que llevan a cabo con frecuencia actividades promocionales dirigidas a los consumidores en sus cuentas de medios sociales se consideren «comerciantes», independientemente de su número de seguidores. Véase el punto 2.2 sobre el concepto de «comerciante» para consultar ejemplos de factores que deben tenerse en cuenta en esta determinación. Las obligaciones de claridad sobre la comunicación comercial se aplican a los comerciantes con independencia de que sean o no los proveedores de los productos [(357)](#ntr357-C_2021526ES.01000101-E0357).

Al igual que ocurre con otras formas de comercialización encubierta, el hecho de no declarar claramente el elemento comercial en el contenido o la práctica de un influente podría constituir una práctica engañosa con arreglo a los artículos 6 y 7. Las aprobaciones del influente cubren diversas prácticas, como las entradas remuneradas, los contenidos de afiliación (por ejemplo, el influente comparte un código de descuento o un enlace con su público a cambio de una comisión), los retuiteos o el etiquetado de la marca o el comerciante. De conformidad con el artículo 7, apartado 2, todas las comunicaciones comerciales deben indicarse claramente como tales, a menos que ya resulten evidentes por el contexto. Por otra parte, además de la aplicación de los artículos 6 y 7 que se aplican en todos los casos de comercialización por medio de influentes, el punto 11 del anexo I prohíbe las prácticas que no aclaran que un comerciante ha pagado por la promoción de un producto en su contenido editorial. El concepto de «contenido editorial» debe interpretarse en sentido amplio, cubriendo en algunos casos también los contenidos generados por el influente o publicados por este en plataformas de medios sociales. En el asunto Peek & Cloppenburg, el Tribunal de Justicia confirmó que el punto 11 debe ser objeto de una interpretación que refleje la realidad de la práctica editorial y publicitaria [(358)](#ntr358-C_2021526ES.01000101-E0358). El asunto se refería a la interpretación del concepto de «pago», que se explica más adelante. Para garantizar la eficacia de la prohibición, el Tribunal de Justicia destacó la pertinencia de «la publicidad “encubierta” en Internet a través de la difusión de comentarios en las redes sociales, los foros o los blogs que parecen emanar de los propios consumidores, cuando se trata realmente de mensajes de carácter publicitario o comercial generados o financiados de forma directa o indirecta por operadores económicos, e insistía en el efecto perjudicial que tienen estas prácticas sobre la confianza de los consumidores […]» [(359)](#ntr359-C_2021526ES.01000101-E0359). Por último, la falta de una divulgación adecuada por parte del influente en cuestión aumenta también el riesgo de que se infrinja el punto 22 del anexo I, que prohíbe presentarse de forma fraudulenta como un consumidor.

La divulgación del elemento comercial debe ser clara y apropiada, teniendo en cuenta el medio en que tiene lugar la comercialización, incluido el contexto, el emplazamiento, el momento, la duración, el lenguaje, el público destinatario y otros aspectos. La divulgación debe destacar lo suficiente como para informar adecuadamente al consumidor medio o vulnerable que recibe el contenido. Por ejemplo, la divulgación no puede considerarse adecuada en caso de que la información relativa a la comunicación comercial no se muestre de forma destacada (por ejemplo, etiquetas al final de una larga cláusula de exención de responsabilidad; simplemente etiquetar a un comerciante) o exija al consumidor tomar medidas adicionales (por ejemplo, hacer clic en «leer más») [(360)](#ntr360-C_2021526ES.01000101-E0360).

También es necesario etiquetar individualmente cada comunicación comercial a medida que llegue a los consumidores, incluso si el influente participa en un acuerdo más amplio relativo a aprobaciones con un comerciante o marca.

Se considera que el elemento comercial está presente siempre que el influente reciba cualquier tipo de contraprestación por la aprobación, incluidos los casos de pago, descuentos, acuerdos de asociación, porcentaje de vínculos de afiliación, productos gratuitos (incluidos obsequios no solicitados), viajes o invitaciones a eventos, etc. La presencia de un contrato y de un pago monetario no es necesaria para poner en marcha la aplicación de estas normas. En el asunto Peek & Cloppenburg, el Tribunal de Justicia confirmó que un comerciante ha «pagado» por un contenido editorial también en caso de pago no monetario. El Tribunal de Justicia consideró que debía existir una «contrapartida con valor patrimonial» y un vínculo cierto entre el pago proporcionado por dicho comerciante y ese contenido. Sin embargo, la forma concreta del pago no afecta desde el punto de vista de la protección del consumidor. Por ejemplo, se consideró que existía una contraprestación en lo relativo a la concesión gratuita por el comerciante mismo de imágenes amparadas por derechos de autor, en las que son visibles los locales comerciales del comerciante y los productos comercializados por este. El Tribunal de Justicia también señaló que no se exige un importe mínimo del pago o la proporción entre dicho pago en el coste total de la campaña publicitaria en cuestión [(361)](#ntr361-C_2021526ES.01000101-E0361).

Dependiendo de las circunstancias del caso, la infracción podría atribuirse tanto al influente como al comerciante/marca que lo haya contratado y que se beneficie de la aprobación. La presencia de un control editorial por parte del comerciante no es necesaria para poner en marcha la aplicación de estas normas, pero podría ser un factor en la determinación de su responsabilidad. El comerciante/marca es responsable de las infracciones de las disposiciones mencionadas y, en particular, del requisito de ejercer la diligencia profesional con arreglo al artículo 5. En función de la evaluación de las circunstancias del caso, es improbable que tal responsabilidad esté presente en el supuesto de que un influente no tenga ninguna conexión con el comerciante/marca (es decir, cuando simule actuar en nombre del comerciante de forma engañosa). El influente sería responsable de sus propias obligaciones en virtud de la DPCD, siempre que pueda considerarse «comerciante», como se ha explicado anteriormente.

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| Por ejemplo:  Un comerciante republicó entradas en medios sociales de influentes que promocionaban sus productos a cambio de una contraprestación, pero no etiquetó adecuadamente sus entradas como comunicaciones comerciales. Un órgano jurisdiccional nacional consideró al comerciante responsable de no adoptar las medidas necesarias para garantizar el cumplimiento del Derecho en materia de protección de los consumidores, como garantizar la transparencia, educar a los influentes y disponer de mecanismos de control para poner fin a las infracciones [(362)](#ntr362-C_2021526ES.01000101-E0362). |

En caso de que el influente esté aprobando sus propios productos o empresas, se aplicarán las mismas normas. El propósito comercial de la comunicación debe declararse siempre en tales casos, en particular a la luz del punto 22 del anexo I, que prohíbe afirmar de forma fraudulenta o crear la impresión falsa de que un comerciante no actúa a los fines propios de su actividad comercial, o presentarse de forma fraudulenta como un consumidor. También es necesaria una divulgación adecuada en caso de que los influentes aprueben marcas o productos que estén relacionados visiblemente con ellos, por ejemplo, con su nombre o cara.

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| Por ejemplo:  Una influente promocionó en Instagram los productos de una empresa en la que era la consejera delegada, la accionista principal y el único miembro del consejo de administración. Se constató que las entradas de Instagram pertinentes eran engañosas, ya que el propósito comercial no era claro para el consumidor medio. En una entrada que promocionaba el aceite de pescado hizo declaraciones indirectas sobre el refuerzo de la función inmunológica y, por lo tanto, sobre la protección contra la COVID-19. A falta de pruebas de tales declaraciones, se constató que esta entrada era engañosa y agresiva [(363)](#ntr363-C_2021526ES.01000101-E0363). |

Además, dado que la relación que el influente construye con su público a menudo se basa en la confianza y en una conexión personal, su comportamiento podría, en algunos casos, constituir una práctica comercial agresiva por el uso de una influencia indebida, prohibida por los artículos 8 y 9. Esto es especialmente importante cuando el principal público destinatario de un influente incluye a consumidores vulnerables, como los niños y los jóvenes. Además, el punto 28 del anexo I prohíbe las exhortaciones directas a los niños en cualquier circunstancia.

Además de las obligaciones de los influentes y las marcas, la plataforma en línea que se utiliza para las actividades promocionales está sujeta a sus propias obligaciones en materia de diligencia profesional en virtud de la DPCD, como se ha comentado en puntos anteriores. Esto incluye la obligación de adoptar las medidas adecuadas para que los terceros comerciantes puedan cumplir sus obligaciones en virtud del Derecho de la UE, por ejemplo, proporcionar herramientas de divulgación específicas y adecuadas en la interfaz de la plataforma [(364)](#ntr364-C_2021526ES.01000101-E0364).

4.2.7.   Prácticas basadas en los datos y patrones oscuros

El entorno digital se caracteriza cada vez más por la generación, la acumulación y el control de una enorme cantidad de datos sobre los consumidores, que pueden combinarse con el uso de algoritmos e inteligencia artificial para convertirlos en información utilizable con fines comerciales. Entre otros fines, estos datos pueden ofrecer una valiosa visión de las características sociodemográficas, como la edad, el género o la situación financiera, así como de las características personales o psicológicas, como los intereses, las preferencias, el perfil psicológico y el estado de ánimo. Esto permite a los comerciantes informarse más sobre los consumidores, en particular sobre sus vulnerabilidades.

Las prácticas de personalización basadas en datos en la relación entre empresas y consumidores incluyen la personalización de la publicidad, los sistemas de recomendación, la fijación de precios, la clasificación de ofertas en los resultados de las búsquedas, etc. Las disposiciones y prohibiciones basadas en principios de la DPCD pueden utilizarse para abordar las prácticas comerciales desleales basadas en datos de las empresas en sus relaciones con los consumidores, además de otros instrumentos del marco jurídico de la UE, como la Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas, el RGPD o la legislación sectorial aplicable a las plataformas en línea. Las decisiones existentes de las autoridades de protección de datos relativas al cumplimiento o incumplimiento por parte de un comerciante de las normas de protección de datos deben tenerse en cuenta al evaluar la equidad general de la práctica en el marco de la DPCD.

La DPCD abarca las fases de publicidad, ventas y ejecución del contrato, incluido el consentimiento para el tratamiento de datos personales y el uso de datos personales para la entrega de contenidos personalizados, así como la rescisión de una relación contractual. Además, la Directiva tiene un amplio ámbito de aplicación: abarca todas las prácticas comerciales de las empresas en sus relaciones con los consumidores y no exige la existencia de una relación contractual o la compra de un producto. Por ejemplo, la Directiva también abarcaría prácticas comerciales tales como captar la atención del consumidor, lo que da lugar a decisiones sobre las transacciones, como seguir utilizando el servicio (por ejemplo, desplazarse por una noticia), ver el contenido publicitario o hacer clic en un enlace.

Persuadir a los consumidores de que se comprometan con el contenido del comerciante es una parte esencial de las prácticas comerciales y de la publicidad en particular, tanto en el mundo en línea como fuera de ella. Sin embargo, el entorno digital permite a los comerciantes utilizar sus prácticas de manera más eficaz sobre la base de los datos de los consumidores, con gran escalabilidad e incluso de forma dinámica en tiempo real. Los comerciantes pueden desarrollar prácticas de persuasión personalizadas porque se benefician de un conocimiento superior basado en datos agregados sobre el comportamiento y las preferencias de los consumidores, por ejemplo, vinculando datos procedentes de distintas fuentes. Los comerciantes también pueden hacer ajustes para mejorar la eficacia de sus prácticas, ya que prueban continuamente los efectos de sus prácticas en los consumidores y, de este modo, aprenden más sobre su comportamiento (por ejemplo, mediante pruebas A/B). Además, estas prácticas podrían utilizarse a menudo sin el pleno conocimiento del consumidor. La presencia de estos factores y su opacidad es lo que distingue, por una parte, las técnicas de publicidad o venta altamente persuasivas de, por otra parte, las prácticas comerciales que pueden resultar manipuladoras y, por tanto, desleales desde el punto de vista del Derecho en materia de protección de los consumidores. Además, pueden infringir las obligaciones de transparencia en virtud del RGPD o de la Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas.

Cualquier práctica de las empresas en sus relaciones con los consumidores que distorsione o pueda distorsionar sustancialmente el comportamiento económico de un consumidor medio o vulnerable podría infringir los requisitos de la diligencia profesional del comerciante (artículo 5) o constituir una práctica engañosa (artículos 6 y 7) o una práctica agresiva (artículos 8 y 9), dependiendo de las circunstancias específicas del caso.

A efectos de esta evaluación, el valor de referencia de un consumidor medio o vulnerable puede modularse en función del grupo destinatario y, si la práctica es muy personalizada, incluso formularse desde la perspectiva de una sola persona que haya estado sujeta a la personalización específica.

Estas prácticas también pueden tener un efecto más significativo en los consumidores vulnerables. Como se explica en el punto 2.6, las características que definen la vulnerabilidad en el artículo 5, apartado 3, son indicativas y no exhaustivas. El concepto de vulnerabilidad de la DPCD es dinámico y situacional, lo que significa, por ejemplo, que un consumidor puede ser vulnerable en una situación, pero no en otras. Por ejemplo, algunos consumidores pueden ser especialmente sensibles a prácticas de persuasión personalizadas en el entorno digital, pero menos en tiendas físicas y otros entornos fuera de línea.

Es probable que el uso de información sobre las vulnerabilidades de consumidores específicos o de un grupo de consumidores con fines comerciales influya en la decisión de los consumidores sobre una transacción. Dependiendo de las circunstancias del caso, tales prácticas podrían constituir una forma de manipulación en la que el comerciante ejerce una «influencia indebida» sobre el consumidor, lo que daría lugar a una práctica comercial agresiva prohibida por los artículos 8 y 9 de la DPCD. Al evaluar la presencia de influencia indebida, de conformidad con el artículo 9, letra c), debe tenerse en cuenta la explotación de cualquier infortunio o circunstancia específicos lo suficientemente graves como para mermar la capacidad de discernimiento del consumidor, de los que el comerciante tenga conocimiento.

Además, si la práctica se dirige a los niños, el punto 28 del anexo I es especialmente pertinente, ya que prohíbe las exhortaciones directas a los niños. Los posibles efectos adversos de dirigirse a los niños también justifican una protección específica en virtud del RGPD [(365)](#ntr365-C_2021526ES.01000101-E0365).

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante puede identificar que un adolescente se encuentra en un estado de ánimo vulnerable debido a acontecimientos de su vida personal. Esta información se utiliza posteriormente para dirigirse al adolescente con anuncios basados en emociones en un momento concreto. |  |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante conoce el historial de un consumidor con los servicios financieros y el hecho de que han sido prohibidos por una entidad de crédito debido a la incapacidad de pagar. Posteriormente, el consumidor recibe ofertas específicas de una entidad de crédito, con el fin de aprovechar su situación financiera. |  |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante conoce el historial de compras de un consumidor en relación con los juegos de azar y el contenido aleatorio de un videojuego. Posteriormente, el consumidor recibe comunicaciones comerciales personalizadas que contienen elementos similares, con el fin de aprovechar su mayor probabilidad de contratar tales productos. | |

Dentro de la categoría de prácticas de manipulación, el término «patrón oscuro» se utiliza para referirse a un tipo de estímulo malintencionado, generalmente incorporado en las interfaces digitales de diseño. Los patrones oscuros podrían basarse en datos y personalizarse, o aplicarse de forma más general, aprovechando los sesgos heurísticos y conductuales, como los efectos por defecto o los sesgos de escasez [(366)](#ntr366-C_2021526ES.01000101-E0366).

El término «patrón oscuro» no tiene una definición jurídica en la Directiva. La DPCD se aplica a cualquier «práctica comercial desleal» que cumpla los requisitos del ámbito de aplicación material de la Directiva, independientemente de su clasificación. Si se aplican patrones oscuros en el contexto de las relaciones comerciales entre empresas y consumidores, la Directiva puede utilizarse para cuestionar la equidad de tales prácticas, además de otros instrumentos del marco jurídico de la UE, como el RGPD.

Como se ha explicado anteriormente, cualquier práctica de manipulación que distorsione o pueda distorsionar sustancialmente el comportamiento económico de un consumidor medio o vulnerable podría infringir los requisitos de la diligencia profesional del comerciante (artículo 5) o constituir una práctica engañosa (artículos 6 y 7) o una práctica agresiva (artículos 8 y 9), dependiendo del patrón oscuro específico que se aplique. La DPCD no exige que exista una intención de aplicar el patrón oscuro. La norma en materia de diligencia profesional del artículo 5 de la DPCD en el ámbito del diseño de interfaces podrá incluir principios derivados de normas internacionales y códigos de conducta para el diseño ético. Como principio general en virtud de los requisitos de la diligencia profesional del artículo 5 de la DPCD, los comerciantes deben adoptar las medidas adecuadas para garantizar que el diseño de su interfaz no distorsione las decisiones sobre transacciones de los consumidores.

Las prácticas de manipulación pueden consistir en ocultar visualmente información importante o pedirla de manera que favorezca una opción específica (por ejemplo, un botón muy visible y otro oculto; una ruta muy larga y otra más corta), además de utilizar preguntas con trampa y un lenguaje ambiguo (por ejemplo, dobles negativos) para confundir al consumidor. Es probable que tales prácticas se consideren una acción u omisión engañosa con arreglo a los artículos 6 y 7 de la DPCD respectivamente, al hacer que la información sea ininteligible o ambigua. Además, utilizar las emociones para alejar a los usuarios de una determinada elección (por ejemplo, el confirmshaming, que consiste en hacer que el consumidor se sienta culpable al confirmar una elección) podría equivaler a una práctica agresiva en virtud del artículo 8 de la DPCD por utilizar una influencia indebida para perjudicar la toma de decisiones del consumidor.

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| Por ejemplo:  Durante el proceso de pedido en un mercado en línea, se pide al consumidor en varias ocasiones que elija entre «sí» y «no»: «¿Desea que se le mantenga informado sobre ofertas similares? ¿Desea suscribirse al boletín? ¿Podemos utilizar sus datos para personalizar nuestra oferta?». A mitad de la secuencia de clics, los botones «sí» y «no» se invierten intencionadamente. El consumidor ha hecho clic en «no» varias veces, pero ahora hace clic en «sí» y se suscribe accidentalmente al boletín. |

Los ajustes de la interfaz por defecto tienen un impacto significativo en las decisiones sobre transacciones de un consumidor medio. Los comerciantes no solo pueden influir en los consumidores para que tomen determinadas medidas, sino que también pueden tomar medidas específicas en su lugar, por ejemplo, utilizando casillas marcadas previamente, incluido el cobro por servicios adicionales, lo que está prohibido en virtud del artículo 22 de la DDC. Estas prácticas también pueden infringir la DPCD, así como las normas sobre protección de datos y privacidad [(367)](#ntr367-C_2021526ES.01000101-E0367).

Algunas prácticas que a menudo se etiquetan como «patrones oscuros» ya están expresamente prohibidas en cualquier circunstancia en el anexo I de la DPCD:

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| — | Las denominadas prácticas de «señuelo y cambio», que incluyen ofrecer productos a un precio determinado sin revelar la existencia de motivos razonables para no poder suministrar el producto u ofrecerlo y, a continuación, negarse a aceptar pedidos o a hacer entregas en un período de tiempo razonable, con la intención de promocionar un producto diferente (puntos 5 y 6 del anexo I). |

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| — | Crear una urgencia al afirmar falsamente que el producto solo estará disponible durante un período de tiempo muy limitado o que solo estará disponible en determinadas condiciones durante un período de tiempo muy limitado (punto 7 del anexo I). Esto incluye, por ejemplo, los temporizadores falsos y las declaraciones de existencias limitadas en sitios web. |

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| — | Facilitar información inexacta sobre las condiciones del mercado o sobre la posibilidad de encontrar el producto, con la intención de inducir al consumidor a adquirirlo en condiciones menos favorables (punto 18 del anexo I). |

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| — | Afirmar que el consumidor ha ganado un premio, sin conceder los premios descritos ni algo razonablemente equivalente (puntos 19 y 31 del anexo I) o describir falsamente un producto como «regalo» (punto 20 del anexo I). |

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| — | realizar repetidas intrusiones durante las interacciones normales para que el consumidor haga o acepte algo (es decir, la persistencia), lo que podría equivaler a una proposición no solicitada y persistente (punto 26 del anexo I) [(368)](#ntr368-C_2021526ES.01000101-E0368). |

Además, varias prácticas engañosas que infringen los artículos 6 y 7 de la DPCD también se etiquetan como «patrones oscuros», como las pruebas gratuitas engañosas y las trampas de suscripción, que se abordaron con más detalle en el punto 2.9.6. Al diseñar sus interfaces, los comerciantes deben seguir el principio de que la cancelación de la suscripción de un servicio debe ser tan fácil como la suscripción al servicio, por ejemplo, utilizando los mismos métodos usados anteriormente para suscribirse al servicio o métodos diferentes, siempre que se presenten a los consumidores elecciones claras y libres, proporcionadas y específicas a las decisiones que se les pide que tomen.

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| Por ejemplo:  Para darse de baja de un servicio digital, el consumidor se ve obligado a dar numerosos pasos no intuitivos para llegar al enlace de cancelación. Estos pasos incluyen el confirmshaming, en virtud del cual se pide al consumidor, sin una justificación razonada, que reconsidere su elección mediante mensajes emocionales en varias ocasiones («Sentimos ver que vas», «Estas son las ventajas que perderás»), así como las «interferencias visuales», como imágenes destacadas que animan al usuario a continuar con la suscripción en lugar de cancelarla [(369)](#ntr369-C_2021526ES.01000101-E0369). Tales prácticas podrían infringir el artículo 7 y el artículo 9, letra d), de la DPCD. |

4.2.8.   Prácticas de fijación de precios

Los precios por goteo cubren situaciones en las que los comerciantes añaden costes a lo largo del proceso de compra, por ejemplo, añadiendo gastos que son inevitables y deberían haberse incluido en el precio desde el principio o aumentando arbitrariamente de cualquier otro modo el precio final. Esto puede inducir a los consumidores a tomar decisiones sobre transacciones que no hubieran tomado en caso de que en la primera «invitación a comprar» se hubiera indicado el precio íntegro. Así pues, dicha práctica puede equivaler a una acción u omisión engañosa que incumpliría la DPCD.

La fijación dinámica de los precios (también llamada determinación de precios en tiempo real) consiste en cambiar el precio de un producto de una manera muy flexible y rápida en respuesta a las demandas del mercado.

En virtud de la DPCD, los comerciantes pueden fijar libremente los precios de sus productos, siempre y cuando informen adecuadamente a los consumidores acerca de los costes totales y de la forma de determinar el precio en caso de que no pueda calcularse razonablemente de antemano por la naturaleza del producto [artículo 6, apartado 1, letra d), y artículo 7, apartado 4, letra c), de la DPCD]. Sin embargo, en determinadas circunstancias, las prácticas de fijación dinámica de los precios podrían ajustarse a la definición de «desleal» en virtud de la DPCD.

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| Por ejemplo:  Una práctica de fijación dinámica de los precios en la que un comerciante sube el precio de un producto durante el proceso de reserva, en particular después de que el consumidor lo haya colocado en su carro de la compra digital o de que proceda al pago, sin darle un plazo razonable para completar la transacción, podría considerarse contraria a la diligencia profesional o una práctica agresiva con arreglo a los artículos 8 y 9 de la DPCD. |

La discriminación de precios es el hecho de que un comerciante aplique diferentes precios a distintos consumidores o grupos de consumidores por los mismos bienes o servicios. La DPCD, como tal, no prohíbe a los comerciantes discriminar los precios siempre que informen adecuadamente al consumidor sobre el precio total o sobre cómo se calcula. No obstante, la discriminación de precios puede estar prohibida por otras normas.

En particular, la Directiva de servicios [(370)](#ntr370-C_2021526ES.01000101-E0370) incluye una prohibición general de discriminación de precios basada en la nacionalidad o el lugar de residencia. El artículo 20 de dicha Directiva establece que «las condiciones generales de acceso a un servicio que el prestador ponga a disposición del público» no pueden contener «condiciones discriminatorias basadas en la nacionalidad o el lugar de residencia del destinatario». Sin embargo, según el artículo 20, esto no menoscaba «la posibilidad de establecer diferencias en las condiciones de acceso directamente justificadas por criterios objetivos».

Además, la discriminación de precios, directa o indirecta, basada en la nacionalidad del cliente final o su residencia o en el lugar de establecimiento de los transportistas o de los proveedores de billetes en la Unión está prohibida expresamente por varias normativas sectoriales de la UE. Esto se aplica al transporte aéreo [(371)](#ntr371-C_2021526ES.01000101-E0371), al transporte marítimo [(372)](#ntr372-C_2021526ES.01000101-E0372), al transporte ferroviario [(373)](#ntr373-C_2021526ES.01000101-E0373) y al transporte en autobús y autocar [(374)](#ntr374-C_2021526ES.01000101-E0374).

La discriminación de precios puede adoptar la forma de precios personalizados basados en el seguimiento y la elaboración de perfiles en línea del comportamiento del consumidor [(375)](#ntr375-C_2021526ES.01000101-E0375).

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| Por ejemplo:  Un consumidor incluido en la categoría de «gran poder adquisitivo» podría ser reconocido por la dirección IP de su ordenador u otros medios cuando acceda al sitio web del comerciante desde su ordenador doméstico. Los precios propuestos a ese consumidor pueden ser, por ejemplo, un 10 % superiores, por término medio, a los de un nuevo cliente o consumidor incluido en la categoría de «bajo poder adquisitivo». |

La DPCD no impide a los comerciantes personalizar sus precios sobre la base del seguimiento y la elaboración de perfiles en línea. El artículo 6, apartado 1, letra e bis), de la DDC, añadido por la Directiva (UE) 2019/2161, obliga a los comerciantes a informar a los consumidores de que el precio se personalizó basándose en la toma de decisiones automatizada en el caso de los contratos a distancia y los contratos celebrados fuera del establecimiento. Además, los precios y las ofertas personalizados pueden combinarse con diferentes prácticas comerciales desleales, por ejemplo, si, en el contexto de la personalización basada en datos, los comerciantes se benefician de una «influencia indebida» sobre el consumidor con arreglo a los artículos 8 y 9 de la DPCD.

Los comerciantes que personalizan los precios utilizando los datos personales de los consumidores también deben cumplir el RGPD y la Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas. Esto incluye el requisito de utilizar únicamente aparatos de llamada automática, fax o correo electrónico para la venta directa si el abonado o los usuarios han dado su consentimiento previo (artículo 13 de la Directiva sobre la privacidad y las comunicaciones electrónicas), y el requisito de que el responsable del tratamiento debe dejar de enviar mercadotecnia directa si la persona que la recibe se opone al tratamiento de sus datos personales con ese fin, tal como se establece en el artículo 21 del RGPD. Además, los artículos 12, 13 y 14 del RGPD incluyen obligaciones de información relativas al tratamiento de datos personales, incluido el derecho a una información significativa sobre la existencia de decisiones automatizadas, y el artículo 22 de dicho Reglamento reconoce el derecho del interesado a no ser objeto de una decisión basada únicamente en el tratamiento automatizado, incluida la elaboración de perfiles, que produzca efectos jurídicos en él o le afecte significativamente de modo similar.

4.2.9.   Juego

Los videojuegos, los juegos móviles y los juegos en línea presentan una variedad de prácticas comerciales que pueden plantear problemas de equidad en el marco de la DPCD, en particular para consumidores vulnerables, como niños y adolescentes, que merecen una protección especial en virtud del artículo 5, apartado 3, de dicha Directiva (véase el punto 2.6 sobre consumidores vulnerables).

Los juegos pueden incluir promociones y anuncios dentro de ellos, que aumentan el riesgo de comercialización encubierta y podrían constituir una práctica engañosa con arreglo a los artículos 6 y 7 de la DPCD, a menos que el elemento comercial quede claro y se distinga suficientemente del juego. Esto afecta tanto a las compras durante el juego como a los productos disponibles fuera de este. La divulgación debe tener en cuenta el medio en el que tiene lugar la comercialización, incluido el contexto, el emplazamiento, el momento, la duración, el lenguaje y el público destinatario.

Además, con arreglo al punto 28 del anexo I, está prohibido incluir exhortación directa a los niños para que compren productos. Ello incluye ejercer presión sobre el niño para que compre un artículo directamente o para que convenza a un adulto de que se lo compre. Diferentes estudios han mostrado que es menos probable que los niños descubran y comprendan el propósito comercial de la publicidad en los juegos, en comparación con anuncios más directos en televisión [(376)](#ntr376-C_2021526ES.01000101-E0376).

Al ofrecer compras dentro de los juegos, los comerciantes deben asegurarse de que cumplen las obligaciones de información establecidas en el artículo 7 de la DPCD y en la DDC. Las características principales del producto deben describirse claramente y los precios de los artículos virtuales deben mostrarse de manera clara y destacada (también) en una moneda real. Si el precio no puede calcularse razonablemente de antemano, el comerciante debe indicar la forma en que este se debe calcular. Los precios de los artículos virtuales deben mostrarse de manera clara y destacada en una moneda real en el momento de la transacción comercial.

Al ofrecer juegos de «acceso anticipado», es decir, juegos que aún están en fase de desarrollo, los comerciantes deben ser claros sobre lo que puede esperar el consumidor, por ejemplo, en cuanto al contenido del juego de acceso anticipado y sus perspectivas de desarrollo.

Los comerciantes deben hacer uso de los controles parentales a nivel de plataforma ofrecidos por la plataforma en la que estará disponible el juego (por ejemplo, herramientas de control parental que permitan a los padres inhabilitar el gasto).

De conformidad con el artículo 7, apartado 2 y apartado 4, letra d), de la DPCD y el artículo 6, apartado 1, letra g), de la DDC, los consumidores deben estar claramente informados de los procedimientos de pago antes de cada compra. En virtud de la DDC, cualquier compra requiere el consentimiento expreso del consumidor y el comerciante debe proporcionarle la información necesaria. Además, el artículo 64 de la Directiva (UE) 2015/2366, sobre servicios de pago, requiere el consentimiento del ordenante a que se ejecute la operación de pago y establece que, a falta de tal consentimiento, la operación de pago se considerará no autorizada. Asimismo, el establecimiento de condiciones de pago por defecto no debe permitir efectuar compras sin el consentimiento expreso del consumidor (por ejemplo, mediante una contraseña). Cuando el sistema prevea intervalos de tiempo para la validez del consentimiento (por ejemplo, un intervalo de quince minutos), el comerciante deberá solicitar el consentimiento expreso del consumidor en relación con la duración aplicable.

Determinadas prácticas comerciales en juegos, incluida la publicidad incorporada, podrían constituir una práctica agresiva con arreglo a los artículos 8 y 9 de la DPCD. Este puede ser el caso si las prácticas implican el uso de sesgos de comportamiento o elementos de manipulación relacionados con, por ejemplo, el momento en que se presentan las ofertas dentro del juego (por ejemplo, ofreciendo microtransacciones durante momentos críticos del juego), la persistencia persuasiva o el uso de efectos visuales y acústicos para ejercer una presión indebida sobre el jugador. Además, las prácticas comerciales podrían personalizarse y tener en cuenta información específica sobre las vulnerabilidades de los jugadores. La combinación de prácticas en un juego (por ejemplo, hacer que una oferta resulte atractiva para los niños u otros grupos vulnerables, el uso de microtransacciones o la publicidad incorporada y no transparente) agrava el impacto para los consumidores. Además de las preocupaciones relacionadas con los niños y los jóvenes, el aumento de la sensibilidad a las comunicaciones comerciales y a las prácticas de manipulación podría afectar también a los jugadores adultos, especialmente durante juegos largos e inmersivos.

Una preocupación relacionada se refiere al contenido de los juegos con elementos de juegos de azar, como los diseños de interfaces adictivas que incluyen máquinas tragaperras, determinadas cajas de recompensas/misterio o apuestas. Algunos Estados miembros consideran que tales elementos entran en el ámbito de aplicación de la legislación sobre juegos de azar, lo que puede implicar requisitos adicionales que vayan más allá de la DPCD [(377)](#ntr377-C_2021526ES.01000101-E0377), como las autorizaciones de licencias o la prohibición total del uso de elementos de juegos de azar en los juegos.

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| Por ejemplo:  Un juego en línea utiliza algoritmos para determinar, sobre la base de los hábitos de juego del usuario, su «puntuación de asunción de riesgos» para personalizar el momento en que se ofertan cajas de recompensas dentro del juego, las posibilidades de obtener un artículo muy valorado en una de estas cajas y la fuerza de los adversarios del juego, todo ello con el fin de mantenerlo absorto en el juego y aumentar el gasto dentro de este. Los algoritmos se utilizan para dirigirse, en particular, a los jugadores propensos a la adicción. Esto puede constituir una práctica agresiva. |

Se debe informar claramente al consumidor acerca de la presencia de contenidos aleatorios de pago (por ejemplo, cajas de recompensas, paquetes de tarjetas, ruedas de premios), incluida una explicación de las probabilidades de recibir un artículo aleatorio. Por ejemplo, las cajas de recompensas/misterio son contenidos presentes en los juegos que generalmente incluyen artículos aleatorios que tienen relevancia en el juego (por ejemplo, armas, pieles, moneda del juego, opciones para avanzar) [(378)](#ntr378-C_2021526ES.01000101-E0378). La venta de cajas de recompensas en los juegos debe cumplir las obligaciones de información en virtud de la DDC y la DPCD en relación con el precio y las principales características del producto.

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| Por ejemplo:  Una autoridad nacional recibió compromisos de un productor de juegos acerca de la información presentada sobre las compras durante el juego, incluidas las cajas de recompensas. La autoridad señaló que es necesaria la máxima claridad y transparencia para los consumidores y los padres en cuanto a la posibilidad de realizar tales compras, especialmente en relación con las cajas de recompensas, en las que el carácter aleatorio es una característica principal [(379)](#ntr379-C_2021526ES.01000101-E0379). |

En el ámbito de las aplicaciones de juego, en 2013-2014 la Comisión y las autoridades nacionales abordaron las prácticas desleales relativas a los juegos que ofrecen compras desde aplicaciones móviles y que son susceptibles de atraer a los niños o de ser jugados por ellos [(380)](#ntr380-C_2021526ES.01000101-E0380). Su posición común destacó que, con arreglo al punto 20 del anexo I y al artículo 7, apartado 4, letra c), de la DPCD, así como al artículo 6, apartado 1, letra e), de la DDC, solo los juegos en los que las compras desde aplicaciones móviles sean opcionales pueden presentarse como «regalo» sin inducir a error a los consumidores. En cambio, un juego en línea no puede comercializarse como «regalo» si el consumidor no puede jugar a él de la manera que cabe razonablemente esperar sin hacer compras desde aplicaciones móviles. Este aspecto se ha de determinar de manera individual para cada aplicación que incluya compras desde aplicaciones móviles. Se subrayó también que si se considera que un juego se ajusta a lo dispuesto en el punto 20 del anexo I en lo que se refiere al uso de la palabra «regalo», puede aún evaluarse con arreglo a otras disposiciones de la DPCD, tales como los artículos 6 a 9, con el fin de asegurarse de que otros elementos, como la manera de mostrar la información sobre los precios, no son engañosos o agresivos. Además, el punto 28 del anexo I y el artículo 5, apartado 3, de la DPCD establecen que los juegos destinados a los niños, o que los comerciantes pueden prever razonablemente que son susceptibles de atraer a los niños, no deben contener exhortaciones directas a estos para que compren artículos adicionales durante el juego.

4.2.10.   Utilización de técnicas de geolocalización

Al comprar en otro Estado miembro o a otro Estado miembro, los consumidores se enfrentan a veces a la negativa de los comerciantes a venderles o a discriminaciones de precios basadas en el lugar de residencia o en la nacionalidad del consumidor. Estas prácticas pueden tener lugar en línea o en las compras en establecimientos tradicionales. Los comerciantes pueden utilizar técnicas de geolocalización, por ejemplo, sobre la base de la dirección IP del consumidor, su dirección de residencia, el país de expedición de su tarjeta de crédito, etc., o bien denegar la venta de un producto al consumidor para redirigirlo automáticamente a una tienda virtual local o con fines de discriminación de precios.

Los comerciantes pueden tener motivos diferentes para denegar el acceso a un producto o aplicar precios diferentes basados en información geográfica, como costes de entrega más elevados u obligaciones jurídicas adicionales para ellos. Por lo que se refiere a la denegación de venta o al redireccionamiento, de conformidad con el artículo 8, apartado 3, de la DDC, los comerciantes deben informar a los consumidores sobre las restricciones de entrega, a más tardar al inicio del procedimiento de compra. Con arreglo al artículo 7, apartado 5, de la DPCD, este requisito de información se considera «sustancial». Por otra parte, si un comerciante cumple el requisito de información del artículo 8, apartado 3, DDC, la denegación de venta y el redireccionamiento no son prácticas comerciales desleales per se de conformidad con la DPCD. Sin embargo, en función de los hechos del caso concreto, tales prácticas podrían dar lugar a prácticas comerciales desleales.

Estas prácticas también pueden constituir una infracción de otros ámbitos del Derecho de la Unión. Desde el 3 de diciembre de 2018, el Reglamento sobre bloqueo geográfico [(381)](#ntr381-C_2021526ES.01000101-E0381) prohíbe a los comerciantes en línea discriminar entre clientes de la UE por razón de su nacionalidad, residencia o establecimiento. La Comisión publicó orientaciones detalladas sobre el Reglamento en su documento de preguntas y respuestas [(382)](#ntr382-C_2021526ES.01000101-E0382). En el caso de los servicios en línea relacionados con obras no audiovisuales protegidas por derechos de autor (como libros, videojuegos, música y software), la disposición de no discriminación, es decir, la obligación de permitir a los clientes extranjeros acceder a las mismas ofertas que los clientes locales y disfrutar de ellas, no se aplica en virtud del Reglamento. Sin embargo, otras normas del Reglamento sobre bloqueo geográfico, como las que prohíben el bloqueo discriminatorio del acceso a interfaces en línea y el redireccionamiento sin el consentimiento previo del cliente (artículo 3), así como la discriminación por motivos relacionados con el pago (artículo 5), sí se aplican a los servicios mencionados.

Además, el artículo 20 de la Directiva de servicios obliga a los Estados miembros a velar por que las empresas no traten de forma distinta a los consumidores en función de su lugar de residencia o de su nacionalidad, a menos que esté justificado por criterios objetivos. Ambos actos legislativos afectan a la denegación categórica de venta, incluido el redireccionamiento automático, y a la aplicación de diferentes precios en línea o fuera de ella.

El bloqueo geográfico o el filtrado también pueden infringir el Derecho de la competencia [(383)](#ntr383-C_2021526ES.01000101-E0383). Por ejemplo, el 20 de enero de 2021, la Comisión multó a cinco editores de videojuegos y a una plataforma de juegos por sus prácticas de bloqueo geográfico [(384)](#ntr384-C_2021526ES.01000101-E0384).

4.2.11.   Cautividad del consumidor

A veces, los consumidores pueden verse limitados en su elección, experimentando una pérdida de calidad de los productos que compran, sufriendo cambios desfavorables en las condiciones contractuales o pagando precios inflados debido a la cautividad provocada por un proveedor. Esto se ve favorecido por los productos o la comercialización diseñados para crear cautividad, y por mercados que carecen de competencia o transparencia. Esto es especialmente cierto en el caso de los mercados digitales con normas privadas que fomentan la falta de interoperatividad.

Por ejemplo, cuando los consumidores deciden sobre un teléfono móvil, también eligen la tienda de aplicaciones que acompaña al sistema operativo. Asimismo inician un proceso dependiente de la trayectoria subyacente que refuerza la cautividad cuando compran otros productos del internet de las cosas que solo son interoperables con su ecosistema móvil. Una vez hecha esta elección, es difícil para los consumidores desplazarse entre ecosistemas sin sufrir pérdidas económicas (aplicaciones y otros equipos del internet de las cosas), la pérdida de tiempo (restauración de información personal, ajustes, etc.) y la pérdida de datos. Otros ejemplos son los medios digitales adquiridos, que pueden resultar inaccesibles una vez finalizado el contrato con el comerciante, o las reparaciones de vehículos, que el consumidor debe ejecutar en talleres certificados por el fabricante de automóviles, ya que solo estos tienen acceso a toda la serie de datos de diagnóstico. Los consumidores también pueden verse cautivos en una versión (nacional) determinada de un ecosistema determinado, por ejemplo, a partir de los datos de localización facilitados en el registro del perfil del usuario, de modo que utilizar el mismo perfil en otra versión de la interfaz o ecosistema puede implicar la pérdida de todos los datos y contenidos adquiridos en la versión original.

Por lo general, la DPCD reduce el riesgo de cautividad de los consumidores con arreglo a su artículo 9, letra d), al impedir que los comerciantes creen obstáculos para cambiar o rescindir el contrato. Para evaluar si una práctica es agresiva, establece que deben tenerse en cuenta «cualesquiera obstáculos no contractuales onerosos o desproporcionados impuestos por el comerciante cuando un consumidor desee ejercitar derechos previstos en el contrato, incluidos el derecho de poner fin al contrato o el de cambiar de producto o de comerciante». Esta disposición tiene un ámbito de aplicación amplio que puede abarcar diversos obstáculos no contractuales.

El Tribunal de Justicia ha proporcionado más orientaciones sobre un escenario específico de cautividad. En el asunto Sony, el Tribunal de Justicia examinó la práctica de vender un ordenador con programas preinstalados (incluido el sistema operativo) [(385)](#ntr385-C_2021526ES.01000101-E0385). El Tribunal de Justicia declaró que la venta de un ordenador sin que exista la posibilidad de que el consumidor se procure el mismo modelo de ordenador pero desprovisto de los programas preinstalados no constituye en sí misma una práctica comercial desleal en el sentido del artículo 5, apartado 2, de la DPCD, a menos que existan circunstancias adicionales que hagan que la práctica sea contraria a los requisitos de la diligencia profesional y distorsionen o puedan distorsionar de manera sustancial, con respecto al producto de que se trate, el comportamiento económico del consumidor medio. A este respecto, el Tribunal de Justicia ya ha declarado que no se puede excluir que, en particular mediante una información correcta al consumidor, una oferta conjunta de bienes o servicios diferentes satisfaga los requisitos de lealtad establecidos por la Directiva 2005/29/CE [(386)](#ntr386-C_2021526ES.01000101-E0386). Además, el Tribunal de Justicia confirmó en el asunto Sony que la falta de indicación del precio de cada uno de los programas preinstalados en el ordenador no constituye una práctica comercial engañosa en el sentido del artículo 5, apartado 4, letra a), y del artículo 7 de la DPCD [(387)](#ntr387-C_2021526ES.01000101-E0387).

Además de las normas de protección de los consumidores de la UE, existen normas de competencia de la UE para evitar desequilibrios en el mercado. Los posibles riesgos de cautividad para los consumidores debido a la falta de interoperatividad de los dispositivos del internet de las cosas formaban parte de la motivación de la investigación sectorial de los bienes y servicios de consumo relacionados con el internet de las cosas, iniciada el 16 de julio de 2020 [(388)](#ntr388-C_2021526ES.01000101-E0388). Además, la propuesta de la Comisión de una Ley de Mercados Digitales tiene por objeto abordar los riesgos de cautividad de los consumidores mediante nuevas obligaciones para las plataformas de guardianes de acceso [(389)](#ntr389-C_2021526ES.01000101-E0389).

Al cambiar de proveedor, el artículo 20 del RGPD y el artículo 16, apartado 4, de la Directiva sobre contenidos digitales [(390)](#ntr390-C_2021526ES.01000101-E0390) otorgan a las personas el derecho a llevar consigo, respectivamente, sus datos personales y contenidos que no sean datos personales, que el consumidor haya facilitado o creado al utilizar los contenidos o servicios digitales suministrados por el empresario, limitando así los efectos de las prácticas de cautividad [(391)](#ntr391-C_2021526ES.01000101-E0391). Además, el artículo 5, apartado 1, letras g) y h), y el artículo 6, apartado 1, letras r) y s), de la DDC ayudan a los consumidores a identificar de antemano situaciones de cautividad al exigir al comerciante que informe al consumidor, antes de la celebración del contrato, de la funcionalidad, compatibilidad e interoperatividad de los bienes con elementos, contenidos y servicios digitales. Por último, el artículo 3 del Reglamento sobre bloqueo geográfico [(392)](#ntr392-C_2021526ES.01000101-E0392) garantiza el acceso a la interfaz en línea (incluidas las tiendas de aplicaciones), independientemente de la nacionalidad, el lugar de residencia o el lugar de establecimiento del cliente.

4.3.   Sector de los viajes y el transporte

4.3.1.   Cuestiones transversales

Pueden surgir prácticas comerciales desleales en la fase previa a la reserva, la fase de reserva y la fase posterior a la reserva de los servicios de viaje y transporte, como la publicidad engañosa y otras prácticas de manipulación, la falta de información sustancial o el suministro de información engañosa, las prácticas de precios por goteo, las cláusulas contractuales abusivas, los problemas relacionados con las cancelaciones, la asistencia insuficiente en caso de retrasos o cancelaciones, así como la ineficacia de los sistemas de tramitación de reclamaciones.

La DPCD se aplica no solo al comerciante que realmente presta el servicio de viaje y transporte, sino también a «cualquiera que actúe en nombre del comerciante o por cuenta de éste» [artículo 2, letra b)]. Las disposiciones de la DPCD, en particular los requisitos de información establecidos en los artículos 6 y 7, también se aplican no solo a las compañías aéreas, los hoteles o las empresas de alquiler de automóviles, sino también a los intermediarios (como sitios web de reserva de viajes, herramientas comparativas o metabuscadores) que operan entre aquellos y los consumidores.

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| Por ejemplo:  Tanto la compañía aérea como las agencias de viajes en línea que ofrezcan billetes de avión a los consumidores [(393)](#ntr393-C_2021526ES.01000101-E0393) en nombre de la compañía aérea o por cuenta de esta deberán informar a los consumidores de si el equipaje está incluido en el precio del vuelo o si está sujeto a una tasa adicional. Ambos deben también informar a los pasajeros de si los vuelos se pueden reprogramar o reembolsar. |

El artículo 7, apartado 4, enumera determinados elementos de información que deben considerarse sustanciales en las invitaciones a comprar, por ejemplo, en el caso de un billete de avión o de tren, de alojamiento o de un vehículo de alquiler, si la información no resulta evidente por el contexto. No facilitar esta información puede, en algunos casos, considerarse una omisión engañosa. Los tipos de información cubiertos por este punto incluyen, en particular:

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| — | las características principales del producto; |

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| — | la identidad del comerciante; |

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| — | el precio, incluidos los impuestos; |

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| — | los procedimientos de pago; |

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| — | el sistema de tratamiento de las reclamaciones. |

Las invitaciones a comprar se abordan más a fondo en el punto 2.9.5.

El artículo 7, apartado 4, letra b), establece que los comerciantes deben proporcionar su dirección geográfica y su identidad. A tenor de lo dispuesto en el artículo 7, apartado 5, en combinación con el artículo 5, apartado 1, letra c), de la Directiva sobre el comercio electrónico, la dirección de correo electrónico del comerciante también es información sustancial en virtud de la DPCD. Esta información debe ser fácil de encontrar (es decir, no debe figurar únicamente en las condiciones generales o en páginas de información o enlaces aparte) y ha de ser accesible de manera directa y permanente.

Por lo que se refiere al tratamiento de las reclamaciones, en virtud del artículo 7, apartado 4, letra d), de la DPCD, debe quedar claro para el consumidor a quién dirigirse para formular preguntas o reclamaciones. Los consumidores deben recibir instrucciones claras sobre cómo presentar una reclamación en caso de problemas, por ejemplo, a través de una dirección de correo electrónico y un número de teléfono.

Para preguntas sobre la lengua de redacción de las condiciones generales, véase el punto 2.9.3, «Redacción de determinada información en otra lengua».

Los comerciantes, incluidos los intermediarios que facilitan las operaciones entre empresas y consumidores, deben velar por que el precio de los billetes sea transparente desde el principio, ya desde la fase de publicidad, así como durante todo el proceso de reserva.

Para las preguntas sobre la discriminación en relación con los precios de los billetes, véase el punto 4.2.8 sobre prácticas de fijación de precios.

En particular, de conformidad con el artículo 6, apartado 1, letra d), y el artículo 7, apartado 4, letra c), el precio total que se ha de pagar se debe indicar en todo momento y debe incluir los impuestos y tasas aplicables que sean inevitables y previsibles en el momento de la publicación o reserva, incluidos los recargos. Por ejemplo, en el caso del transporte aéreo, tal como exige la legislación sectorial pertinente [(394)](#ntr394-C_2021526ES.01000101-E0394), se indicará en todo momento el precio final que deba pagarse, que incluirá la tarifa o flete aplicable así como todos los impuestos aplicables y los cánones, recargos y derechos que sean obligatorios y previsibles en el momento de su publicación.

Los precios de los vuelos o las habitaciones de hotel pueden cambiar con gran rapidez. Por ejemplo, cuando un consumidor busca un billete de avión en la plataforma de un agente de viajes en línea, el precio puede variar entre el momento en que el consumidor comienza la búsqueda del billete y el momento en que decide realizar la compra. Si tales cambios de precios se deben verdaderamente a la naturaleza dinámica del mercado y, por consiguiente, escapan al control de la agencia de viajes en línea, tendrán un impacto sobre las posibilidades de la agencia de viajes en línea de garantizar que el precio que se anuncia es totalmente correcto en todo momento. La obligación en materia de diligencia profesional prevista en el artículo 5, apartado 2, de la DPCD sugiere que los comerciantes conscientes de la posibilidad de cambios repentinos en los precios tengan que dejarlo claro a los consumidores cuando anuncien los precios.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante que ofrecía paquetes turísticos mencionó el precio de una póliza de seguro en el precio total de un producto. No obstante, la póliza de seguro no era obligatoria, sino facultativa. Una autoridad nacional consideró que esto inducía a error [(395)](#ntr395-C_2021526ES.01000101-E0395). |  |  |  | | --- | --- | | — | Una autoridad nacional consideró que cobrar a los turistas costes adicionales de combustible sin indicar cómo se habían calculado y sin ofrecer a los consumidores una documentación adecuada era una omisión engañosa, una acción engañosa y una práctica agresiva [(396)](#ntr396-C_2021526ES.01000101-E0396). |  |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante que ofrecía apartamentos de vacaciones no indicó en el precio costes obligatorios tales como los de limpieza, impuestos municipales y tasas por servicios adicionales de reserva. Un órgano jurisdiccional nacional consideró que esta práctica incumplía la diligencia profesional y constituía una omisión engañosa [(397)](#ntr397-C_2021526ES.01000101-E0397). | |

En caso de que un comerciante ofrezca servicios de compra adicionales (opcionales), la información sobre gastos opcionales debe ser claramente visible y distinguirse del servicio principal; los comerciantes no deben inducir a error a los consumidores en cuanto a la adquisición de servicios adicionales. Los costes opcionales podrán consistir, por ejemplo, en lo siguiente: el coste de una habitación individual, los seguros no obligatorios, la elección de asiento o la facturación del equipaje (por oposición al equipaje de mano) [(398)](#ntr398-C_2021526ES.01000101-E0398). Los consumidores deben ser informados de la existencia de gastos no obligatorios en las invitaciones a comprar y, en cualquier caso, a más tardar al inicio del proceso de reserva. También debe quedar claro que estos costes son opcionales y no se debe engañar a los consumidores en relación con su decisión de comprar servicios adicionales [(399)](#ntr399-C_2021526ES.01000101-E0399).

Estos requisitos se desprenden, en particular, del artículo 6, apartado 1, letras b) y d), y del artículo 7, apartado 4, letras a) y c), de la DPCD. Las prácticas que contravienen estos principios también se podrían considerar, en su caso, contrarias a los requisitos de la diligencia profesional (véase el artículo 5, apartado 2, de la DPCD).

Además de las normas de la DPCD, la DDC prohíbe la utilización de opciones por defecto que el consumidor deba rechazar para evitar pagos adicionales, en lugar de solicitar el consentimiento expreso del consumidor para los pagos extraordinarios, como en el caso de las casillas marcadas previamente en los sitios web. El artículo 22 de dicha Directiva dispone que «[s]i el comerciante no ha obtenido el consentimiento expreso del consumidor, pero lo ha deducido utilizando opciones por defecto que el consumidor debe rechazar para evitar el pago adicional, el consumidor tendrá derecho al reembolso de dicho pago».

Aparte de los casos de casillas marcadas previamente, puede suceder que los comerciantes que comercializan sus servicios en línea ofrezcan servicios adicionales de forma poco clara o ambigua, por ejemplo, ocultando la opción de no reservar ningún servicio adicional (véase asimismo el punto 4.2.7 sobre patrones oscuros). Estas prácticas comerciales pueden considerarse engañosas, agresivas o incompatibles con la diligencia profesional.

Dado que estas prácticas se han observado, en particular, en el sector del transporte aéreo, y teniendo en cuenta la existencia de normas adicionales en ese sector, en el punto 4.3.4 se dan algunos ejemplos.

4.3.2.   Viajes combinados

La Directiva (UE) 2015/2302 relativa a los viajes combinados y a los servicios de viaje vinculados (Directiva sobre viajes combinados) contiene disposiciones sobre la combinación de diferentes servicios de viaje, es decir, el transporte de pasajeros, el alojamiento, el alquiler de vehículos de motor [(400)](#ntr400-C_2021526ES.01000101-E0400) y otros servicios turísticos que se ofrecen a los viajeros.

La Directiva sobre viajes combinados regula, entre otras cosas, la información precontractual que los comerciantes deben dar a los viajeros, como la información específica sobre los servicios incluidos en el viaje combinado y el precio total de este con todos los impuestos incluidos y, en su caso, todas las comisiones, recargos y otros costes adicionales. En virtud de la Directiva, los comerciantes también deben informar a los viajeros de forma destacada de si los servicios ofrecidos constituyen un viaje combinado o únicamente un servicio de viaje vinculado, con un menor nivel de protección, y han de facilitar información sobre el nivel de protección aplicable al concepto correspondiente, utilizando formularios de información normalizados.

Los comerciantes también están obligados a informar a los viajeros sobre un seguro facultativo u obligatorio que cubra los gastos de terminación del contrato por el viajero o los gastos de asistencia en caso de accidente, enfermedad o fallecimiento.

La Directiva sobre viajes combinados no impide la aplicación de la DPCD a los viajes combinados y a los servicios de viaje vinculados como complemento de sus normas específicas.

4.3.3.   Contratos de aprovechamiento por turno

La Directiva 2008/122/CE del Parlamento Europeo y el Consejo [(401)](#ntr401-C_2021526ES.01000101-E0401) («Directiva sobre aprovechamiento por turno») confiere determinados derechos de protección del consumidor en relación con los contratos de aprovechamiento por turno de bienes de uso turístico, de adquisición de productos vacacionales de larga duración, de reventa y de intercambio. En particular, establece:

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| — | normas estrictas sobre las obligaciones de información precontractual y contractual de los comerciantes; |

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| — | el derecho del consumidor a desistir del contrato en el plazo de catorce días naturales; |

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| — | la prohibición de pago de anticipos durante el plazo de desistimiento; |

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| — | la prohibición de comercializar o vender como inversión estos productos. |

La DPCD proporciona protección a los consumidores de una forma complementaria a la ofrecida por la Directiva sobre aprovechamiento por turno.

La investigación realizada para apoyar el informe de la Comisión de evaluación de la Directiva sobre aprovechamiento por turno [(402)](#ntr402-C_2021526ES.01000101-E0402) señala algunos problemas recurrentes en este sector, en particular en algunos destinos populares de vacaciones de algunos Estados miembros de la UE:

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| — | Información engañosa antes de la firma del contrato, que da a los compradores la impresión errónea de que la elección de los lugares de vacaciones disponibles es prácticamente ilimitada o de que el contrato se puede vender o intercambiar fácilmente. A menudo, el consumidor no descubre hasta después de la firma del contrato que esta información es incorrecta. |

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| — | Métodos de venta agresivos consistentes en someter a los compradores potenciales a una presión considerable, por ejemplo, «encerrándolos» en una sala donde se realizan presentaciones continuas y de la que a veces no se les permite salir salvo que firmen el contrato. |

La DPCD aborda estas prácticas a través de sus disposiciones sobre acciones engañosas [en particular mediante su artículo 6, apartado 1, letra b)] y sobre prácticas comerciales agresivas (artículos 8 y 9).

Por otra parte, el informe de la Comisión relativo a la Directiva sobre aprovechamiento por turno señaló problemas recurrentes de los consumidores a la hora de rescindir contratos de aprovechamiento por turno. El informe concluye que este aspecto se puede afrontar con éxito mediante la legislación nacional y que es posible mejorar la aplicación de los instrumentos del Derecho de la UE en materia de protección de los consumidores.

4.3.4.   Cuestiones que afectan en particular al transporte aéreo

Al anunciar opciones de vuelo, los comerciantes deben garantizar que las declaraciones sobre la disponibilidad de plazas y vuelos (por ejemplo, «última plaza disponible») se faciliten de manera clara y veraz. Estas declaraciones incluyen las matizaciones pertinentes, en caso necesario (por ejemplo, «última plaza disponible en este sitio web a esta cantidad»). Cuando se anuncien precios específicos para opciones de vuelo (por ejemplo, «precios a partir de 19,99 EUR»), el precio ofrecido deberá estar disponible en cantidades razonables, teniendo en cuenta la escala de la publicidad realizada. Además, los comerciantes solo deben presentar ofertas como de duración limitada si posteriormente no estarán disponibles al mismo precio.

Además de suscitar preocupación por la diligencia profesional con arreglo al artículo 5, apartado 2, de la DPCD y las prácticas engañosas con arreglo a los artículos 6 y 7 de dicha Directiva, las prácticas mencionadas podrían estar sujetas a las prohibiciones del anexo I, puntos 5 (publicidad señuelo), 7 (declaraciones falsas o engañosas de escasez) y 18 (información inexacta sobre las condiciones de mercado o sobre la posibilidad de encontrar el producto).

Las «características principales» de un vuelo en el sentido del artículo 6, apartado 1, letra b), y del artículo 7, apartado 4, letra a), de la DPCD deben incluir la existencia de escalas y la indicación precisa del destino y del tiempo de vuelo estimado.

Esto es particularmente pertinente en el caso de las compañías aéreas que a veces organizan vuelos desde aeropuertos situados a cierta distancia de una gran ciudad, pero utilizan el nombre de esta ciudad al comercializarlos. En algunos casos, tales prácticas comerciales pueden inducir a error al consumidor en cuanto a la situación real del aeropuerto y hacer que tome decisiones sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado. De hecho, algunos consumidores pueden preferir pagar un precio superior a cambio de llegar a un aeropuerto más próximo a la ciudad de destino.

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| Por ejemplo:  Indicar como destino «Barcelona» cuando el aeropuerto está situado realmente en la ciudad de Reus, a 100 km de Barcelona, puede considerarse engañoso. |

Además de los requisitos del artículo 6, apartado 1, letra d), y del artículo 7, apartado 4, letra c), de la DPCD sobre la presentación del precio incluidos los honorarios y los impuestos previsibles e inevitables, el artículo 23, apartado 1, del Reglamento (CE) n.o 1008/2008 sobre servicios aéreos dispone que «[s]e indicará en todo momento el precio final que deba pagarse, que incluirá la tarifa o flete aplicable así como todos los impuestos aplicables y los cánones, recargos y derechos que sean obligatorios y previsibles en el momento de su publicación».

El Reglamento establece también:

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| — | la indicación de que el precio final se desglose en componentes (por ejemplo, tarifa aérea, impuestos, tasas de aeropuerto y otros cánones y recargos); |

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| — | la obligación de comunicar los suplementos opcionales de precio de una manera clara, transparente e inequívoca al comienzo del proceso de reserva; |

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| — | la obligación de que la aceptación por el pasajero de los suplementos opcionales de precio se realice sobre una base de opción de inclusión. |

El Tribunal de Justicia ha aclarado que entre los elementos de precio que son obligatorios y previsibles con arreglo al artículo 23, apartado 1, figuran los gastos de facturación de los pasajeros cuyo pago no puede evitarse porque no existe ningún modo alternativo de facturación gratuito, el IVA aplicado a las tarifas de los vuelos nacionales y los gastos de gestión por las compras realizadas mediante una tarjeta de crédito distinta de la autorizada por el transportista aéreo. En cambio, los suplementos opcionales de precio incluyen los gastos de facturación de los pasajeros cuyo pago puede evitarse recurriendo a una opción de facturación gratuita, al igual que el IVA aplicado a los suplementos facultativos relativos a los vuelos nacionales [(403)](#ntr403-C_2021526ES.01000101-E0403).

Cuando los proveedores de servicios de viaje que comercializan sus servicios en línea infringen la DDC o el Reglamento sobre servicios aéreos, los aspectos de las prácticas infractoras que no están explícitamente regulados por artículos de estos instrumentos jurídicos específicos podrían considerarse desleales en virtud de la DPCD si pueden hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado. Esto debe evaluarse caso por caso.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Un comerciante utiliza las casillas marcadas previamente u ofrece servicios adicionales de forma poco clara o ambigua al ocultar la posibilidad de no reservar ningún servicio adicional o dificultando que los consumidores no seleccionen los servicios adicionales. De este modo, el comerciante puede hacer que los consumidores acepten servicios adicionales que de otro modo no hubieran elegido. |  |  |  | | --- | --- | | — | En la mayoría de los casos, el precio de los billetes de avión no incluye el precio del seguro de viaje. La práctica consistente en que los consumidores que no deseen comprar un seguro de viaje estén obligados a hacer clic en la opción «sin seguro» al reservar un billete de avión puede entrar en el ámbito de aplicación del artículo 22 de la Directiva sobre los derechos de los consumidores y del artículo 23, apartado 1, del Reglamento sobre servicios aéreos. Incluso antes de que entrase en vigor la Directiva sobre los derechos de los consumidores, algunas autoridades nacionales habían tomado medidas contra esas prácticas en virtud de la DPCD. Del mismo modo, se había considerado desleal la práctica por la que los consumidores que deseaban comprar un billete de avión pero no un seguro de viaje estaban obligados a seleccionar la opción «sin seguro» escondida entre una lista de posibles países de residencia, porque era incompatible con la diligencia profesional (artículo 5, apartado 2, de la DPCD) o engañosa (artículos 6 o 7). | |

Los requisitos de información del Reglamento sobre servicios aéreos se consideran información sustancial con arreglo al artículo 7, apartado 5, de la DPCD. Estos requisitos se suman a los previstos en el artículo 7, apartado 4, de la DPCD en relación con la información sobre el precio total del billete de avión, incluido si los consumidores tienen que pagar una tasa de desarrollo en el aeropuerto de salida o llegada. Además, conviene recordar que, como se expone en el punto 1.2.1, cuando existan actos legislativos sectoriales o de la UE, y sus disposiciones se solapen con lo dispuesto en la DPCD, prevalecerán las disposiciones correspondientes de la lex specialis.

Al comienzo del proceso de reserva, la compañía de transportes o el agente de viajes han de consignar en un lugar destacado la información sobre las tasas obligatorias que deben abonarse tras el proceso de reserva, por ejemplo, directamente en el aeropuerto (como las tasas de desarrollo que se cobran a todos los pasajeros que parten de determinados aeropuertos de Irlanda e Inglaterra).

Si las compañías aéreas o los intermediarios que venden billetes de avión vinculan el coste de los recargos a los medios de pago utilizados, el precio inicial debe incluir el coste del principal método de pago y, como se aclara en el asunto Ryanair [(404)](#ntr404-C_2021526ES.01000101-E0404), los gastos de gestión por las compras efectuadas con una tarjeta de crédito distinta de la autorizada por el transportista aéreo. Cuando dichos recargos no pueden calcularse de antemano, los consumidores han de ser debidamente informados de la forma en que se determina el precio o del hecho de que estos «pueden existir».

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| Por ejemplo:  Si el pago realizado con la tarjeta de fidelidad de una compañía aérea supone un coste de 1,5 EUR, mientras que el pago con una tarjeta de crédito cuesta 6 EUR, el precio indicado en la invitación a comprar y al comienzo del proceso de reserva deberá incluir el precio del pago con tarjeta de crédito. Por otra parte, probablemente la mayoría de los consumidores no podrá pagar con la tarjeta de fidelidad de la compañía. |

Además, el artículo 19 de la DDC prohíbe a los comerciantes cargar a los consumidores, por el uso de determinados medios de pago, tasas que superen el coste asumido por el comerciante por el uso de tales medios. Esto se aplicará a todo tipo de tasas directamente vinculadas a un medio de pago, independientemente de cómo se presenten a los consumidores.

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| Por ejemplo:  Las tasas denominadas de administración, reserva o gestión, aplicadas habitualmente en el sector de la venta de billetes en línea, especialmente por las compañías aéreas y las empresas de transbordadores, y también en las ventas en línea de entradas para actos, deben quedar cubiertas por el artículo 19 si pueden evitarse utilizando un medio de pago determinado. |

El artículo 23, apartado 1, del Reglamento sobre servicios aéreos exige que las tarifas y los fletes aéreos ofrecidos o publicados bajo cualquier forma disponibles para el público en general incluirán las condiciones aplicables. El Tribunal de Justicia también subrayó en el asunto Air Berlin [(405)](#ntr405-C_2021526ES.01000101-E0405) que el artículo 23, apartado 1, del Reglamento sobre servicios aéreos exige que los sistemas de reserva en línea muestren a los consumidores el precio final que debe pagarse cada vez que se indiquen los precios de los servicios aéreos.

Del mismo modo, también debe figurar de forma destacada la información relativa a la política de equipajes, incluida la franquicia de equipaje de mano, el tamaño del equipaje y todas las tasas aplicables. Deberá indicarse claramente cualquier coste o tasa adicional a este respecto [(406)](#ntr406-C_2021526ES.01000101-E0406). Los cambios en las políticas de equipajes preexistentes deben comunicarse cuidadosamente a los consumidores a fin de evitar que se les induzca a error en virtud, en particular, del artículo 7, apartados 1, 4 y 5, de la DPCD. Un consumidor medio puede tener expectativas razonables sobre lo que implica la política de equipajes, como la inclusión de un equipaje de mano estándar que responda a las exigencias razonables relativas a su peso y dimensiones en el precio del billete [(407)](#ntr407-C_2021526ES.01000101-E0407).

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| Por ejemplo:  Un órgano jurisdiccional nacional ordenó a una compañía aérea que reembolsara a un cliente el importe que se le cobró por un equipaje de mano sin un billete especial, e instó a la compañía aérea a suprimir la cláusula de sus condiciones generales. La compañía aérea solo permitía bolsas pequeñas en la cabina si podían guardarse bajo el asiento delantero, pero las bolsas más grandes de hasta 10 kilos requerían una tasa de equipaje o una tarjeta de embarque prioritario de pago. El órgano jurisdiccional dictaminó que la política de equipajes de mano genera un grave desequilibrio en la relación contractual entre las partes en detrimento del consumidor [(408)](#ntr408-C_2021526ES.01000101-E0408). |

De conformidad con el artículo 23, apartado 1, del Reglamento sobre servicios aéreos, las tasas opcionales por la selección de asientos (la alternativa es la asignación aleatoria de los asientos en diferentes partes de la aeronave) deben comunicarse de una manera clara, transparente y sin ambigüedades al comienzo del proceso de reserva.

En virtud de la DPCD, cuando los comerciantes anuncian un billete de avión determinado, también deben indicar la política de cancelaciones que se aplica a ese billete (por ejemplo, si no hay posibilidad de reembolso o de cambiar el billete). Este aspecto es especialmente importante cuando las tasas administrativas impuestas al consumidor por la compañía aérea o agencia de viajes por cancelar el billete equivalen al coste real del billete propiamente dicho. Cuando los gastos de cancelación cobrados por las compañías aéreas sean incluso más elevados que el precio pagado por el billete, la afirmación por el comerciante de que dicha cancelación es posible probablemente sea engañosa.

Por otra parte, los procedimientos establecidos no deben dificultar la reclamación de los impuestos y cánones que ya no se deban. En caso contrario, esto podría suponer una falta de diligencia profesional en el sentido del artículo 5, apartado 2, de la DPCD y una práctica agresiva en el sentido de los artículos 8 y 9 y, en particular, del artículo 9, letra d), de dicha Directiva.

En caso de cancelaciones de vuelos por parte de la compañía aérea, esta deberá facilitar a los pasajeros información clara sobre los derechos aplicables a los pasajeros en virtud del Reglamento (CE) n.o 261/2004 sobre los derechos de los pasajeros aéreos, así como sobre los procedimientos pertinentes que debe seguir el consumidor. El hecho de no facilitar esta información de manera oportuna y precisa podría equivaler a una falta de diligencia profesional con arreglo al artículo 5, apartado 2, de la DPCD y, por tanto, puede considerarse engañosa en el marco de dicha Directiva. Por ejemplo, la información sobre los derechos y procedimientos aplicables debe presentarse de manera clara, dando la misma importancia a las diferentes opciones legales de que dispone el pasajero en caso de retraso o cancelación de un vuelo. Debe comunicarse al pasajero de forma oportuna y sencilla, por ejemplo, en forma de hipervínculo en la comunicación por correo electrónico o SMS.

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | En 2017, varias autoridades de ejecución adoptaron medidas en respuesta a cancelaciones masivas de vuelos por parte de una compañía aérea como consecuencia de huelgas de tripulación y tráfico aéreo. Se constató que la compañía aérea actuaba de manera engañosa al informar a los pasajeros de las cancelaciones al no facilitar información completa y adecuada sobre los derechos de los consumidores a una compensación con arreglo al Reglamento (CE) n.o 261/2004. Varias autoridades pidieron a la compañía aérea que informara a los consumidores de los derechos pertinentes derivados de la cancelación y de los procedimientos que debían seguirse [(409)](#ntr409-C_2021526ES.01000101-E0409). |  |  |  | | --- | --- | | — | En 2020, la Comisión presentó directrices adicionales sobre los derechos de los pasajeros de la UE, así como una recomendación sobre los bonos en respuesta a cancelaciones masivas debidas a la pandemia de COVID-19  [(410)](#ntr410-C_2021526ES.01000101-E0410). En caso de cancelaciones por parte de la compañía aérea, el transportista debe ofrecer a los pasajeros el reembolso o un transporte alternativo. El reembolso en forma de bono estará supeditado al acuerdo del viajero. Si los propios pasajeros deciden cancelar sus viajes, el reembolso del billete (en efectivo o en forma de bono) no está regulado por el Reglamento (CE) n.o 261/2004 y, por tanto, depende de las condiciones generales de la compañía aérea [(411)](#ntr411-C_2021526ES.01000101-E0411). |  |  |  | | --- | --- | | — | En 2021, una autoridad de protección de los consumidores multó a tres compañías aéreas por un total de 8,4 millones EUR por infracciones de la DPCD en el contexto de la pandemia de COVID-19. Se constató que las compañías aéreas incumplían las normas en materia de diligencia profesional al seguir cancelando vuelos por razones de emergencia sanitaria en los períodos en que se levantaron las restricciones de viaje, procediendo a expedir bonos en lugar de ofrecer a los pasajeros el reembolso de sus billetes. La autoridad también constató que las compañías aéreas proporcionaban información y omisiones engañosas, en particular mediante el uso de procedimientos que animaban u obligaban a los consumidores a elegir los bonos frente al reembolso en efectivo. Se constató que algunas de las compañías aéreas sancionadas también imponían obstáculos adicionales a los titulares de bonos, como la obligación de llamar a un número de teléfono para canjear sus bonos [(412)](#ntr412-C_2021526ES.01000101-E0412). |  |  |  | | --- | --- | | — | La red CPC de autoridades de protección de los consumidores puso en marcha en 2021 una encuesta coordinada de varias compañías aéreas en relación con sus prácticas de cancelación y reembolso de vuelos durante la pandemia de COVID-19, identificando prácticas problemáticas en todo el sector. En particular, la red CPC constató que, a menudo, el reembolso se presentaba a los consumidores de forma menos prominente que los bonos y que las compañías aéreas no estaban informando proactivamente a los consumidores afectados sobre sus derechos, incluida la información requerida en virtud del Reglamento (CE) n.o 261/2004 [(413)](#ntr413-C_2021526ES.01000101-E0413). | |

Las prácticas relacionadas con las correcciones de nombres en los billetes deben ser transparentes y proporcionadas, teniendo en cuenta las circunstancias del caso. Además de la preocupación por el carácter engañoso de las prácticas, la imposición de tasas adicionales puede, en algunos casos, equivaler a una práctica agresiva con arreglo a los artículos 8 y 9, en particular, por ejemplo, si el consumidor solo es informado de dichas tasas en el aeropuerto, con la salida inminente del vuelo. Si la práctica se deriva de cláusulas contractuales, puede ser aplicable la Directiva sobre cláusulas contractuales abusivas (véase el punto 1.2.4).

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| Por ejemplo:  Una autoridad de protección de los consumidores multó a una compañía aérea por la aplicación de una sanción a los consumidores, consistente inicialmente en el pago de un nuevo billete para poder utilizar el servicio ya adquirido y, posteriormente, una tasa de 50 EUR por ruta, en caso de registro incorrecto del nombre del pasajero en el momento de la reserva, en particular en caso de omisión de un segundo nombre o apellido o en caso de modificación o ausencia de algunas letras. La compañía aérea no facilitó información previa sobre las consecuencias del registro incompleto y algunas de las discrepancias se debieron al propio sistema de la compañía aérea, por ejemplo, la limitación de espacio disponible para introducir todos los nombres/apellidos de los pasajeros o el desajuste entre las interfaces operativas y los sitios web de intermediarios [(414)](#ntr414-C_2021526ES.01000101-E0414). |

4.3.5.   Cuestiones que afectan en particular al alquiler de automóviles

Las disposiciones de la DPCD se aplican tanto a los comerciantes que ofrecen el servicio de alquiler de automóviles como a los intermediarios, por ejemplo, sitios web de reserva o de comparación. En 2017, la Comisión y las autoridades nacionales obtuvieron compromisos de cinco empresas de alquiler de automóviles, de conformidad con el Derecho de la UE en materia de protección de los consumidores, en relación con las siguientes prácticas [(415)](#ntr415-C_2021526ES.01000101-E0415):

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| — | incluir todos los gastos en el precio total de la reserva: el precio general del sitio web debe coincidir con el precio final que deben pagar los consumidores, incluidos todos los costes adicionales, tales como tasas específicas por servicio de combustible, tasas de aeropuerto, «recargos por conductor joven» o la «tasa por devolución en una oficina diferente» si el lugar de retorno difiere del lugar de recogida; |

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| — | descripción clara de los principales servicios del alquiler en las condiciones generales en todas las lenguas nacionales, en particular sobre las principales características del alquiler, como el kilometraje incluido, la política de combustible, la política de cancelaciones y los requisitos de depósito, etc.; |

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| — | información clara en la oferta de precio sobre el precio y los detalles de las opciones extra, en particular, para las exenciones del seguro que reducen el importe adeudado en caso de daños y acerca de lo que el conductor puede tener que pagar aún. |

Tradicionalmente, las empresas de alquiler de automóviles proporcionan los vehículos con el depósito lleno y exigen al consumidor que después del alquiler también devuelvan el vehículo con el depósito lleno. Sin embargo, los consumidores se quejaron de que algunos comerciantes hacen pagar un coste adicional por el depósito lleno al tomar posesión del vehículo y luego esperan que los consumidores lo devuelvan con el depósito vacío, pero no reembolsan nada si sigue habiendo combustible en el depósito cuando devuelven el vehículo.

En el marco de la DPCD, previa evaluación caso por caso, dicha práctica comercial podría considerarse desleal si los comerciantes no cumplieron los requisitos de información de los artículos 6 y 7 de la Directiva. Cuando las empresas de alquiler de automóviles alquilan un vehículo con el depósito lleno, la información de que el consumidor tendrá que pagar por el combustible más adelante puede considerarse en algunos casos información sustancial sobre la base del artículo 6, apartado 1, letras b) y d), y del artículo 7, apartado 1 y apartado 4, letras a) y c). Probablemente, el coste se considerará obligatorio y, por tanto, formará parte del precio total del producto con arreglo al artículo 6, apartado 1, letra d), y al artículo 7, apartado 4, letra c), de la Directiva, información que deberá proporcionarse al principio del proceso de reserva.

Una práctica comercial por la que los consumidores tienen que pagar mucho más combustible del que realmente consumen también podría ser, en determinadas circunstancias, contraria a los requisitos de la diligencia profesional contemplados en el artículo 5, apartado 2, de la DPCD.

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| Por ejemplo:  A la hora de evaluar si la práctica de cobrar a los consumidores todo el depósito de combustible es desleal, podrían tenerse en cuenta la duración del alquiler y la situación local. Por ejemplo, si un vehículo se alquila durante un período breve (dos o tres días), o dependiendo de la ubicación geográfica (un coche alquilado en una isla pequeña), será improbable que el consumidor tenga la posibilidad de vaciar el depósito. |

En virtud del artículo 6, apartado 1, letras b) y d), y del artículo 7, apartado 4, letras a) y c), debe informarse claramente a los consumidores de las características principales y del precio del servicio de alquiler. Las características principales y el precio del contrato de alquiler de un automóvil podrían, por ejemplo, incluir información sobre el tipo de vehículo, los costes, el alcance de las exenciones y franquicias y las posibles opciones (como neumáticos de invierno y sillas infantiles).

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Podría inducir a error que un comerciante exigiera «responsabilidad 0» si, de hecho, siempre se aplica una franquicia al consumidor en caso de daños, incluso con un coste reducido. |  |  |  | | --- | --- | | — | Podría inducir a error afirmar «seguro completo incluido» cuando, por ejemplo, el seguro no cubra los daños causados al techo y el parabrisas. | |

Las empresas de alquiler de automóviles también deben tener en cuenta los requisitos locales o nacionales específicos.

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| Por ejemplo:  El Derecho nacional puede obligar a equipar todos los vehículos con neumáticos de nieve en invierno. Por lo tanto, en ese Estado miembro, durante el período invernal, las empresas de alquiler de automóviles deberían proporcionar los automóviles con neumáticos de nieve. Si los neumáticos de nieve representan un coste adicional, debe informarse a los consumidores de ese coste de carácter obligatorio al comienzo del proceso de reserva. |

4.3.6.   Cuestiones que afectan en particular a los sitios web de reserva de viajes

La DPCD es aplicable no solo a los comerciantes que ofrecen el servicio de viaje, sino también a intermediarios como los sitios web de reserva de viajes [(416)](#ntr416-C_2021526ES.01000101-E0416), que deben cumplir las disposiciones clave abordadas en los puntos anteriores. Los consumidores necesitan recibir información sustancial sobre la identidad de los comerciantes, los datos de contacto, las políticas de cancelación aplicables y los principales aspectos de la seguridad de los viajes, por ejemplo, si los alojamientos turísticos están equipados con detectores de humo y monóxido de carbono o si se ofrecen servicios de transporte de pasajeros con vehículos adecuadamente inspeccionados y asegurados.

En 2019, la Comisión y las autoridades nacionales recibieron compromisos de Airbnb, de conformidad con el Derecho de la UE en materia de protección de los consumidores, en relación con las siguientes prácticas [(417)](#ntr417-C_2021526ES.01000101-E0417):

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| — | los consumidores deben ver el precio total en la página de resultados de la búsqueda, incluidos todos los gastos y tasas obligatorios aplicables (por ejemplo, gastos de servicios, limpieza e impuestos locales); |

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| — | distinguir claramente si el que ofrece el alojamiento es un anfitrión particular o profesional; |

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| — | proporcionar un enlace de fácil acceso a la plataforma de resolución de litigios en línea [(418)](#ntr418-C_2021526ES.01000101-E0418) en su sitio web y toda la información necesaria relacionada con la resolución de litigios; |

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| — | dejar claro que los consumidores pueden acudir a los órganos jurisdiccionales de su país de residencia y respetar el derecho a demandar a un anfitrión en caso de daños personales o de otro tipo; |

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| — | no modificar unilateralmente las condiciones generales sin informar claramente a los usuarios con antelación y sin darles la posibilidad de rescindir el contrato. |

En 2020, la Comisión y las autoridades nacionales recibieron compromisos de Booking y Expedia, de conformidad con el Derecho de la UE en materia de protección de los consumidores, también en relación con las siguientes prácticas [(419)](#ntr419-C_2021526ES.01000101-E0419):

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| — | garantizar la presentación clara de las reducciones y los descuentos de precios, lo que incluye no presentar como descuento los precios calculados en función de diferentes fechas de estancia (por ejemplo, utilizando una tachadura o términos como «% de descuento») y dejar claro si los precios más bajos solo están a disposición de los miembros de programas de recompensas; |

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| — | aclarar cuándo los pagos recibidos por los proveedores de alojamiento han influido en su clasificación en los resultados de las búsquedas e incluir información en dichos resultados si esta se corresponde con los criterios de búsqueda (por ejemplo, en caso de que los resultados muestren hoteles que no estén disponibles en las fechas especificadas, solo deben presentarse de manera adecuada); |

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| — | mostrar declaraciones sobre el número de visitantes y la disponibilidad de manera clara e incluir las matizaciones pertinentes, como «habitaciones limitadas en este sitio web» o «para las mismas fechas de estancia»; |

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| — | no presentar falsamente una oferta como de duración limitada si posteriormente va a seguir estando disponible al mismo precio; |

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| — | no limitar o excluir totalmente la responsabilidad en relación con el cumplimiento de obligaciones contractuales y no imponer al consumidor una obligación general y absoluta de asumir todos los riesgos posibles. |

4.4.   Servicios financieros y bienes inmuebles

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| Artículo 3, punto 9  Por lo que respecta a los servicios financieros definidos en la Directiva 2002/65/CE y a los bienes inmuebles, los Estados miembros podrán imponer requisitos más exigentes o más restrictivos que los previstos en la presente Directiva en el ámbito objeto de la aproximación que esta realiza. |

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| Considerando 9  Los servicios financieros y los bienes inmuebles, por su complejidad y por la importancia de los riesgos que conllevan, exigen unos requisitos detallados que incluyen obligaciones positivas para los comerciantes. Por tal motivo, en el ámbito de los servicios financieros y de los bienes inmuebles, la presente Directiva se entiende sin perjuicio del derecho de los Estados miembros de ir más allá de las disposiciones que en ella se incluyen con objeto de proteger los intereses económicos de los consumidores. |

4.4.1.   Cuestiones transversales

En explicación de la lógica que subyace al artículo 3, apartado 9, de la Directiva, el informe de la Comisión de 2013 sobre la aplicación de la DPCD [(420)](#ntr420-C_2021526ES.01000101-E0420) señalaba que:

«Las principales razones son: el riesgo financiero más elevado de los servicios financieros y los bienes inmuebles (en comparación con otros bienes y servicios); la particular inexperiencia de los consumidores en estos ámbitos (junto con la falta de transparencia, en particular de las operaciones financieras); las particulares vulnerabilidades presentes en ambos sectores que hacen que los consumidores sean sensibles a las prácticas de promoción y a las presiones; la experiencia de los organismos de control financiero competentes con un sistema nacional; y, por último, el funcionamiento y la estabilidad de los mercados financieros como tales».

Del artículo 3, apartado 9, de la DPCD se desprende que sus normas prevén la armonización mínima únicamente para los servicios financieros y los bienes inmuebles. Por tanto, los Estados miembros pueden adoptar normas nacionales más restrictivas o rigurosas conformes al Derecho de la Unión.

En el asunto Citroën Belux, el Tribunal de Justicia dictaminó que los Estados miembros pueden establecer una prohibición general de ofertas conjuntas dirigidas a los consumidores cuando al menos uno de sus componentes sea un servicio financiero [(421)](#ntr421-C_2021526ES.01000101-E0421). En dicho asunto, la oferta conjunta presentada por Citroën fue la inclusión de seis meses gratuitos de seguro completo en la compra de un automóvil Citroën nuevo. Por otra parte, el Tribunal de Justicia aclaró que el artículo 3, apartado 9:

«[…] no impone ningún límite en cuanto al grado de restricción de las normas nacionales a este respecto, y no establece criterios relativos al grado de complejidad o de riesgo que deben implicar los referidos servicios para ser objeto de normas más estrictas» [(422)](#ntr422-C_2021526ES.01000101-E0422).

El estudio de la Comisión sobre la manera en que se aplica la DPCD a los servicios financieros y los bienes inmuebles [(423)](#ntr423-C_2021526ES.01000101-E0423) puso de manifiesto que los Estados miembros han utilizado ampliamente la exención. El estudio revela que la mayoría de estas normas adicionales consisten en obligaciones de información precontractual y contractual de carácter sectorial [(424)](#ntr424-C_2021526ES.01000101-E0424). También explicó que un número significativo de prohibiciones afecta principalmente a las prácticas de venta directa y promoción [(425)](#ntr425-C_2021526ES.01000101-E0425), las prácticas que aprovechan determinadas vulnerabilidades [(426)](#ntr426-C_2021526ES.01000101-E0426) y la prevención de conflictos de intereses [(427)](#ntr427-C_2021526ES.01000101-E0427).

El informe de la Comisión sobre la aplicación de la DPCD señaló que, a pesar de la gran cantidad de normas nacionales existentes, la DPCD ha sido citada como base jurídica en al menos la mitad de los asuntos relativos a las prácticas desleales en los ámbitos de los servicios financieros y los bienes inmuebles [(428)](#ntr428-C_2021526ES.01000101-E0428).

El artículo 5, apartado 2, letra a), de la DPCD, sobre los requisitos de la diligencia profesional, parece especialmente pertinente cuando los comerciantes actúan frente a los consumidores en los ámbitos de los bienes inmuebles y los servicios financieros [(429)](#ntr429-C_2021526ES.01000101-E0429). Si el comerciante no actúa con el nivel de competencia y cuidado que cabe esperar razonablemente de un profesional en estos ámbitos de actividad comercial, el consumidor podría sufrir consecuencias económicas significativas.

Las prácticas desleales que se comunican con más frecuencia (en el sentido de la DPCD) en relación tanto con los servicios financieros [(430)](#ntr430-C_2021526ES.01000101-E0430) como con los bienes inmuebles se refieren a la falta de información esencial en la fase de publicidad y las descripciones engañosas de productos [(431)](#ntr431-C_2021526ES.01000101-E0431). Las ofertas en línea pueden carecer de información sobre las características principales del crédito al consumo, o los costes de crédito presentados inicialmente pueden no incluir todos los gastos aplicables o no presentarse de manera clara, inteligible e inequívoca, como exige el artículo 7, apartados 1, 2 y 4, de la DPCD [(432)](#ntr432-C_2021526ES.01000101-E0432). Estas prácticas también pueden implicar infracciones de otra legislación en materia de protección de los consumidores, en particular la Directiva de crédito al consumo y la Directiva sobre cláusulas contractuales abusivas.

4.4.2.   Aspectos específicos de los bienes inmuebles

Aunque tradicionalmente los bienes inmuebles se regulan a nivel nacional, desde marzo de 2016 algunos de sus aspectos importantes se regulan a nivel de la UE [(433)](#ntr433-C_2021526ES.01000101-E0433). Las normas generales de la DPCD suelen complementar la legislación sectorial de la UE, así como normas nacionales, a veces, más estrictas.

Hay algunas cuestiones específicas de la aplicación de la Directiva en este sector. De hecho, muchos consumidores invierten en bienes inmuebles como alternativa a un fondo de pensiones. Adquieren un inmueble con vistas a alquilarlo y percibir una renta en lugar de cobrar los intereses que habrían obtenido invirtiendo en un producto financiero. Ello plantea una serie de preguntas sobre cómo se aplica el concepto de «consumidor» a los compradores de bienes inmuebles.

En virtud del artículo 2, letra a), de la Directiva, cualquier persona física que «actúe con un propósito ajeno a su actividad económica, negocio, oficio o profesión» se considerará un consumidor. Por consiguiente, el hecho de que una persona física adquiera un bien inmueble con fines de inversión no debe afectar a su condición de consumidor, siempre y cuando lo haga al margen de sus actividades profesionales. Así pues, la Directiva se aplicará y protegerá, por ejemplo, a un comprador que sea inducido a error por una empresa inmobiliaria en relación con la compra.

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| Por ejemplo:  Un profesor alemán decide comprar dos pisos en un complejo turístico en España para alquilarlos a otras personas y, más adelante, jubilarse e irse a vivir a España. Al actuar al margen de sus actividades profesionales, se le debe considerar consumidor con arreglo a la Directiva en relación con sus pisos en España. |

El concepto de «comerciante» puede aplicarse a los arrendadores. En virtud del artículo 2, letra b), de la Directiva, cualquier persona física o jurídica puede considerarse un comerciante si «actúa con un propósito relacionado con su actividad económica, negocio, oficio o profesión». Por consiguiente, no se debe considerar que el mero hecho de que una persona alquile un apartamento o una casa a un tercero la convierta automáticamente en un comerciante frente a su inquilino. Sin embargo, si esa persona recibe una parte esencial de sus ingresos de alquilar apartamentos a otras personas, en determinadas circunstancias podría considerarse un comerciante con arreglo a la DPCD (véase también el punto 2.2 sobre el concepto de comerciante).

Por último, en vista de la importancia y la singularidad de la decisión que toman los consumidores al adquirir bienes inmuebles, los comerciantes deben prestar especial atención al cumplimiento de los requisitos de información previstos en los artículos 6 y 7 de la DPCD. En el contexto de la Directiva sobre cláusulas contractuales abusivas, el Tribunal de Justicia ha insistido en la importancia de una vivienda familiar como derecho fundamental [(434)](#ntr434-C_2021526ES.01000101-E0434).

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| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Unos consumidores que compraron viviendas en determinados proyectos de promoción inmobiliaria constataron que, una vez terminados los edificios, los apartamentos no tenían suministro de agua ni de electricidad. La información de que esto sucedería podría considerarse información sustancial en relación con las «características principales del producto» con arreglo al artículo 6, apartado 1, letra b), y al artículo 7, apartado 4, letra a), de la DPCD. El hecho de que fuera necesario un servicio adicional para conectar los apartamentos a estos servicios también se podría considerar sustancial con arreglo al artículo 6, apartado 1, letra e). |  |  |  | | --- | --- | | — | La superficie de un bien inmueble se podría considerar información sustancial de conformidad con el artículo 6, apartado 1, letras a) y b), y el artículo 7, apartado 4, letra a). |  |  |  | | --- | --- | | — | El precio del bien inmueble incluido el IVA y todos los gastos inevitables, como la comisión del agente de venta o del corredor, sería información sustancial con arreglo al artículo 7, apartado 4, letra c). | |

4.4.3.   Cuestiones específicas de los servicios financieros

Dado que en este sector existe un conjunto sólido de legislación sectorial de la UE, el carácter de «red de seguridad» de la DPCD es aquí especialmente evidente [(435)](#ntr435-C_2021526ES.01000101-E0435).

Estos servicios se definen en la Directiva 2002/65/CE del Parlamento Europeo y del Consejo [(436)](#ntr436-C_2021526ES.01000101-E0436) como «todo servicio bancario, de crédito, de seguros, de jubilación personal, de inversión o de pago» [(437)](#ntr437-C_2021526ES.01000101-E0437). Varios tipos de legislación sectorial de la UE resultan pertinentes de cara a la protección de los consumidores en relación con los servicios financieros. A título de ejemplo, cabe citar:

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| — | la Directiva 2014/65/UE, relativa a los mercados de instrumentos financieros («MiFID 2»); |

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| — | la Directiva (UE) 2015/2366 sobre servicios de pago; |

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| — | la Directiva 2008/48/CE, relativa a los contratos de crédito al consumo; |

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| — | la Directiva 2014/17/UE, sobre los contratos de crédito celebrados con los consumidores para bienes inmuebles de uso residencial; |

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| — | la Directiva 2014/92/UE sobre la comparabilidad de las comisiones conexas a las cuentas de pago, el traslado de cuentas de pago y el acceso a cuentas de pago básicas; |

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| — | la Directiva (UE) 2016/97 sobre la distribución de seguros; |

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| — | el Reglamento (UE) 2015/751 del Parlamento Europeo y del Consejo [(438)](#ntr438-C_2021526ES.01000101-E0438) sobre las tasas de intercambio aplicadas a las operaciones de pago con tarjeta; |

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| — | el Reglamento (UE) n.o 1286/2014 sobre los documentos de datos fundamentales relativos a los productos de inversión minorista vinculados y los productos de inversión basados en seguros. |

Los productos de servicios financieros son a menudo difíciles de comprender y pueden conllevar graves riesgos económicos, por lo que los comerciantes deberían prestar una atención especial para actuar con el nivel de competencia y cuidado que cabe esperar razonablemente de un profesional en este ámbito de actividad comercial [véase el artículo 5, apartado 2, letra a), de la DPCD].

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| Por ejemplo:  Con arreglo al artículo 5, apartado 6, de la Directiva de crédito al consumo, los prestamistas y, en su caso, los intermediarios de crédito deben dar al consumidor explicaciones adecuadas con el fin de que pueda evaluar si el contrato de crédito propuesto se ajusta a sus necesidades y a su situación económica, en su caso explicando la información precontractual que se ha de facilitar con arreglo al artículo 5, apartado 1, de la Directiva de crédito al consumo, las características esenciales de los productos propuestos y los efectos específicos que pueden tener en el consumidor, incluidas las consecuencias del impago por parte del consumidor. |

Los comerciantes tampoco deben llevar a cabo prácticas engañosas, como se establece en los artículos 6 y 7 de la DPCD, tales como:

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| — | falta de información en la publicidad sobre la tasa anual equivalente (TAE) y el coste del crédito; |

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| — | ofertas de acuerdos engañosos para los contratos de crédito con un tipo de interés bajo; |

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| --- | --- |
| — | falta de información adecuada sobre las obligaciones legales correspondientes a la firma de contratos. |

|  |  |  |  |  |  |  |
| --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- |
| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | Los comerciantes no deberían exagerar los beneficios económicos, omitir información sobre los riesgos financieros que corren los consumidores, ni confiar excesivamente en los resultados anteriores del producto financiero. |  |  |  | | --- | --- | | — | Las principales características de un producto financiero en virtud del artículo 6, apartado 1, letra b), y del artículo 7, apartado 4, letra a), podrían incluir información sobre el hecho de que un producto financiero se calculará en una moneda que diferente de la del país donde se celebre el contrato [(439)](#ntr439-C_2021526ES.01000101-E0439). |  |  |  | | --- | --- | | — | De conformidad con el artículo 6, apartado 1, letra d), y con el artículo 7, apartado 4, letra c), la presentación y el cálculo de las tasas y gastos deben incluir todos los costes afrontados por los consumidores, por ejemplo, los costes de los servicios relacionados con las comisiones de agentes o intermediarios, o en relación con los cargos por descubiertos. La presentación y el cálculo de las tasas y los gastos deben también mostrar claramente que un tipo de interés o gasto bajo específico solo es aplicable durante un tiempo limitado. | |

Los artículos 8 y 9 establecen criterios para evaluar las prácticas comerciales agresivas. El punto 27 del anexo I de la Directiva se refiere a una práctica comercial agresiva en el ámbito de los servicios financieros y, por consiguiente, debe considerarse desleal en cualquier circunstancia:

|  |
| --- |
| Punto 27 del anexo I  Exigir al consumidor que desee reclamar una indemnización al amparo de una póliza de seguro que presente documentos que no puedan razonablemente considerarse pertinentes para determinar la validez de la reclamación o dejar sistemáticamente sin responder la correspondencia al respecto, con el fin de disuadirlo de ejercer sus derechos contractuales. |

|  |  |  |  |  |
| --- | --- | --- | --- | --- |
| Por ejemplo:   |  |  | | --- | --- | | — | En algunas circunstancias, los obstáculos al cambio [(440)](#ntr440-C_2021526ES.01000101-E0440) se pueden considerar una práctica comercial agresiva y, por lo tanto, desleal sobre la base del artículo 9, letra d) [(441)](#ntr441-C_2021526ES.01000101-E0441). |  |  |  | | --- | --- | | — | En el sector de los seguros, el punto 27 del anexo I se ha aplicado a situaciones en las que los aseguradores se negaron a pagar siniestros y obligaron a los consumidores que querían solicitar una indemnización al amparo de una póliza de seguro a presentar documentos que no se podían considerar razonablemente pertinentes para determinar la validez de la solicitud. En estos casos, los comerciantes no respondieron sistemáticamente a la correspondencia, a fin de disuadir a los consumidores de ejercer sus derechos contractuales. | |

Las autoridades nacionales han aplicado ampliamente la DPCD en el ámbito de los servicios financieros.

|  |
| --- |
| Por ejemplo:  Una autoridad nacional adoptó medidas jurídicas contra algunos bancos por facilitar información engañosa sobre los riesgos inherentes a determinados productos financieros, a saber, los bonos de Lehman Brothers [(442)](#ntr442-C_2021526ES.01000101-E0442). Al determinar si esas prácticas eran engañosas, la autoridad tuvo en cuenta que los consumidores a los que se habían dirigido los bancos para venderles estos bonos eran simples titulares de cuentas corrientes que no estaban familiarizados con este tipo de productos financieros. |

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ANEXO

Lista de asuntos del Tribunal de Justicia mencionados en la presente Guía

(ordenados por año de la sentencia)

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| Número y denominación del asunto | Cuestión(es) | Punto(s) de la Guía |
| 2009 | | |
| Asuntos acumulados C-261/07 Total Belgium y C-299/07 Galatea BVBA | |  |  | | --- | --- | | — | El carácter de armonización plena de la Directiva se opone a una normativa nacional que establece una prohibición general de las ofertas conjuntas, aun cuando dicha legislación nacional ofrece un mayor nivel de protección de los consumidores. |  |  |  | | --- | --- | | — | Los Estados miembros podrán establecer una prohibición general, sin tener en cuenta las circunstancias específicas, únicamente en relación con las prácticas enumeradas en el anexo I de la Directiva. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| 2010 | | |
| C-304/08, Plus Warenhandelsgesellschaft | |  |  | | --- | --- | | — | La Directiva tiene un amplio ámbito de aplicación material, incluida la legislación nacional destinada a restringir las prácticas anticompetitivas que también afectan a los consumidores. |  |  |  | | --- | --- | | — | La Directiva se opone a una prohibición general de las prácticas comerciales en virtud de las cuales la participación de los consumidores en un concurso o una lotería está supeditada a la adquisición de bienes o a la utilización de servicios, ya que tales prácticas no están enumeradas en el anexo I de la Directiva. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| C-540/08, Mediaprint | |  |  | | --- | --- | | — | La Directiva se opone a una prohibición nacional general de las ventas con primas destinada a lograr la protección de los consumidores, así como a otras. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| C-522/08, Telekom. Polska | |  |  | | --- | --- | | — | La Directiva se opone a una normativa nacional que, con determinadas excepciones y sin tener en cuenta las circunstancias específicas, impone una prohibición general de las ofertas conjuntas hechas por un vendedor a un consumidor. |  |  |  | | --- | --- | | — | Así sucede incluso cuando dicha legislación nacional es admisible con arreglo a la Directiva marco y a la Directiva servicio universal. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| 2011 | | |
| C-122/10, Ving Sverige | |  |  | | --- | --- | | — | Para que una comunicación comercial pueda calificarse de invitación a comprar, no es necesario que incluya una oportunidad real de compra ni que aparezca cerca de tal oportunidad y al mismo tiempo. |  |  |  | | --- | --- | | — | El uso de «precios de partida» no es contrario a la DPCD, siempre que el precio final no pueda «calcularse razonablemente de antemano». |  |  |  | | --- | --- | | — | El alcance de la información relativa a las características principales de un producto que se ha de comunicar en una invitación a comprar ha de apreciarse en función del contexto de dicha invitación, de la naturaleza y las características del producto y del medio de comunicación utilizado. | | 2.9.4. Contexto fáctico y limitaciones del medio de comunicación utilizado  2.9.5. Información sustancial en las invitaciones a comprar: artículo 7, apartado 4 |
| C-288/10, Wamo | |  |  | | --- | --- | | — | Normas nacionales que prohíben las reducciones de precios durante periodos de preventa incompatibles con la Directiva en la medida en que tienen por objeto proteger los intereses económicos de los consumidores. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| C-126/11, Inno | |  |  | | --- | --- | | — | Disposición nacional no comprendida en el ámbito de aplicación de la Directiva si está destinada, como sostiene el órgano jurisdiccional remitente, a regular las relaciones entre competidores y no tiene como objetivo la protección de los consumidores. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| 2012 | | |
| C-428/11, Purely Creative | |  |  | | --- | --- | | — | El punto 31 del anexo I prohíbe toda práctica en la que, para obtener un premio, el consumidor esté obligado a efectuar un pago o incurrir en un gasto. |  |  |  | | --- | --- | | — | Tales prácticas están prohibidas incluso si el cliente dispone de múltiples formas de obtener el premio, siendo gratuitas algunas de ellas. |  |  |  | | --- | --- | | — | El coste de la solicitud del premio es irrelevante, ya que esta práctica figura en el anexo I y, por lo tanto, la intención de la Directiva es evitar evaluaciones difíciles de las circunstancias individuales de cada caso, como ocurriría si el cliente comparase el valor del premio con el coste de obtenerlo. | | 3.8. Premios: punto 31 |
| C-559/11, Pelckmans Turnhout | |  |  | | --- | --- | | — | Prohibición nacional de abrir las tiendas los siete días de la semana que solo tiene por objeto proteger los intereses de los trabajadores y empleados en el sector de la distribución y no se propone proteger a los consumidores. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| C-453/10, Pereničová y Perenič | |  |  | | --- | --- | | — | Comunicación de información errónea en los términos del contrato, «engañosa» en el sentido de la DPCD si hace o puede hacer que el consumidor medio tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado. | | 1.2.4. Interacción con la Directiva sobre cláusulas contractuales abusivas |
| 2013 | | |
| C-206/11, Köck | |  |  | | --- | --- | | — | Ley nacional que permite el anuncio de una venta de liquidación sujeta únicamente a la autorización de la autoridad administrativa competente que se considera que está dirigida a la protección de los consumidores, y no exclusivamente a la protección de los competidores y otros operadores del mercado. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| C-435/11, CHS Tour Services | |  |  | | --- | --- | | — | Cuando una práctica comercial cumple todos los criterios establecidos en el artículo 6, apartado 1, para ser considerada práctica engañosa en relación con el consumidor, no es necesario comprobar si tal práctica es también contraria a los requisitos de la diligencia profesional contemplados en el artículo 5, apartado 2, letra a). | | 2.7. Artículo 5: diligencia profesional |
| C-59/12, BKK Mobil Oil | |  |  | | --- | --- | | — | Un organismo de Derecho público que tiene encomendada una misión de interés general, como la gestión de un régimen legal de seguro de enfermedad, puede ser calificado de «comerciante». | | 2.2. Concepto de comerciante |
| C-265/12, Citroën Belux | |  |  | | --- | --- | | — | Los Estados miembros pueden establecer una prohibición general de ofertas conjuntas dirigidas a los consumidores en caso de que al menos uno de los componentes de estas ofertas sea un servicio financiero. | | 4.4. Servicios financieros y bienes inmuebles |
| C-281/12, Trento Sviluppo | |  |  | | --- | --- | | — | Confirmación de interpretación amplia: «decisión sobre una transacción» no solo incluye la decisión de adquirir o no un producto, sino también las decisiones relacionadas directamente con esta, en particular, la de entrar en la tienda. | | 2.4. Criterio de la decisión sobre una transacción |
| C-391/12, RLvS | |  |  | | --- | --- | | — | Cuando las prácticas comerciales de un operador sean llevadas a cabo por otra empresa, que actúe en nombre o por cuenta de ese operador, la DPCD podría, en determinados supuestos, ser oponible tanto a dicho operador como a la citada empresa cuando ambos respondan a la definición de «comerciante». |  |  |  | | --- | --- | | — | La DPCD, en particular el punto 11 del anexo I, no puede invocarse frente a los editores de prensa. Por lo tanto, la Directiva no se opone a la aplicación de una disposición nacional en virtud de la cual dichos editores estén obligados a identificar específicamente, en este caso mediante el uso del término «publicidad», toda publicación en sus publicaciones periódicas por las que perciban una remuneración, a menos que ya se desprenda de la disposición y del diseño de la publicación que se trata de un anuncio. | | 2.2. Concepto de comerciante  2.3. Concepto de práctica comercial |
| C-343/12, Euronics | |  |  | | --- | --- | | — | La Directiva se opone a una disposición nacional que tiene por objeto prohibir las ventas a pérdida, únicamente cuando esta disposición persigue también el objetivo de proteger a los consumidores. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| 2014 | | |
| C-421/12, Comisión Europea/Reino de Bélgica | |  |  | | --- | --- | | — | Las normas nacionales que imponen una prohibición general a prácticas no contempladas en el anexo I, sin prever un análisis individual para determinar si las prácticas son «desleales» a la luz de los criterios enunciados en los artículos 5 a 9 de dicha Directiva, no están permitidas con arreglo a su artículo 4 y son contrarias al objetivo de armonización plena que persigue dicha Directiva. |  |  |  | | --- | --- | | — | Promociones de precios y carácter de armonización plena a la luz de la Directiva sobre indicación de los precios. |  |  |  | | --- | --- | | — | La omisión por parte de un comerciante de información exigida por las disposiciones nacionales que esté permitida por las cláusulas mínimas de los instrumentos jurídicos de la UE vigentes ya no se considerará una omisión de información sustancial y, por tanto, no constituirá una omisión engañosa con arreglo a la Directiva. | | 1.2.5. Interacción con la Directiva sobre indicación de los precios |
| C-515/12, «4finance» UAB/Ministerio de Finanzas lituano | |  |  | | --- | --- | | — | Un plan de venta piramidal solo constituye una práctica comercial desleal si obliga al consumidor a pagar una contrapartida financiera, con independencia de su importe, por la oportunidad de recibir una compensación derivada fundamentalmente de la entrada de otros consumidores en el plan, y no de la venta o el consumo de productos. | | 3.2. Planes piramidales: punto 14 |
| 2015 | | |
| C-388/13, UPC | |  |  | | --- | --- | | — | En realidad, ni las definiciones dadas en el artículo 2, letras c) y d), en el artículo 3, apartado 1, y en el artículo 6, apartado 1, de la Directiva sobre las prácticas comerciales desleales ni la propia Directiva considerada en su conjunto contienen indicios que apunten a que la acción u omisión por parte del comerciante haya de revestir un carácter repetido o deba afectar a más de un consumidor. | | 2.3. Concepto de práctica comercial |
| C-13/15, Cdiscount | |  |  | | --- | --- | | — | Corresponde a las autoridades y órganos jurisdiccionales nacionales decidir si una disposición nacional está destinada a proteger los intereses de los consumidores. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| Asuntos acumulados C-544/13 y C-545/13, Abcur | |  |  | | --- | --- | | — | La aplicación de la DPCD no se excluye aun cuando a un determinado conjunto de hechos también se le aplique otra legislación de la UE. |  |  |  | | --- | --- | | — | Incluso cuando los medicamentos de uso humano, como los tratados en el procedimiento principal, están comprendidos en el ámbito de aplicación de la Directiva 2001/83/CE, las prácticas publicitarias relativas a los medicamentos, como las que se alegan en el procedimiento principal, pueden estar incluidas en el ámbito de aplicación de la Directiva 2005/29/CE, siempre que se cumplan las condiciones de aplicación de dicha Directiva. | | 1.2.1. Relación con otros actos legislativos de la UE |
| 2016 | | |
| C-310/15, Sony | |  |  | | --- | --- | | — | La venta de un ordenador sin que exista la posibilidad de que el consumidor se procure el mismo modelo de ordenador pero desprovisto de los programas preinstalados no constituye en sí misma una práctica comercial desleal en el sentido del artículo 5, apartado 2, de la DPCD, a menos que la práctica sea contraria a los requisitos de la diligencia profesional y distorsione o pueda distorsionar de manera sustancial el comportamiento económico del consumidor medio con respecto al producto. |  |  |  | | --- | --- | | — | La falta de indicación del precio de cada uno de los programas preinstalados en el ordenador no constituye una práctica comercial engañosa en el sentido del artículo 5, apartado 4, letra a), y del artículo 7 de la DPCD. | | 4.2.11. Cautividad del consumidor |
| C-476/14, Citroën | |  |  | | --- | --- | | — | En caso de conflicto entre la DPCD y el resto de las normas del Derecho de la UE que regulan aspectos concretos de las prácticas comerciales desleales, estas últimas prevalecerán y serán aplicables a esos aspectos concretos. La Directiva 98/6/CE sobre indicación de los precios prevalece en la medida en que regula aspectos específicos relativos a la indicación del precio de venta de los productos en las ofertas de venta y en la publicidad. | | 1.2.5. Interacción con la Directiva sobre indicación de los precios |
| C-611/14, Canal Digital Danmark | |  |  | | --- | --- | | — | A la hora de apreciar si una práctica debe calificarse de omisión engañosa en el sentido del artículo 7, apartados 1 y 3, se deben tener en cuenta los criterios relativos al contexto en el que se inscribe dicha práctica, aunque no esté indicada en la normativa nacional aplicable, sino únicamente en los antecedentes legislativos de dicha normativa. |  |  |  | | --- | --- | | — | El artículo 7, apartado 4, contiene una enumeración exhaustiva de la información sustancial que debe figurar en una invitación a comprar. El hecho de que el comerciante facilite la totalidad de esa información no excluye que esa invitación pueda calificarse de práctica engañosa con arreglo al artículo 6, apartado 1, o al artículo 7, apartado 2. |  |  |  | | --- | --- | | — | Cuando un comerciante fija el precio de un abono de tal modo que el consumidor debe pagar tanto una cuota mensual como una cuota semestral, esta práctica debe calificarse de omisión engañosa en virtud del artículo 7 en el caso de que en la comunicación comercial se destaque especialmente el importe de la cuota mensual, mientras que el importe de la cuota semestral se omite por completo o se presenta de forma menos notoria, si tal omisión hace que el consumidor tome una decisión sobre la transacción que de otro modo no hubiera tomado. |  |  |  | | --- | --- | | — | Cuando un comerciante divide el precio de un producto en varios componentes y pone de relieve uno de ellos, dicha práctica debe considerarse una acción engañosa con arreglo al artículo 6, apartado 1, ya que dicha práctica podría dar al consumidor medio la impresión errónea de que se le ha ofrecido un precio favorable y hacer que tome una decisión sobre una transacción que de otro modo no hubiera tomado. Las limitaciones temporales que pueden aplicarse a determinados medios de comunicación, como los anuncios televisivos, no pueden tenerse en cuenta. | | 2.8.2. Ventajas con respecto al precio  2.9.4. Contexto fáctico y limitaciones del medio de comunicación utilizado  2.9.5. Información sustancial en las invitaciones a comprar: artículo 7, apartado 4 |
| C-667/15, Loterie Nationale | |  |  | | --- | --- | | — | Una práctica comercial debe calificarse de «plan de venta piramidal» con arreglo al punto 14 del anexo I, aunque solo exista una vinculación indirecta entre las contraprestaciones realizadas por los nuevos miembros del plan y las compensaciones percibidas por los participantes anteriores. | | 3.2. Planes piramidales: punto 14 |
| C-149/15, Wathelet | |  |  | | --- | --- | | — | El intermediario puede ser calificado de «vendedor» si no ha informado debidamente al consumidor de que el vendedor de los bienes es una persona diferente y, por tanto, ha creado la impresión de que es el vendedor. El asunto se refiere a la Directiva 1999/44/CE, relativa a la venta y las garantías de los bienes de consumo, pero las conclusiones del Tribunal de Justicia tienen una relevancia más amplia para las relaciones contractuales. | | 4.2.2. Intermediación de contratos celebrados por consumidores con terceros |
| 2017 | | |
| C-562/15, Carrefour | |  |  | | --- | --- | | — | La publicidad que compara los precios aplicados en los establecimientos de tamaños o formatos superiores de su grupo con los aplicados en establecimientos de tamaños o formatos inferiores de los grupos competidores (por ejemplo, supermercados e hipermercados) podría ser ilícita en el sentido del artículo 4, párrafo primero, letras a) y c), de la Directiva 2006/114/CE, en relación con el artículo 7, apartados 1, 2 y 3, de la DPCD, a menos que se informe a los consumidores, de manera clara y mediante el propio mensaje publicitario, de que la comparación se ha llevado a cabo entre los precios aplicados en los establecimientos de tamaños o formatos superiores del grupo del anunciante y los aplicados en establecimientos de tamaños o formatos inferiores de los grupos competidores. | | 1.2.6. Interacción con la Directiva sobre publicidad engañosa y publicidad comparativa |
| C-146/16, Verband Sozialer Wettbewerb | |  |  | | --- | --- | | — | La DPCD puede aplicarse a un anuncio publicado por una plataforma que mostraba diferentes productos que no eran suministrados por la propia plataforma, sino por terceros vendedores que operaban en ella. |  |  |  | | --- | --- | | — | La publicidad debe evaluarse para comprobar si se ha proporcionado toda la información sustancial con arreglo al artículo 7, apartado 4, teniendo en cuenta al mismo tiempo las limitaciones de espacio y otras circunstancias específicas del caso. En el contexto de los anuncios publicados por plataformas en línea con un gran número de opciones de venta ofrecidas por diversos vendedores terceros, puede haber limitaciones de espacio en el sentido del artículo 7, apartado 3, que puedan justificar la omisión de la dirección geográfica y la identidad de cada comerciante. No obstante, dicha información debe comunicarse de manera sencilla y rápida al acceder a la plataforma. | | 2.9.5. Información sustancial en las invitaciones a comprar: artículo 7, apartado 4  4.2.1. Plataformas en línea y sus prácticas comerciales  4.2.6. Comercialización por medio de influentes |
| C-339/15, Luc Vanderborght | |  |  | | --- | --- | | — | La DPCD no se opone a una disposición nacional que protege la salud pública y la dignidad de la profesión de odontólogo, por una parte, prohibiendo con carácter general y absoluto toda publicidad relativa a prestaciones de tratamientos bucales y dentales y, por otra parte, estableciendo determinados requisitos de discreción en lo que se refiere a los rótulos de las consultas de odontología. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| C-357/16, Gelvora | |  |  | | --- | --- | | — | Las prácticas de cobro de deudas están incluidas en el ámbito de aplicación material de la DPCD. | | 2.3.1. Prácticas posventa, incluidas las actividades de cobro de deudas |
| C-295/16, Europamur Alimentación | |  |  | | --- | --- | | — | La DPCD se opone a las prohibiciones generales nacionales de ofertar o realizar ventas de bienes con pérdida y que establecen excepciones a dicha prohibición basadas en criterios que no figuran en la citada Directiva. | | 1.1. Ámbito de aplicación material |
| 2018 | | |
| C-632/16, Dyson/BSH | |  |  | | --- | --- | | — | La falta de información, que no exige la legislación sectorial, relativa a las circunstancias en que se efectuó la medición que dio lugar a la clasificación energética indicada en la etiqueta relativa a la clase energética de las aspiradoras no constituye una omisión engañosa. | | 1.2.1. Relación con otros actos legislativos de la UE |
| Asuntos acumulados C-54/17 y C-55/17, Wind tre, Vodafone | |  |  | | --- | --- | | — | La comercialización de tarjetas SIM en las que se habían preinstalado y preactivado unos servicios sin haber informado de modo adecuado al consumidor de dichos servicios ni de su coste se podía considerar una práctica agresiva prohibida de suministro no solicitado a tenor del punto 29 del anexo I. |  |  |  | | --- | --- | | — | A efectos de la apreciación, resulta indiferente que la utilización de los servicios haya podido requerir una acción consciente por parte del consumidor o que el consumidor haya tenido la posibilidad de desactivar los servicios, ya que, a falta de información adecuada, no cabe considerar que tal acción demuestre la existencia de una libre elección con respecto a tales servicios. | | 2.10. Artículos 8 y 9: prácticas comerciales agresivas |
| C-105/17, Kamenova | |  |  | | --- | --- | | — | Una persona que publica en un sitio de internet ocho anuncios de venta de bienes nuevos y de segunda mano no es necesariamente un «comerciante». La calificación debe tener en cuenta los diferentes criterios no taxativos enumerados en el asunto. | | 2.2. Concepto de comerciante |
| C-109/17, Bankia | |  |  | | --- | --- | | — | El artículo 11 no se opone a una normativa nacional que prohíbe al juez del procedimiento de ejecución hipotecaria controlar, de oficio o a instancia de parte, la validez del título ejecutivo en relación con la existencia de prácticas comerciales desleales y, en cualquier caso, no permite que el juez que pudiera conocer del proceso declarativo para apreciar la existencia de esas prácticas adopte medidas cautelares, tales como la suspensión del procedimiento de ejecución hipotecaria. |  |  |  | | --- | --- | | — | El artículo 11 no se opone a una normativa nacional que no confiere carácter jurídicamente vinculante a un código de conducta, como los mencionados en el artículo 10. | | 1.2.4. Interacción con la Directiva sobre cláusulas contractuales abusivas  2.8.4. Incumplimiento de los códigos de conducta |
| 2019 | | |
| C-628/17, Orange Polska | |  |  | | --- | --- | | — | La firma de un contrato en presencia de un mensajero no puede considerarse una práctica agresiva que utilice una influencia indebida en cualquier circunstancia con arreglo a los artículos 8 y 9. Debe tenerse en cuenta el comportamiento del comerciante en el caso concreto, que este produzca el efecto de ejercer presión sobre el consumidor de manera que se merme de forma significativa su libertad de elección, y que le incomode o turbe su reflexión relativa a la decisión comercial que ha de tomar. |  |  |  | | --- | --- | | — | El hecho de que no se haya dado al consumidor la oportunidad de leer previamente las cláusulas contractuales tipo no es, por sí solo, indicativo de una práctica agresiva. Sin embargo, podría ser agresivo si se combinase con la mención de que cualquier retraso en la firma del contrato o de la cláusula adicional implica que la posterior celebración del contrato o de la cláusula adicional solo será posible en condiciones menos favorables, o con el hecho de que el consumidor se exponga al pago de penalizaciones contractuales o, en el supuesto de modificación del contrato, a la suspensión de la prestación del servicio del comerciante, o si el mensajero informa al consumidor de que podría recibir una evaluación desfavorable por parte de su empresario en caso de que no firme o se demore en hacerlo. | | 2.10. Artículos 8 y 9: prácticas comerciales agresivas |
| C-393/17, Kirschstein | |  |  | | --- | --- | | — | Existe una diferencia entre las prácticas del comerciante que están estrechamente vinculadas a la promoción, la venta o el suministro de productos a los consumidores y las prácticas que se refieren al propio producto (por ejemplo, la autorización de prestadores de servicios para que puedan expedir títulos universitarios). |  |  |  | | --- | --- | | — | No puede considerarse que una norma nacional que pretende determinar el operador autorizado para prestar un servicio objeto de una operación comercial, sin regular directamente las prácticas que ese operador puede llevar a cabo después para promover o vender dicho servicio, guarde relación con una práctica comercial directamente relacionada con la prestación de dicho servicio, en el sentido de la DPCD. | | 2.3. Concepto de práctica comercial |
| Asuntos acumulados C-708/17 y C-725/17, EVN Bulgaria Toplofikatsia | |  |  | | --- | --- | | — | La DDC y la DPCD no se oponen a una normativa nacional que establece que los propietarios de una vivienda en un edificio en régimen de propiedad horizontal conectado a una red de calefacción urbana están obligados a contribuir a los gastos del consumo de energía térmica de las partes comunes y de la instalación interior del edificio, aun cuando no hayan solicitado individualmente el suministro de calefacción y no lo utilicen en su vivienda. | | 1.2.3. Interacción con la Directiva sobre los derechos de los consumidores |
| 2020 | | |
| C-393/19, Mezina | |  |  | | --- | --- | | — | En caso de conflicto entre las disposiciones del Reglamento (CE) n.o 1924/2006 y la Directiva 2005/29/CE, prevalecerán las primeras y se aplicarán a las prácticas comerciales desleales en relación con las declaraciones de propiedades saludables. | | 1.2.2. Información establecida por otros actos legislativos de la UE como información «sustancial» |
| 2021 | | |
| C-922/19, Waternet | |  |  | | --- | --- | | — | La DDC y la DPCD no regulan la formación de los contratos, por lo que corresponde a los órganos jurisdiccionales correspondientes apreciar, de conformidad con la normativa nacional, si puede considerarse celebrado un contrato entre una empresa de distribución de agua y un consumidor, sin el consentimiento expreso de este. |  |  |  | | --- | --- | | — | El concepto de «suministro no solicitado» del punto 29 del anexo I de la Directiva 2005/29/CE no abarca la práctica comercial de una empresa de distribución de agua potable consistente en mantener la conexión a la red pública de distribución de agua cuando se instala un consumidor en una vivienda que había estado previamente ocupada, ya que dicho consumidor no puede elegir el proveedor de tal servicio, este proveedor factura, en función del consumo de agua, tarifas que cubren los costes y son transparentes y no discriminatorios, y dicho consumidor sabe que la citada vivienda está conectada a la red pública de distribución de agua y que el abastecimiento de agua es de pago. | | 1.2.3. Interacción con la Directiva sobre los derechos de los consumidores 2.10. Artículos 8 y 9: prácticas comerciales agresivas |
| C-371/20, Peek & Cloppenburg | |  |  | | --- | --- | | — | El punto 11 del anexo I debe interpretarse en el sentido de que la promoción de un producto por la publicación de un contenido editorial «está pagado» por un comerciante, cuando este comerciante proporciona una contrapartida con valor patrimonial por esta publicación, ya sea en forma de abono de una cantidad de dinero o en cualquier otra forma, siempre que concurra un vínculo cierto entre el pago proporcionado por el referido comerciante y la mencionada publicación. Es así, especialmente, en lo relativo a la concesión gratuita por el comerciante mismo de imágenes amparadas por derechos de autor, en las que son visibles los locales comerciales del comerciante y los productos comercializados por este. | | 4.2.5. Comercialización por medio de influentes |

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